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Green homes are up to 4% more expensive, with up to 30% savings on electricity and water.

Green homes are up to 4% more expensive, with up to 30% savings on electricity and water.
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नई दिल्ली13 मिनट पहले

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रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रीन होम में रहने से खर्चों में कमी आती है। बिजली की बचत और बेहतर तापमान नियंत्रण से बजट घटता है।

घर खरीदने का पैमाना अब सिर्फ लोकेशन, दाम और सुविधाएं नहीं, बल्कि सस्टेनेबिलिटी भी है। प्रॉपटेक फर्म स्क्वेयर यार्ड्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रीन होम की निर्माण लागत सामान्य घरों से 3.5-4% ज्यादा हो सकती है। लेकिन ये लंबे समय में घर के मालिक के लिए ज्यादा किफायती साबित होते हैं।

सस्टेनेबिलिटी का मतलब है कि घर ऐसे बनाए जाएं जो पर्यावरण पर कम से कम दबाव डाले और लंबे समय तक संसाधनों की बचत कर सके। इसमें सोलर पावर, रेन-वॉटर हार्वेस्टिंग और कचरा प्रबंधन शामिल हैं। ये आरामदायक होने के साथ ही बिजली-पानी की खपत घटाकर बचत भी कराते हैं।

सस्टेनेबल घर पानी की खपत 30-50% और बिजली बिल 20-30% तक कम कर सकते हैं। देश में वर्ष 2050 तक 40 करोड़ लोग शहरों में बसेंगे। शहरों में घरों का निर्माण दोगुना होने का अनुमान है। कंस्ट्रक्शन सेक्टर देश के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में एक-तिहाई हिस्से के लिए जिम्मेदार है। यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब पर्यावरण के अनुकूल घरों की अहमियत बढ़ रही है। खरीदारों को अब सही प्रोजेक्ट चुनने के लिए नए मानदंडों की जरूरत है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रीन होम में रहने से खर्चों में कमी आती है। बिजली की बचत और बेहतर तापमान नियंत्रण से बजट घटता है। हालांकि, खरीदारों के लिए अच्छे प्रोजेक्ट्स चुनना थोड़ा मुश्किल है, क्योंकि सस्टेनेबिलिटी से जुड़ी जानकारियां कई प्रमाणपत्रों और तकनीकी रिपोर्टों में बिखरी रहती है। रिपोर्ट में इसे ‘ग्रीन हाउसिंग पैराडॉक्स’ कहा गया है। खरीदार स्वस्थ वातावरण पसंद तो करते हैं, लेकिन सूचनाओं के अभाव में फैसला नहीं कर पाते हैं। अब सस्टेनेबिलिटी को लोकेशन और कीमत जैसे पारंपरिक कारकों के समान अहमियत मिल रही है। यह लंबी अवधि में घर की क्वालिटी और जीवन स्तर को प्रभावित करता है।

देश में 16 अरब वर्ग फीट मे 19,715 ग्रीन प्रोजेक्ट्स और 130 नेट-जीरो प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं। इनसे हर साल 199.3 अरब लीटर पानी और 66.4 अरब यूनिट बिजली की बचत होगी। साथ ही सालाना 5.31 करोड़ टन कार्बन उत्सर्जन घटाने में मदद मिलेगी। स्क्वेयर यार्ड्स ने ‘स्क्वेयर यार्ड्स ग्रीन लिविंग इंडेक्स’ भी लॉन्च किया है। यह सस्टेनेबिलिटी, सुविधाएं, घर की मजबूती और स्मार्टनेस मापने का एक पैमाना है। यह सिस्टम रेरा की जानकारी और लोकेशन डेटा को आम लोगों के समझने लायक आसान स्कोर में बदलता है।

भविष्य – नेट-जीरो लक्ष्य में पर्यावरण की सुरक्षा, पारदर्शिता की बड़ी भूमिका

भारत ने 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है। भविष्य में सस्टेनेबिलिटी से जुड़ी जानकारियां ग्राहकों को फैसले करने में मुख्य भूमिका निभाएंगी। विशेषज्ञ डॉ. प्रियंका कोचर के अनुसार, इससे सूचनाओं की कमी दूर होगी। अब खरीदार पर्यावरण के साथ-साथ वित्तीय बचत के नजरिए से भी घर चुन सकेंगे।

