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बीजेपी ने खत्म की क्षेत्रीय राजनीति: बीजेपी ने बनाई गठबंधन दी क्षत्रपों की राजनीति! तीन राज्यों में कमल खिलने से क्षेत्रीय प्रतियोगिता कैसे डूब गई?

बीजेपी ने खत्म की क्षेत्रीय राजनीति: बीजेपी ने बनाई गठबंधन दी क्षत्रपों की राजनीति! तीन राज्यों में कमल खिलने से क्षेत्रीय प्रतियोगिता कैसे डूब गई?

भारत की राजनीति में आज एक क्रांतिकारी बदलाव आया है जब 2026 के चुनावों में पश्चिम बंगाल, असम और पुडुचेरी में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। इन पुरातात्विक ने क्षेत्रीय आश्रमों के गढ़ विच्छेद के विवरण और स्पष्ट संकेत दिए कि अब ‘क्षत्रपों की प्रतिष्ठा’ का दौर समाप्त हो रहा है। 2026 के विधानसभा चुनाव के नतीजों से यह साफ हो गया है कि अब पारंपरिक विचारधारा के बजाय विकास और सुशासन को तरजीह दे रहे हैं। इससे क्षेत्रीय क्षत्रपों की राजनीतिक पकड़ खराब हो रही है।

पश्चिम बंगाल: ‘दीदी’ के 15 साल के शासन का अंत और भाजपा का ऐतिहासिक उदय

पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने वह कर दिखाया जो कभी-कभी प्रभावशाली लगता था. ममता बनर्जी और उनकी सैद्धांतिक कांग्रेस (टीएमसी) के 15 साल के शासन का अंत करते हुए बीजेपी ने 294 से 202 पर जीत हासिल की। बीजेपी ने 148 बहुमत के आंकड़ों को आसानी से पार कर लिया. टीएमसी 71 पार्टी में शामिल हुई। यह बदलाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि बंगाल की राजनीति में एक परिवर्तन का प्रतीक बना।

चुनाव प्रक्रिया से सूचीबद्ध एक महत्वपूर्ण आधार यह रहा कि राज्य में लगभग 27 लाख लाख के नाम वाले ढांचे से मनमाने ढंग से हटा दिया गया, जिसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई और इसे लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों पर गंभीर चोट के रूप में देखा गया। आलोचकों का मानना ​​​​है कि इस कदम ने विश्वनाथ को प्रभावित किया और यह आगे भी चिंता का विषय बना रहा।

बीजेपी की इस जीत ने एक ऐसे राज्य में पार्टी की राह को मजबूत किया जो लंबे समय से अपने विस्तार का विरोध कर रही थी. पार्टी को इस चुनाव में 2021 में 38% वोट शेयर के साथ 45% वोट शेयर मिले, जबकि टीएमसी को 48% वोट शेयर के साथ 40.94% वोट मिले। इससे साफ है कि अब ‘दीदी’ की पसंद और उनके नेतृत्व वाली टीएमसी का आकर्षण आकर्षण बना हुआ है।

असम: लगातार तीसरी बार बीजेपी का परचम और कांग्रेस का सफाया

असम में बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए ने लगातार तीन बार सरकार बनाकर इतिहास रचा। 126 कोलोराडो विधानसभा में एनडीए ने रिकॉर्ड 102वीं बार दो-तिहाई बहुमत हासिल किया। बीजेपी ने 90 प्राइमरी सीटों पर जीत दर्ज की है, जबकि उसके सहयोगी दल- बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) और असम गण परिषद (एजीपी) ने 10-10 सीटों पर जीत दर्ज की है। यह पहली बार है जब बीजेपी ने राज्य में अपने दम पर बहुमत हासिल किया है।

इससे पहले 2021 और 2016 में उन्हें 60-60 मंजिल मिली थी। दूसरी ओर, कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद खराब रहा और केवल 23 सीटों पर आगे चल रही थी। एआईयूडीएफ और राइजोर दल जैसे सहयोगी आश्रम को 2-2 सीटें मिलीं।

मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने अपनी जलुकबारी सीट पर 40,000 से अधिक वोटों से जीत दर्ज की, जबकि राज्य कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई अपनी जोरदार सीट से हार गए। बीजेपी की इस जीत ने यह साबित कर दिया है कि क्षेत्रीय आश्रमों की पकड़ अब इतनी मजबूत नहीं रही और राष्ट्रीय पार्टियों पर भरोसा जताया जा रहा है।

