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क्या बच्चे भी एंजायटी और डिप्रेशन की दवाएं ले सकते हैं? इस बारे में क्या है एक्सपर्ट की राय

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Anxiety and Depression in Kids: आजकल बच्चों में एंजायटी और डिप्रेशन जैसी मानसिक समस्याएं बढ़ रही हैं. एक्सपर्ट्स के अनुसार जरूरत पड़ने पर बच्चों को एंजायटी और डिप्रेशन की दवाएं दी जा सकती हैं. हालांकि यह फैसला केवल डॉक्टर ही कर सकते हैं. कॉग्निटिव थेरेपी, फैमिली सपोर्ट और हेल्दी लाइफस्टाइल से बच्चों की मेंटल हेल्थ को सुधारा जा सकता है.

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बच्चों में आजकल मेंटल हेल्थ से जुड़ी प्रॉब्लम्स बढ़ रही हैं.

Anxiety and Depression Drugs: आज के जमाने में मेंटल हेल्थ से जुड़ी समस्याएं बढ़ रही हैं. छोटे बच्चों से लेकर टीनएजर्स, युवा, मिडिल एज के लोग और बुजुर्ग सभी मानसिक समस्याओं से परेशान हैं. पढ़ाई का दबाव, सोशल मीडिया, अकेलापन, पारिवारिक तनाव और बदलती लाइफस्टाइल की वजह से कई बच्चे एंजायटी और डिप्रेशन जैसी समस्याओं की चपेट में आ जाते हैं. ऐसे में माता-पिता के मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि क्या बच्चों को भी एंजायटी और डिप्रेशन की दवाएं दी जा सकती हैं? चलिए इस बारे में साइकेट्रिस्ट से हकीकत जानने की कोशिश करते हैं.

नई दिल्ली के लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज की प्रोफेसर और साइकेस्ट्रिस्ट डॉ. प्रेरणा कुकरेती ने News18 को बताया बच्चों में एंजायटी और डिप्रेशन का इलाज केवल दवाओं पर निर्भर नहीं होता है. ज्यादातर मामलों में सबसे पहले काउंसलिंग, बिहेवियर थेरेपी और परिवार का सहयोग जरूरी माना जाता है. अगर समस्या हल्की हो, तो थेरेपी और लाइफस्टाइल में बदलाव करने की सलाह दी जाती है. अगर बच्चा लंबे समय तक उदास रहे, पढ़ाई और रोजमर्रा की गतिविधियों में रुचि कम हो जाए, नींद और भूख प्रभावित होने लगे या आत्महत्या जैसे विचार आने लगें, तब दवाओं की जरूरत पड़ सकती है.

एक्सपर्ट के अनुसार कुछ एंटीडिप्रेसेंट और एंटी-एंजायटी दवाएं बच्चों और किशोरों के लिए मेडिकल गाइडलाइन के तहत इस्तेमाल की जाती हैं. हर दवा हर बच्चे के लिए सुरक्षित नहीं होती. डॉक्टर बच्चे की उम्र, लक्षणों की गंभीरता, मेडिकल हिस्ट्री और मानसिक स्थिति को ध्यान में रखकर ही दवा तय करते हैं. यही वजह है कि बिना डॉक्टर की सलाह के बच्चों को मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी दवाएं देना खतरनाक माना जाता है. इन दवाओं के कुछ साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं. कुछ मामलों में शुरुआती दिनों में आत्मघाती विचार बढ़ने का खतरा भी देखा गया है, इसलिए दवा शुरू होने के बाद बच्चे की नियमित निगरानी बेहद जरूरी होती है. माता-पिता को बच्चे के व्यवहार में आने वाले किसी भी असामान्य बदलाव पर डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए.

डॉक्टर का मानना है कि बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर पैरेंट्स को भी जागरूक रहना चाहिए. कई बार माता-पिता बच्चों की चिंता, डर या उदासी को सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन अगर बच्चा लंबे समय तक चुप रहने लगे, दोस्तों से दूरी बनाने लगे, पढ़ाई में गिरावट आए या व्यवहार अचानक बदल जाए, तो इसे गंभीरता से लेना चाहिए. स्वस्थ दिनचर्या भी बच्चों की मानसिक सेहत को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. पर्याप्त नींद, संतुलित आहार, फिजिकल एक्टिविटी, परिवार के साथ समय और स्क्रीन टाइम कम करना एंजायटी और तनाव को कम करने में मदद कर सकता है. बच्चों से खुलकर बातचीत करना और उनकी भावनाओं को समझना भी बेहद जरूरी है.

