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केरल राजनीति: जब बिना विधायक बने दो बार सीएम बने एके एंटनी: केरल की राजनीति का सबसे अनोखा अध्याय

केरल राजनीति: जब बिना विधायक बने दो बार सीएम बने एके एंटनी: केरल की राजनीति का सबसे अनोखा अध्याय

भारतीय राजनीति में कई असामान्य घटनाएं सामने आई हैं, लेकिन एक ही नेता का दो बार बिना नेता का मुख्यमंत्री बनना बेहद दुर्लभ है। केरल की राजनीति में ऐसा दिखा कांग्रेस के दिग्गज नेता ए.के. एंटनी ने—और वह भी दो अलग-अलग दौर में, दो बड़े संकटों के बीच। यह कहानी सिर्फ सत्य तक पहुंचने की नहीं है, बल्कि उस दावे की है कि जिस पार्टी के नेतृत्व में एक ऐसे नेता ने बिग बॉस पर कब्जा कर लिया, जो खुद पद की दौड़ में कभी आगे नहीं बढ़ता।

1977: संकट के बीच उभरे एंटनी

अप्रैल 1977—केरल की राजनीति उघाड़-सीधा में थी। राजन केस के फैसले के बाद मुख्यमंत्री के. करुणाकरण को छोड़ दिया गया। कांग्रेस के सामने थी सबसे बड़ी चुनौती-अब मुख्यमंत्री कौन? विधायक दल में कोई स्पष्ट चेहरा नहीं था. सहमति बन नहीं रही थी. ऐसे में पार्टी हाईकमान ने वरिष्ठ नेता सी. सुब्रमण्यम को केरल भेजा गया। और अधिक से अधिक कहानी चलती है। सुब्रमण्यम ने उस समय केपीसीसी अध्यक्ष ए.के. एंटनी को चुना—एक ऐसा नाम जो माता की दौड़ में सबसे आगे नहीं था। मोहम 36 साल की उम्र, साफा-सुथरी छवि और पद के प्रति झिझक—ये सब उन्हें “असामान्य विकल्प” चकमा दे गए। लेकिन पार्टी को उस गति में स्थिरता मिलनी चाहिए थी—और पार्टी की धारणा पर पानी फिर गया। 27 अप्रैल 1977 को वे मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और देश के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने।

पहली परीक्षा: 6 महीने में चुनाव जीतना

संविधान के अनुसार, मुख्यमंत्री बनने के छह महीने बाद विधानसभा में सदस्यता जरूरी थी. एंटनी के लिए सीट की खोज की गई – कज़ाकोट्टम। वहाँ के विधायक थेलेकुन्निल बशीर ने पद छोड़ दिया, ताकि एंटनी चुनाव लड़ें। बाद में बशीर ने कहा कि यह सुझाव उनका अपना था, जब सीट को लेकर चर्चा लंबी खानदान रही थी।

लेकिन यह साधारण आसान नहीं था. आख़िरकार की यादें ताज़ा जगह. राजन केश ने जनता के सदन को हवा दी थी. छोटे-छोटे नमूने थे कि राजन के पिता टी.वी. इचारा वारियर ने खुद को कज़ाकोट्टम क्षेत्र और एंटनी के खिलाफ प्रचारित किया। चुनाव पूरी तरह से राजनीतिक और स्थिर बन गया था। इसके बावजूद, एंटनी ने जीत दर्ज करने और विधानसभा में अपनी जगह पक्की करने के लिए 8,000 से अधिक सीटें हासिल कीं।

1995: इतिहास का रहस्योद्घाटन हुआ

करीब दो दशक बाद केरल की राजनीति फिर संकट में आ गई. 1995 में इसरो स्पाई कांड के रहस्य। करुणा करण को एक बार फिर से छोड़ दिया गया। कांग्रेस को फिर से एक भरोसेमंद व्यक्ति की आवश्यकता थी. इस बार भी पार्टी की नजरें एंटनी पर ही पड़ीं—जो कि वोक्स्ट मोनामोवादी थे। उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली—फिर बिना विधायक बने। इसके बाद उन्होंने तिरुरंगा सीट से विधानसभा लड़ाई की, जिसमें मुस्लिम लीग के विधायक वी.के. इब्राहिम कुंजु ने खाली कर दिया था. एंटनी ने यह चुनाव भी जीता और एक बार फिर संवैधानिक शर्त पूरी की।

