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सुविंदर विक्की ने कभी इंश्योरेंस पॉलिसी बेची थी:खाने तक के पैसे नहीं थे; ‘आवारापन 2’ के किरदार को अपनी जिंदगी से जुड़ा बताया

सुविंदर विक्की ने कभी इंश्योरेंस पॉलिसी बेची थी:खाने तक के पैसे नहीं थे; ‘आवारापन 2’ के किरदार को अपनी जिंदगी से जुड़ा बताया

एक्टर सुविंदर विक्की हाल ही में फिल्म ‘आवारापन 2’ में दिखाई दिए। कभी वो एक थिएटर प्ले से मिले सिर्फ 5 हजार रुपए लेकर मुंबई पहुंचे थे, लेकिन पैसे जल्दी खत्म हो गए और उन्हें एक महीने के अंदर पंजाब लौटना पड़ा। मुंबई में एक समय ऐसा भी आया, जब उनके पास खाने तक के पैसे नहीं थे। गुजारा करने के लिए उन्होंने इंश्योरेंस पॉलिसी बेचीं और छोटे-मोटे काम किए। करीब एक दशक तक पंजाबी फिल्मों में छोटे किरदार निभाने के बाद उन्होंने ‘उड़ता पंजाब’ से हिंदी फिल्मों में कदम रखा। इसके बाद ‘केसरी’, ‘माइलस्टोन’, ‘कोहरा’ और ‘धुरंधर द रिवेंज’ जैसे प्रोजेक्ट्स में काम किया है। हाल ही में सुविंदर विक्की ने दैनिक भास्कर के साथ बातचीत में अपनी हाल ही में रिलीज हुई फिल्म ‘आवारापन 2’ के बारे में बात की। पढ़िए इंटरव्यू की अहम बातें। सवाल: ‘आवारापन 2’ का हिस्सा बनने का मौका आपको कैसे मिला और जब आपको फिल्म ऑफर हुई तो पहला रिएक्शन क्या था? जवाब: मेरे लिए सबसे खुशी की बात यह है कि मैं ‘आवारापन 2’ से जुड़ा। करीब 18 साल पहले जब ‘आवारापन’ आई थी, तब उसने युवाओं के बीच एक अलग ही इमेज बनाई थी। फिल्म के म्यूजिक और इमरान हाशमी के काम को लेकर उस समय काफी चर्चा हुई थी। आज मेरी बेटी भी बड़ी हो गई है और वह भी ‘आवारापन’ को लेकर काफी एक्साइटेड रहती है। जैसे ही उसे पता चला कि मैं ‘आवारापन 2’ में काम कर रहा हूं, उसने फिल्म को लेकर बातें शुरू कर दीं। मेरे लिए यह एक बड़ी खुशी थी कि मैं उस फिल्म की दुनिया का हिस्सा बन रहा हूं, जिसे एक पीढ़ी ने इतना पसंद किया है। सवाल: ‘आवारापन 2’ में आपके किरदार जयदीप का अपना आंतरिक संघर्ष क्या है? जवाब: जयदीप का संघर्ष मुझे अपने जीवन के संघर्ष से काफी जुड़ा हुआ लगा। मेरी जिंदगी में भी एक समय यह द्वंद्व रहा कि क्या करना है, अभिनेता बनना है तो कैसे बनना है, कितनी स्ट्रगल करनी पड़ेगी, पैसे आएंगे या नहीं आएंगे, नौकरी के साथ यह काम करना पड़ेगा या पूरी तरह इसमें आना चाहिए। जयदीप के भीतर भी कुछ इसी तरह के सवाल हैं। वह सोचता है कि यहां रहूं या छोड़ दूं, साथ दूं या नहीं दूं। मुझे लगा कि उसके ये संघर्ष मेरे अपने संघर्षों से काफी मैच करते हैं। इसलिए मुझे इस किरदार से जुड़ना बहुत आसान लगा। सवाल: आपने अब तक कई ग्रे और नेगेटिव शेड्स वाले किरदार निभाए हैं। क्या अब कुछ अलग करने की इच्छा थी? जवाब: बिल्कुल। मन करता है कि कुछ अलग भी नजर आए। ऐसा नहीं है कि मैं रोमांस नहीं कर सकता। मेरा भी मन करता है कि पर्दे पर मेरी कोई हीरोइन हो, हम रोमांटिक सीन करें, तारों की छांव में बैठें या मैं उसके लिए मारधाड़ करूं और वह मेरे जख्मों पर मरहम लगाए। लेकिन फिर लगता है कि अगर हर कोई