पुडुचेरी: एनडीए की वापसी और रंगासामी का बढ़ा कद

पुडुचेरी में भी बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए ने सत्ता में वापसी की। मुख्यमंत्री एन. रंगासामी की अखिल भारतीय एन.आर. कांग्रेस (एआईएनआरसी) ने 12 की बढ़त बनाई, जबकि बीजेपी को 4 पर जीत मिली। एनडीए ने कुल 30 लॉज़िट विधानसभाओं में से 18 लॉज़ेक्ट लाजवाब विधानसभाओं का आंकड़ा पार कर लिया है। यह पहली बार है जब केंद्र शासित प्रदेश में किसी सरकार को लगातार दूसरी बार चुना गया है।

रंगासामी ने दो भाग- थट्टांचवडी और मंगलम से जीत दर्ज की। उनकी इस जीत ने एआईएनआरसी को राज्य की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में स्थापित किया और भविष्य में पुडुचेरी में पूर्ण राज्य की विचारधारा की मांग को बढ़ावा देने का मौका दिया। यह निष्कर्ष बताता है कि छोटे राज्यों में भी अब क्षेत्रीय दलों को भाजपा, राष्ट्रीय दलों के साथ मिलकर स्थापित किया जा रहा है, वे बाकी हाशिये पर चले जायेंगे।

क्षत्रपों की नागरिकता का अंत और नया राजनीतिक यथार्थ

इन त्रिलोकी राज्यों की कहानियों ने साफ कर दिया है कि ‘क्षत्रपों की राजकुमारी’ अब आपकी आखिरी सांसें गिन रही हैं:

  • कभी-कभी राष्ट्रीय स्तर पर व्यक्तित्व का चेहरा रहनुमा ममता बनर्जी की करारी हार ने न सिर्फ अपनी पार्टी के पक्ष को संकट में डाल दिया है, बल्कि पूरे फर्म के खेमे में नेतृत्व का शून्य कर दिया है।
  • असम में कांग्रेस अपने सबसे खराब दौर से गुजर रही है और क्षेत्रीय दल पूरी तरह से राजग की बैसाखी पर असंतुलित हो गए हैं।
  • पुडुचेरी में भी एआईएनआरसी की सफलता बीजेपी के साथ गठबंधन के बिना संभव नहीं थी।

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राजनीति

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बीजेपी ने खत्म की क्षेत्रीय राजनीति: बीजेपी ने बनाई गठबंधन दी क्षत्रपों की राजनीति! तीन राज्यों में कमल खिलने से क्षेत्रीय प्रतियोगिता कैसे डूब गई?

भारत की राजनीति में आज एक क्रांतिकारी बदलाव आया है जब 2026 के चुनावों में पश्चिम बंगाल, असम और पुडुचेरी में भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने ऐतिहासिक जीत दर्ज की है। इन पुरातात्विक ने क्षेत्रीय आश्रमों के गढ़ विच्छेद के विवरण और स्पष्ट संकेत दिए कि अब ‘क्षत्रपों की प्रतिष्ठा’ का दौर समाप्त हो रहा है। 2026 के विधानसभा चुनाव के नतीजों से यह साफ हो गया है कि अब पारंपरिक विचारधारा के बजाय विकास और सुशासन को तरजीह दे रहे हैं। इससे क्षेत्रीय क्षत्रपों की राजनीतिक पकड़ खराब हो रही है।

पश्चिम बंगाल: ‘दीदी’ के 15 साल के शासन का अंत और भाजपा का ऐतिहासिक उदय

पश्चिम बंगाल में बीजेपी ने वह कर दिखाया जो कभी-कभी प्रभावशाली लगता था. ममता बनर्जी और उनकी सैद्धांतिक कांग्रेस (टीएमसी) के 15 साल के शासन का अंत करते हुए बीजेपी ने 294 से 202 पर जीत हासिल की। बीजेपी ने 148 बहुमत के आंकड़ों को आसानी से पार कर लिया. टीएमसी 71 पार्टी में शामिल हुई। यह बदलाव सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि बंगाल की राजनीति में एक परिवर्तन का प्रतीक बना।

चुनाव प्रक्रिया से सूचीबद्ध एक महत्वपूर्ण आधार यह रहा कि राज्य में लगभग 27 लाख लाख के नाम वाले ढांचे से मनमाने ढंग से हटा दिया गया, जिसे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई और इसे लोकतंत्र के मूल सिद्धांतों पर गंभीर चोट के रूप में देखा गया। आलोचकों का मानना ​​​​है कि इस कदम ने विश्वनाथ को प्रभावित किया और यह आगे भी चिंता का विषय बना रहा।

