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क्यों नहीं होता दिल में जल्दी कैंसर? चूहों पर हुई रिसर्च ने मिला जवाब, सामने आयी हार्ट की ये खासियत

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हार्ट अटैक, कार्डियक अरेस्ट, हार्ट में ब्लॉकेज जैसे तमाम हेल्थ कंडीशन से आपने लोगों को सामना करते देखा होगा, लेकिन क्या आप किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हैं जिसे हार्ट में कैंसर हो? आपमें से ज्यादातर लोग नहीं ही कहेंगे, क्योंकि ये बहुत रेयर है. इसका कारण हाल ही में वैज्ञानिकों को चूहों पर एक रिसर्च दौरान पता लगा है.

आमतौर पर वयस्क दिल खुद को दोबारा नहीं बनाता और हर साल केवल लगभग 1% हार्ट सेल्स ही नए बनते हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि दिल पर लगातार पड़ने वाला मैकेनिकल दबाव (जब दिल लगातार खून पंप करता है) कोशिकाओं के बढ़ने को सीमित करता है, और यही प्रक्रिया कैंसर कोशिकाओं को बढ़ने से भी रोकती है.यह अध्ययन जर्नल साइंस में प्रकाशित हुआ है. इसमें यह भी संकेत मिला है कि भविष्य में मैकेनिकल स्टिमुलेशन के आधार पर कैंसर का इलाज विकसित किया जा सकता है.

रिसर्च में वैज्ञानिकों ने एक चूहे का दिल दूसरे चूहे की गर्दन में ट्रांसप्लांट किया. इस तरह से ट्रांसप्लांट किया गया दिल खून की सप्लाई तो पा रहा था, लेकिन शरीर में खून पंप करने का काम नहीं कर रहा था, यानी उस पर सामान्य मैकेनिकल दबाव नहीं था. इसके बाद वैज्ञानिकों ने दोनों दिलों (मूल और ट्रांसप्लांटेड) में मानव कैंसर कोशिकाएं डालीं और उनकी वृद्धि की तुलना की.

शुरुआती 3 दिनों में दोनों दिलों में कैंसर कोशिकाओं की संख्या लगभग समान थी. लेकिन 14 दिनों बाद ट्रांसप्लांटेड दिल में कैंसर कोशिकाओं ने ज्यादातर स्वस्थ टिशू को बदल दिया, जबकि सामान्य दिल में केवल लगभग 20% टिशू ही प्रभावित हुआ. इसके अलावा, बिना दबाव वाले दिल में कैंसर कोशिकाएं दोगुनी तेजी से बढ़ती पाई गईं.

वैज्ञानिकों ने इस नतीजे की पुष्टि एक लैब मॉडल में भी की. जब टिशू को खींचकर उस पर दबाव डाला गया, तो कैंसर कोशिकाओं की वृद्धि कम हुई. वहीं, बिना दबाव वाले टिशू में कैंसर ज्यादा तेजी से बढ़ा. इस मॉडल में यह भी देखा गया कि टिशू के अंदर दबाव का अंतर था. अंदरूनी हिस्से में ज्यादा दबाव और बाहरी हिस्से में कम. जहां दबाव ज्यादा था, वहां कैंसर कोशिकाएं कम पाई गईं, जबकि कम दबाव वाले हिस्सों में उनकी संख्या ज्यादा थी.

मानव मरीजों के सैंपल के विश्लेषण में पाया गया कि दिल में फैले कैंसर में क्रोमैटिन (DNA और प्रोटीन का समूह) कम सघन था. जब क्रोमैटिन ढीला होता है, तो DNA ज्यादा सक्रिय हो जाता है और जीन आसानी से काम करने लगते हैं. आगे के प्रयोगों से पता चला कि यह प्रक्रिया Nesprin-2 नाम के प्रोटीन के जरिए नियंत्रित होती है. यह प्रोटीन LINC कॉम्प्लेक्स का हिस्सा है, जो सेल के बाहर से मिलने वाले मैकेनिकल संकेतों को न्यूक्लियस तक पहुंचाता है. यह संकेत ऐसे जीन को सक्रिय करते हैं जो कैंसर कोशिकाओं की वृद्धि को रोकते हैं.

हालांकि, इस सिस्टम को इलाज के रूप में इस्तेमाल करना आसान नहीं है. LINC कॉम्प्लेक्स शरीर की कई कोशिकाओं में जरूरी भूमिका निभाता है, इसलिए इसकी गतिविधि बढ़ाने से साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं। साथ ही, इससे जीन एक्सप्रेशन में बड़े बदलाव आ सकते हैं. इसलिए वैज्ञानिक अब ऐसे दूसरे प्रोटीन खोजने पर ध्यान दे रहे हैं, जो Nesprin-2 के साथ मिलकर खास तौर पर कैंसर कोशिकाओं की वृद्धि को रोक सकें.