यही करेगा तो हम जो करते हैं, वह कौन करेगा? हमारे हिस्से में अच्छाई के साथ-साथ निगेटिविटी और बुराई को भी पर्दे पर उतारने की जिम्मेदारी आती है। सवाल: क्या किसी विलेन या ग्रे किरदार की सफलता का पैमाना यह है कि दर्शक उससे नफरत करने लगें? जवाब: बिल्कुल। एक विलेन तब कामयाब होता है, जब लोगों को उससे नफरत होने लगे। अगर आप किसी किरदार को पूरी ईमानदारी से निभाते हैं और दर्शक उस किरदार को लेकर रिएक्ट करते हैं, उसकी तारीफ करते हैं या उससे डरते-नफरत करते हैं, तो एक अभिनेता के तौर पर वही आपकी सफलता है। सवाल: क्या किसी किरदार को निभाने के बाद उससे बाहर निकलने में आपको कभी परेशानी हुई है? जवाब: ऐसा बहुत ज्यादा नहीं हुआ, लेकिन ‘माइलस्टोन’ में गालिब का किरदार करते समय मुझे काफी पीठ दर्द रहता था। शूटिंग के बाद भी कुछ समय तक वह दर्द मेरे साथ रहा। फिर मैंने अपने दिमाग को यह समझाया कि आपने इतनी मेहनत की है, लगातार सीढ़ियां चढ़ते रहे हैं, इसलिए शरीर में कोई मसल खिंच गया होगा। पता नहीं सच में ऐसा था या मैंने अपने दिमाग को उस तरह सेट किया, लेकिन मेरे लिए वह तरीका काम कर गया। कई बार ऐसा भी होता है कि एक किरदार से निकलकर तुरंत दूसरे किरदार में जाना पड़ता है। जैसे मैंने बलबीर का किरदार किया और उसके बाद ‘सतलुज’ के लिए तैयारी करनी थी। ऐसे समय में अभिनेता को बहुत जल्दी स्विच ऑन और स्विच ऑफ करना पड़ता है। सवाल: पंजाबी सिनेमा, हिंदी फिल्मों और ओटीटी तीनों जगह काम करते हुए क्या आपकी एक्टिंग अप्रोच बदलती है? जवाब: मैं खुद को इस मामले में किस्मत वाला मानता हूं कि मुझे अक्सर ऐसा काम मिल जाता है, जो मुझे पसंद आता है। मेरे पास बहुत ज्यादा ऑप्शंस भी नहीं होते। अगर 8-10 स्क्रिप्ट आती हैं और उनमें से एक चुननी है तो मेरे लिए जो काम करने लायक है, मैं उसे करना चाहता हूं। चाहे किरदार एक सीन का हो, दो सीन का हो या 40 दिन का काम हो, मेरे लिए उसमें कुछ करने लायक जरूर होना चाहिए। अब तक मुझे जो काम मिला है, उसमें मैं खुद को काफी लकी मानता हूं। सवाल: इतने साल इंडस्ट्री में काम करने के बाद भी क्या आज काम मांगने में झिझक नहीं होती? जवाब: नहीं, काम मांगने में कैसी झिझक? यह मेरा काम है। मैंने अपनी खुशी से, पूरे होश-हवास में इस फील्ड को चुना है। भगवान को साक्षी मानकर तय किया है कि मुझे अभिनेता बनना है। अब मेरी ड्यूटी है कि मुझे हर किरदार को अपनी 100 प्रतिशत क्षमता के साथ निभाना है। लोगों को वह पसंद आए, यही मेरे लिए सबसे बड़ी बात है। मेरे लिए मेरे सारे किरदार एक जैसे हैं। कोई एक दूसरे से कम या ज्यादा नहीं है। सवाल: आगे ऐसा कौन-सा किरदार करना चाहते हैं, जो अभी तक नहीं मिला? जवाब: मैं ऐसा किरदार करना चाहता हूं, जो मेरी अपनी जिंदगी के ज्यादा करीब हो। मैंने पुलिस वाले काफी किए हैं। अब कोई ऐसा आम आदमी, इंश्योरेंस एजेंट जैसा किरदार, बिजनेसमैन या पिता की भूमिका जिसमें जिंदगी की सच्चाई और मेरे अपने अनुभवों की झलक हो ऐसा कुछ करना चाहूंगा। क्योंकि जब किरदार आपके अपने अनुभवों से जुड़ता है तो उसे निभाने का आनंद अलग होता है।