बीजेपी की इस जीत ने एक ऐसे राज्य में पार्टी की राह को मजबूत किया जो लंबे समय से अपने विस्तार का विरोध कर रही थी. पार्टी को इस चुनाव में 2021 में 38% वोट शेयर के साथ 45% वोट शेयर मिले, जबकि टीएमसी को 48% वोट शेयर के साथ 40.94% वोट मिले। इससे साफ है कि अब ‘दीदी’ की पसंद और उनके नेतृत्व वाली टीएमसी का आकर्षण आकर्षण बना हुआ है।

असम: लगातार तीसरी बार बीजेपी का परचम और कांग्रेस का सफाया

असम में बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए ने लगातार तीन बार सरकार बनाकर इतिहास रचा। 126 कोलोराडो विधानसभा में एनडीए ने रिकॉर्ड 102वीं बार दो-तिहाई बहुमत हासिल किया। बीजेपी ने 90 प्राइमरी सीटों पर जीत दर्ज की है, जबकि उसके सहयोगी दल- बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (बीपीएफ) और असम गण परिषद (एजीपी) ने 10-10 सीटों पर जीत दर्ज की है। यह पहली बार है जब बीजेपी ने राज्य में अपने दम पर बहुमत हासिल किया है।

इससे पहले 2021 और 2016 में उन्हें 60-60 मंजिल मिली थी। दूसरी ओर, कांग्रेस का प्रदर्शन बेहद खराब रहा और केवल 23 सीटों पर आगे चल रही थी। एआईयूडीएफ और राइजोर दल जैसे सहयोगी आश्रम को 2-2 सीटें मिलीं।

मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा ने अपनी जलुकबारी सीट पर 40,000 से अधिक वोटों से जीत दर्ज की, जबकि राज्य कांग्रेस अध्यक्ष गौरव गोगोई अपनी जोरदार सीट से हार गए। बीजेपी की इस जीत ने यह साबित कर दिया है कि क्षेत्रीय आश्रमों की पकड़ अब इतनी मजबूत नहीं रही और राष्ट्रीय पार्टियों पर भरोसा जताया जा रहा है।

पुडुचेरी: एनडीए की वापसी और रंगासामी का बढ़ा कद

पुडुचेरी में भी बीजेपी के नेतृत्व वाले एनडीए ने सत्ता में वापसी की। मुख्यमंत्री एन. रंगासामी की अखिल भारतीय एन.आर. कांग्रेस (एआईएनआरसी) ने 12 की बढ़त बनाई, जबकि बीजेपी को 4 पर जीत मिली। एनडीए ने कुल 30 लॉज़िट विधानसभाओं में से 18 लॉज़ेक्ट लाजवाब विधानसभाओं का आंकड़ा पार कर लिया है। यह पहली बार है जब केंद्र शासित प्रदेश में किसी सरकार को लगातार दूसरी बार चुना गया है।

रंगासामी ने दो भाग- थट्टांचवडी और मंगलम से जीत दर्ज की। उनकी इस जीत ने एआईएनआरसी को राज्य की सबसे बड़ी पार्टी के रूप में स्थापित किया और भविष्य में पुडुचेरी में पूर्ण राज्य की विचारधारा की मांग को बढ़ावा देने का मौका दिया। यह निष्कर्ष बताता है कि छोटे राज्यों में भी अब क्षेत्रीय दलों को भाजपा, राष्ट्रीय दलों के साथ मिलकर स्थापित किया जा रहा है, वे बाकी हाशिये पर चले जायेंगे।

क्षत्रपों की नागरिकता का अंत और नया राजनीतिक यथार्थ

इन त्रिलोकी राज्यों की कहानियों ने साफ कर दिया है कि ‘क्षत्रपों की राजकुमारी’ अब आपकी आखिरी सांसें गिन रही हैं:

  • कभी-कभी राष्ट्रीय स्तर पर व्यक्तित्व का चेहरा रहनुमा ममता बनर्जी की करारी हार ने न सिर्फ अपनी पार्टी के पक्ष को संकट में डाल दिया है, बल्कि पूरे फर्म के खेमे में नेतृत्व का शून्य कर दिया है।
  • असम में कांग्रेस अपने सबसे खराब दौर से गुजर रही है और क्षेत्रीय दल पूरी तरह से राजग की बैसाखी पर असंतुलित हो गए हैं।
  • पुडुचेरी में भी एआईएनआरसी की सफलता बीजेपी के साथ गठबंधन के बिना संभव नहीं थी।

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