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हमले की आशंका में खामेनेई का अंतिम संस्कार रोका:भोपाल में ईरान के प्रतिनिधि का दावा; यह ट्रंप-नेतन्याहू की निजी जंग, बातचीत से पीछे हटने का आरोप

हमले की आशंका इसलिए खामेनेई का अंतिम संस्कार रोका:भोपाल में ईरान के प्रतिनिधि का दावा; यह ट्रंप-नेतन्याहू की निजी जंग, बातचीत से पीछे हटने का आरोप

ईरान के सुप्रीम लीडर के अंतिम संस्कार में देरी को लेकर बड़ा बयान सामने आया है। ईरान के सुप्रीम लीडर के प्रतिनिधि मौलाना डॉ. अब्दुल मजीद हकीम इलाही ने रविवार को भोपाल में कहा कि सुरक्षा खतरे के कारण अंतिम संस्कार अभी तक नहीं किया गया है। उन्होंने आशंका जताई कि अगर लाखों लोग जुटते हैं तो उन पर हमला हो सकता है। मौलाना डॉ. अब्दुल मजीद हकीम इलाही ने कहा कि सुप्रीम लीडर का अंतिम संस्कार इसलिए टाला गया है क्योंकि हालात पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। यदि अंतिम संस्कार आयोजित होता है तो ईरान के शहर मशहद में 2 करोड़ से अधिक लोगों के पहुंचने की संभावना है। इतनी बड़ी संख्या में लोग इकट्ठा होते हैं, तो उन पर हमला किया जा सकता है। लेबनान में एक दिन में दो हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे। वैसी स्थिति दोबारा बन सकती है। इसलिए हम हालात पूरी तरह शांत और सुरक्षित होने का इंतजार कर रहे हैं। मौलाना डॉ. अब्दुल मजीद हकीम इलाही भोपाल में कोहेफिजा स्थित एमआईजी हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी में रविवार को आयोजित ‘इत्तेहाद-उल-मुस्लिमीन जलसा’ कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे। यह ट्रंप-नेतन्याहू की निजी जंग मौलाना इलाही ने कहा कि यह युद्ध ईरान ने नहीं छेड़ा, बल्कि यह डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू की निजी जंग है। इससे न अमेरिका को फायदा है, न इजराइल को। ईरान ने कभी युद्ध नहीं चाहा। हमने पहले ही चेतावनी दी थी कि अगर युद्ध हुआ तो इसका असर कई देशों पर पड़ेगा। हमने बातचीत की कोशिश की, लेकिन उन्होंने ही हमला किया। ईरान के पास 5,000 साल से अधिक की सभ्यता है, बहुत अच्छे लोग हैं, कारखाने हैं और सब कुछ है। लेकिन दुर्भाग्य से 147 साल पहले से कुछ दूसरे देशों ने ईरान के खिलाफ बहुत सारे प्रतिबंध, आर्थिक प्रतिबंध बनाए। 3 दिन में ईरान गिराने की योजना थी, अमेरिकी भी इस युद्ध के खिलाफ मौलाना इलाही ने दावा किया कि अमेरिका को भरोसा था कि वह तीन दिनों में ईरान की सरकार गिरा सकता है। युद्ध के बाद ईरान का नक्शा बदलने की बात कही गई थी। ईरान को पांच हिस्सों में बांटने की योजना थी। युद्ध में ईरान को भारी नुकसान हुआ है। 