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सुविंदर विक्की ने कभी इंश्योरेंस पॉलिसी बेची थी:खाने तक के पैसे नहीं थे; ‘आवारापन 2’ के किरदार को अपनी जिंदगी से जुड़ा बताया

एक्टर सुविंदर विक्की हाल ही में फिल्म ‘आवारापन 2’ में दिखाई दिए। कभी वो एक थिएटर प्ले से मिले सिर्फ 5 हजार रुपए लेकर मुंबई पहुंचे थे, लेकिन पैसे जल्दी खत्म हो गए और उन्हें एक महीने के अंदर पंजाब लौटना पड़ा। मुंबई में एक समय ऐसा भी आया, जब उनके पास खाने तक के पैसे नहीं थे। गुजारा करने के लिए उन्होंने इंश्योरेंस पॉलिसी बेचीं और छोटे-मोटे काम किए। करीब एक दशक तक पंजाबी फिल्मों में छोटे किरदार निभाने के बाद उन्होंने ‘उड़ता पंजाब’ से हिंदी फिल्मों में कदम रखा। इसके बाद ‘केसरी’, ‘माइलस्टोन’, ‘कोहरा’ और ‘धुरंधर द रिवेंज’ जैसे प्रोजेक्ट्स में काम किया है। हाल ही में सुविंदर विक्की ने दैनिक भास्कर के साथ बातचीत में अपनी हाल ही में रिलीज हुई फिल्म ‘आवारापन 2’ के बारे में बात की। पढ़िए इंटरव्यू की अहम बातें। सवाल: ‘आवारापन 2’ का हिस्सा बनने का मौका आपको कैसे मिला और जब आपको फिल्म ऑफर हुई तो पहला रिएक्शन क्या था? जवाब: मेरे लिए सबसे खुशी की बात यह है कि मैं ‘आवारापन 2’ से जुड़ा। करीब 18 साल पहले जब ‘आवारापन’ आई थी, तब उसने युवाओं के बीच एक अलग ही इमेज बनाई थी। फिल्म के म्यूजिक और इमरान हाशमी के काम को लेकर उस समय काफी चर्चा हुई थी। आज मेरी बेटी भी बड़ी हो गई है और वह भी ‘आवारापन’ को लेकर काफी एक्साइटेड रहती है। जैसे ही उसे पता चला कि मैं ‘आवारापन 2’ में काम कर रहा हूं, उसने फिल्म को लेकर बातें शुरू कर दीं। मेरे लिए यह एक बड़ी खुशी थी कि मैं उस फिल्म की दुनिया का हिस्सा बन रहा हूं, जिसे एक पीढ़ी ने इतना पसंद किया है। सवाल: ‘आवारापन 2’ में आपके किरदार जयदीप का अपना आंतरिक संघर्ष क्या है? जवाब: जयदीप का संघर्ष मुझे अपने जीवन के संघर्ष से काफी जुड़ा हुआ लगा। मेरी जिंदगी में भी एक समय यह द्वंद्व रहा कि क्या करना है, अभिनेता बनना है तो कैसे बनना है, कितनी स्ट्रगल करनी पड़ेगी, पैसे आएंगे या नहीं आएंगे, नौकरी के साथ यह काम करना पड़ेगा या पूरी तरह इसमें आना चाहिए। जयदीप के भीतर भी कुछ इसी तरह के सवाल हैं। वह सोचता है कि यहां रहूं या छोड़ दूं, साथ दूं या नहीं दूं। मुझे लगा कि उसके ये संघर्ष मेरे अपने संघर्षों से काफी मैच करते हैं। इसलिए मुझे इस किरदार से जुड़ना बहुत आसान लगा। सवाल: आपने अब तक कई ग्रे और नेगेटिव शेड्स वाले किरदार निभाए हैं। क्या अब कुछ अलग करने की इच्छा थी? जवाब: बिल्कुल। मन करता है कि कुछ अलग भी नजर आए। ऐसा नहीं है कि मैं रोमांस नहीं कर सकता। मेरा भी मन करता है कि पर्दे पर मेरी कोई हीरोइन हो, हम रोमांटिक सीन करें, तारों की छांव में बैठें या मैं उसके लिए मारधाड़ करूं और वह मेरे जख्मों पर मरहम लगाए। लेकिन फिर लगता है कि अगर हर कोई यही करेगा तो हम जो करते हैं, वह कौन करेगा? हमारे हिस्से में अच्छाई के साथ-साथ निगेटिविटी