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Sabarimala Women Entry Verdict LIVE Update; Supreme Court | Hindu Beliefs

Sabarimala Women Entry Verdict LIVE Update; Supreme Court | Hindu Beliefs
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नई दिल्ली6 मिनट पहले

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सुप्रीम कोर्ट में छठे दिन सुनवाई जारी है। कोर्ट ने मंदिर के मुख्य पुजारी (तंत्री) से सवाल किया कि क्या संविधान उस भक्त की मदद के लिए आगे नहीं आएगा, जिसे केवल उसके वंश और जन्म के कारण देवता को छूने से रोक दिया जाता है।

इस पर सबरीमाला के वकील एडवोकेट गिरी ने कहा किसी भी मंदिर में होने वाले रीति-रिवाज उस धर्म का अभिन्न हिस्सा होते हैं। पूजा देवता की विशेषताओं के उलट नहीं हो सकती। भगवान अयप्पा ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ हैं, इसलिए वहां की परंपराएं उसी के अनुरूप तय की गई हैं।

सुप्रीम कोर्ट में 9 जजों की संवैधानिक बेंच सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री से जुड़े मामले पर सुनवाई कर रही है। इसके साथ धार्मिक आस्था के 66 मामले और जुड़े हैं। जिसका फैसला कल आने की संभावना है।

केरल हाईकोर्ट ने 1991 में सबरीमाला में मासिक धर्म वाली महिलाओं (10-50 साल) की एंट्री पर रोक लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में बैन हटा दिया। फैसले के खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं लगाई गईं, जिसपर अब सुनवाई हो रही है। मंदिर प्रशासन महिलाओं की एंट्री का विरोध कर रहा है।

17 अप्रैल की सुनवाई में कोर्ट ने कहा था कि आस्था से जुड़े मामलों का फैसला करते समय, संविधान को व्यक्तिगत धार्मिक मान्यताओं से ऊपर रखना चाहिए। जब मुद्दा संवैधानिक अधिकारों का हो, तो केवल ‘धर्म’ की दुहाई देकर उसे न्यायिक समीक्षा से बाहर नहीं रखा जा सकता।

7 सवाल, जिनपर सुप्रीम कोर्ट में बहस हो रही

सबरीमाला मामले पर 7 अप्रैल से शुरू हुई सुनवाई

सबरीमाला मंदिर मामले पर 7 अप्रैल से सुनवाई शुरू हुई है। पहले 3 दिन, 9 अप्रैल तक सुनवाई हुई। इस दौरान केंद्र सरकार ने महिलाओं की एंट्री के विरोध में दलीलें रखीं। सरकार ने कहा था कि देश के कई देवी मंदिरों में पुरुषों की एंट्री भी बैन है, इसलिए धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए।

पिछले 5 दिन की सुनवाई में क्या हुआ, पढ़िए…

7 अप्रैल : केंद्र की दलील- मंदिर में महिलाओं की एंट्री का फैसला गलत

8 अप्रैल- जो भक्त नहीं, वो धार्मिक परंपरा को चुनौती कैसे दे रहा

9 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट बोला- मंदिरों में एंट्री रोकने से समाज बंटेगा

15 अप्रैल- सबरीमाला मैनेजमेंट बोला- अयप्पा मंदिर रेस्टोरेंट नहीं, यहां ब्रह्मचारी देवता

17 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट बोला- संविधान सबसे ऊपर, निजी धार्मिक मान्यताओं से उठकर फैसला जरूरी

सबरीमाला केस से जुड़ी सुप्रीम कोर्ट में पल-पल की अपडेट्स के लिए नीचे के ब्लॉग से गुजर जाएं…

लाइव अपडेट्स

6 मिनट पहले

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सबरीमाला के वकील बोले- मुझे अपने धर्म का पालन करने का अधिकार

सबरीमाला के वकील: संविधान के आर्टिकल 25(1) के तहत मुझे अपने धर्म का पालन करने का अधिकार है। मैं इसमें विश्वास रखता हूं, इसलिए जब मैं पूजा करने जाता हूं तो मैं वहां के देवता में विश्वास रखता हूं।

ऐसा नहीं हो सकता कि मेरा वहां विश्वास न हो, और फिर भी मैं पूजा करने के उद्देश्य से किसी पूजा स्थल पर जाऊं।

मंदिर में जाकर यह पता लगाने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता कि वहां के देवी-देवताओं की विशेषताएं क्या हैं।

