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जड़ी-बूटियों, आयुर्वेदिक फॉर्मुलेशन के लिए क्लीनिकल ट्रायल जरूरी:लाइफ क्वालिटी बेहतर बनाने के लिए भारत ही नहीं, अब दुनियाभर में अपनाया जा रहा ‘साइंटिफिक-आयुर्वेद’

जड़ी-बूटियों, आयुर्वेदिक फॉर्मुलेशन के लिए क्लीनिकल ट्रायल जरूरी:लाइफ क्वालिटी बेहतर बनाने के लिए भारत ही नहीं, अब दुनियाभर में अपनाया जा रहा ‘साइंटिफिक-आयुर्वेद’

आयुर्वेद की प्रसिद्ध अवधारणा ‘दिनचर्या’ आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी आधुनिक जीवनशैली से पहले थी। तय समय पर जागना, सही वक्त पर खाना, कसरत, पूरी नींद और खान-पान में संयम इसका मूल मंत्र है। विज्ञान भी अब इन आदतों को सही मानता है, बस भाषा अलग है। मसलन सर्केडियन साइकल, मेटाबॉलिज्म और बिहेवियरल साइंस। इसी वैज्ञानिक सोच पर टिके आधुनिक आयुर्वेदिक ब्रांड कपिवा के संस्थापक और सीईओ अमीव शर्मा ने दैनिक भास्कर से खास बातचीत की। पढ़िए मुख्य अंश: आपके नजरिए से विज्ञान आधारित आयुर्वेद क्या है? आज लोग लंबा जी तो रहे हैं, लेकिन यह जरूरी नहीं कि वे स्वस्थ भी हों। यहीं आयुर्वेद की सबसे बड़ी भूमिका है। लेकिन आयुर्वेद को आधुनिक चिकित्सा का विकल्प मानना गलत होगा। गंभीर संक्रमण, हार्ट अटैक, कैंसर, ट्रॉमा जैसे हालात में एविडेंस-बेस्ड इलाज ही जरूरी है। इसका सही रास्ता है इंटीग्रेशन। आधुनिक चिकित्सा डायग्नोसिस (जांच) और इमरजेंसी केयर में आगे है, जबकि आयुर्वेद लाइफस्टाइल गाइडेंस और लंबे समय तक स्वस्थ रहने में मदद करता है। यही वजह है कि लाइफ क्वालिटी सुधारने के लिए अब भारत ही नहीं, पूरी दुनिया ‘साइंटिफिक-आयुर्वेद’ अपना रही है। आयुर्वेदिक ब्रांड्स को मिले-जुले रिस्पॉन्स के बीच कपिवा अपनी जगह कैसे बना रहा है? कपिवा नाम तीन आयुर्वेदिक दोष- कफ, पित्त और वात से बना है। पिछले पांच दशकों में कोई बड़ा आयुर्वेदिक ब्रांड नहीं उभरा। 2016 में शुरू हुई कपिवा आज सालाना ~500 करोड़ का टर्नओवर पार कर चुका है। इसमें से 70% कारोबार रिपीट ग्राहकों से आता है। अब कंपनी के प्रोडक्ट्स देश के 400 से ज्यादा शहरों में एक लाख से अधिक स्टोर्स में उपलब्ध हैं। ये डायबिटीज के मरीजों के बीच खासे लोकप्रिय हैं। कंपनी अपनी एप ‘कपिवा डॉट इन’ के अलावा अमेजन जैसी साइट्स पर भी सप्लीमेंट सेगमेंट में अग्रणी है। कपिवा एम्स जैसे संस्थानों में डॉक्टरों के साथ भी काम करता है। यही नहीं, चीन में भी हर तीन में से एक प्रिस्क्रिप्शन में आयुर्वेदिक दवा शामिल होती है। ऐसा यूं ही नहीं है। कपिवा के चीफ इनोवेशन ऑफिसर डॉ. आर. गोविंदराजन एम फार्म और पीएचडी हैं। आयुर्वेद को लेकर आप जागरूकता कैसे बढ़ा रहे हैं? अब तक ‘वर्ड ऑफ माउथ’ ही कंपनी की सबसे बड़ी ताकत रही है। पिछले 10 वर्षों में कंपनी हर महीने करीब पांच लाख लोगों तक पहुंच रही है। अब हम डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी गंभीरता से फोकस कर रहे हैं। विज्ञान की आधुनिक दुनिया में आयुर्वेद एलोपैथी से कैसे मुकाबला करेगा? इस मामले में इंटीग्रेशन की जरूरत है। आयुर्वेद के लिए वैज्ञानिक सत्यापन जरूरी है। सिर्फ पुराना होने से कोई भी नुस्खा कारगर नहीं हो जाता। कई आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों और फॉर्मुलेशन की सुरक्षा, सही खुराक और असर साबित करने के लिए सख्त क्लीनिकल ट्रायल जरूरी है। इस दिशा में रिसर्च बढ़ रही है। सबसे असरदार तरीकों को व्यापक स्वीकृति मिल रही है। हेल्दी एजिंग, प्रिवेंटिव हेल्थकेयर, स्ट्रेस रिडक्शन और सस्टेनेबल लिविंग आज दुनियाभर की प्राथमिकताएं बन चुकी हैं। यही वे क्षेत्र हैं, जहां आयुर्वेद का योगदान मायने रखता है।

