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समझाया: हिमंत बिस्वा सरमा की तीसरी पारी ‘मियां’ के दुश्मन! बदरुद्दीन की जीत से 34.22% मुस्लिम आबादी को फ़ायदा क्यों नहीं?

समझाया: हिमंत बिस्वा सरमा की तीसरी पारी 'मियां' के दुश्मन! बदरुद्दीन की जीत से 34.22% मुस्लिम आबादी को फ़ायदा क्यों नहीं?

असम में हिमंत बिस्वा सरमा की तीसरी जीत में सिर्फ सत्य ही नहीं बची, बल्कि एक नए और नाटकीय राजनीतिक युग की शुरुआत भी की गई है। 126 में से 82 में शामिल होने वाली बीजेपी के सीएम हिमंत ने सोलो में सोलो के खिलाफ कई दावे किए। दूसरी ओर, बदरुद्दीन अजमल की जीत और उनकी पार्टी एआईयूडीएफ के सफा ने असम की मुस्लिम राजनीति में एक अहम बदलाव का संकेत दिया है। लेकिन इससे कम्यूनिटी को फ़ायदा उठाने वाला अब एक बड़ा सवाल बदल गया है। कैसे?

हिमंत बिस्वा सरमा ने आदिवासियों के खिलाफ दिया बड़ा बयान

हिमंत बिस्वा सरमा ने दादी को ‘मियां’ कहा और एक के बाद एक कई सिद्धांत और सख्त बातें बताईं:

  • गोली मारने का संकेत: उन्होंने सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर किया (बाद में इसे हटा दिया गया), जिसमें कथित तौर पर मुस्लिम समुदाय के लोगों पर राइफल से गोली चलाने का आरोप लगाया गया था। इस पर AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी.
  • ‘जेल जाने को तैयार’: ओलाज़ी की याचिका पर प्रतिक्रिया देते हुए सरमा ने कहा, ‘मैं जेल जाने के लिए तैयार हूं, मुझे क्या करना है? मुझे किसी भी वीडियो के बारे में नहीं पता…लेकिन मैं बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ हूं और उनके बारे में बताता हूं।’
  • ‘नॉन-कोऑपरेशन’ की खोज: फरवरी 2026 में उन्होंने ‘गैर-सहयोग’ (असहयोग) और ‘सविनय अज्ञेय’ का विरोध करते हुए बैलर मूल के नारे लगाए, ताकि ऐसा रंगीन बनाया जाए जिसमें ‘वे असम में न रह जाएं’। उन्होंने लोगों से अपील की, ‘रिक्शा पर सवार होने से पहले सोचिए कि आप लोग रिश्तेदार रिक्शा पर चढ़ रहे हैं।’
  • ‘खुद ही चले जाओ’ की रणनीति: मार्च 2026 में उन्होंने कहा कि वे ऐसा ‘दबाव’ बनाना चाहते हैं ताकि बंगाली भाषी मुस्लिम ‘खुद ही चले जाएं।’ उन्होंने कहा कि बेदाखली, सरकारी खजाने से निवेशकों और अवैध घुसपैठियों पर रबर की गोलियां चलाने जैसे उपाय किए जा सकते हैं।
  • विशेष चेतावनी: सरमा ने यह भी कहा, ‘अगर असम में मुस्लिम आबादी 50% पार कर गई तो गैर-मुस्लिम जीवित नहीं बचेंगे।’

क्या मुख्यमंत्री की तीसरी पारी की मुश्किलें और बढ़ेंगी?

सरमा और उनकी सरकार की क्लस्टर कंपार्टमेंट और भविष्य के वादों को देखते हुए, असम के पैरालिड, बैलर मूल के पैरालिड के लिए अगले पांच साल 3 कारणों से बेहद मुश्किल हो सकती है:

  • विधानसभा में राजनीतिक हाशियाकरण: 2023 के प्रिसिमन के बाद, जिन प्रिस्क्राइब पर क्लासिक्स का प्रभाव पड़ा, उनकी संख्या 35 से 35 के रूप में 20 रह गयी। बीजेपी ने 2026 के चुनाव में एक भी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया. मुस्लिम वोट पूरी तरह से विभाजित पार्टी कांग्रेस और एआईयूडीएफ की तरह ही अलग-अलग हिस्सों में बंटे हुए हैं।
  • कठोर वाल्व का प्रभाव: भाजपा के संकल्प पत्र में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने के खिलाफ ‘लव जिहाद’ और ‘भूमि जिहाद’ को खत्म करने वाला कानून बनाने का वादा किया गया है। साथ ही, अवैध घुसपैठियों (जिसका समुद्री तट पर मुस्लिम होते हैं) से जमीन खाली कराना और ‘मिशन बससंधारा’ के तहत भूमि अधिकार देने की बात कही गई है।
  • बेख़ौफ़ और प्रोडक्शन का जारी रहना: सरमा ने सबसे पहले ही साफ कहा था कि पिछले साल 1.5 लाख की राहत में से ज्यादा जमीन को हटा दिया गया था और यह अभियान जारी रहेगा। ‘पुशबैक’ नीति के तहत हजारों लोगों को बांग्लादेश भेजा जा रहा है, जिसमें कई भारतीय नागरिक भी पीड़ित हैं।

तो क्या बदरुद्दीन अजमल की जीत का फायदा नहीं मिलेगा?