सेहत, रिलेशनशिप, लाइफ या धर्म-ज्योतिष से जुड़ी है कोई निजी उलझन तो हमें करें WhatsApp, आपका नाम गोपनीय रखकर देंगे जानकारी.

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अमित उपाध्याय

अमित उपाध्याय News18 हिंदी की लाइफस्टाइल टीम के अनुभवी पत्रकार हैं, जिनके पास प्रिंट और डिजिटल मीडिया में 9 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे हेल्थ, वेलनेस और लाइफस्टाइल से जुड़ी रिसर्च-बेस्ड और डॉक्टर्स के इंटरव्…और पढ़ें

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नई दिल्ली के लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज की प्रोफेसर और साइकेस्ट्रिस्ट डॉ. प्रेरणा कुकरेती ने News18 को बताया बच्चों में एंजायटी और डिप्रेशन का इलाज केवल दवाओं पर निर्भर नहीं होता है. ज्यादातर मामलों में सबसे पहले काउंसलिंग, बिहेवियर थेरेपी और परिवार का सहयोग जरूरी माना जाता है. अगर समस्या हल्की हो, तो थेरेपी और लाइफस्टाइल में बदलाव करने की सलाह दी जाती है. अगर बच्चा लंबे समय तक उदास रहे, पढ़ाई और रोजमर्रा की गतिविधियों में रुचि कम हो जाए, नींद और भूख प्रभावित होने लगे या आत्महत्या जैसे विचार आने लगें, तब दवाओं की जरूरत पड़ सकती है.

एक्सपर्ट के अनुसार कुछ एंटीडिप्रेसेंट और एंटी-एंजायटी दवाएं बच्चों और किशोरों के लिए मेडिकल गाइडलाइन के तहत इस्तेमाल की जाती हैं. हर दवा हर बच्चे के लिए सुरक्षित नहीं होती. डॉक्टर बच्चे की उम्र, लक्षणों की गंभीरता, मेडिकल हिस्ट्री और मानसिक स्थिति को ध्यान में रखकर ही दवा तय करते हैं. यही वजह है कि बिना डॉक्टर की सलाह के बच्चों को मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी दवाएं देना खतरनाक माना जाता है. इन दवाओं के कुछ साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं. कुछ मामलों में शुरुआती दिनों में आत्मघाती विचार बढ़ने का खतरा भी देखा गया है, इसलिए दवा शुरू होने के बाद बच्चे की नियमित निगरानी बेहद जरूरी होती है. माता-पिता को बच्चे के व्यवहार में आने वाले किसी भी असामान्य बदलाव पर डॉक्टर से संपर्क करना चाहिए.

डॉक्टर का मानना है कि बच्चों के मानसिक स्वास्थ्य को लेकर पैरेंट्स को भी जागरूक रहना चाहिए. कई बार माता-पिता बच्चों की चिंता, डर या उदासी को सामान्य समझकर नजरअंदाज कर देते हैं, लेकिन अगर बच्चा लंबे समय तक चुप रहने लगे, दोस्तों से दूरी बनाने लगे, पढ़ाई में गिरावट आए या व्यवहार अचानक बदल जाए, तो इसे गंभीरता से लेना चाहिए. स्वस्थ दिनचर्या भी बच्चों की मानसिक सेहत को बेहतर बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है. पर्याप्त नींद, संतुलित आहार, फिजिकल एक्टिविटी, परिवार के साथ समय और स्क्रीन टाइम कम करना एंजायटी और तनाव को कम करने में मदद कर सकता है. बच्चों से खुलकर बातचीत करना और उनकी भावनाओं को समझना भी बेहद जरूरी है.

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अमित उपाध्याय

अमित उपाध्याय News18 हिंदी की लाइफस्टाइल टीम के अनुभवी पत्रकार हैं, जिनके पास प्रिंट और डिजिटल मीडिया में 9 वर्षों से अधिक का अनुभव है। वे हेल्थ, वेलनेस और लाइफस्टाइल से जुड़ी रिसर्च-बेस्ड और डॉक्टर्स के इंटरव्…और पढ़ें

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