2001 केरल कांग्रेस का विद्रोह

एक के एंटनी के चेहरे पर कांग्रेस ने चुनाव तो जीत लिया था लेकिन पार्टी के नेतृत्व को लेकर चल रही थी सैलून चल रही थी। दिल्ली से गुलाम नबी आजाद और मोतीलाल वोहरा को तिरुवनंतपुरम भेजा गया। ए के एंटनी हाई कमांड की पसंद थे तो अंततः उम्मीद थी कि कहीं और तेजी से खत्म हो जाएगा। पार्टी ने ए.के. एंटनी को सर्वसम्मति से प्रमुख दल का नेता चुन लिया गया, जिससे सरकार गठन का रास्ता साफ हो गया।

पूर्व मुख्यमंत्री के करुणाकरण ने अपने बेटे को पार्टी का अध्यक्ष बनाने की शर्त रखी थी। हालाँकि, पूर्व मुख्यमंत्री के. करुणा गुटके की यह मांग तुरंत नहीं मानी गई कि उनके बेटे के। मुरलीधरन को प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाए। चुनाव के बाद आज़ाद ने साफ़ कहा, “प्रदेश अध्यक्ष का निर्णय पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को पद से हटा दिया गया है।” उन्होंने “बहुत खूबसूरत” और “बहुत ही सहज” को चुनने की प्रक्रिया बताई।

दिलचस्प बात यह है कि करुणा, जो चुनाव से पहले फ्रैंक विरोध में थीं, बैठक में मौजूद थीं लेकिन कोई सार्वजनिक टिप्पणी नहीं की। आज़ाद ने इसे पार्टी की एकता का संकेत देते हुए कहा, “हमें पता है कि कब सदस्य है और कब एकजुट होना है।” दो-तिहाई बहुमत के साथ सत्ता में वापसी यूयू फेल अब एंटनी के नेतृत्व में सरकार बना रही थी।

हालाँकि, इंकम के पीछे लगातार बातचीत चलती रही। माना जा रहा है कि करुणाकरण गुट के अनुयायियों के लिए मुरलीधरन को प्रदेश अध्यक्ष बनाने पर सहमति बनी है।

सिर्फ किस्मत नहीं, प्रतिष्ठा की राजनीति

ए.के. एंटनी का दो बार बिना नेता के मुख्यमंत्री बनना महज संयोग नहीं है, बल्कि प्रतिष्ठा की राजनीति का एक मजबूत उदाहरण है। उस दौर में जब केरल की राजनीति संकट से गुजर रही थी, तब कांग्रेस नेतृत्व ने पार्टियों की लॉबी या दबाव की जगह एक ऐसे चेहरे को चुना था, जिसमें साक्षात् छवि और नेतृत्व नेतृत्व की पहचान शामिल थी।

एंटनी कभी-कभी सत्य के लिए अनुमति नहीं देतीं। यही कारण था कि जब पार्टी को स्थिर और स्थायी नेतृत्व की जरूरत पड़ी, तो उनकी ओर देखा गया। उन्होंने अपने किरदार में कोई कमी नहीं छोड़ी- चाहे 1977 का राजनीतिक उधेड़न हो या 1995 का संकट- को पूरा करने की भी जिम्मेदारी ली।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ए.के. एंटनी अब सक्रिय राष्ट्रीय राजनीति से दूरी बना चुके हैं। कभी-कभी बड़े घोषणापत्रों के वक्त सोनिया गांधी के साथ रहने वाले एंटनी अब तिरुवनंतपुरम के बाहरी इलाके में शांत जीवन जी रहे हैं। उन्होंने कहा, “कांग्रेस एक वास्तविकता है, यह बनी रहेगी, मैं इसे लेकर आशावादी हूं।” नेहरू-गांधी परिवार की भूमिका पर उन्होंने साफा ने कहा, “कांग्रेस इस परिवार के नेतृत्व के बिना नहीं रह सकती।” एंटनी ने देश के सीमांत जीवों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा, “आज का परिदृश्य बहुत दुखद है…विविधता का खतरा है।”

