Wednesday, 15 Apr 2026 | 04:58 AM

Trending :

EXCLUSIVE

जबलपुर के बघौड़ा गांव में अनोखी परंपरा:इस दिन घर में नहीं बाहर बनता है खाना, हैजा से हुई मौतों का डर आज भी

जबलपुर के बघौड़ा गांव में अनोखी परंपरा:इस दिन घर में नहीं बाहर बनता है खाना, हैजा से हुई मौतों का डर आज भी

भले ही आज हम 21वीं सदी में जी रहे हो,पर अभी भी पुरानी परंपरा या फिर अंध विश्वास कहे, वो जीवित है। जबलपुर के ग्राम बघौड़ा में वैशाख माह के पहले मंगलवार को सालो से चल आ रही एक प्रथा को गांव के ग्रामीणों ने आज भी जीवित रखा है,यह प्रथा है, कि इस दिन लोग अपने घरों में नहीं बल्कि गांव से बाहर खाना बनाते हैं। गांव की महिलाएं खाने-पीने का समान लेकर एक साथ पहुंचती है और पेड़ के नीच सभी का भोजन बनता है। गांव के लोग इसे बुढ़वा मंगल के रूप में मनाते हैं। बघोड़ा गांव में परंपरा यह लंबे समय से चली आ रही है। कहा जाता है कि बुढ़वा मंगल के डर के कारण ग्रामीण साल में एक दिन (मंगलवार) को बाहर खाना बनाते हैं। खाने में लजीज भोजन नहीं बल्कि गक्कड़, भरता,चटनी बनाने की परंपरा है। बताया जाता है, कि सैकड़ो साल पहले गांव में हैजा नाम से बीमारी फैली थी, और इसका कोई हल नहीं निकल रहा था। एक के बाद एक कई ग्रामीणों की मौत हो रही थी। किसी को कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या किया जाए। बुजुर्ग बताते हैं कि नीम,हकीम, वैध सबको दिखाया, पर गांव में हालात जस के तस बने रहे। इसी समय गांव में एक संत का आगमन हुआ, उन्होंने गांव वालों को वैशाख माह की पहले मंगल को बुढ़वा मंगल मनाने की सलाह दी। संत ने कहा कि अगर गांव के बाहर खाना बनाया गया, और घर के अंदर दोनों वक्त का चूल्हा नहीं जला तो निश्चित रूप से फायदा होगा। ग्रामीणों ने यह सब किया तो गांव में बीमारी का प्रकोप खत्म हो जाएगा। संत की बात सभी ने मानी और फिर एक साथ होकर गांव के बाहर जाकर भोजन बनाया। बताया जाता है कि यह सब करने के बाद गांव से बीमारी दूर हो गई। उस दिन के बाद से आज तक बैसाख के पहले मंगलवार को गांव के सभी लोग बाहर जाकर भोजन बनाकर खाते है। परंपरा को लेकर कहा जाता है कि अगर गांव में किसी ग्रामीण को चाय भी पीनी होती है, तो उसके लिए चाय भी बाहर बनाई जाती है। यदि किसी के घर में शादी-ब्याह भी इस दिन पड़ जाता है तो उसे घर में नहीं बल्कि बाहर ही खाना बनाना होता है। ग्रामीणों की मान्यता है कि बुढ़वा मंगल मानने से उनके गांव में बड़ी बीमारियां नहीं होती है। पुरानी परंपरा का लंबे समय से निर्वाह किया जा रहा है। सारे गांव में घर के बाहर महिलाएं पुरुष एक साथ गक्कड़-भरता बनाते हैं, भगवान को भोग लगाते है फिर खाना होता है। गांव के 70 वर्षीय सन्नू लाल पटेल बताते है कि यह परंपरा कब से चली आ रही है, यह नहीं पता, पर बिना किसी गेप के आज तक बैशाख में मंगलवार को यह किया जाता है। उन्होंने बताया बीमारी में कई लोगों की मौत हुई थी। संत के कहने पर गांव के बाहर भोजन बनाया गया था, जो कि आज भी लगातार चल रहा है। साल में एक बार बुढ़वा मंगल मनाया जाता है। अर्चना पटेल ने बताया कि जब से शादी होकर गांव आई है, तब से लेकर आज तक यह प्रथा चली आ रही है कि साल में एक दिन गांव के बाहर खाना बनाया जाए, उस दिन गांव में किसी के घर में ना ही चूल्हा जले, औ ना ही धुंआ हो। उनका कहना है, कि उस दिन के बाद से आज तक बीमारी गांव में नहीं आई है।

