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अमेरिका से पैसा निकालने लगे दुनिया के बड़े निवेशक:40 ट्रिलियन डॉलर के कर्ज से बढ़ी चिंता, सोना खरीद रहे, चीन में निवेश बढ़ा रहे

अमेरिका से पैसा निकालने लगे दुनिया के बड़े निवेशक:40 ट्रिलियन डॉलर के कर्ज से बढ़ी चिंता, सोना खरीद रहे, चीन में निवेश बढ़ा रहे

अमेरिका पर 40 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा का कर्ज है। इसके साथ ब्याज दरें, टैरिफ और दूसरे देशों पर लगाए जा रहे आर्थिक प्रतिबंध भी बढ़ रहे हैं। इससे दुनिया के कुछ निवेशक अब सोच रहे हैं कि अपना पैसा अमेरिका के अलावा कहां लगाया जाए। कुछ बड़े सरकारी फंड अमेरिकी बॉन्ड में निवेश घटा रहे हैं। कई देशों के केंद्रीय बैंक सोना खरीदकर अपना भंडार बढ़ा रहे हैं। वहीं, जर्मनी की कंपनियों ने 2026 की पहली छमाही में अमेरिका में निवेश कम किया और चीन में निवेश बढ़ाया। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि दुनिया अमेरिका से पूरी तरह दूर हो रही है। डॉलर अभी भी दुनिया की सबसे बड़ी रिजर्व करेंसी है और अमेरिकी शेयर बाजार व बॉन्ड में अब भी बड़ी मात्रा में पैसा लगा हुआ है। अमेरिका को कर्ज लेने के लिए ज्यादा ब्याज देना पड़ रहा अमेरिकी बॉन्ड बाजार में निवेशकों की चिंता अब साफ दिखने लगी है। 10 साल के अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड सितंबर में करीब 5% तक पहुंच गई। 11 सितंबर को यह 4.93% थी, जबकि इससे पहले 4.979% तक पहुंच चुकी थी। आसान भाषा में समझें तो यील्ड बढ़ने का मतलब है कि अमेरिका को कर्ज लेने के लिए निवेशकों को ज्यादा ब्याज देना पड़ रहा है। यानी सरकार के लिए कर्ज लेना महंगा होता जा रहा है। इसका असर आगे चलकर सरकारी खर्च पर भी पड़ सकता है। बॉन्ड में निवेशकों की दिलचस्पी बनाए रखने के लिए अमेरिकी ट्रेजरी पुराने बॉन्ड की खरीद बढ़ा रहा है। हालांकि, ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट का कहना है कि अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था मजबूत है और बॉन्ड की हाल की नीलामियां अच्छी रही हैं। नॉर्वे अमेरिकी बॉन्ड में निवेश घटा सकता है अमेरिका से निवेश कम करने वालों में नॉर्वे का सरकारी फंड भी शामिल है। करीब 2.3 ट्रिलियन डॉलर (₹218.5 लाख करोड़) का यह फंड अमेरिकी सरकारी बॉन्ड में अपना पैसा कम करने की योजना बना रहा है। नॉर्वे के फंड में सरकारी बॉन्ड का हिस्सा 70% से घटाकर 50% करने का प्रस्ताव है। इसमें सबसे बड़ी कटौती अमेरिकी बॉन्ड में होने की संभावना है। इससे अमेरिका के बॉन्ड में नॉर्वे का निवेश करीब 80 अरब डॉलर तक कम हो सकता है। हालांकि, नॉर्वे सिर्फ अमेरिका से दूरी बनाने के लिए यह बदलाव नहीं कर रहा। वह जापान के सरकारी बॉन्ड और दूसरे तरह के बॉन्ड में पैसा लगाने पर भी विचार कर रहा है। इसका मकसद अपना पैसा अलग-अलग जगह लगाना और बेहतर कमाई के मौके तलाशना है। जर्मन कंपनियों का अमेरिका में निवेश 65% घटा, चीन में एक-तिहाई बढ़ा अमेरिका और चीन में जर्मन कंपनियों के निवेश के आंकड़ों में इस साल बड़ा फर्क दिखा है। 