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रसगुल्ला खाते-खाते 35 साल के शख्स को मार दिया लकवा, पर ऐसा हुआ क्यों? डॉक्टर ने बताया इसके पीछे का खौफनाक सच

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Paralysed After Eating Rasgullas : हैदराबाद में 35 साल के एक शख्स को रसगुल्ला खाते समय अचानक लकवा मार दिया. उसे आनन-फानन में अस्पताल ले जाया गया लेकिन लोग समझ नहीं पा रहे हैं कि आखिर रसगुल्ला खाने से किसी को लकवा कैसे मार सकता है. यही सवाल हमने एशिया मारेंगो अस्पताल गुरुग्राम के चेयरमैन और प्रसिद्ध न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. प्रवीण गुप्ता से पूछा तो उन्होंने कहा कि ऐसा हो सकता है और इसके कारण होते हैं लेकिन यह सबको नहीं होता. आइए इसके बारे में विस्तार से जानते हैं.

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डॉ. प्रवीण गुप्ता बता रहे हैं रसगुल्ला और लकवे का कनेक्शन.

क्या कोई कल्पना कर सकता है कि रसगुल्ला खाते-खाते किसी को लकवा मार दे. शायद ही कोई इस पर यकीन करे लेकिन एक डॉक्टर ने इंस्टाग्राम पर सच में ऐसे वाकये के बारे में बताया है. उन्होंने बताया है कि 35 साल का एक शख्स पहले की तरह रसगुल्ला खा रहा था. जैसे ही उसने 5-6 रसगुल्ले खाएए उसके बाद अचानक उनके हाथ-पैरों से ताकत गायब होने लगी. पहले तो उसे कुछ समझ में नहीं आया लेकिन कुछ ही समय बाद उसे हाथ और पैरों में पूरी तरह से ताकत लगनी बंद हो गई. इसके बाद अस्पताल जाना पड़ा. डॉक्टर ने लिखा है कि मरीज को कोई फूड प्वाइजनिंग नहीं हुआ क्योंकि रसगुल्ले एकदम ताजे थे. फिर ऐसा क्या हुआ कि उसे लकवा मार दिया.

क्यों होता है ऐसा

जब यही सवाल मैंने एशिया मारेंगो अस्पताल गुरुग्राम के चेयरमैन और प्रसिद्ध न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. प्रवीण गुप्ता से पूछा तो उन्होंने कहा कि ऐसा बिल्कुल संभव है. लेकिन ऐसा नहीं है कि रसगुल्ला खाने से किसी को भी यह बीमारी हो सकती है. यह एक स्थिति है जो कुछ लोगों में हो सकती है. इस बीमारी को मेडिकल भाषा में हाइपोकैलमिक पीरियोडिक पैरालाइसिस कहा जाता है. यह एक रेयर जेनेटिक कंडीशन है जो बचपन से लेकर जवानी तक किसी भी उम्र में शुरू हो सकती है. डॉ. प्रवीण गु्प्ता ने बताया कि हाइपोकैलमिया का मतलब है कि खून में पौटाशियम का लेवल बहुत कम हो जाना. वास्तव में जब कोई ज्यादा कार्बोहाइड्रैट वाली चीजें खाता है तो उसमें इस कार्बोहाइड्रैट को एनर्जी में बदलने के लिए इंसुलिन हार्मोन तेजी से निकलता है. पर जिस व्यक्ति में हाइपोकैलमिया की स्थिति होती है उसमें इंसुलिन ज्यादा बनने पर पोटैशियम को खून से निकाल देता है और कोशिकाओं के अंदर भर देता है. पोटैशियम हमारी जिंदगी के लिए बहुत जरूरी है. पोटैशियम हमारे शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स का काम करता है. यानी यह दिमाग से शरीर में इलेक्ट्रिक सिग्नल भेजने में मदद करता है. जब पोटैशियम की कमी हो जाती है तो नर्व से मसल्स तक सिग्नल ट्रांसफर नहीं हो पाता है. इससे मसल्स काम करना बंद कर देता है और हाथ-पैर हिलते-डुलते नहीं है. जिस व्यक्ति में यह बीमारी होती है, उसे यह बार बार यह होता है. पोटैशियम की कमी होने पर हार्ट रेट पर कम हो सकता है. इस कारण हार्ट स्लो हो जाता है. अगर इसका समय पर इलाज नहीं कराया जाए तो इससे कार्डिएक अरेस्ट का भी खतरा बढ़ सकता है.

