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शिक्षकों को मंत्री की सलाह, धरना नहीं सुप्रीम कोर्ट जाएं:सीएम अनुरोध यात्रा से पहले सरकार में अलग-अलग सुर, SC के फैसले पर टिकी नजर

शिक्षकों को मंत्री की सलाह, धरना नहीं सुप्रीम कोर्ट जाएं:सीएम अनुरोध यात्रा से पहले सरकार में अलग-अलग सुर, SC के फैसले पर टिकी नजर

18 अप्रैल को प्रस्तावित शिक्षकों की “मुख्यमंत्री अनुरोध यात्रा” से पहले प्रदेश सरकार के दो मंत्रियों के अलग-अलग बयान सामने आने से मामला और गरमा गया है। स्कूल शिक्षा मंत्री उदय प्रताप सिंह ने साफ शब्दों में कहा है कि सरकार सुप्रीम कोर्ट में लगी पुनर्विचार याचिका के फैसले का इंतजार कर रही है, इसके बाद फैसला लिया जाएगा। किसी भी तरह के धरना-प्रदर्शन से इस फैसले में बदलाव संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि शिक्षक एक दिन धरना दें या 100 दिन तक आंदोलन करें, इससे कुछ नहीं होने वाला। अगर उन्हें राहत चाहिए तो उन्हें सीधे सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाना चाहिए। सरकार कोर्ट के आदेश के खिलाफ जाकर अवमानना (कंटेम्प्ट) में नहीं फंसना चाहती। सिंह ने यह भी कहा कि विधि विभाग से परामर्श लिया जा चुका है और सरकार अपनी सीमाओं के भीतर रहकर ही निर्णय ले सकती है। उन्होंने शिक्षक संगठनों से अपील की कि वे अपनी ऊर्जा धरना-प्रदर्शन में खर्च करने के बजाय पुनर्विचार याचिका के माध्यम से न्यायालय में प्रयास करें। वहीं दूसरी ओर, शाजापुर में आयोजित शिक्षक सम्मेलन में उच्च शिक्षा मंत्री इंदर सिंह परमार का बयान अपेक्षाकृत अलग नजर आया। उन्होंने कहा कि पात्रता परीक्षा को लेकर स्थिति क्लियर करने की जरूरत है। इसको लेकर भ्रम फैलाया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से प्रदेश के सभी शिक्षक प्रभावित नहीं हैं, बल्कि केवल 2005 के पहले नियुक्त लगभग 70 हजार शिक्षक ही इसके दायरे में आते हैं। इसमें जनजाति कार्य विभाग के शिक्षक भी शामिल हैं। परमार ने स्पष्ट किया कि पात्रता परीक्षा (टेट) को लेकर भ्रम फैलाया जा रहा है। 2005 के बाद नियुक्त सभी शिक्षकों ने यह परीक्षा दी है, इसलिए उन पर यह नियम लागू नहीं होता। उन्होंने कहा कि यह मामला पश्चिम बंगाल के केस के आधार पर बना है। पश्चिम बंगाल के लोग सुप्रीम कोर्ट गए हैं उस पर पुनर्विचार हो रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि राज्य सरकार इस मामले में सीधे तौर पर हस्तक्षेप नहीं कर सकती और फिलहाल सुप्रीम कोर्ट के फैसले का इंतजार किया जा रहा है।

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