1 लाख से अधिक घर तबाह, कई अस्पताल, विश्वविद्यालय और प्रयोगशालाएं नष्ट, कई कारखाने क्षतिग्रस्त, बड़ी संख्या में नागरिकों की मौत हुई है। अब ईरान अपने घायलों के इलाज के लिए भारत से दवाइयां खरीद रहा है। अमेरिकियों को इस युद्ध से कोई लाभ नहीं है, अमेरिकी सीनेटरों ने इस युद्ध की निंदा की है। आप न्यूयॉर्क के मेयर के बयान पर जाइए, जो मूल रूप से भारतीय हैं। अमेरिकी थोंपने लगे थे अपनी शर्तें, इसलिए विफल हुई वार्ता मौलाना इलाही ने बताया कि ईरान ने कभी भी किसी देश से यह नहीं कहा कि वह ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थ बने। कोई ईरान नहीं गया, कोई ईरान से नहीं आया। बल्कि, कुछ देश अपनी मर्जी से आगे आए और उन्होंने हमारे और अमेरिका के बीच बातचीत की पहल कर दी। ओमान और जिनेवा में बातचीत शुरू हुई थी और शुरुआती संकेत सकारात्मक थे। पहले अमेरिका ने 15-सूत्रीय प्रस्ताव दिया, जिसे ईरान ने खारिज किया। इसके बाद ईरान ने 10-सूत्रीय प्रस्ताव रखा, जिसे अमेरिका ने स्वीकार कर लिया। लेकिन अंतिम दौर में अमेरिका ने नई और असामान्य शर्तें रख दीं। उन्होंने कहा, जब यह साफ हो गया कि वे अपनी बात से पीछे हट रहे हैं, तो बातचीत विफल हो गई। होर्मुज अस्थायी रूप से बंद, लेकिन जल्द ही खुल जाएगा भारतीय जहाजों को लेकर उठ रहे सवालों के बीच मौलाना डॉ. अब्दुल मजीद हकीम इलाही ने स्पष्ट किया कि होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद किए जाने के पीछे सुरक्षा ही सबसे बड़ा कारण है। जब कुछ अन्य देश इस जलडमरूमध्य के रास्ते अपने युद्धपोत भेजना चाहते थे, तब ईरान को यह कदम उठाना पड़ा। यह कदम किसी एक देश के खिलाफ नहीं, बल्कि समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया था। उन्होंने विश्वास जताया कि होर्मुज जलडमरूमध्य पहले की तरह सभी देशों के लिए खुल जाएगा, जैसा कि 28 फरवरी से पहले था। यह रोक अस्थायी है और जल्द ही स्थिति सामान्य हो जाएगी। तीन साल की मासूम ने रोते हुए उतार दी अपनी बाली मौलाना इलाही ने युद्ध के असर को लेकर एक भावुक घटना भी साझा की। उन्होंने बताया कि एक कार्यक्रम के दौरान तीन साल की बच्ची रोते हुए उनके पास आई और अपनी सोने की बाली उतारकर दे दी। बच्ची ने कहा, मैंने सुना है लड़कियों के स्कूल पर बमबारी हुई, कृपया यह ले लो। वह बच्ची यह नहीं जानती थी कि वे बच्चियां अब इस दुनिया में नहीं हैं। मैं भावुक हो गया। बाली वापस करते हुए कहा, यह तुम्हारे लिए उपहार है, और उसकी कीमत का दोगुना देने की बात कही। ईरान-भारत संबंध 5,000 साल पुराने, भारतीय दयालु भारत-ईरान संबंधों पर कहा, ईरान और भारत के बीच संबंध बहुत अच्छे हैं, बहुत मजबूत हैं। मुझे यकीन है कि ईरान और भारत के बीच संबंध बेहतर हो जाएंगे और विभिन्न पहलुओं शिक्षा, संस्कृति, अर्थव्यवस्था और अन्य क्षेत्रों में विस्तारित होंगे। हमारा और अधिक संबंध और मित्रता होनी चाहिए। वास्तव में यहां आने से पहले मैंने भारत के बारे में बहुत कुछ सुना और पढ़ा था कि भारतीय बहुत दयालु, वफादार, बुद्धिमान, ईमानदार और उदार होते हैं। लेकिन वह सब केवल किताबी जानकारी थी। जब भारत को अपनी आंखों से देखा तो महसूस किया कि भारत के लोग दूसरों से अलग हैं। उन्होंने अपनी अंतरराष्ट्रीय यात्राओं