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रील संस्कृति के समय में परिपक्व प्रेम पर खास चर्चा:सौरभ जैन और शीन दास ने कहा- सम्मान और धैर्य से ही रिश्ते चलते हैं

रील संस्कृति के समय में परिपक्व प्रेम पर खास चर्चा:सौरभ जैन और शीन दास ने कहा- सम्मान और धैर्य से ही रिश्ते चलते हैं

सौरभ राज जैन और शीन सविता दास इन दिनों वेब सीरीज संमरमर को लेकर चर्चा में हैं। दैनिक भास्कर से खास बातचीत में दोनों कलाकारों ने अपने किरदारों अमृता और आदित्य के जरिए बदलते दौर के प्रेम, धैर्य और रिश्तों की गहराई पर खुलकर बात की। उन्होंने बताया कि सच्चा प्यार केवल साथ रहने का नाम नहीं, बल्कि सम्मान, समझ और जिम्मेदारी निभाने का भी नाम है। आज के ‘रील संस्कृति’ और त्वरित फैसलों वाले समय में उनका मानना है कि रिश्तों की असली ताकत धैर्य और परस्पर सम्मान में छिपी है। दोनों ने अपने निजी अनुभव साझा करते हुए यह भी बताया कि टीवी से आगे बढ़ने के सफर में उन्हें किन धारणाओं का सामना करना पड़ा। साथ ही, सूरज बड़जात्या के साथ काम करने के अनुभव को उन्होंने परिवार जैसा बताया। पेश है कुछ खास अंश.. सवाल: शीन, आपका किरदार आपके असली जीवन से कितना मिलता-जुलता है? जवाब/शीन:मुझे लगता है कि भावनात्मक रूप से मैं और अमृता (मेरा किरदार) थोड़े संवेदनशील हैं। फर्क इतना है कि अमृता पहले बात को समझती है, उसे अपने भीतर समेटती है और फिर प्रतिक्रिया देती है। लेकिन मैं तुरंत प्रतिक्रिया दे देती हूं। मैं खुद भी यही सीखना चाहती हूं कि पहले बात को समझूं और फिर जवाब दूं। सवाल: सौरभ, आपका किरदार आदित्य आपसे कितना मिलता है? जवाब/सौरभ: आदित्य मुझे बहुत अपने जैसा लगता है। रिश्तों को समझना और उन्हें सम्मान देना मेरे लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है। बचपन में हम सब थोड़े आवेग में फैसले लेते हैं और फिर उनसे सीखते हैं। आदित्य की यात्रा भी कुछ ऐसी ही है। इसलिए यह किरदार मेरे लिए बहुत जुड़ा हुआ और अपना-सा है। सवाल: बदलते समय में प्यार के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे? और यह कहानी कितनी प्रासंगिक है? जवाब/शीन: एक पुरानी कहावत है कि प्यार करना आसान है, लेकिन निभाना कठिन है। जो लोग निभा लेते हैं, वही सच्चे मायने में जीतते हैं। अमृता और आदित्य ने अपने प्यार को निभाया है। उन्हें समाज के लिए शादी की जरूरत नहीं थी, क्योंकि उनका रिश्ता गहरा और सच्चा था। हालांकि परिस्थितियों के कारण अमृता को अपने परिवार की जिम्मेदारियां निभाने के लिए अलग रास्ता चुनना पड़ा। लेकिन आदित्य ने उसका साथ नहीं छोड़ा। उसने उसे आगे बढ़ने की आज़ादी दी। यह कहानी सपनों और जिम्मेदारियों के बीच संतुलन की है। जीवन हमेशा सीधी रेखा में नहीं चलता। प्यार और जिम्मेदारियां हमेशा एक साथ नहीं चलतीं। यही इस कहानी की खूबसूरती है। सवाल: आज के ‘तुरंत सब कुछ पाने’ वाले दौर में इंतजार और धैर्य कितना मायने रखता है? जवाब/सौरभ: मेरे विचार से किसी भी दौर का प्यार हो, उसका आधार एक ही है, सम्मान। जहां सम्मान है, वहां धैर्य भी है। बिना धैर्य के सम्मान नहीं हो सकता। जो इस बात को समझता है, वही सच्चा प्रेम करता है। जो सिर्फ समय बिताना चाहता है, उसके लिए प्रेम का कोई अर्थ नहीं है। सवाल: आजकल ‘अल्फा मेल’ की बातें होती हैं। ऐसे में आदित्य जैसा सरल और संवेदनशील लड़का कितना प्रासंगिक है? जवाब/सौरभ: मुझे लगता है कि दस आक्रामक लोगों के बीच एक शांत और संतुलित व्यक्ति काफी होता है। सच्चे प्रेम में हिंसा नहीं, बल्कि मूल्य और जिम्मेदारी