कांग्रेस के चुनाव जीतने के बाद ए के एंटनी तिरुवन अजंथपुरम की कांग्रेस पार्टी में शामिल हुई जहां पार्टी में जोश का माहौल देखा तो ये किस्सा याद आ गया। राज्य विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यू डिफेक्ट) ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया है। यह जीत के साथ ही यू फ़ोकस राज्य सरकार बनाने के लिए पूरी तरह से तैयार है। एंटनी की स्थापना को प्रमुख रूप से अहम माना जा रहा है, क्योंकि वे संगठन और सरकार गठन की प्रक्रिया में मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। अब अब्दुल्ला नजरें अगले मुख्यमंत्री के चयन और शपथ ग्रहण की तारीख पर टिकी हैं।

आज का एंटनी कौन?

कभी ए.के. एंटनी उस क्लासिक, साफा-सुथरी और प्रतिष्ठित राजनीति का चेहरा थे, जो गुटबाजी के बीच भी सर्वस्व कार्य बनी रही। आज स्पेस को लेकर तुलना हो रही है-क्या वीडी सतीसन, रमेश चेन्निथला और केसी वेणुगोपाल उस स्पेस को लेकर नजर डालते हैं। शशि थरूर का नाम क्या है, यह कंपोजिट और कॉम्प्लेक्स बनाता है। चारों एक साथ चार मई को प्रेस कैंफ्रेस में नज़र आये और एक दूसरे के गले मिले। लेकिन राजनीति में ये भी आम आदमी जानता है कि जो बातें कैमरे के सामने होती हैं वो बंदा दर्शन में होने वाले घमासान से मेल नहीं खातीं।

वीडियो में “परिवर्तन” का चेहरा उभर कर सामने आ रहा है। नेता प्रतिपक्ष के रूप में उनके आक्रामक कार्यकर्ता और साकी छवि उन्हें बढ़त दिलाती है। लेकिन अनुभव की कमी और गुटीय संतुलन के साधनों की चुनौती उनके सामने बड़ी बाधा हो सकती है। इसके उलट रमेश चेनिथला अनुभव और मजबूत पकड़ के साथ स्थिरता का भरोसा देते हैं, हालांकि 2021 की हार और “प्राचीन चेहरे” की छवि उनके पक्ष को कमजोर करती है।

केसी वेणुगोपाल का मामला अलग है. राहुल गांधी के करीबी के कारण उनकी उम्मीदवारी सीधे तौर पर हाईकमैन की राजनीति से जुड़ती है। वे रिक्त के दावेदार बन सकते हैं, लेकिन नेता नहीं होते और “दिल्ली के प्रतिनिधि” की धारणा उन्हें जोखिम भरा विकल्प बनाती है। बाकी अवशेष विशेष रूप से केरल में जमे हुए हैं, वेणुगोपाल दिल्ली के करीबी क्षेत्र हैं और अगले ही दिन दिल्ली की तरफ कूज कर खाए गए हैं। साथ ही चुने गए नामों में भी उनकी अच्छी पकड़ है क्योंकि टिकट बांटते समय भी “हाइकमैन” के सामने सिर्फ उनकी ही चली थी।

शशि थरूर एक दिलचस्प लघुगणक हैं। अंतर्राष्ट्रीय छवि, आक्षेप और शहरी मध्यम वर्ग में पकड़ उन्हें एक अलग तरह का नेता बनाती है। वे कांग्रेस को “नए नैरेटिव” के साथ पेश कर सकते हैं – लेकिन राज्य संगठनों में उनकी सीमित जमीनी पकड़ और पारंपरिक गुटों से दूरी बनाना मुश्किल है।