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जड़ी-बूटियों, आयुर्वेदिक फॉर्मुलेशन के लिए क्लीनिकल ट्रायल जरूरी:लाइफ क्वालिटी बेहतर बनाने के लिए भारत ही नहीं, अब दुनियाभर में अपनाया जा रहा ‘साइंटिफिक-आयुर्वेद’

जड़ी-बूटियों, आयुर्वेदिक फॉर्मुलेशन के लिए क्लीनिकल ट्रायल जरूरी:लाइफ क्वालिटी बेहतर बनाने के लिए भारत ही नहीं, अब दुनियाभर में अपनाया जा रहा ‘साइंटिफिक-आयुर्वेद’

आयुर्वेद की प्रसिद्ध अवधारणा ‘दिनचर्या’ आज भी उतनी ही प्रासंगिक है, जितनी आधुनिक जीवनशैली से पहले थी। तय समय पर जागना, सही वक्त पर खाना, कसरत, पूरी नींद और खान-पान में संयम इसका मूल मंत्र है। विज्ञान भी अब इन आदतों को सही मानता है, बस भाषा अलग है। मसलन सर्केडियन साइकल, मेटाबॉलिज्म और बिहेवियरल साइंस। इसी वैज्ञानिक सोच पर टिके आधुनिक आयुर्वेदिक ब्रांड कपिवा के संस्थापक और सीईओ अमीव शर्मा ने दैनिक भास्कर से खास बातचीत की। पढ़िए मुख्य अंश: आपके नजरिए से विज्ञान आधारित आयुर्वेद क्या है? आज लोग लंबा जी तो रहे हैं, लेकिन यह जरूरी नहीं कि वे स्वस्थ भी हों। यहीं आयुर्वेद की सबसे बड़ी भूमिका है। लेकिन आयुर्वेद को आधुनिक चिकित्सा का विकल्प मानना गलत होगा। गंभीर संक्रमण, हार्ट अटैक, कैंसर, ट्रॉमा जैसे हालात में एविडेंस-बेस्ड इलाज ही जरूरी है। इसका सही रास्ता है इंटीग्रेशन। आधुनिक चिकित्सा डायग्नोसिस (जांच) और इमरजेंसी केयर में आगे है, जबकि आयुर्वेद लाइफस्टाइल गाइडेंस और लंबे समय तक स्वस्थ रहने में मदद करता है। यही वजह है कि लाइफ क्वालिटी सुधारने के लिए अब भारत ही नहीं, पूरी दुनिया ‘साइंटिफिक-आयुर्वेद’ अपना रही है। आयुर्वेदिक ब्रांड्स को मिले-जुले रिस्पॉन्स के बीच कपिवा अपनी जगह कैसे बना रहा है? कपिवा नाम तीन आयुर्वेदिक दोष- कफ, पित्त और वात से बना है। पिछले पांच दशकों में कोई बड़ा आयुर्वेदिक ब्रांड नहीं उभरा। 2016 में शुरू हुई कपिवा आज सालाना ~500 करोड़ का टर्नओवर पार कर चुका है। इसमें से 70% कारोबार रिपीट ग्राहकों से आता है। अब कंपनी के प्रोडक्ट्स देश के 400 से ज्यादा शहरों में एक लाख से अधिक स्टोर्स में उपलब्ध हैं। ये डायबिटीज के मरीजों के बीच खासे लोकप्रिय हैं। कंपनी अपनी एप ‘कपिवा डॉट इन’ के अलावा अमेजन जैसी साइट्स पर भी सप्लीमेंट सेगमेंट में अग्रणी है। कपिवा एम्स जैसे संस्थानों में डॉक्टरों के साथ भी काम करता है। यही नहीं, चीन में भी हर तीन में से एक प्रिस्क्रिप्शन में आयुर्वेदिक दवा शामिल होती है। ऐसा यूं ही नहीं है। कपिवा के चीफ इनोवेशन ऑफिसर डॉ. आर. गोविंदराजन एम फार्म और पीएचडी हैं। आयुर्वेद को लेकर आप जागरूकता कैसे बढ़ा रहे हैं? अब तक ‘वर्ड ऑफ माउथ’ ही कंपनी की सबसे बड़ी ताकत रही है। पिछले 10 वर्षों में कंपनी हर महीने करीब पांच लाख लोगों तक पहुंच रही है। अब हम डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भी गंभीरता से फोकस कर रहे हैं। विज्ञान की आधुनिक दुनिया में आयुर्वेद एलोपैथी से कैसे मुकाबला करेगा? इस मामले में इंटीग्रेशन की जरूरत है। आयुर्वेद के लिए वैज्ञानिक सत्यापन जरूरी है। सिर्फ पुराना होने से कोई भी नुस्खा कारगर नहीं हो जाता। कई आयुर्वेदिक जड़ी-बूटियों और फॉर्मुलेशन की सुरक्षा, सही खुराक और असर साबित करने के लिए सख्त क्लीनिकल ट्रायल जरूरी है। इस दिशा में रिसर्च बढ़ रही है। सबसे असरदार तरीकों को व्यापक स्वीकृति मिल रही है। हेल्दी एजिंग, प्रिवेंटिव हेल्थकेयर, स्ट्रेस रिडक्शन और सस्टेनेबल लिविंग आज दुनियाभर की प्राथमिकताएं बन चुकी हैं। यही वे क्षेत्र हैं, जहां आयुर्वेद का योगदान मायने रखता है।

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