इस बीमारी की पहचान कैसे करें

डॉ. प्रवीण गुप्ता कहते हैं कि आमतौर पर इस बीमारी में हाथ-पैर बहुत कमजोर होकर काम करना बंद कर देते हैं. यह अचानक भी हो सकता है और धीरे-धीरे भी हो सकता है. कभी-कभार लक्षण बहुत कम होते हैं तो लोग ध्यान नहीं देते लेकिन यह बार-बार होता है इसलिए बाद में मरीज को पता चल ही जाता है. इस बीमारी में जब अटैक आता है तो उससे पहले मूड चेंज होने लगता है. हाथ-पैर में ऐसा लगता है कि सूई चुभ रही है. इसके साथ ही थकान होने लगती है.

किस स्थिति में अटैक का खतरा

जिस व्यक्ति को हाइपोकैलमिक पीरियोडिक पैरालाइसिस की बीमारी है उनमें कभी-कभी बहुत हार्ड एक्सरसाइज करने के बाद भी अटैक हो सकता है. इसलिए ऐसे लोगों को हार्ड एक्सरसाइज से बचना चाहिए. इसके अलावा बहुत ज्यादा ओवरइटिंग, ज्यादा कार्बोहाइड्रैट वाली चीजें खाने, ज्यादा नमक खाने, शराब पीने आदि से भी अटैक आ सकता है. वहीं ज्यादा सर्दी लग जाए तो भी इस बीमारी का अटैक हो सकता है. जिन लोगों को किडनी की बीमारी रीनल ट्यूबलर एडिसोसिस होती है, उन्हें भी इस बीमारी का खतरा ज्यादा रहता है.

इस बीमारी का इलाज क्या है

डॉ. प्रवीण गुप्ता कहते हैं कि पैरालाइसिस अटैक के बाद मरीज को तुरंत अस्पताल में लाना चाहिए. न्यूरोलॉजिस्ट कुछ टेस्ट लिखते हैं. इसके बाद अगर यह साबित हो जाता है कि मरीज को हाइपोकैलमिक पीरियोडिक पैरालाइसिस है तो उसे पोटैशियम बढ़ाने वाली दवाई दी जाती है. इससे धीरे-धीरे पैरालाइसिस ठीक हो जाती है. ऐसे मरीजों को हाई पोटैशियम डाइट लेने की सलाह दी जाती है. मसूर की दाल, एवोकाडो, आलू, केला, दूध, पालक, चिकन ब्रेस्ट, मछली, फूलगोभी आदि में पोटैशियम की मात्रा ज्यादा होती है. इसलिए इन चीजों को मरीज को सेवन करना चाहिए.

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Lakshmi Narayan

18 साल से ज्यादा के लंबे करियर में लक्ष्मी नारायण ने डीडी न्यूज, आउटलुक, नई दुनिया, दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। समसामयिक विषयों के विभिन्न मुद्दों, राजनीति, समाज, …और पढ़ें

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डॉ. प्रवीण गुप्ता बता रहे हैं रसगुल्ला और लकवे का कनेक्शन.

क्या कोई कल्पना कर सकता है कि रसगुल्ला खाते-खाते किसी को लकवा मार दे. शायद ही कोई इस पर यकीन करे लेकिन एक डॉक्टर ने इंस्टाग्राम पर सच में ऐसे वाकये के बारे में बताया है. उन्होंने बताया है कि 35 साल का एक शख्स पहले की तरह रसगुल्ला खा रहा था. जैसे ही उसने 5-6 रसगुल्ले खाएए उसके बाद अचानक उनके हाथ-पैरों से ताकत गायब होने लगी. पहले तो उसे कुछ समझ में नहीं आया लेकिन कुछ ही समय बाद उसे हाथ और पैरों में पूरी तरह से ताकत लगनी बंद हो गई. इसके बाद अस्पताल जाना पड़ा. डॉक्टर ने लिखा है कि मरीज को कोई फूड प्वाइजनिंग नहीं हुआ क्योंकि रसगुल्ले एकदम ताजे थे. फिर ऐसा क्या हुआ कि उसे लकवा मार दिया.