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राजनीति

केरल राजनीति: जब बिना विधायक बने दो बार सीएम बने एके एंटनी: केरल की राजनीति का सबसे अनोखा अध्याय

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भारतीय राजनीति में कई असामान्य घटनाएं सामने आई हैं, लेकिन एक ही नेता का दो बार बिना नेता का मुख्यमंत्री बनना बेहद दुर्लभ है। केरल की राजनीति में ऐसा दिखा कांग्रेस के दिग्गज नेता ए.के. एंटनी ने—और वह भी दो अलग-अलग दौर में, दो बड़े संकटों के बीच। यह कहानी सिर्फ सत्य तक पहुंचने की नहीं है, बल्कि उस दावे की है कि जिस पार्टी के नेतृत्व में एक ऐसे नेता ने बिग बॉस पर कब्जा कर लिया, जो खुद पद की दौड़ में कभी आगे नहीं बढ़ता।

1977: संकट के बीच उभरे एंटनी

अप्रैल 1977—केरल की राजनीति उघाड़-सीधा में थी। राजन केस के फैसले के बाद मुख्यमंत्री के. करुणाकरण को छोड़ दिया गया। कांग्रेस के सामने थी सबसे बड़ी चुनौती-अब मुख्यमंत्री कौन? विधायक दल में कोई स्पष्ट चेहरा नहीं था. सहमति बन नहीं रही थी. ऐसे में पार्टी हाईकमान ने वरिष्ठ नेता सी. सुब्रमण्यम को केरल भेजा गया। और अधिक से अधिक कहानी चलती है। सुब्रमण्यम ने उस समय केपीसीसी अध्यक्ष ए.के. एंटनी को चुना—एक ऐसा नाम जो माता की दौड़ में सबसे आगे नहीं था। मोहम 36 साल की उम्र, साफा-सुथरी छवि और पद के प्रति झिझक—ये सब उन्हें “असामान्य विकल्प” चकमा दे गए। लेकिन पार्टी को उस गति में स्थिरता मिलनी चाहिए थी—और पार्टी की धारणा पर पानी फिर गया। 27 अप्रैल 1977 को वे मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और देश के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने।

पहली परीक्षा: 6 महीने में चुनाव जीतना

संविधान के अनुसार, मुख्यमंत्री बनने के छह महीने बाद विधानसभा में सदस्यता जरूरी थी. एंटनी के लिए सीट की खोज की गई – कज़ाकोट्टम। वहाँ के विधायक थेलेकुन्निल बशीर ने पद छोड़ दिया, ताकि एंटनी चुनाव लड़ें। बाद में बशीर ने कहा कि यह सुझाव उनका अपना था, जब सीट को लेकर चर्चा लंबी खानदान रही थी।

लेकिन यह साधारण आसान नहीं था. आख़िरकार की यादें ताज़ा जगह. राजन केश ने जनता के सदन को हवा दी थी. छोटे-छोटे नमूने थे कि राजन के पिता टी.वी. इचारा वारियर ने खुद को कज़ाकोट्टम क्षेत्र और एंटनी के खिलाफ प्रचारित किया। चुनाव पूरी तरह से राजनीतिक और स्थिर बन गया था। इसके बावजूद, एंटनी ने जीत दर्ज करने और विधानसभा में अपनी जगह पक्की करने के लिए 8,000 से अधिक सीटें हासिल कीं।

1995: इतिहास का रहस्योद्घाटन हुआ

करीब दो दशक बाद केरल की राजनीति फिर संकट में आ गई. 1995 में इसरो स्पाई कांड के रहस्य। करुणा करण को एक बार फिर से छोड़ दिया गया। कांग्रेस को फिर से एक भरोसेमंद व्यक्ति की आवश्यकता थी. इस बार भी पार्टी की नजरें एंटनी पर ही पड़ीं—जो कि वोक्स्ट मोनामोवादी थे। उन्होंने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली—फिर बिना विधायक बने। इसके बाद उन्होंने तिरुरंगा सीट से विधानसभा लड़ाई की, जिसमें मुस्लिम लीग के विधायक वी.के. इब्राहिम कुंजु ने खाली कर दिया था. एंटनी ने यह चुनाव भी जीता और एक बार फिर संवैधानिक शर्त पूरी की।