बदरुद्दीन अजमल ने नव-निर्मित बिन्ना कांड़ी सीट से 35,380 सीटों पर जीत दर्ज की, लेकिन यह उनकी पार्टी एआईयूडीएफ के लिए एक बड़ी तबाही को छुपाना नहीं है। पार्टी को केवल 2 सर्वश्रेष्ठ मिलीं, जिसने अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन किया है। इससे:

  • सीमित लाभ: 2024 के आम चुनाव में अपनी धुबरी सीट के बाद राज्य की राजनीति में वापसी के लिए अजमल के लिए एक बड़ी जीत है। लेकिन सिर्फ दो नामचीन विधानसभाओं के साथ मजबूत प्रतिरोध कायम करना बेहद मुश्किल है।
  • ऐतिहासिक गिरावट: कभी प्रतिभा के ‘रक्षक’ के रूप में देखने वाली एआईयूडीएफ का पतन 2018 में एनआरसी का ड्राफ्ट जारी होने के बाद शुरू हुआ। इसमें करीब 19 लाख लोग बाहर रह गए थे, जिनमें शामिल थे बंगाली मुसलमान। पार्टी अपने इसी वोट बैंक की रक्षा करने में नाकाम रही।
  • कांग्रेस की ओर पलायन: असम कांग्रेस ने बीजेपी के ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ से बचने के लिए एआईयूडीएफ से गठबंधन तोड़ने की घोषणा की. नतीजा यह हुआ कि मुस्लिम मौलाना ने एआईयूडीएफ को कांग्रेस से अलग करने का रुख अपनाया।

बीजेपी के प्रचंड जीत और हिमंत बिस्वा सरमा की बेबाक रणनीति ने एक ऐसा माहौल जरूर बनाया है, जहां वे अपने जमींन को और जगह से लागू कर सकते हैं। बदरुद्दीन अजमल की जीत एक मशहूर फिल्म जरूर है, लेकिन असम की मशहूर हस्तियों से किसी बड़े राजनीतिक फायदे की उम्मीद बहुत कम है। अगले पाँच पूर्वी समुदायों के सामने राजनीतिक हाशियाकरण और कठोर विरोधियों की चुनौती सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है।

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समझाया: हिमंत बिस्वा सरमा की तीसरी पारी 'मियां' के दुश्मन! बदरुद्दीन की जीत से 34.22% मुस्लिम आबादी को फ़ायदा क्यों नहीं?

असम में हिमंत बिस्वा सरमा की तीसरी जीत में सिर्फ सत्य ही नहीं बची, बल्कि एक नए और नाटकीय राजनीतिक युग की शुरुआत भी की गई है। 126 में से 82 में शामिल होने वाली बीजेपी के सीएम हिमंत ने सोलो में सोलो के खिलाफ कई दावे किए। दूसरी ओर, बदरुद्दीन अजमल की जीत और उनकी पार्टी एआईयूडीएफ के सफा ने असम की मुस्लिम राजनीति में एक अहम बदलाव का संकेत दिया है। लेकिन इससे कम्यूनिटी को फ़ायदा उठाने वाला अब एक बड़ा सवाल बदल गया है। कैसे?

हिमंत बिस्वा सरमा ने आदिवासियों के खिलाफ दिया बड़ा बयान

हिमंत बिस्वा सरमा ने दादी को ‘मियां’ कहा और एक के बाद एक कई सिद्धांत और सख्त बातें बताईं:

  • गोली मारने का संकेत: उन्होंने सोशल मीडिया पर एक वीडियो शेयर किया (बाद में इसे हटा दिया गया), जिसमें कथित तौर पर मुस्लिम समुदाय के लोगों पर राइफल से गोली चलाने का आरोप लगाया गया था। इस पर AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी.
  • ‘जेल जाने को तैयार’: ओलाज़ी की याचिका पर प्रतिक्रिया देते हुए सरमा ने कहा, ‘मैं जेल जाने के लिए तैयार हूं, मुझे क्या करना है? मुझे किसी भी वीडियो के बारे में नहीं पता…लेकिन मैं बांग्लादेशी घुसपैठियों के खिलाफ हूं और उनके बारे में बताता हूं।’
  • ‘नॉन-कोऑपरेशन’ की खोज: फरवरी 2026 में उन्होंने ‘गैर-सहयोग’ (असहयोग) और ‘सविनय अज्ञेय’ का विरोध करते हुए बैलर मूल के नारे लगाए, ताकि ऐसा रंगीन बनाया जाए जिसमें ‘वे असम में न रह जाएं’। उन्होंने लोगों से अपील की, ‘रिक्शा पर सवार होने से पहले सोचिए कि आप लोग रिश्तेदार रिक्शा पर चढ़ रहे हैं।’
  • ‘खुद ही चले जाओ’ की रणनीति: मार्च 2026 में उन्होंने कहा कि वे ऐसा ‘दबाव’ बनाना चाहते हैं ताकि बंगाली भाषी मुस्लिम ‘खुद ही चले जाएं।’ उन्होंने कहा कि बेदाखली, सरकारी खजाने से निवेशकों और अवैध घुसपैठियों पर रबर की गोलियां चलाने जैसे उपाय किए जा सकते हैं।
  • विशेष चेतावनी: सरमा ने यह भी कहा, ‘अगर असम में मुस्लिम आबादी 50% पार कर गई तो गैर-मुस्लिम जीवित नहीं बचेंगे।’