और बुराई को भी पर्दे पर उतारने की जिम्मेदारी आती है। सवाल: क्या किसी विलेन या ग्रे किरदार की सफलता का पैमाना यह है कि दर्शक उससे नफरत करने लगें? जवाब: बिल्कुल। एक विलेन तब कामयाब होता है, जब लोगों को उससे नफरत होने लगे। अगर आप किसी किरदार को पूरी ईमानदारी से निभाते हैं और दर्शक उस किरदार को लेकर रिएक्ट करते हैं, उसकी तारीफ करते हैं या उससे डरते-नफरत करते हैं, तो एक अभिनेता के तौर पर वही आपकी सफलता है। सवाल: क्या किसी किरदार को निभाने के बाद उससे बाहर निकलने में आपको कभी परेशानी हुई है? जवाब: ऐसा बहुत ज्यादा नहीं हुआ, लेकिन ‘माइलस्टोन’ में गालिब का किरदार करते समय मुझे काफी पीठ दर्द रहता था। शूटिंग के बाद भी कुछ समय तक वह दर्द मेरे साथ रहा। फिर मैंने अपने दिमाग को यह समझाया कि आपने इतनी मेहनत की है, लगातार सीढ़ियां चढ़ते रहे हैं, इसलिए शरीर में कोई मसल खिंच गया होगा। पता नहीं सच में ऐसा था या मैंने अपने दिमाग को उस तरह सेट किया, लेकिन मेरे लिए वह तरीका काम कर गया। कई बार ऐसा भी होता है कि एक किरदार से निकलकर तुरंत दूसरे किरदार में जाना पड़ता है। जैसे मैंने बलबीर का किरदार किया और उसके बाद ‘सतलुज’ के लिए तैयारी करनी थी। ऐसे समय में अभिनेता को बहुत जल्दी स्विच ऑन और स्विच ऑफ करना पड़ता है। सवाल: पंजाबी सिनेमा, हिंदी फिल्मों और ओटीटी तीनों जगह काम करते हुए क्या आपकी एक्टिंग अप्रोच बदलती है? जवाब: मैं खुद को इस मामले में किस्मत वाला मानता हूं कि मुझे अक्सर ऐसा काम मिल जाता है, जो मुझे पसंद आता है। मेरे पास बहुत ज्यादा ऑप्शंस भी नहीं होते। अगर 8-10 स्क्रिप्ट आती हैं और उनमें से एक चुननी है तो मेरे लिए जो काम करने लायक है, मैं उसे करना चाहता हूं। चाहे किरदार एक सीन का हो, दो सीन का हो या 40 दिन का काम हो, मेरे लिए उसमें कुछ करने लायक जरूर होना चाहिए। अब तक मुझे जो काम मिला है, उसमें मैं खुद को काफी लकी मानता हूं। सवाल: इतने साल इंडस्ट्री में काम करने के बाद भी क्या आज काम मांगने में झिझक नहीं होती? जवाब: नहीं, काम मांगने में कैसी झिझक? यह मेरा काम है। मैंने अपनी खुशी से, पूरे होश-हवास में इस फील्ड को चुना है। भगवान को साक्षी मानकर तय किया है कि मुझे अभिनेता बनना है। अब मेरी ड्यूटी है कि मुझे हर किरदार को अपनी 100 प्रतिशत क्षमता के साथ निभाना है। लोगों को वह पसंद आए, यही मेरे लिए सबसे बड़ी बात है। मेरे लिए मेरे सारे किरदार एक जैसे हैं। कोई एक दूसरे से कम या ज्यादा नहीं है। सवाल: आगे ऐसा कौन-सा किरदार करना चाहते हैं, जो अभी तक नहीं मिला? जवाब: मैं ऐसा किरदार करना चाहता हूं, जो मेरी अपनी जिंदगी के ज्यादा करीब हो। मैंने पुलिस वाले काफी किए हैं। अब कोई ऐसा आम आदमी, इंश्योरेंस एजेंट जैसा किरदार, बिजनेसमैन या पिता की भूमिका जिसमें जिंदगी की सच्चाई और मेरे अपने अनुभवों की झलक हो ऐसा कुछ करना चाहूंगा। क्योंकि जब किरदार आपके अपने अनुभवों से जुड़ता है तो उसे निभाने का आनंद अलग होता है।

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