का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने 75 से अधिक देशों की यात्रा की है। वे विश्वविद्यालयों में व्याख्याता और प्रोफेसर रहे हैं। उन्हें संयुक्त राष्ट्र के सेमिनारों और सम्मेलनों में व्याख्यान देने के लिए दुनिया भर से आमंत्रित किया गया। उनके अनुसार, इतना बड़ा अनुभव होने के बावजूद उन्होंने जैसी दयालुता, ईमानदारी और मानसिकता भारत में देखी, वैसी किसी और देश में नहीं देखी। यह खबर भी पढ़ें… मौलाना इलाही ने पंडित नेहरू की किताब ‘डिस्कवरी ऑफ इंडिया’ को बताया अद्भुत, छात्रों को पढ़ने की दी सलाह ईरान के सुप्रीम लीडर के प्रतिनिधि मौलाना डॉ. अब्दुल मजीद हकीम इलाही ने कहा कि ईरान के सर्वोच्च नेता अली खामेनेई भारत के इतिहास, संस्कृति और समाज को समझने के लिए 22 से अधिक किताबों का अध्ययन किया है। इतना ही नहीं, उन्होंने कई मौकों पर अपनी तकरीरों में भारत और भारतीयों के इतिहास, सभ्यता और बौद्धिक परंपरा का जिक्र किया है। यहां पढ़ें पूरी खबर…

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ईरान के सुप्रीम लीडर के अंतिम संस्कार में देरी को लेकर बड़ा बयान सामने आया है। ईरान के सुप्रीम लीडर के प्रतिनिधि मौलाना डॉ. अब्दुल मजीद हकीम इलाही ने रविवार को भोपाल में कहा कि सुरक्षा खतरे के कारण अंतिम संस्कार अभी तक नहीं किया गया है। उन्होंने आशंका जताई कि अगर लाखों लोग जुटते हैं तो उन पर हमला हो सकता है। मौलाना डॉ. अब्दुल मजीद हकीम इलाही ने कहा कि सुप्रीम लीडर का अंतिम संस्कार इसलिए टाला गया है क्योंकि हालात पूरी तरह सुरक्षित नहीं हैं। यदि अंतिम संस्कार आयोजित होता है तो ईरान के शहर मशहद में 2 करोड़ से अधिक लोगों के पहुंचने की संभावना है। इतनी बड़ी संख्या में लोग इकट्ठा होते हैं, तो उन पर हमला किया जा सकता है। लेबनान में एक दिन में दो हजार से ज्यादा लोग मारे गए थे। वैसी स्थिति दोबारा बन सकती है। इसलिए हम हालात पूरी तरह शांत और सुरक्षित होने का इंतजार कर रहे हैं। मौलाना डॉ. अब्दुल मजीद हकीम इलाही भोपाल में कोहेफिजा स्थित एमआईजी हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी में रविवार को आयोजित ‘इत्तेहाद-उल-मुस्लिमीन जलसा’ कार्यक्रम के मुख्य अतिथि थे। यह ट्रंप-नेतन्याहू की निजी जंग मौलाना इलाही ने कहा कि यह युद्ध ईरान ने नहीं छेड़ा, बल्कि यह डोनाल्ड ट्रंप और बेंजामिन नेतन्याहू की निजी जंग है। इससे न अमेरिका को फायदा है, न इजराइल को। ईरान ने कभी युद्ध नहीं चाहा। हमने पहले ही चेतावनी दी थी कि अगर युद्ध हुआ तो इसका असर कई देशों पर पड़ेगा। हमने बातचीत की कोशिश की, लेकिन उन्होंने ही हमला किया। ईरान के पास 5,000 साल से अधिक की सभ्यता है, बहुत अच्छे लोग हैं, कारखाने हैं और सब कुछ है। लेकिन दुर्भाग्य से 147 साल पहले से कुछ दूसरे देशों ने ईरान के खिलाफ बहुत सारे प्रतिबंध, आर्थिक प्रतिबंध बनाए। 