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SC on Religious Practices: Hundreds of Cases, Societal Impact

SC on Religious Practices: Hundreds of Cases, Societal Impact
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  • SC On Religious Practices: Hundreds Of Cases, Societal Impact | Sabarimala

नई दिल्ली23 मिनट पहले

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सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को कहा कि अगर लोग धार्मिक प्रथाओं और धर्म के मामलों को संवैधानिक अदालत में चुनौती देने लगेंगे, तो इससे धर्म और सभ्यता पर असर पड़ सकता है। कोर्ट ने कहा कि इससे सैकड़ों याचिकाएं आएंगी और हर रिवाज पर सवाल उठने लगेंगे।

यह टिप्पणी नौ जजों की संविधान पीठ ने की, जो अलग-अलग धर्मों में धार्मिक आजादी के दायरे और महिलाओं के साथ भेदभाव से जुड़े मामलों की सुनवाई कर रही है। इसमें केरल के सबरीमाला मंदिर से जुड़ा मामला और दाऊदी बोहरा समुदाय का केस भी शामिल है।

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को 40 साल पुरानी जनहित याचिका (PIL) की वैधता पर सवाल उठाए थे।

7 सवाल, जिन पर बहस हो रही…

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अगर हर व्यक्ति धार्मिक प्रथाओं पर सवाल उठाएगा, तो भारतीय समाज पर असर पड़ेगा, क्योंकि यहां धर्म समाज से गहराई से जुड़ा है। उन्होंने कहा, हर अधिकार पर सवाल उठेंगे-मंदिर खुलने या बंद होने तक के मामले कोर्ट में आएंगे।

जस्टिस एम एम सुन्द्रेश ने कहा कि अगर ऐसे विवादों को लगातार अनुमति दी गई, तो हर व्यक्ति हर चीज पर सवाल उठाएगा। उन्होंने कहा कि इससे धर्म टूट सकते हैं और संवैधानिक अदालतों पर भी असर पड़ेगा।

मामला दाऊदी बोहरा समुदाय से जुड़ा

यह मामला दाऊदी बोहरा समुदाय से जुड़ा है। समुदाय के केंद्रीय बोर्ड ने 1986 में जनहित याचिका दायर की थी, जिसमें 1962 के फैसले को चुनौती दी गई थी। उस फैसले में बॉम्बे प्रिवेंशन ऑफ एक्सकम्युनिकेशन एक्ट, 1949 रद्द कर दिया गया था। इस कानून के तहत किसी सदस्य को समुदाय से बाहर करना गैरकानूनी था।

1962 के फैसले में कहा गया था कि धार्मिक आधार पर किसी सदस्य को समुदाय से बाहर करना, समुदाय के धार्मिक मामलों के प्रबंधन का हिस्सा है। इसलिए 1949 का कानून संविधान के अनुच्छेद 26(बी) के तहत मिले अधिकारों का उल्लंघन करता है।

धार्मिक प्रथाओं पर सवाल कहां और कैसे उठाए जाएं

सुधारवादी दाऊदी बोहरा समूह की ओर से वरिष्ठ वकील राजू रामचंद्रन ने कोर्ट में दलील दी कि अगर कोई प्रथा सामाजिक या निजी कारणों से जुड़ी है, तो उसे संविधान के अनुच्छेद 25 और 26 के तहत धार्मिक सुरक्षा नहीं मिलनी चाहिए।

उन्होंने कहा कि कोई भी प्रथा अगर मौलिक अधिकारों पर नकारात्मक असर डालती है, तो उसे सीमित किया जा सकता है।

इस पर जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि यह तय करना जरूरी है कि धार्मिक प्रथाओं पर सवाल कहां और कैसे उठाए जाएं-क्या यह समुदाय के भीतर होना चाहिए या राज्य या कोर्ट को दखल देना चाहिए। उन्होंने कहा कि भारत की पहचान उसकी विविधता और सभ्यता से है, और धर्म इसमें एक स्थायी तत्व है। इसे तोड़ना सही नहीं होगा।

सबरीमाला मामले पर 7 अप्रैल से सुनवाई हुई

सबरीमाला मंदिर मामले पर 7 अप्रैल से सुनवाई शुरू हुई थी। इस दौरान केंद्र सरकार ने महिलाओं की एंट्री के विरोध में दलीलें रखीं। सरकार ने कहा था कि देश के कई देवी मंदिरों में पुरुषों की एंट्री भी बैन है, इसलिए धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए।