16 मिनट पहले

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सरकारी कार्रवाई से मूर्ति अपवित्र हो, तो यह आस्था में हस्तक्षेप

सबरीमाला के वकील: सभी सांप्रदायिक मंदिरों में यह एक सामान्य नियम है कि किसी विशेष देवता की पूजा के लिए पूजा करने वाले अर्चक को, अनुष्ठानों में पारंगत होना चाहिए। साथ ही साथ एक विशेष संप्रदाय से भी होना चाहिए।

माना जाता है कि किसी दूसरे संप्रदाय का अर्चक अपने स्पर्श से मूर्ति को अपवित्र कर देता है। सभी उपासकों की धार्मिक आस्था का मूल तत्व यही है कि किसी भी दशा में मूर्ति अपवित्र नहीं होनी चाहिए। मंदिर-पूजा के मामले में अर्चक की जगह बहुत अहम है।

कोई भी सरकारी कार्रवाई, जिसके कारण अर्चक के छूने से मूर्ति अपवित्र हो जाती हो, वह हिंदू उपासक की धार्मिक आस्था और प्रथाओं में जबरदस्त हस्तक्षेप मानी जाएगी।

08:28 AM21 अप्रैल 2026

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एडवोकेट वीवी गिरी छठे दिन की सुनवाई में सबसे पहले दलीलें रख रहे

एडवोकेट गिरी: ब्रह्म पुराण कहता है कि जब कोई मूर्ति दो टुकड़ों में टूट जाती है। कणों में बदल जाती है। जल जाती है। अपने आसन से हटा दी जाती है। अपमानित होती है। उसकी पूजा बंद हो जाती है। बंदर जैसे जानवरों और अपवित्र भूमि से छू जाती है। बाकी देवताओं के मंत्रों से उसकी पूजा की जाती है या फिर अपवित्र हो जाती है…तो इन दस हालात में ईश्वर उसमें निवास करना बंद कर देता है।

इस मामले में आगम बहुत सख्त हैं। पार्थसारथी पट्टाचार्य ने एक याचिका दायर की है जिसमें वैकंठ सूत्र का जिक्र है। वैखानस शास्त्र के मूल पाठ के अनुसार, जो लोग भृगु, अत्रि, मरीचि और कश्यप, इन चार ऋषि परंपराओं के अनुयायी हैं, और वैकंठ माता-पिता से जन्मे हैं, केवल वही वैष्णव संप्रदाय के वैखानस मंदिरों में पूजा कर सकते हैं।

केवल वही मूर्तियों को छू सकते हैं। धार्मिक अनुष्ठान, रस्में कर सकते हैं। इनके अलावा कोई और व्यक्ति, चाहे वह समाज में किसी भी ऊंचे पद पर हो, जैसे कि धर्माचार्य/आचार्य, यहां तक कि अन्य स्वामी भी मूर्तियों को छू नहीं सकता, पूजा नहीं कर सकता, और न ही गर्भगृह में प्रवेश कर सकता है। यहां तक कि किसी दूसरे आगम से जुड़ा व्यक्ति भी वैकंठ मंदिरों में पूजा करने के योग्य नहीं है।

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इस पर सबरीमाला के वकील एडवोकेट गिरी ने कहा किसी भी मंदिर में होने वाले रीति-रिवाज उस धर्म का अभिन्न हिस्सा होते हैं। पूजा देवता की विशेषताओं के उलट नहीं हो सकती। भगवान अयप्पा ‘नैष्ठिक ब्रह्मचारी’ हैं, इसलिए वहां की परंपराएं उसी के अनुरूप तय की गई हैं।

सुप्रीम कोर्ट में 9 जजों की संवैधानिक बेंच सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री से जुड़े मामले पर सुनवाई कर रही है। इसके साथ धार्मिक आस्था के 66 मामले और जुड़े हैं। जिसका फैसला कल आने की संभावना है।

केरल हाईकोर्ट ने 1991 में सबरीमाला में मासिक धर्म वाली महिलाओं (10-50 साल) की एंट्री पर रोक लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में बैन हटा दिया। फैसले के खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं लगाई गईं, जिसपर अब सुनवाई हो रही है। मंदिर प्रशासन महिलाओं की एंट्री का विरोध कर रहा है।

17 अप्रैल की सुनवाई में कोर्ट ने कहा था कि आस्था से जुड़े मामलों का फैसला करते समय, संविधान को व्यक्तिगत धार्मिक मान्यताओं से ऊपर रखना चाहिए। जब मुद्दा संवैधानिक अधिकारों का हो, तो केवल ‘धर्म’ की दुहाई देकर उसे न्यायिक समीक्षा से बाहर नहीं रखा जा सकता।