महत्वपूर्ण होते हैं। सशक्त होना मतलब केवल अपने बारे में सोचना नहीं है। असली सशक्तिकरण तब है, जब आप अपने सपनों के साथ-साथ अपनी जिम्मेदारियों को भी समझते हैं। आदित्य और अमृता की यात्रा यही सिखाती है। सवाल: टीवी से फिल्मों और अन्य मंचों पर आने वाले कलाकारों को ‘टीवी कलाकार’ का टैग झेलना पड़ता है। क्या आपके साथ ऐसा हुआ? जवाब/शीन: कभी-कभी लोग ऐसा कहते हैं। लेकिन मेरा मानना है कि मैं जिस लगन से टीवी करती हूं, उसी लगन से फिल्म भी करूंगी। टीवी कलाकारों को अनुशासन, संवाद याद रखने और समय की कद्र करने की अच्छी आदत होती है। इसलिए यह अनुभव हमें और मजबूत बनाता है। लोगों की सोच अलग हो सकती है, लेकिन इससे मुझे फर्क नहीं पड़ता। सौरभ: हां, ऐसी धारणाएं होती हैं। लेकिन मेरा मानना है कि जब आपका समय आता है, तो सब ठीक हो जाता है। अगर समय नहीं आया, तो हम कई कारण गिना सकते हैं। पर सही समय पर सब अपने आप ठीक हो जाता है। सवाल: राजश्री परिवार के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा? और सूरज जी से क्या सीख मिली? जवाब/शीन: जब मैंने उनके साथ पहला शो किया था, तो उन्होंने मुझसे कहा था कि टीआरपी की चिंता मत करो, बस प्रक्रिया का आनंद लो। यह सुनकर मैं हैरान रह गई थी। इतने बड़े निर्माता का ऐसा कहना बहुत प्रेरणादायक था। आज भी जब उनका फोन आता है, तो ऐसा लगता है जैसे घर से फोन आया हो। सौरभ: पहले मैंने ‘यहां में घर घर खेली’ में एक छोटे किरदार में काम किया था, और इस बार बड़ा अवसर मिला। जब मैं पहली बार उनसे मिला, तो सोचा था कोई असिस्टेंट आकर किरदार समझाएगा। लेकिन वे खुद मेरे मेकअप कक्ष में आए और किरदार के संदर्भ लेकर समझाया। उनका काम के प्रति जुनून और सभी को सम्मान देने का तरीका बहुत प्रेरणादायक है। आज के समय में जहां सम्मान को दिखावा समझ लिया जाता है, वहां उनके साथ रहकर महसूस होता है कि सच्चा सम्मान कैसा होता है।

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सौरभ राज जैन और शीन सविता दास इन दिनों वेब सीरीज संमरमर को लेकर चर्चा में हैं। दैनिक भास्कर से खास बातचीत में दोनों कलाकारों ने अपने किरदारों अमृता और आदित्य के जरिए बदलते दौर के प्रेम, धैर्य और रिश्तों की गहराई पर खुलकर बात की। उन्होंने बताया कि सच्चा प्यार केवल साथ रहने का नाम नहीं, बल्कि सम्मान, समझ और जिम्मेदारी निभाने का भी नाम है। आज के ‘रील संस्कृति’ और त्वरित फैसलों वाले समय में उनका मानना है कि रिश्तों की असली ताकत धैर्य और परस्पर सम्मान में छिपी है। दोनों ने अपने निजी अनुभव साझा करते हुए यह भी बताया कि टीवी से आगे बढ़ने के सफर में उन्हें किन धारणाओं का सामना करना पड़ा। साथ ही, सूरज बड़जात्या के साथ काम करने के अनुभव को उन्होंने परिवार जैसा बताया। पेश है कुछ खास अंश.. सवाल: शीन, आपका किरदार आपके असली जीवन से कितना मिलता-जुलता है? जवाब/शीन:मुझे लगता है कि भावनात्मक रूप से मैं और अमृता (मेरा किरदार) थोड़े संवेदनशील हैं। फर्क इतना है कि अमृता पहले बात को समझती है, उसे अपने भीतर समेटती है और फिर प्रतिक्रिया देती है। लेकिन मैं तुरंत प्रतिक्रिया दे देती हूं। मैं खुद भी यही सीखना चाहती हूं कि पहले बात को समझूं और फिर जवाब दूं। सवाल: सौरभ, आपका किरदार आदित्य आपसे कितना मिलता है? जवाब/सौरभ: आदित्य मुझे बहुत अपने जैसा लगता है। रिश्तों को समझना और उन्हें सम्मान देना मेरे लिए भी बहुत महत्वपूर्ण है। बचपन में हम सब थोड़े आवेग में फैसले लेते हैं और फिर उनसे सीखते हैं। आदित्य की यात्रा भी कुछ ऐसी ही है। इसलिए