पिछली 9 सुनवाई में क्या हुआ, पढ़िए…

7 अप्रैल : केंद्र की दलील- मंदिर में महिलाओं की एंट्री का फैसला गलत

8 अप्रैल- जो भक्त नहीं, वो धार्मिक परंपरा को चुनौती कैसे दे रहा

9 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट बोला- मंदिरों में एंट्री रोकने से समाज बंटेगा

15 अप्रैल- सबरीमाला मैनेजमेंट बोला- अयप्पा मंदिर रेस्टोरेंट नहीं, यहां ब्रह्मचारी देवता

17 अप्रैल- SC बोला- संविधान सबसे ऊपर, निजी धार्मिक मान्यताओं से उठकर फैसला जरूरी

21 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट ने पूछा-छूने से देवता अपवित्र कैसे होते हैं

22 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट बोला- हिंदू एकजुट रहें, संप्रदायों में बंटे नहीं

23 अप्रैल- इस्लाम में महिलाओं के मस्जिद आने पर रोक नहीं

28 अप्रैल- धार्मिक प्रथाओं के नाम पर सड़कें ब्लॉक नहीं कर सकते

29 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट बोला- धर्म के विनाश का हिस्सा नहीं बनेंगे

5 मई- सबरीमाला केस में वकीलों ने याचिका लगाई; जज ने कहा- अपने लोगों के लिए काम करें

6 मई- सबरीमाला केस, सुप्रीम कोर्ट बोला बार-बार रुख नहीं बदल सकते

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ये खबर भी पढ़ें:

सबरीमाला केस, सुप्रीम कोर्ट बोला बार-बार रुख नहीं बदल सकते:बोहरा समाज में बहिष्कार और धार्मिक अधिकारों पर 1986 की PIL की वैधता पर सवाल उठाए

सुप्रीम कोर्ट में बुधवार को सबरीमाला मामले की सुनवाई हुई। कोर्ट ने 40 साल पुरानी जनहित याचिका ( PIL) की वैधता पर सवाल उठाए। यह याचिका दाऊदी बोहरा समुदाय में बहिष्कार (एक्सकम्युनिकेशन) के अधिकार और उसके संवैधानिक संरक्षण से जुड़ी है। कोर्ट ने कहा कि उसे पुराने फैसले के साथ रहना होगा और वह अपना रुख अचानक नहीं बदल सकता। पढ़ें पूरी खबर…

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7 सवाल, जिन पर बहस हो रही…

जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अगर हर व्यक्ति धार्मिक प्रथाओं पर सवाल उठाएगा, तो भारतीय समाज पर असर पड़ेगा, क्योंकि यहां धर्म समाज से गहराई से जुड़ा है। उन्होंने कहा, हर अधिकार पर सवाल उठेंगे-मंदिर खुलने या बंद होने तक के मामले कोर्ट में आएंगे।

जस्टिस एम एम सुन्द्रेश ने कहा कि अगर ऐसे विवादों को लगातार अनुमति दी गई, तो हर व्यक्ति हर चीज पर सवाल उठाएगा। उन्होंने कहा कि इससे धर्म टूट सकते हैं और संवैधानिक अदालतों पर भी असर पड़ेगा।

मामला दाऊदी बोहरा समुदाय से जुड़ा

यह मामला दाऊदी बोहरा समुदाय से जुड़ा है। समुदाय के केंद्रीय बोर्ड ने 1986 में जनहित याचिका दायर की थी, जिसमें 1962 के फैसले को चुनौती दी गई थी। उस फैसले में बॉम्बे प्रिवेंशन ऑफ एक्सकम्युनिकेशन एक्ट, 1949 रद्द कर दिया गया था। इस कानून के तहत किसी सदस्य को समुदाय से बाहर करना गैरकानूनी था।

1962 के फैसले में कहा गया था कि धार्मिक आधार पर किसी सदस्य को समुदाय से बाहर करना, समुदाय के धार्मिक मामलों के प्रबंधन का हिस्सा है। इसलिए 1949 का कानून संविधान के अनुच्छेद 26(बी) के तहत मिले अधिकारों का उल्लंघन करता है।

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28 अप्रैल- धार्मिक प्रथाओं के नाम पर सड़कें ब्लॉक नहीं कर सकते

29 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट बोला- धर्म के विनाश का हिस्सा नहीं बनेंगे

5 मई- सबरीमाला केस में वकीलों ने याचिका लगाई; जज ने कहा- अपने लोगों के लिए काम करें

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