मप्र के किसान गेहूं बेचने के लिए मंडी के बजाय तहसीलों के चक्कर लगा रहे हैं। वे वे किसान हैं, जिनके खेतों का सेटेलाइट सर्वे होना है। यह जिम्मा राजस्व विभाग का है। पटवारी, आरआई को निर्देश दिए जा चुके हैं कि वे सर्वे पूरा कर लें, लेकिन सर्वे करने में लगातार देरी की जा रही है। यदि जरा सा भी डेटा मिसमैच हो रहा है तो वह पुनर्सत्यापन में चला जाता है। सर्वे पूरा नहीं होने के कारण किसान पंजीयन के लिए जाता है तो उसका पंजीयन नहीं हो पा रहा है। मप्र के 55 जिलों में ऐसे करीब 3 लाख किसान हैं। किसानों ने बताया कि तहसील में जवाब दिया जाता है कि पुनरीक्षण होना है, इसलिए अटका है। सेटेलाइट सर्वे में वे किसान उलझे हुए हैं, जिनके पास दो एकड़ से अधिक जमीन है। इस मामले में खाद्य विभाग से जानकारी ली तो पता चला कि मप्र में कलेक्टरों की जांच में करीब 45 हजार खसरे ऐसे सामने आए हैं, जिनमें कोई निर्माण हो चुका है। मंदिर है, मकान हैं या अन्य कोई शेड है। वहीं ऐसे भी खसरे सामने आए हैं, जिनमें नदी, तालाब आ चुके हैं। ऐसे खसरों का पुर्नसत्यापन कराया जा रहा है। इसलिए सर्वे में देरी हो रही है। हालांकि पहले भी दो बार सर्वे हो चुका है। सर्वे से जुड़े पटवारियों ने बताया कि जग गिरदावरी जमा की गई थी, तब पहली सर्वे हुआ था और दूसरी बार फसल कटने पर। किसानों के सहयोग के लिए एक भी अधिकारी नियुक्त नहीं भारतीय किसान संघ के प्रांत प्रचार प्रमुख राहुल धूत ने बताया कि प्रदेश के लगभग सभी जिलों से शिकायत आ रही है कि किसानों की समस्या हल करने के लिए एक भी अधिकारी तकनीकी सहयोग के लिए नियुक्त नहीं किया गया है। धूत ने बताया कि तीन लाख से अधिक किसान सेटेलाइट सर्वे, सर्वर में उलझकर रह गए हैं। उन्होंने बताया कि हमने इस संबंध में जब कृषि विभाग के अफसरों से बात की तो उन्होंने कहा कि यह राजस्व का काम है। जब राजस्व से बात करो तो बोलते हैं डेटा कृषि विभाग को भेज दिया। धूत का आरोप है कि इस सरकारी लेतलाली से किसान औने–पौने दामों में अपनी उपज बाहर बाजार में बेचने के लिए मजबूर हो गया है। सर्वर डाउन की भी बड़ी समस्या सभी जिलों में सहकारी समितियों को 13 अप्रैल को जिला प्रबंधक की तरफ से निर्देश दिए गए हैं कि बिना स्लॉट बुक कोई तुलाई नहीं करें। लेकिन जब किसान पंजीयन के लिए सोसायटी जाते हैं तो बार–बार सर्वर डाउन की समस्या सामने आ जाती है। 45 हजार खसरों में गड़बड़ी संज्ञान में आया था कि कुछ खसरों में नदी, तालाब या अन्य कुछ आ रहा है। सभी कलेक्टरों को कहा है कि इसकी बारीकी से जांच करवाए। अब तक 45 हजार खसरों में गड़बड़ी सामने आई है। कर्मवीर शर्मा, आयुक्त, खाद्य आपूर्ति एवं उपभोक्ता संरक्षण













