क्या मुख्यमंत्री की तीसरी पारी की मुश्किलें और बढ़ेंगी?

सरमा और उनकी सरकार की क्लस्टर कंपार्टमेंट और भविष्य के वादों को देखते हुए, असम के पैरालिड, बैलर मूल के पैरालिड के लिए अगले पांच साल 3 कारणों से बेहद मुश्किल हो सकती है:

  • विधानसभा में राजनीतिक हाशियाकरण: 2023 के प्रिसिमन के बाद, जिन प्रिस्क्राइब पर क्लासिक्स का प्रभाव पड़ा, उनकी संख्या 35 से 35 के रूप में 20 रह गयी। बीजेपी ने 2026 के चुनाव में एक भी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया. मुस्लिम वोट पूरी तरह से विभाजित पार्टी कांग्रेस और एआईयूडीएफ की तरह ही अलग-अलग हिस्सों में बंटे हुए हैं।
  • कठोर वाल्व का प्रभाव: भाजपा के संकल्प पत्र में समान नागरिक संहिता (यूसीसी) लागू करने के खिलाफ ‘लव जिहाद’ और ‘भूमि जिहाद’ को खत्म करने वाला कानून बनाने का वादा किया गया है। साथ ही, अवैध घुसपैठियों (जिसका समुद्री तट पर मुस्लिम होते हैं) से जमीन खाली कराना और ‘मिशन बससंधारा’ के तहत भूमि अधिकार देने की बात कही गई है।
  • बेख़ौफ़ और प्रोडक्शन का जारी रहना: सरमा ने सबसे पहले ही साफ कहा था कि पिछले साल 1.5 लाख की राहत में से ज्यादा जमीन को हटा दिया गया था और यह अभियान जारी रहेगा। ‘पुशबैक’ नीति के तहत हजारों लोगों को बांग्लादेश भेजा जा रहा है, जिसमें कई भारतीय नागरिक भी पीड़ित हैं।

तो क्या बदरुद्दीन अजमल की जीत का फायदा नहीं मिलेगा?

बदरुद्दीन अजमल ने नव-निर्मित बिन्ना कांड़ी सीट से 35,380 सीटों पर जीत दर्ज की, लेकिन यह उनकी पार्टी एआईयूडीएफ के लिए एक बड़ी तबाही को छुपाना नहीं है। पार्टी को केवल 2 सर्वश्रेष्ठ मिलीं, जिसने अब तक का सबसे खराब प्रदर्शन किया है। इससे:

  • सीमित लाभ: 2024 के आम चुनाव में अपनी धुबरी सीट के बाद राज्य की राजनीति में वापसी के लिए अजमल के लिए एक बड़ी जीत है। लेकिन सिर्फ दो नामचीन विधानसभाओं के साथ मजबूत प्रतिरोध कायम करना बेहद मुश्किल है।
  • ऐतिहासिक गिरावट: कभी प्रतिभा के ‘रक्षक’ के रूप में देखने वाली एआईयूडीएफ का पतन 2018 में एनआरसी का ड्राफ्ट जारी होने के बाद शुरू हुआ। इसमें करीब 19 लाख लोग बाहर रह गए थे, जिनमें शामिल थे बंगाली मुसलमान। पार्टी अपने इसी वोट बैंक की रक्षा करने में नाकाम रही।
  • कांग्रेस की ओर पलायन: असम कांग्रेस ने बीजेपी के ‘मुस्लिम तुष्टिकरण’ से बचने के लिए एआईयूडीएफ से गठबंधन तोड़ने की घोषणा की. नतीजा यह हुआ कि मुस्लिम मौलाना ने एआईयूडीएफ को कांग्रेस से अलग करने का रुख अपनाया।

बीजेपी के प्रचंड जीत और हिमंत बिस्वा सरमा की बेबाक रणनीति ने एक ऐसा माहौल जरूर बनाया है, जहां वे अपने जमींन को और जगह से लागू कर सकते हैं। बदरुद्दीन अजमल की जीत एक मशहूर फिल्म जरूर है, लेकिन असम की मशहूर हस्तियों से किसी बड़े राजनीतिक फायदे की उम्मीद बहुत कम है। अगले पाँच पूर्वी समुदायों के सामने राजनीतिक हाशियाकरण और कठोर विरोधियों की चुनौती सबसे बड़ी बाधा बनी हुई है।

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