2001 केरल कांग्रेस का विद्रोह

एक के एंटनी के चेहरे पर कांग्रेस ने चुनाव तो जीत लिया था लेकिन पार्टी के नेतृत्व को लेकर चल रही थी सैलून चल रही थी। दिल्ली से गुलाम नबी आजाद और मोतीलाल वोहरा को तिरुवनंतपुरम भेजा गया। ए के एंटनी हाई कमांड की पसंद थे तो अंततः उम्मीद थी कि कहीं और तेजी से खत्म हो जाएगा। पार्टी ने ए.के. एंटनी को सर्वसम्मति से प्रमुख दल का नेता चुन लिया गया, जिससे सरकार गठन का रास्ता साफ हो गया।

पूर्व मुख्यमंत्री के करुणाकरण ने अपने बेटे को पार्टी का अध्यक्ष बनाने की शर्त रखी थी। हालाँकि, पूर्व मुख्यमंत्री के. करुणा गुटके की यह मांग तुरंत नहीं मानी गई कि उनके बेटे के। मुरलीधरन को प्रदेश अध्यक्ष बनाया जाए। चुनाव के बाद आज़ाद ने साफ़ कहा, “प्रदेश अध्यक्ष का निर्णय पार्टी अध्यक्ष सोनिया गांधी को पद से हटा दिया गया है।” उन्होंने “बहुत खूबसूरत” और “बहुत ही सहज” को चुनने की प्रक्रिया बताई।

दिलचस्प बात यह है कि करुणा, जो चुनाव से पहले फ्रैंक विरोध में थीं, बैठक में मौजूद थीं लेकिन कोई सार्वजनिक टिप्पणी नहीं की। आज़ाद ने इसे पार्टी की एकता का संकेत देते हुए कहा, “हमें पता है कि कब सदस्य है और कब एकजुट होना है।” दो-तिहाई बहुमत के साथ सत्ता में वापसी यूयू फेल अब एंटनी के नेतृत्व में सरकार बना रही थी।

हालाँकि, इंकम के पीछे लगातार बातचीत चलती रही। माना जा रहा है कि करुणाकरण गुट के अनुयायियों के लिए मुरलीधरन को प्रदेश अध्यक्ष बनाने पर सहमति बनी है।

सिर्फ किस्मत नहीं, प्रतिष्ठा की राजनीति

ए.के. एंटनी का दो बार बिना नेता के मुख्यमंत्री बनना महज संयोग नहीं है, बल्कि प्रतिष्ठा की राजनीति का एक मजबूत उदाहरण है। उस दौर में जब केरल की राजनीति संकट से गुजर रही थी, तब कांग्रेस नेतृत्व ने पार्टियों की लॉबी या दबाव की जगह एक ऐसे चेहरे को चुना था, जिसमें साक्षात् छवि और नेतृत्व नेतृत्व की पहचान शामिल थी।

एंटनी कभी-कभी सत्य के लिए अनुमति नहीं देतीं। यही कारण था कि जब पार्टी को स्थिर और स्थायी नेतृत्व की जरूरत पड़ी, तो उनकी ओर देखा गया। उन्होंने अपने किरदार में कोई कमी नहीं छोड़ी- चाहे 1977 का राजनीतिक उधेड़न हो या 1995 का संकट- को पूरा करने की भी जिम्मेदारी ली।

कांग्रेस के वरिष्ठ नेता ए.के. एंटनी अब सक्रिय राष्ट्रीय राजनीति से दूरी बना चुके हैं। कभी-कभी बड़े घोषणापत्रों के वक्त सोनिया गांधी के साथ रहने वाले एंटनी अब तिरुवनंतपुरम के बाहरी इलाके में शांत जीवन जी रहे हैं। उन्होंने कहा, “कांग्रेस एक वास्तविकता है, यह बनी रहेगी, मैं इसे लेकर आशावादी हूं।” नेहरू-गांधी परिवार की भूमिका पर उन्होंने साफा ने कहा, “कांग्रेस इस परिवार के नेतृत्व के बिना नहीं रह सकती।” एंटनी ने देश के सीमांत जीवों पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा, “आज का परिदृश्य बहुत दुखद है…विविधता का खतरा है।”