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हार्ट अटैक, कार्डियक अरेस्ट, हार्ट में ब्लॉकेज जैसे तमाम हेल्थ कंडीशन से आपने लोगों को सामना करते देखा होगा, लेकिन क्या आप किसी ऐसे व्यक्ति को जानते हैं जिसे हार्ट में कैंसर हो? आपमें से ज्यादातर लोग नहीं ही कहेंगे, क्योंकि ये बहुत रेयर है. इसका कारण हाल ही में वैज्ञानिकों को चूहों पर एक रिसर्च दौरान पता लगा है.

आमतौर पर वयस्क दिल खुद को दोबारा नहीं बनाता और हर साल केवल लगभग 1% हार्ट सेल्स ही नए बनते हैं. वैज्ञानिकों का मानना है कि दिल पर लगातार पड़ने वाला मैकेनिकल दबाव (जब दिल लगातार खून पंप करता है) कोशिकाओं के बढ़ने को सीमित करता है, और यही प्रक्रिया कैंसर कोशिकाओं को बढ़ने से भी रोकती है.यह अध्ययन जर्नल साइंस में प्रकाशित हुआ है. इसमें यह भी संकेत मिला है कि भविष्य में मैकेनिकल स्टिमुलेशन के आधार पर कैंसर का इलाज विकसित किया जा सकता है.

रिसर्च में वैज्ञानिकों ने एक चूहे का दिल दूसरे चूहे की गर्दन में ट्रांसप्लांट किया. इस तरह से ट्रांसप्लांट किया गया दिल खून की सप्लाई तो पा रहा था, लेकिन शरीर में खून पंप करने का काम नहीं कर रहा था, यानी उस पर सामान्य मैकेनिकल दबाव नहीं था. इसके बाद वैज्ञानिकों ने दोनों दिलों (मूल और ट्रांसप्लांटेड) में मानव कैंसर कोशिकाएं डालीं और उनकी वृद्धि की तुलना की.

शुरुआती 3 दिनों में दोनों दिलों में कैंसर कोशिकाओं की संख्या लगभग समान थी. लेकिन 14 दिनों बाद ट्रांसप्लांटेड दिल में कैंसर कोशिकाओं ने ज्यादातर स्वस्थ टिशू को बदल दिया, जबकि सामान्य दिल में केवल लगभग 20% टिशू ही प्रभावित हुआ. इसके अलावा, बिना दबाव वाले दिल में कैंसर कोशिकाएं दोगुनी तेजी से बढ़ती पाई गईं.

वैज्ञानिकों ने इस नतीजे की पुष्टि एक लैब मॉडल में भी की. जब टिशू को खींचकर उस पर दबाव डाला गया, तो कैंसर कोशिकाओं की वृद्धि कम हुई. वहीं, बिना दबाव वाले टिशू में कैंसर ज्यादा तेजी से बढ़ा. इस मॉडल में यह भी देखा गया कि टिशू के अंदर दबाव का अंतर था. अंदरूनी हिस्से में ज्यादा दबाव और बाहरी हिस्से में कम. जहां दबाव ज्यादा था, वहां कैंसर कोशिकाएं कम पाई गईं, जबकि कम दबाव वाले हिस्सों में उनकी संख्या ज्यादा थी.

मानव मरीजों के सैंपल के विश्लेषण में पाया गया कि दिल में फैले कैंसर में क्रोमैटिन (DNA और प्रोटीन का समूह) कम सघन था. जब क्रोमैटिन ढीला होता है, तो DNA ज्यादा सक्रिय हो जाता है और जीन आसानी से काम करने लगते हैं. आगे के प्रयोगों से पता चला कि यह प्रक्रिया Nesprin-2 नाम के प्रोटीन के जरिए नियंत्रित होती है. यह प्रोटीन LINC कॉम्प्लेक्स का हिस्सा है, जो सेल के बाहर से मिलने वाले मैकेनिकल संकेतों को न्यूक्लियस तक पहुंचाता है. यह संकेत ऐसे जीन को सक्रिय करते हैं जो कैंसर कोशिकाओं की वृद्धि को रोकते हैं.

हालांकि, इस सिस्टम को इलाज के रूप में इस्तेमाल करना आसान नहीं है. LINC कॉम्प्लेक्स शरीर की कई कोशिकाओं में जरूरी भूमिका निभाता है, इसलिए इसकी गतिविधि बढ़ाने से साइड इफेक्ट्स हो सकते हैं। साथ ही, इससे जीन एक्सप्रेशन में बड़े बदलाव आ सकते हैं. इसलिए वैज्ञानिक अब ऐसे दूसरे प्रोटीन खोजने पर ध्यान दे रहे हैं, जो Nesprin-2 के साथ मिलकर खास तौर पर कैंसर कोशिकाओं की वृद्धि को रोक सकें.

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