WhatsApp
Facebook
Twitter
LinkedIn

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

लेटेस्ट टॉप अपडेट

सच्चाई की दहाड़

ब्रेकिंग खबरें सीधे अपने ईमेल पर पाने के लिए रजिस्टर करें।

You have been successfully Subscribed! Ops! Something went wrong, please try again.

ग्लोबल करेंसी अपडेट

Provided by IFC Markets
स्प्राउट्स खाने का जोखिम: सेहत बनाने वाले स्प्राउट्स कहीं भी आपको बीमार न कर दें, खाने से पहले इन बातों का रखें ध्यान

April 8, 2026/
5:05 pm

अंकुरित अनाज खाने का जोखिम: आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में ‘हेल्थ कॉन्शियस’ अच्छी बात हो रही है और जब...

भारत 2023 के बाद पहली बार ICC इवेंट में हारा:बुमराह हाईएस्ट विकेट टेकर, टी-20 में भारत की दूसरी सबसे बड़ी हार; रिकॉर्ड्स

February 23, 2026/
4:30 am

अहमदाबाद में भारत 2023 के बाद पहली बार किसी ICC इवेंट में मैच हार गया। टी-20 वर्ल्ड कप के सुपर-8...

गिरफ्तारी से नाराज पारदी महिलाओं ने किया चक्काजाम:बच्चे को जमीन पर पटकने की कोशिश की; अधेड़ बस के पहिए के नीचे लेट गया

March 30, 2026/
8:05 am

गुना के कैंट थाने के सामने रविवार रात पारदी समाज की महिलाओं ने चक्काजाम कर दिया। वह लूट के एक...

सूरत में एक मकान में आग से 5 की मौत:घर में भर रखा था 10 टन साड़ियों का स्टॉक, पैदल चलने तक की जगह नहीं थी

March 31, 2026/
1:24 pm

सूरत18 घंटे पहले कॉपी लिंक गुजरात के सूरत में एक मकान में मंगलवार दोपहर को आग लगने से 5 लोगों...

NZ Vs SL T20 World Cup LIVE Score Update; Dasun Shanaka

February 25, 2026/
4:36 am

स्पोर्ट्स डेस्क35 मिनट पहले कॉपी लिंक टी-20 वर्ल्ड कप के सुपर-8 स्टेज का छठा मैच आज श्रीलंका और न्यूजीलैंड के...

पश्चिम बंगाल चुनाव 2026: 'वोट कट्ट' के डर से दिल्ली से बंगाल लौट रहे प्रवासी!, कई लोगों ने कहा- अभी तक सूची में नाम नहीं

March 31, 2026/
1:03 pm

पश्चिम बंगाल चुनाव 2026: पश्चिम बंगाल चुनाव से पहले एक नया ट्रेंड सामने आ रहा है. दिल्ली में काम करने...

जॉब - शिक्षा

हेल्थ & फिटनेस

राजनीति

जबलपुर के बघौड़ा गांव में अनोखी परंपरा:इस दिन घर में नहीं बाहर बनता है खाना, हैजा से हुई मौतों का डर आज भी

जबलपुर के बघौड़ा गांव में अनोखी परंपरा:इस दिन घर में नहीं बाहर बनता है खाना, हैजा से हुई मौतों का डर आज भी

