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Supreme Court Dismisses Hate Speech Petitions; Cant Force Parliament Lawmaking

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नई दिल्ली10 मिनट पहले

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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को हेट स्पीच से जुड़ी याचिकाएं खारिज करते हुए कहा कि अदालत संसद को कानून बनाने के लिए मजबूर नहीं कर सकती। कोर्ट ने कहा कि इस मुद्दे पर कानून बनाना विधायिका का अधिकार है। अदालत केवल जरूरत की ओर ध्यान दिला सकती है।

जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि नीति बनाना और कानून तैयार करना विधायिका के दायरे में आता है। अदालत इसमें दखल नहीं दे सकती।

कोर्ट ने यह फैसला उन याचिकाओं पर दिया, जिनमें केंद्र सरकार को हेट स्पीच और अफवाह फैलाने से जुड़े कानूनों की समीक्षा कर नया कानून बनाने का निर्देश देने की मांग की गई थी।

कोर्ट बोला- हेट स्पीच को लेकर कानून में कोई खालीपन नहीं

बेंच ने कहा कि मौजूदा कानूनी ढांचा हेट स्पीच जैसे मामलों से निपटने के लिए सक्षम है। समस्या कानून की कमी नहीं, बल्कि उसके लागू होने में देरी या असमानता की है। कोर्ट के मुताबिक कई मामलों में कार्रवाई समय पर नहीं होती या एक जैसी नहीं होती।

कोर्ट ने कहा कि यह कहना सही नहीं है कि इस क्षेत्र में कोई कानूनी खालीपन है। कानून मौजूद हैं और उनमें ऐसे प्रावधान हैं, जो सार्वजनिक व्यवस्था बिगाड़ने या समुदायों के बीच तनाव फैलाने वाले व्यवहार से निपट सकते हैं। दिक्कत कानून की कमी नहीं, बल्कि उसके लागू होने के तरीके में है। कई मामलों में कार्रवाई में देरी होती है या कानूनी प्रक्रियाओं का इस्तेमाल एक जैसा नहीं होता।

SC की 5 मुख्य बातें…

  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसका काम नए अपराध तय करना या अलग से कोई नया ढांचा बनाना नहीं है, बल्कि मौजूदा कानूनों का सही तरीके से पालन सुनिश्चित करना है।
  • केवल तब हस्तक्षेप किया जा सकता है, जब कानून लागू करने में स्पष्ट विफलता दिखे। जहां पूरा कानूनी ढांचा मौजूद है, वहां अदालत को संयम रखना चाहिए और शक्तियों के विभाजन के सिद्धांत का पालन करना चाहिए।
  • संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र का अहम आधार है, लेकिन यह असीमित नहीं है। सार्वजनिक व्यवस्था, गरिमा और सामाजिक सौहार्द के लिए इस पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
  • ऐसा भाषण जो समाज में नफरत फैलाए या समुदायों के बीच तनाव बढ़ाए, वह लोकतंत्र को मजबूत नहीं करता, बल्कि भाईचारे, गरिमा और समानता के मूल्यों को नुकसान पहुंचाता है। हेट स्पीच अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का विकृत रूप है।
  • केंद्र और राज्य सरकारें अपने विवेक से तय कर सकती हैं कि बदलती परिस्थितियों में नए कानून या संशोधन की जरूरत है या नहीं, जिसमें लॉ कमीशन की 2017 की 267वीं रिपोर्ट के सुझाव भी शामिल हो सकते हैं।

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  • सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उसका काम नए अपराध तय करना या अलग से कोई नया ढांचा बनाना नहीं है, बल्कि मौजूदा कानूनों का सही तरीके से पालन सुनिश्चित करना है।
  • केवल तब हस्तक्षेप किया जा सकता है, जब कानून लागू करने में स्पष्ट विफलता दिखे। जहां पूरा कानूनी ढांचा मौजूद है, वहां अदालत को संयम रखना चाहिए और शक्तियों के विभाजन के सिद्धांत का पालन करना चाहिए।
  • संविधान के अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र का अहम आधार है, लेकिन यह असीमित नहीं है। सार्वजनिक व्यवस्था, गरिमा और सामाजिक सौहार्द के लिए इस पर उचित प्रतिबंध लगाए जा सकते हैं।
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  • केंद्र और राज्य सरकारें अपने विवेक से तय कर सकती हैं कि बदलती परिस्थितियों में नए कानून या संशोधन की जरूरत है या नहीं, जिसमें लॉ कमीशन की 2017 की 267वीं रिपोर्ट के सुझाव भी शामिल हो सकते हैं।

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