2026 की पहली छमाही में अमेरिका में उनका निवेश 65% घटकर 4.3 अरब यूरो रह गया। वहीं, चीन में निवेश करीब एक-तिहाई बढ़कर 5.6 अरब यूरो पहुंच गया। जर्मन इकोनॉमिक इंस्टीट्यूट की स्टडी के मुताबिक, अमेरिका में जर्मन कंपनियों का निवेश ऐसे समय घटा है, जब ट्रम्प की टैरिफ और व्यापार नीतियों को लेकर कारोबार में अनिश्चितता बनी हुई है। वहीं, चीन में पहले से काम कर रही जर्मन कंपनियां अपने कारोबार में लगातार पैसा लगा रही हैं। डॉलर की हिस्सेदारी धीरे-धीरे घट रही डॉलर अभी भी दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली रिजर्व करेंसी है। लेकिन दुनिया के केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर का हिस्सा धीरे-धीरे कम कर रहे हैं। आईएमएफ के मुताबिक, 2025 की आखिरी तिमाही में दुनिया के विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की हिस्सेदारी 56.77% थी। इससे पिछली तिमाही में यह 56.93% थी। वहीं, चीन की मुद्रा रेनमिन्बी की हिस्सेदारी सिर्फ 1.95% थी। इसका मतलब यह नहीं है कि चीन की मुद्रा अभी डॉलर की जगह लेने वाली है। डॉलर की पकड़ अब भी बहुत मजबूत है। बस कुछ देश अपने पैसे को अलग-अलग जगह रख रहे हैं। वे डॉलर के साथ दूसरी मुद्राओं और सोने में भी अपना भंडार बढ़ा रहे हैं। केंद्रीय बैंक लगातार सोना खरीद रहे डॉलर के साथ अब सोना भी केंद्रीय बैंकों के लिए अहम रिजर्व बनता जा रहा है। कई देश अपने विदेशी मुद्रा भंडार में सोने का हिस्सा बढ़ा रहे हैं। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक, दुनिया के केंद्रीय बैंकों ने 2025 में कुल 863 टन सोना खरीदा। यह 2024 के मुकाबले कम था, लेकिन लंबे समय के औसत से अब भी काफी ज्यादा रहा। 2022 से 2025 के बीच केंद्रीय बैंकों ने हर साल औसतन करीब 1,000 टन सोना खरीदा। यानी सोने को रिजर्व में शामिल करने का चलन पिछले कुछ सालों से लगातार बना हुआ है। 2026 में भी खरीद जारी चीन-भारत में भी सोने की मांग बढ़ी सोने की बढ़ती मांग सिर्फ केंद्रीय बैंकों तक सीमित नहीं है। आम निवेशक भी सोने में ज्यादा पैसा लगा रहे हैं। 2025 में चीन में सोने की निवेश मांग 28% बढ़ी। भारत में भी सोने में निवेश की मांग 17% बढ़ी। दोनों देशों के बाजारों ने मिलकर दुनिया में सोने की छड़ों और सिक्कों की कुल मांग का आधे से ज्यादा हिस्सा अपने नाम किया। यानी सोने की मांग दो तरफ से बढ़ रही है। एक ओर केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार में सोना बढ़ा रहे हैं, तो दूसरी ओर चीन और भारत जैसे बड़े बाजारों में आम निवेशक भी सोने को निवेश का विकल्प मान रहे हैं। अमेरिका की आर्थिक ताकत अभी भी बरकरार इन बदलावों के बावजूद अमेरिका की आर्थिक ताकत अभी खत्म नहीं हुई है। दुनिया के विदेशी मुद्रा भंडार में आज भी डॉलर की हिस्सेदारी 56% से ज्यादा है। अमेरिकी शेयर बाजार और सरकारी बॉन्ड में भी दूसरे देशों का पैसा लगा हुआ है। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट का कहना है कि अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था पर लोगों का भरोसा बना हुआ है और सरकारी बॉन्ड की नीलामी भी अच्छी चल रही है।