क्यों होता है ऐसा

जब यही सवाल मैंने एशिया मारेंगो अस्पताल गुरुग्राम के चेयरमैन और प्रसिद्ध न्यूरोलॉजिस्ट डॉ. प्रवीण गुप्ता से पूछा तो उन्होंने कहा कि ऐसा बिल्कुल संभव है. लेकिन ऐसा नहीं है कि रसगुल्ला खाने से किसी को भी यह बीमारी हो सकती है. यह एक स्थिति है जो कुछ लोगों में हो सकती है. इस बीमारी को मेडिकल भाषा में हाइपोकैलमिक पीरियोडिक पैरालाइसिस कहा जाता है. यह एक रेयर जेनेटिक कंडीशन है जो बचपन से लेकर जवानी तक किसी भी उम्र में शुरू हो सकती है. डॉ. प्रवीण गु्प्ता ने बताया कि हाइपोकैलमिया का मतलब है कि खून में पौटाशियम का लेवल बहुत कम हो जाना. वास्तव में जब कोई ज्यादा कार्बोहाइड्रैट वाली चीजें खाता है तो उसमें इस कार्बोहाइड्रैट को एनर्जी में बदलने के लिए इंसुलिन हार्मोन तेजी से निकलता है. पर जिस व्यक्ति में हाइपोकैलमिया की स्थिति होती है उसमें इंसुलिन ज्यादा बनने पर पोटैशियम को खून से निकाल देता है और कोशिकाओं के अंदर भर देता है. पोटैशियम हमारी जिंदगी के लिए बहुत जरूरी है. पोटैशियम हमारे शरीर में इलेक्ट्रोलाइट्स का काम करता है. यानी यह दिमाग से शरीर में इलेक्ट्रिक सिग्नल भेजने में मदद करता है. जब पोटैशियम की कमी हो जाती है तो नर्व से मसल्स तक सिग्नल ट्रांसफर नहीं हो पाता है. इससे मसल्स काम करना बंद कर देता है और हाथ-पैर हिलते-डुलते नहीं है. जिस व्यक्ति में यह बीमारी होती है, उसे यह बार बार यह होता है. पोटैशियम की कमी होने पर हार्ट रेट पर कम हो सकता है. इस कारण हार्ट स्लो हो जाता है. अगर इसका समय पर इलाज नहीं कराया जाए तो इससे कार्डिएक अरेस्ट का भी खतरा बढ़ सकता है.

इस बीमारी की पहचान कैसे करें

डॉ. प्रवीण गुप्ता कहते हैं कि आमतौर पर इस बीमारी में हाथ-पैर बहुत कमजोर होकर काम करना बंद कर देते हैं. यह अचानक भी हो सकता है और धीरे-धीरे भी हो सकता है. कभी-कभार लक्षण बहुत कम होते हैं तो लोग ध्यान नहीं देते लेकिन यह बार-बार होता है इसलिए बाद में मरीज को पता चल ही जाता है. इस बीमारी में जब अटैक आता है तो उससे पहले मूड चेंज होने लगता है. हाथ-पैर में ऐसा लगता है कि सूई चुभ रही है. इसके साथ ही थकान होने लगती है.

किस स्थिति में अटैक का खतरा

जिस व्यक्ति को हाइपोकैलमिक पीरियोडिक पैरालाइसिस की बीमारी है उनमें कभी-कभी बहुत हार्ड एक्सरसाइज करने के बाद भी अटैक हो सकता है. इसलिए ऐसे लोगों को हार्ड एक्सरसाइज से बचना चाहिए. इसके अलावा बहुत ज्यादा ओवरइटिंग, ज्यादा कार्बोहाइड्रैट वाली चीजें खाने, ज्यादा नमक खाने, शराब पीने आदि से भी अटैक आ सकता है. वहीं ज्यादा सर्दी लग जाए तो भी इस बीमारी का अटैक हो सकता है. जिन लोगों को किडनी की बीमारी रीनल ट्यूबलर एडिसोसिस होती है, उन्हें भी इस बीमारी का खतरा ज्यादा रहता है.

इस बीमारी का इलाज क्या है

डॉ. प्रवीण गुप्ता कहते हैं कि पैरालाइसिस अटैक के बाद मरीज को तुरंत अस्पताल में लाना चाहिए. न्यूरोलॉजिस्ट कुछ टेस्ट लिखते हैं. इसके बाद अगर यह साबित हो जाता है कि मरीज को हाइपोकैलमिक पीरियोडिक पैरालाइसिस है तो उसे पोटैशियम बढ़ाने वाली दवाई दी जाती है. इससे धीरे-धीरे पैरालाइसिस ठीक हो जाती है. ऐसे मरीजों को हाई पोटैशियम डाइट लेने की सलाह दी जाती है. मसूर की दाल, एवोकाडो, आलू, केला, दूध, पालक, चिकन ब्रेस्ट, मछली, फूलगोभी आदि में पोटैशियम की मात्रा ज्यादा होती है. इसलिए इन चीजों को मरीज को सेवन करना चाहिए.

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18 साल से ज्यादा के लंबे करियर में लक्ष्मी नारायण ने डीडी न्यूज, आउटलुक, नई दुनिया, दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। समसामयिक विषयों के विभिन्न मुद्दों, राजनीति, समाज, …और पढ़ें

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