कांग्रेस के चुनाव जीतने के बाद ए के एंटनी तिरुवन अजंथपुरम की कांग्रेस पार्टी में शामिल हुई जहां पार्टी में जोश का माहौल देखा तो ये किस्सा याद आ गया। राज्य विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (यू डिफेक्ट) ने स्पष्ट बहुमत हासिल किया है। यह जीत के साथ ही यू फ़ोकस राज्य सरकार बनाने के लिए पूरी तरह से तैयार है। एंटनी की स्थापना को प्रमुख रूप से अहम माना जा रहा है, क्योंकि वे संगठन और सरकार गठन की प्रक्रिया में मार्गदर्शन प्रदान करते हैं। अब अब्दुल्ला नजरें अगले मुख्यमंत्री के चयन और शपथ ग्रहण की तारीख पर टिकी हैं।

आज का एंटनी कौन?

कभी ए.के. एंटनी उस क्लासिक, साफा-सुथरी और प्रतिष्ठित राजनीति का चेहरा थे, जो गुटबाजी के बीच भी सर्वस्व कार्य बनी रही। आज स्पेस को लेकर तुलना हो रही है-क्या वीडी सतीसन, रमेश चेन्निथला और केसी वेणुगोपाल उस स्पेस को लेकर नजर डालते हैं। शशि थरूर का नाम क्या है, यह कंपोजिट और कॉम्प्लेक्स बनाता है। चारों एक साथ चार मई को प्रेस कैंफ्रेस में नज़र आये और एक दूसरे के गले मिले। लेकिन राजनीति में ये भी आम आदमी जानता है कि जो बातें कैमरे के सामने होती हैं वो बंदा दर्शन में होने वाले घमासान से मेल नहीं खातीं।

वीडियो में “परिवर्तन” का चेहरा उभर कर सामने आ रहा है। नेता प्रतिपक्ष के रूप में उनके आक्रामक कार्यकर्ता और साकी छवि उन्हें बढ़त दिलाती है। लेकिन अनुभव की कमी और गुटीय संतुलन के साधनों की चुनौती उनके सामने बड़ी बाधा हो सकती है। इसके उलट रमेश चेनिथला अनुभव और मजबूत पकड़ के साथ स्थिरता का भरोसा देते हैं, हालांकि 2021 की हार और “प्राचीन चेहरे” की छवि उनके पक्ष को कमजोर करती है।

केसी वेणुगोपाल का मामला अलग है. राहुल गांधी के करीबी के कारण उनकी उम्मीदवारी सीधे तौर पर हाईकमैन की राजनीति से जुड़ती है। वे रिक्त के दावेदार बन सकते हैं, लेकिन नेता नहीं होते और “दिल्ली के प्रतिनिधि” की धारणा उन्हें जोखिम भरा विकल्प बनाती है। बाकी अवशेष विशेष रूप से केरल में जमे हुए हैं, वेणुगोपाल दिल्ली के करीबी क्षेत्र हैं और अगले ही दिन दिल्ली की तरफ कूज कर खाए गए हैं। साथ ही चुने गए नामों में भी उनकी अच्छी पकड़ है क्योंकि टिकट बांटते समय भी “हाइकमैन” के सामने सिर्फ उनकी ही चली थी।

शशि थरूर एक दिलचस्प लघुगणक हैं। अंतर्राष्ट्रीय छवि, आक्षेप और शहरी मध्यम वर्ग में पकड़ उन्हें एक अलग तरह का नेता बनाती है। वे कांग्रेस को “नए नैरेटिव” के साथ पेश कर सकते हैं – लेकिन राज्य संगठनों में उनकी सीमित जमीनी पकड़ और पारंपरिक गुटों से दूरी बनाना मुश्किल है।

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