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जिंदगी की कीमत 18 करोड़! बेगूसराय की रूही के पास बचे हैं सिर्फ 6 महीने, सिस्टम सुनेगा मां की पुकार?

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Spinal Muscular Atrophy Treatment: बेगूसराय की 16 माह की मासूम रूही एक दुर्लभ बीमारी SMA से जंग लड़ रही है. जिसके इलाज के लिए 18 करोड़ के इंजेक्शन की जरूरत है. बेबस मां और डॉक्टर ने सरकार व समाज से मदद की गुहार लगाई है. क्या वक्त रहते रूही को नई जिंदगी मिल पाएगी? पढ़िए पूरी रिपोर्ट.

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बेगूसराय: राजनेताओं और सरकार के दावों के बीच बेगूसराय की एक मां अपनी मासूम बच्ची की जिंदगी के लिए झोली फैलाकर खड़ी है. यह कहानी है 16 महीने की रूही की. जिसकी मुस्कान अब धीरे-धीरे धुंधली पड़ रही है. रूही एक ऐसी दुर्लभ बीमारी से जूझ रही है. जिसका इलाज तो मुमकिन है, लेकिन उसकी कीमत इतनी अधिक है कि एक मध्यमवर्गीय परिवार के लिए वह महज एक सपना बनकर रह गई है.

मदद की आस में भटकती मां
बेगूसराय जिले के सदर प्रखंड के पचम्बा की रहने वाली अंजली कुमारी अपनी बेटी रूही की जान बचाने के लिए दर-दर की ठोकरें खा रही हैं. अंजली ने लोकल 18 को अपनी आपबीती सुनाते हुए बताया कि उन्होंने बेगूसराय से लेकर पटना तक के अनगिनत चक्कर काटे. शुरुआत में स्थानीय डॉक्टरों ने भारी-भरकम बिल तो बनाए, लेकिन मर्ज समझ नहीं पाए. पटना में तो यहां तक कह दिया गया कि यह बच्ची कभी ठीक नहीं होगी. हताशा और कर्ज के बोझ तले दबी अंजली जब अंत में बेगूसराय सदर अस्पताल पहुंचीं. तब जाकर इस बीमारी का असली नाम सामने आया.

क्या है स्पाइनल मस्कुलर अट्रॉफी?
सदर अस्पताल के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ.कृष्ण कुमार ने रूही की जांच के बाद बताया कि वह स्पाइनल मस्कुलर अट्रॉफी यानी SMA नामक दुर्लभ बीमारी से ग्रस्त है. यह बीमारी जींस की खराबी के कारण होती है. जो न्यूरोमस्कुलर जंक्शन को प्रभावित करती है. इसमें बच्चे की मांसपेशियां धीरे-धीरे काम करना बंद कर देती हैं. बच्चा न तो ठीक से बैठ पाता है और न खड़ा हो पाता है. साथ ही चल भी नहीं पाता है. डॉ.कुमार के अनुसार यह एक ऑटोसोमल रिसेसिव बीमारी है. जो लगभग 10000 बच्चों में से किसी एक को होती है.

18 करोड़ का एक इंजेक्शन, असंभव सी चुनौती
इस बीमारी का दुनिया में एकमात्र प्रभावी इलाज जीन थेरेपी है. इसके लिए ज़ोल्जेंसमा नामक एक सिंगल डोज इंजेक्शन दिया जाता है. इस इंजेक्शन की कीमत जानकर किसी के भी पैरों तले जमीन खिसक जाए. इसकी कीमत लगभग 17 से 18 करोड़ रुपये है. डॉक्टर बताते हैं कि इस इंजेक्शन का सक्सेस रेट 92% से 95% तक है. लेकिन इस तक पहुंचना एक गरीब या सामान्य परिवार के लिए असंभव है. रूही के पास अब केवल 6 महीने का समय शेष है. क्योंकि इस इंजेक्शन का असर एक निश्चित आयु सीमा तक ही सबसे प्रभावी होता है.