7 सवाल, जिनपर सुप्रीम कोर्ट में बहस हो रही

सबरीमाला मामले पर 7 अप्रैल से शुरू हुई सुनवाई

सबरीमाला मंदिर मामले पर 7 अप्रैल से सुनवाई शुरू हुई है। पहले 3 दिन, 9 अप्रैल तक सुनवाई हुई। इस दौरान केंद्र सरकार ने महिलाओं की एंट्री के विरोध में दलीलें रखीं। सरकार ने कहा था कि देश के कई देवी मंदिरों में पुरुषों की एंट्री भी बैन है, इसलिए धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए।

पिछले 5 दिन की सुनवाई में क्या हुआ, पढ़िए…

7 अप्रैल : केंद्र की दलील- मंदिर में महिलाओं की एंट्री का फैसला गलत

8 अप्रैल- जो भक्त नहीं, वो धार्मिक परंपरा को चुनौती कैसे दे रहा

9 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट बोला- मंदिरों में एंट्री रोकने से समाज बंटेगा

15 अप्रैल- सबरीमाला मैनेजमेंट बोला- अयप्पा मंदिर रेस्टोरेंट नहीं, यहां ब्रह्मचारी देवता

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सबरीमाला के वकील: संविधान के आर्टिकल 25(1) के तहत मुझे अपने धर्म का पालन करने का अधिकार है। मैं इसमें विश्वास रखता हूं, इसलिए जब मैं पूजा करने जाता हूं तो मैं वहां के देवता में विश्वास रखता हूं।

ऐसा नहीं हो सकता कि मेरा वहां विश्वास न हो, और फिर भी मैं पूजा करने के उद्देश्य से किसी पूजा स्थल पर जाऊं।

मंदिर में जाकर यह पता लगाने का तो कोई सवाल ही नहीं उठता कि वहां के देवी-देवताओं की विशेषताएं क्या हैं।

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माना जाता है कि किसी दूसरे संप्रदाय का अर्चक अपने स्पर्श से मूर्ति को अपवित्र कर देता है। सभी उपासकों की धार्मिक आस्था का मूल तत्व यही है कि किसी भी दशा में मूर्ति अपवित्र नहीं होनी चाहिए। मंदिर-पूजा के मामले में अर्चक की जगह बहुत अहम है।

कोई भी सरकारी कार्रवाई, जिसके कारण अर्चक के छूने से मूर्ति अपवित्र हो जाती हो, वह हिंदू उपासक की धार्मिक आस्था और प्रथाओं में जबरदस्त हस्तक्षेप मानी जाएगी।

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एडवोकेट गिरी: ब्रह्म पुराण कहता है कि जब कोई मूर्ति दो टुकड़ों में टूट जाती है। कणों में बदल जाती है। जल जाती है। अपने आसन से हटा दी जाती है। अपमानित होती है। उसकी पूजा बंद हो जाती है। बंदर जैसे जानवरों और अपवित्र भूमि से छू जाती है। बाकी देवताओं के मंत्रों से उसकी पूजा की जाती है या फिर अपवित्र हो जाती है…तो इन दस हालात में ईश्वर उसमें निवास करना बंद कर देता है।

इस मामले में आगम बहुत सख्त हैं। पार्थसारथी पट्टाचार्य ने एक याचिका दायर की है जिसमें वैकंठ सूत्र का जिक्र है। वैखानस शास्त्र के मूल पाठ के अनुसार, जो लोग भृगु, अत्रि, मरीचि और कश्यप, इन चार ऋषि परंपराओं के अनुयायी हैं, और वैकंठ माता-पिता से जन्मे हैं, केवल वही वैष्णव संप्रदाय के वैखानस मंदिरों में पूजा कर सकते हैं।

केवल वही मूर्तियों को छू सकते हैं। धार्मिक अनुष्ठान, रस्में कर सकते हैं। इनके अलावा कोई और व्यक्ति, चाहे वह समाज में किसी भी ऊंचे पद पर हो, जैसे कि धर्माचार्य/आचार्य, यहां तक कि अन्य स्वामी भी मूर्तियों को छू नहीं सकता, पूजा नहीं कर सकता, और न ही गर्भगृह में प्रवेश कर सकता है। यहां तक कि किसी दूसरे आगम से जुड़ा व्यक्ति भी वैकंठ मंदिरों में पूजा करने के योग्य नहीं है।

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