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अमेरिका से पैसा निकालने लगे दुनिया के बड़े निवेशक:40 ट्रिलियन डॉलर के कर्ज से बढ़ी चिंता, सोना खरीद रहे, चीन में निवेश बढ़ा रहे

अमेरिका पर 40 ट्रिलियन डॉलर से ज्यादा का कर्ज है। इसके साथ ब्याज दरें, टैरिफ और दूसरे देशों पर लगाए जा रहे आर्थिक प्रतिबंध भी बढ़ रहे हैं। इससे दुनिया के कुछ निवेशक अब सोच रहे हैं कि अपना पैसा अमेरिका के अलावा कहां लगाया जाए। कुछ बड़े सरकारी फंड अमेरिकी बॉन्ड में निवेश घटा रहे हैं। कई देशों के केंद्रीय बैंक सोना खरीदकर अपना भंडार बढ़ा रहे हैं। वहीं, जर्मनी की कंपनियों ने 2026 की पहली छमाही में अमेरिका में निवेश कम किया और चीन में निवेश बढ़ाया। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि दुनिया अमेरिका से पूरी तरह दूर हो रही है। डॉलर अभी भी दुनिया की सबसे बड़ी रिजर्व करेंसी है और अमेरिकी शेयर बाजार व बॉन्ड में अब भी बड़ी मात्रा में पैसा लगा हुआ है। अमेरिका को कर्ज लेने के लिए ज्यादा ब्याज देना पड़ रहा अमेरिकी बॉन्ड बाजार में निवेशकों की चिंता अब साफ दिखने लगी है। 10 साल के अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड की यील्ड सितंबर में करीब 5% तक पहुंच गई। 11 सितंबर को यह 4.93% थी, जबकि इससे पहले 4.979% तक पहुंच चुकी थी। आसान भाषा में समझें तो यील्ड बढ़ने का मतलब है कि अमेरिका को कर्ज लेने के लिए निवेशकों को ज्यादा ब्याज देना पड़ रहा है। यानी सरकार के लिए कर्ज लेना महंगा होता जा रहा है। इसका असर आगे चलकर सरकारी खर्च पर भी पड़ सकता है। बॉन्ड में निवेशकों की दिलचस्पी बनाए रखने के लिए अमेरिकी ट्रेजरी पुराने बॉन्ड की खरीद बढ़ा रहा है। हालांकि, ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट का कहना है कि अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था मजबूत है और बॉन्ड की हाल की नीलामियां अच्छी रही हैं। नॉर्वे अमेरिकी बॉन्ड में निवेश घटा सकता है अमेरिका से निवेश कम करने वालों में नॉर्वे का सरकारी फंड भी शामिल है। करीब 2.3 ट्रिलियन डॉलर (₹218.5 लाख करोड़) का यह फंड अमेरिकी सरकारी बॉन्ड में अपना पैसा कम करने की योजना बना रहा है। नॉर्वे के फंड में सरकारी बॉन्ड का हिस्सा 70% से घटाकर 50% करने का प्रस्ताव है। इसमें सबसे बड़ी कटौती अमेरिकी बॉन्ड में होने की संभावना है। इससे अमेरिका के बॉन्ड में नॉर्वे का निवेश करीब 80 अरब डॉलर तक कम हो सकता है। हालांकि, नॉर्वे सिर्फ अमेरिका से दूरी बनाने के लिए यह बदलाव नहीं कर रहा। वह जापान के सरकारी बॉन्ड और दूसरे तरह के बॉन्ड में पैसा लगाने पर भी विचार कर रहा है। इसका मकसद अपना पैसा अलग-अलग जगह लगाना और बेहतर कमाई के मौके तलाशना है। जर्मन कंपनियों का अमेरिका में निवेश 65% घटा, चीन में एक-तिहाई बढ़ा अमेरिका और चीन में जर्मन कंपनियों के निवेश के आंकड़ों में इस साल बड़ा फर्क दिखा है। 