यह किरदार मेरे लिए बहुत जुड़ा हुआ और अपना-सा है। सवाल: बदलते समय में प्यार के बारे में आप क्या कहना चाहेंगे? और यह कहानी कितनी प्रासंगिक है? जवाब/शीन: एक पुरानी कहावत है कि प्यार करना आसान है, लेकिन निभाना कठिन है। जो लोग निभा लेते हैं, वही सच्चे मायने में जीतते हैं। अमृता और आदित्य ने अपने प्यार को निभाया है। उन्हें समाज के लिए शादी की जरूरत नहीं थी, क्योंकि उनका रिश्ता गहरा और सच्चा था। हालांकि परिस्थितियों के कारण अमृता को अपने परिवार की जिम्मेदारियां निभाने के लिए अलग रास्ता चुनना पड़ा। लेकिन आदित्य ने उसका साथ नहीं छोड़ा। उसने उसे आगे बढ़ने की आज़ादी दी। यह कहानी सपनों और जिम्मेदारियों के बीच संतुलन की है। जीवन हमेशा सीधी रेखा में नहीं चलता। प्यार और जिम्मेदारियां हमेशा एक साथ नहीं चलतीं। यही इस कहानी की खूबसूरती है। सवाल: आज के ‘तुरंत सब कुछ पाने’ वाले दौर में इंतजार और धैर्य कितना मायने रखता है? जवाब/सौरभ: मेरे विचार से किसी भी दौर का प्यार हो, उसका आधार एक ही है, सम्मान। जहां सम्मान है, वहां धैर्य भी है। बिना धैर्य के सम्मान नहीं हो सकता। जो इस बात को समझता है, वही सच्चा प्रेम करता है। जो सिर्फ समय बिताना चाहता है, उसके लिए प्रेम का कोई अर्थ नहीं है। सवाल: आजकल ‘अल्फा मेल’ की बातें होती हैं। ऐसे में आदित्य जैसा सरल और संवेदनशील लड़का कितना प्रासंगिक है? जवाब/सौरभ: मुझे लगता है कि दस आक्रामक लोगों के बीच एक शांत और संतुलित व्यक्ति काफी होता है। सच्चे प्रेम में हिंसा नहीं, बल्कि मूल्य और जिम्मेदारी महत्वपूर्ण होते हैं। सशक्त होना मतलब केवल अपने बारे में सोचना नहीं है। असली सशक्तिकरण तब है, जब आप अपने सपनों के साथ-साथ अपनी जिम्मेदारियों को भी समझते हैं। आदित्य और अमृता की यात्रा यही सिखाती है। सवाल: टीवी से फिल्मों और अन्य मंचों पर आने वाले कलाकारों को ‘टीवी कलाकार’ का टैग झेलना पड़ता है। क्या आपके साथ ऐसा हुआ? जवाब/शीन: कभी-कभी लोग ऐसा कहते हैं। लेकिन मेरा मानना है कि मैं जिस लगन से टीवी करती हूं, उसी लगन से फिल्म भी करूंगी। टीवी कलाकारों को अनुशासन, संवाद याद रखने और समय की कद्र करने की अच्छी आदत होती है। इसलिए यह अनुभव हमें और मजबूत बनाता है। लोगों की सोच अलग हो सकती है, लेकिन इससे मुझे फर्क नहीं पड़ता। सौरभ: हां, ऐसी धारणाएं होती हैं। लेकिन मेरा मानना है कि जब आपका समय आता है, तो सब ठीक हो जाता है। अगर समय नहीं आया, तो हम कई कारण गिना सकते हैं। पर सही समय पर सब अपने आप ठीक हो जाता है। सवाल: राजश्री परिवार के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा? और सूरज जी से क्या सीख मिली? जवाब/शीन: जब मैंने उनके साथ पहला शो किया था, तो उन्होंने मुझसे कहा था कि टीआरपी की चिंता मत करो, बस प्रक्रिया का आनंद लो। यह सुनकर मैं हैरान रह गई थी। इतने बड़े निर्माता का ऐसा कहना बहुत प्रेरणादायक था। आज भी जब उनका फोन आता है, तो ऐसा लगता है जैसे घर से फोन आया हो। सौरभ: पहले मैंने ‘यहां में घर घर खेली’ में एक छोटे किरदार में काम किया था, और इस बार बड़ा अवसर मिला। जब मैं पहली बार उनसे मिला, तो सोचा था कोई असिस्टेंट आकर किरदार समझाएगा। लेकिन वे खुद मेरे मेकअप कक्ष में आए और किरदार के संदर्भ लेकर समझाया। उनका काम के प्रति जुनून और सभी को सम्मान देने का तरीका बहुत प्रेरणादायक है। आज के समय में जहां सम्मान को दिखावा समझ लिया जाता है, वहां उनके साथ रहकर महसूस होता है कि सच्चा सम्मान कैसा होता है।

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