’93 वर्षीय अर्नावाज कॉन्ट्रैक्टर की कहानी इसी बदलाव की मिसाल है. कभी सक्रिय और आत्मनिर्भर रहीं अर्नावाज को अचानक गंभीर कमर दर्द ने जकड़ लिया. दर्द इतना बढ़ गया कि चलना-फिरना तक मुश्किल हो गया और वे लगभग बिस्तर पर आ गईं. जांच में रीढ़ की हड्डी में गंभीर समस्या सामने आई. डॉक्टरों ने डीकंप्रेशन सर्जरी की सलाह दी. उम्र को देखते हुए परिवार को संदेह था, लेकिन आधुनिक एनेस्थीसिया और मिनिमली इनवेसिव तकनीक ने भरोसा दिया. सर्जरी के कुछ ही दिनों बाद उनका दर्द कम होने लगा और फिजियोथेरेपी के बाद वे फिर से चलने लगीं. आज वे फिर से अपने रोजमर्रा के काम खुद कर रही हैं.’
‘इसी तरह 97 वर्षीय अरुणा वैंगणकर का मामला भी प्रेरणादायक है. सोफे से गिरने से उनकी रीढ़ में फ्रैक्चर हो गया था. शुरू में उन्हें आराम और ब्रेस पहनने की सलाह दी गई, लेकिन सुधार न होने पर उन्होंने मिनिमली इनवेसिव सर्जरी कराई. डॉक्टरों के अनुसार उनकी रिकवरी असाधारण रही. आज भी वे सक्रिय हैं और अपने परिवार को निर्देश देती नजर आती हैं.’
एक समय था जब 80-90 की उम्र पार करने के बाद बड़े ऑपरेशन को रिस्क भरा मानकर टाल दिया जाता था लेकिन ऊपर दिए ये दो उदाहरण बताते हैं कि अब चिकित्सा तकनीक में प्रगति और बदलती सोच के साथ यह धारणा तेजी से बदल रही है. आज 90 पार कर चुके बुजुर्ग भी स्पाइनल, ऑर्थोपेडिक और जॉइंट रिप्लेसमेंट जैसी जटिल सर्जरी करा रहे हैं और बेहतर जीवन जी रहे हैं.
डॉक्टरों का कहना है कि अब उम्र अकेले सर्जरी का फैसला नहीं करती. मरीज की ओवरऑल फिटनेस, खासकर दिल की कार्यक्षमता, ज्यादा अहम होती है. बुजुर्ग मरीजों में सर्जरी के दौरान विशेष सावधानियां बरती जाती हैं. मल्टी-डिसिप्लिनरी टीम जिसमें कार्डियोलॉजिस्ट और अन्य विशेषज्ञ शामिल होते हैं, हर समय तैयार रहती है ताकि किसी भी जोखिम को तुरंत संभाला जा सके.
टाइम्स ऑफ इंडिया में छपी खबर के मुताबिक 95 वर्षीय पार्वती लोखंडे इसका एक और उदाहरण हैं. गिरने के बाद उन्हें फीमर फ्रैक्चर हुआ, जो बुजुर्गों में आम लेकिन गंभीर समस्या है. उन्होंने आंशिक हिप रिप्लेसमेंट सर्जरी कराई, जिससे वे फिर से लगभग सामान्य जीवन जीने लगीं.
इस बारे में फॉर्टिस अस्पताल में सीनियर ऑर्थोपेडिक सर्जन डॉ. सचिन भोंसले कहते हैं कि अगर किसी बुजुर्ग को छह महीने से एक साल तक भी स्वतंत्र और सक्रिय जीवन मिल जाए, तो यह उसकी गरिमा और मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहद महत्वपूर्ण होता है. इन मरीजों की सुरक्षा को ध्यान में रखते हुए ये सर्जरी मल्टीडिसिप्लिनरी सपोर्ट से की जाती हैं. आज उम्र सिर्फ एक नंबर है. 90 साल की उम्र के बाद भी बेहतर जीवन जीने के लिए ये सर्जरी कराना फायदेमंद है.
विशेषज्ञ यह भी चेतावनी देते हैं कि सर्जरी में देरी करना कई बार स्थिति को और गंभीर बना सकता है. 90 वर्षीय लीला शिंदे के मामले में गर्दन का दर्द धीरे-धीरे पूरे शरीर की कमजोरी में बदल गया. समय रहते सर्जरी न होती तो स्थायी पक्षाघात का खतरा था. ऑपरेशन और फिजियोथेरेपी के बाद उनकी स्थिति में धीरे-धीरे सुधार हुआ.
नई तकनीकों ने इन सर्जरी को सुरक्षित और प्रभावी बनाया है. ओ-आर्म जैसी एडवांस इमेजिंग तकनीक सर्जनों को जीपीएस की तरह सटीक मार्गदर्शन देती है, जिससे कम कट, कम रक्तस्राव और तेज रिकवरी संभव होती है. रोबोटिक सर्जरी और 3डी-प्रिंटेड इम्प्लांट्स भी इलाज को अधिक व्यक्तिगत और सटीक बना रहे हैं.
कितनी आती है सर्जरी की लागत
हालांकि, इन सर्जरी की लागत एक बड़ी चुनौती बनी हुई है. सामान्य सर्जरी की लागत करीब 3 लाख रुपये से शुरू होकर जटिल मामलों में 8-9 लाख रुपये तक जा सकती है. वरिष्ठ नागरिकों के लिए बीमा कवर अक्सर सीमित और महंगा होता है. कई परिवारों को जेब से बड़ी रकम खर्च करनी पड़ती है.
फिर भी, सरकारी योजनाएं जैसे आयुष्मान भारत और राज्य स्तरीय स्वास्थ्य योजनाएं राहत दे रही हैं. इनकी मदद से अब अधिक बुजुर्ग मरीज सरकारी और निजी अस्पतालों में सर्जरी करवा पा रहे हैं.
क्या सर्जरी है लंबी उम्र का राज
डॉक्टरों का मानना है कि आज के बुजुर्ग सिर्फ लंबी उम्र नहीं, बल्कि बेहतर जीवन जीना चाहते हैं. वे निर्भरता से बचना चाहते हैं और सक्रिय रहना चाहते हैं. यही सोच उन्हें जोखिम उठाने और सर्जरी कराने के लिए प्रेरित कर रही है.
बदलते समय में यह साफ है कि उम्र सिर्फ एक संख्या बनती जा रही है. सही स्वास्थ्य, आधुनिक तकनीक और मजबूत इच्छाशक्ति के साथ, 90 के पार भी नई जिंदगी की शुरुआत संभव है.












