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रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रीन होम में रहने से खर्चों में कमी आती है। बिजली की बचत और बेहतर तापमान नियंत्रण से बजट घटता है।

घर खरीदने का पैमाना अब सिर्फ लोकेशन, दाम और सुविधाएं नहीं, बल्कि सस्टेनेबिलिटी भी है। प्रॉपटेक फर्म स्क्वेयर यार्ड्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रीन होम की निर्माण लागत सामान्य घरों से 3.5-4% ज्यादा हो सकती है। लेकिन ये लंबे समय में घर के मालिक के लिए ज्यादा किफायती साबित होते हैं।

सस्टेनेबिलिटी का मतलब है कि घर ऐसे बनाए जाएं जो पर्यावरण पर कम से कम दबाव डाले और लंबे समय तक संसाधनों की बचत कर सके। इसमें सोलर पावर, रेन-वॉटर हार्वेस्टिंग और कचरा प्रबंधन शामिल हैं। ये आरामदायक होने के साथ ही बिजली-पानी की खपत घटाकर बचत भी कराते हैं।

सस्टेनेबल घर पानी की खपत 30-50% और बिजली बिल 20-30% तक कम कर सकते हैं। देश में वर्ष 2050 तक 40 करोड़ लोग शहरों में बसेंगे। शहरों में घरों का निर्माण दोगुना होने का अनुमान है। कंस्ट्रक्शन सेक्टर देश के कुल ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में एक-तिहाई हिस्से के लिए जिम्मेदार है। यह रिपोर्ट ऐसे समय में आई है जब पर्यावरण के अनुकूल घरों की अहमियत बढ़ रही है। खरीदारों को अब सही प्रोजेक्ट चुनने के लिए नए मानदंडों की जरूरत है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि ग्रीन होम में रहने से खर्चों में कमी आती है। बिजली की बचत और बेहतर तापमान नियंत्रण से बजट घटता है। हालांकि, खरीदारों के लिए अच्छे प्रोजेक्ट्स चुनना थोड़ा मुश्किल है, क्योंकि सस्टेनेबिलिटी से जुड़ी जानकारियां कई प्रमाणपत्रों और तकनीकी रिपोर्टों में बिखरी रहती है। रिपोर्ट में इसे ‘ग्रीन हाउसिंग पैराडॉक्स’ कहा गया है। खरीदार स्वस्थ वातावरण पसंद तो करते हैं, लेकिन सूचनाओं के अभाव में फैसला नहीं कर पाते हैं। अब सस्टेनेबिलिटी को लोकेशन और कीमत जैसे पारंपरिक कारकों के समान अहमियत मिल रही है। यह लंबी अवधि में घर की क्वालिटी और जीवन स्तर को प्रभावित करता है।

देश में 16 अरब वर्ग फीट मे 19,715 ग्रीन प्रोजेक्ट्स और 130 नेट-जीरो प्रोजेक्ट्स चल रहे हैं। इनसे हर साल 199.3 अरब लीटर पानी और 66.4 अरब यूनिट बिजली की बचत होगी। साथ ही सालाना 5.31 करोड़ टन कार्बन उत्सर्जन घटाने में मदद मिलेगी। स्क्वेयर यार्ड्स ने ‘स्क्वेयर यार्ड्स ग्रीन लिविंग इंडेक्स’ भी लॉन्च किया है। यह सस्टेनेबिलिटी, सुविधाएं, घर की मजबूती और स्मार्टनेस मापने का एक पैमाना है। यह सिस्टम रेरा की जानकारी और लोकेशन डेटा को आम लोगों के समझने लायक आसान स्कोर में बदलता है।

भविष्य – नेट-जीरो लक्ष्य में पर्यावरण की सुरक्षा, पारदर्शिता की बड़ी भूमिका

भारत ने 2070 तक नेट-जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य रखा है। भविष्य में सस्टेनेबिलिटी से जुड़ी जानकारियां ग्राहकों को फैसले करने में मुख्य भूमिका निभाएंगी। विशेषज्ञ डॉ. प्रियंका कोचर के अनुसार, इससे सूचनाओं की कमी दूर होगी। अब खरीदार पर्यावरण के साथ-साथ वित्तीय बचत के नजरिए से भी घर चुन सकेंगे।

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