सिस्टम और समाज से उम्मीद
डॉ.कृष्ण कुमार ने बताया कि इससे पहले उन्होंने बदलपुर के एक बच्चे के लिए प्रयास किया था. जिसे मुंबई भेजकर यह इंजेक्शन दिलवाया गया. वह बच्चा अब ठीक है. रूही के मामले में भी वे कोशिश कर रहे हैं. लेकिन अब तक न तो कोई बड़ी संस्था सामने आई है. न ही क्राउडफंडिंग की कोई बड़ी शुरुआत हुई है. अंजली कहती हैं कि अब कोई कर्ज देने को भी तैयार नहीं है. क्या मेरी बच्ची सिर्फ इसलिए दम तोड़ देगी क्योंकि हमारे पास 18 करोड़ रुपये नहीं हैं.

About the Author

Amit ranjan

मैंने अपने 12 वर्षों के करियर में इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट और डिजिटल मीडिया में काम किया है। मेरा सफर स्टार न्यूज से शुरू हुआ और दैनिक भास्कर, दैनिक जागरण, दैनिक भास्कर डिजिटल और लोकल 18 तक पहुंचा। रिपोर्टिंग से ले…और पढ़ें

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बेगूसराय जिले के सदर प्रखंड के पचम्बा की रहने वाली अंजली कुमारी अपनी बेटी रूही की जान बचाने के लिए दर-दर की ठोकरें खा रही हैं. अंजली ने लोकल 18 को अपनी आपबीती सुनाते हुए बताया कि उन्होंने बेगूसराय से लेकर पटना तक के अनगिनत चक्कर काटे. शुरुआत में स्थानीय डॉक्टरों ने भारी-भरकम बिल तो बनाए, लेकिन मर्ज समझ नहीं पाए. पटना में तो यहां तक कह दिया गया कि यह बच्ची कभी ठीक नहीं होगी. हताशा और कर्ज के बोझ तले दबी अंजली जब अंत में बेगूसराय सदर अस्पताल पहुंचीं. तब जाकर इस बीमारी का असली नाम सामने आया.

क्या है स्पाइनल मस्कुलर अट्रॉफी?
सदर अस्पताल के शिशु रोग विशेषज्ञ डॉ.कृष्ण कुमार ने रूही की जांच के बाद बताया कि वह स्पाइनल मस्कुलर अट्रॉफी यानी SMA नामक दुर्लभ बीमारी से ग्रस्त है. यह बीमारी जींस की खराबी के कारण होती है. जो न्यूरोमस्कुलर जंक्शन को प्रभावित करती है. इसमें बच्चे की मांसपेशियां धीरे-धीरे काम करना बंद कर देती हैं. बच्चा न तो ठीक से बैठ पाता है और न खड़ा हो पाता है. साथ ही चल भी नहीं पाता है. डॉ.कुमार के अनुसार यह एक ऑटोसोमल रिसेसिव बीमारी है. जो लगभग 10000 बच्चों में से किसी एक को होती है.

18 करोड़ का एक इंजेक्शन, असंभव सी चुनौती
इस बीमारी का दुनिया में एकमात्र प्रभावी इलाज जीन थेरेपी है. इसके लिए ज़ोल्जेंसमा नामक एक सिंगल डोज इंजेक्शन दिया जाता है. इस इंजेक्शन की कीमत जानकर किसी के भी पैरों तले जमीन खिसक जाए. इसकी कीमत लगभग 17 से 18 करोड़ रुपये है. डॉक्टर बताते हैं कि इस इंजेक्शन का सक्सेस रेट 92% से 95% तक है. लेकिन इस तक पहुंचना एक गरीब या सामान्य परिवार के लिए असंभव है. रूही के पास अब केवल 6 महीने का समय शेष है. क्योंकि इस इंजेक्शन का असर एक निश्चित आयु सीमा तक ही सबसे प्रभावी होता है.

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डॉ.कृष्ण कुमार ने बताया कि इससे पहले उन्होंने बदलपुर के एक बच्चे के लिए प्रयास किया था. जिसे मुंबई भेजकर यह इंजेक्शन दिलवाया गया. वह बच्चा अब ठीक है. रूही के मामले में भी वे कोशिश कर रहे हैं. लेकिन अब तक न तो कोई बड़ी संस्था सामने आई है. न ही क्राउडफंडिंग की कोई बड़ी शुरुआत हुई है. अंजली कहती हैं कि अब कोई कर्ज देने को भी तैयार नहीं है. क्या मेरी बच्ची सिर्फ इसलिए दम तोड़ देगी क्योंकि हमारे पास 18 करोड़ रुपये नहीं हैं.

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