भले ही आज हम 21वीं सदी में जी रहे हो,पर अभी भी पुरानी परंपरा या फिर अंध विश्वास कहे, वो जीवित है। जबलपुर के ग्राम बघौड़ा में वैशाख माह के पहले मंगलवार को सालो से चल आ रही एक प्रथा को गांव के ग्रामीणों ने आज भी जीवित रखा है,यह प्रथा है, कि इस दिन लोग अपने घरों में नहीं बल्कि गांव से बाहर खाना बनाते हैं। गांव की महिलाएं खाने-पीने का समान लेकर एक साथ पहुंचती है और पेड़ के नीच सभी का भोजन बनता है। गांव के लोग इसे बुढ़वा मंगल के रूप में मनाते हैं। बघोड़ा गांव में परंपरा यह लंबे समय से चली आ रही है। कहा जाता है कि बुढ़वा मंगल के डर के कारण ग्रामीण साल में एक दिन (मंगलवार) को बाहर खाना बनाते हैं। खाने में लजीज भोजन नहीं बल्कि गक्कड़, भरता,चटनी बनाने की परंपरा है। बताया जाता है, कि सैकड़ो साल पहले गांव में हैजा नाम से बीमारी फैली थी, और इसका कोई हल नहीं निकल रहा था। एक के बाद एक कई ग्रामीणों की मौत हो रही थी। किसी को कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या किया जाए। बुजुर्ग बताते हैं कि नीम,हकीम, वैध सबको दिखाया, पर गांव में हालात जस के तस बने रहे। इसी समय गांव में एक संत का आगमन हुआ, उन्होंने गांव वालों को वैशाख माह की पहले मंगल को बुढ़वा मंगल मनाने की सलाह दी। संत ने कहा कि अगर गांव के बाहर खाना बनाया गया, और घर के अंदर दोनों वक्त का चूल्हा नहीं जला तो निश्चित रूप से फायदा होगा। ग्रामीणों ने यह सब किया तो गांव में बीमारी का प्रकोप खत्म हो जाएगा। संत की बात सभी ने मानी और फिर एक साथ होकर गांव के बाहर जाकर भोजन बनाया। बताया जाता है कि यह सब करने के बाद गांव से बीमारी दूर हो गई। उस दिन के बाद से आज तक बैसाख के पहले मंगलवार को गांव के सभी लोग बाहर जाकर भोजन बनाकर खाते है। परंपरा को लेकर कहा जाता है कि अगर गांव में किसी ग्रामीण को चाय भी पीनी होती है, तो उसके लिए चाय भी बाहर बनाई जाती है। यदि किसी के घर में शादी-ब्याह भी इस दिन पड़ जाता है तो उसे घर में नहीं बल्कि बाहर ही खाना बनाना होता है। ग्रामीणों की मान्यता है कि बुढ़वा मंगल मानने से उनके गांव में बड़ी बीमारियां नहीं होती है। पुरानी परंपरा का लंबे समय से निर्वाह किया जा रहा है। सारे गांव में घर के बाहर महिलाएं पुरुष एक साथ गक्कड़-भरता बनाते हैं, भगवान को भोग लगाते है फिर खाना होता है। गांव के 70 वर्षीय सन्नू लाल पटेल बताते है कि यह परंपरा कब से चली आ रही है, यह नहीं पता, पर बिना किसी गेप के आज तक बैशाख में मंगलवार को यह किया जाता है। उन्होंने बताया बीमारी में कई लोगों की मौत हुई थी। संत के कहने पर गांव के बाहर भोजन बनाया गया था, जो कि आज भी लगातार चल रहा है। साल में एक बार बुढ़वा मंगल मनाया जाता है। अर्चना पटेल ने बताया कि जब से शादी होकर गांव आई है, तब से लेकर आज तक यह प्रथा चली आ रही है कि साल में एक दिन गांव के बाहर खाना बनाया जाए, उस दिन गांव में किसी के घर में ना ही चूल्हा जले, औ ना ही धुंआ हो। उनका कहना है, कि उस दिन के बाद से आज तक बीमारी गांव में नहीं आई है।

WhatsApp
Facebook
Twitter
LinkedIn

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

हेल्थ & फिटनेस

विज्ञापन

राजनीति

लेटेस्ट टॉप अपडेट

ग्लोबल करेंसी अपडेट

Provided by IFC Markets

Live Cricket

सच्चाई की दहाड़

ब्रेकिंग खबरें सीधे अपने ईमेल पर पाने के लिए रजिस्टर करें।

You have been successfully Subscribed! Ops! Something went wrong, please try again.