3 दिन में ईरान गिराने की योजना थी, अमेरिकी भी इस युद्ध के खिलाफ मौलाना इलाही ने दावा किया कि अमेरिका को भरोसा था कि वह तीन दिनों में ईरान की सरकार गिरा सकता है। युद्ध के बाद ईरान का नक्शा बदलने की बात कही गई थी। ईरान को पांच हिस्सों में बांटने की योजना थी। युद्ध में ईरान को भारी नुकसान हुआ है। 1 लाख से अधिक घर तबाह, कई अस्पताल, विश्वविद्यालय और प्रयोगशालाएं नष्ट, कई कारखाने क्षतिग्रस्त, बड़ी संख्या में नागरिकों की मौत हुई है। अब ईरान अपने घायलों के इलाज के लिए भारत से दवाइयां खरीद रहा है। अमेरिकियों को इस युद्ध से कोई लाभ नहीं है, अमेरिकी सीनेटरों ने इस युद्ध की निंदा की है। आप न्यूयॉर्क के मेयर के बयान पर जाइए, जो मूल रूप से भारतीय हैं। अमेरिकी थोंपने लगे थे अपनी शर्तें, इसलिए विफल हुई वार्ता मौलाना इलाही ने बताया कि ईरान ने कभी भी किसी देश से यह नहीं कहा कि वह ईरान और अमेरिका के बीच मध्यस्थ बने। कोई ईरान नहीं गया, कोई ईरान से नहीं आया। बल्कि, कुछ देश अपनी मर्जी से आगे आए और उन्होंने हमारे और अमेरिका के बीच बातचीत की पहल कर दी। ओमान और जिनेवा में बातचीत शुरू हुई थी और शुरुआती संकेत सकारात्मक थे। पहले अमेरिका ने 15-सूत्रीय प्रस्ताव दिया, जिसे ईरान ने खारिज किया। इसके बाद ईरान ने 10-सूत्रीय प्रस्ताव रखा, जिसे अमेरिका ने स्वीकार कर लिया। लेकिन अंतिम दौर में अमेरिका ने नई और असामान्य शर्तें रख दीं। उन्होंने कहा, जब यह साफ हो गया कि वे अपनी बात से पीछे हट रहे हैं, तो बातचीत विफल हो गई। होर्मुज अस्थायी रूप से बंद, लेकिन जल्द ही खुल जाएगा भारतीय जहाजों को लेकर उठ रहे सवालों के बीच मौलाना डॉ. अब्दुल मजीद हकीम इलाही ने स्पष्ट किया कि होर्मुज जलडमरूमध्य को बंद किए जाने के पीछे सुरक्षा ही सबसे बड़ा कारण है। जब कुछ अन्य देश इस जलडमरूमध्य के रास्ते अपने युद्धपोत भेजना चाहते थे, तब ईरान को यह कदम उठाना पड़ा। यह कदम किसी एक देश के खिलाफ नहीं, बल्कि समुद्री सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उठाया गया था। उन्होंने विश्वास जताया कि होर्मुज जलडमरूमध्य पहले की तरह सभी देशों के लिए खुल जाएगा, जैसा कि 28 फरवरी से पहले था। यह रोक अस्थायी है और जल्द ही स्थिति सामान्य हो जाएगी। तीन साल की मासूम ने रोते हुए उतार दी अपनी बाली मौलाना इलाही ने युद्ध के असर को लेकर एक भावुक घटना भी साझा की। उन्होंने बताया कि एक कार्यक्रम के दौरान तीन साल की बच्ची रोते हुए उनके पास आई और अपनी सोने की बाली उतारकर दे दी। बच्ची ने कहा, मैंने सुना है लड़कियों के स्कूल पर बमबारी हुई, कृपया यह ले लो। वह बच्ची यह नहीं जानती थी कि वे बच्चियां अब इस दुनिया में नहीं हैं। मैं भावुक हो गया। बाली वापस करते हुए कहा, यह तुम्हारे लिए उपहार है, और उसकी कीमत का दोगुना देने की बात कही। ईरान-भारत संबंध 5,000 साल पुराने, भारतीय दयालु भारत-ईरान संबंधों पर कहा, ईरान और भारत के बीच संबंध बहुत अच्छे हैं, बहुत मजबूत हैं। मुझे यकीन है कि 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