2026 की पहली छमाही में अमेरिका में उनका निवेश 65% घटकर 4.3 अरब यूरो रह गया। वहीं, चीन में निवेश करीब एक-तिहाई बढ़कर 5.6 अरब यूरो पहुंच गया। जर्मन इकोनॉमिक इंस्टीट्यूट की स्टडी के मुताबिक, अमेरिका में जर्मन कंपनियों का निवेश ऐसे समय घटा है, जब ट्रम्प की टैरिफ और व्यापार नीतियों को लेकर कारोबार में अनिश्चितता बनी हुई है। वहीं, चीन में पहले से काम कर रही जर्मन कंपनियां अपने कारोबार में लगातार पैसा लगा रही हैं। डॉलर की हिस्सेदारी धीरे-धीरे घट रही डॉलर अभी भी दुनिया में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली रिजर्व करेंसी है। लेकिन दुनिया के केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर का हिस्सा धीरे-धीरे कम कर रहे हैं। आईएमएफ के मुताबिक, 2025 की आखिरी तिमाही में दुनिया के विदेशी मुद्रा भंडार में डॉलर की हिस्सेदारी 56.77% थी। इससे पिछली तिमाही में यह 56.93% थी। वहीं, चीन की मुद्रा रेनमिन्बी की हिस्सेदारी सिर्फ 1.95% थी। इसका मतलब यह नहीं है कि चीन की मुद्रा अभी डॉलर की जगह लेने वाली है। डॉलर की पकड़ अब भी बहुत मजबूत है। बस कुछ देश अपने पैसे को अलग-अलग जगह रख रहे हैं। वे डॉलर के साथ दूसरी मुद्राओं और सोने में भी अपना भंडार बढ़ा रहे हैं। केंद्रीय बैंक लगातार सोना खरीद रहे डॉलर के साथ अब सोना भी केंद्रीय बैंकों के लिए अहम रिजर्व बनता जा रहा है। कई देश अपने विदेशी मुद्रा भंडार में सोने का हिस्सा बढ़ा रहे हैं। वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के मुताबिक, दुनिया के केंद्रीय बैंकों ने 2025 में कुल 863 टन सोना खरीदा। यह 2024 के मुकाबले कम था, लेकिन लंबे समय के औसत से अब भी काफी ज्यादा रहा। 2022 से 2025 के बीच केंद्रीय बैंकों ने हर साल औसतन करीब 1,000 टन सोना खरीदा। यानी सोने को रिजर्व में शामिल करने का चलन पिछले कुछ सालों से लगातार बना हुआ है। 2026 में भी खरीद जारी चीन-भारत में भी सोने की मांग बढ़ी सोने की बढ़ती मांग सिर्फ केंद्रीय बैंकों तक सीमित नहीं है। आम निवेशक भी सोने में ज्यादा पैसा लगा रहे हैं। 2025 में चीन में सोने की निवेश मांग 28% बढ़ी। भारत में भी सोने में निवेश की मांग 17% बढ़ी। दोनों देशों के बाजारों ने मिलकर दुनिया में सोने की छड़ों और सिक्कों की कुल मांग का आधे से ज्यादा हिस्सा अपने नाम किया। यानी सोने की मांग दो तरफ से बढ़ रही है। एक ओर केंद्रीय बैंक अपने विदेशी मुद्रा भंडार में सोना बढ़ा रहे हैं, तो दूसरी ओर चीन और भारत जैसे बड़े बाजारों में आम निवेशक भी सोने को निवेश का विकल्प मान रहे हैं। अमेरिका की आर्थिक ताकत अभी भी बरकरार इन बदलावों के बावजूद अमेरिका की आर्थिक ताकत अभी खत्म नहीं हुई है। दुनिया के विदेशी मुद्रा भंडार में आज भी डॉलर की हिस्सेदारी 56% से ज्यादा है। अमेरिकी शेयर बाजार और सरकारी बॉन्ड में भी दूसरे देशों का पैसा लगा हुआ है। अमेरिकी ट्रेजरी सचिव स्कॉट बेसेंट का कहना है कि अमेरिकी वित्तीय व्यवस्था पर लोगों का भरोसा बना हुआ है और सरकारी बॉन्ड की नीलामी भी अच्छी चल रही है।

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