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जबलपुर के बघौड़ा गांव में अनोखी परंपरा:इस दिन घर में नहीं बाहर बनता है खाना, हैजा से हुई मौतों का डर आज भी

जबलपुर के बघौड़ा गांव में अनोखी परंपरा:इस दिन घर में नहीं बाहर बनता है खाना, हैजा से हुई मौतों का डर आज भी

भले ही आज हम 21वीं सदी में जी रहे हो,पर अभी भी पुरानी परंपरा या फिर अंध विश्वास कहे, वो जीवित है। जबलपुर के ग्राम बघौड़ा में वैशाख माह के पहले मंगलवार को सालो से चल आ रही एक प्रथा को गांव के ग्रामीणों ने आज भी जीवित रखा है,यह प्रथा है, कि इस दिन लोग अपने घरों में नहीं बल्कि गांव से बाहर खाना बनाते हैं। गांव की महिलाएं खाने-पीने का समान लेकर एक साथ पहुंचती है और पेड़ के नीच सभी का भोजन बनता है। गांव के लोग इसे बुढ़वा मंगल के रूप में मनाते हैं। बघोड़ा गांव में परंपरा यह लंबे समय से चली आ रही है। कहा जाता है कि बुढ़वा मंगल के डर के कारण ग्रामीण साल में एक दिन (मंगलवार) को बाहर खाना बनाते हैं। खाने में लजीज भोजन नहीं बल्कि गक्कड़, भरता,चटनी बनाने की परंपरा है। बताया जाता है, कि सैकड़ो साल पहले गांव में हैजा नाम से बीमारी फैली थी, और इसका कोई हल नहीं निकल रहा था। एक के बाद एक कई ग्रामीणों की मौत हो रही थी। किसी को कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या किया जाए। बुजुर्ग बताते हैं कि नीम,हकीम, वैध सबको दिखाया, पर गांव में हालात जस के तस बने रहे। इसी समय गांव में एक संत का आगमन हुआ, उन्होंने गांव वालों को वैशाख माह की पहले मंगल को बुढ़वा मंगल मनाने की सलाह दी। संत ने कहा कि अगर गांव के बाहर खाना बनाया गया, और घर के अंदर दोनों वक्त का चूल्हा नहीं जला तो निश्चित रूप से फायदा होगा। ग्रामीणों ने यह सब किया तो गांव में बीमारी का प्रकोप खत्म हो जाएगा। संत की बात सभी ने मानी और फिर एक साथ होकर गांव के बाहर जाकर भोजन बनाया। बताया जाता है कि यह सब करने के बाद गांव से बीमारी दूर हो गई। उस दिन के बाद से आज तक बैसाख के पहले मंगलवार को गांव के सभी लोग बाहर जाकर भोजन बनाकर खाते है। परंपरा को लेकर कहा जाता है कि अगर गांव में किसी ग्रामीण को चाय भी पीनी होती है, तो उसके लिए चाय भी बाहर बनाई जाती है। यदि किसी के घर में शादी-ब्याह भी इस दिन पड़ जाता है तो उसे घर में नहीं बल्कि बाहर ही खाना बनाना होता है। ग्रामीणों की मान्यता है कि बुढ़वा मंगल मानने से उनके गांव में बड़ी बीमारियां नहीं होती है। पुरानी परंपरा का लंबे समय से निर्वाह किया जा रहा है। सारे गांव में घर के बाहर महिलाएं पुरुष एक साथ गक्कड़-भरता बनाते हैं, भगवान को भोग लगाते है फिर खाना होता है। गांव के 70 वर्षीय सन्नू लाल पटेल बताते है कि यह परंपरा कब से चली आ रही है, यह नहीं पता, पर बिना किसी गेप के आज तक बैशाख में मंगलवार को यह किया जाता है। उन्होंने बताया बीमारी में कई लोगों की मौत हुई थी। संत के कहने पर गांव के बाहर भोजन बनाया गया था, जो कि आज भी लगातार चल रहा है। साल में एक बार बुढ़वा मंगल मनाया जाता है। अर्चना पटेल ने बताया कि जब से शादी होकर गांव आई है, तब से लेकर आज तक यह प्रथा चली आ रही है कि साल में एक दिन गांव के बाहर खाना बनाया जाए, उस दिन गांव में किसी के घर में ना ही चूल्हा जले, औ ना ही धुंआ हो। उनका कहना है, कि उस दिन के बाद से आज तक बीमारी गांव में नहीं आई है।

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जबलपुर के बघौड़ा गांव में अनोखी परंपरा:इस दिन घर में नहीं बाहर बनता है खाना, हैजा से हुई मौतों का डर आज भी

भले ही आज हम 21वीं सदी में जी रहे हो,पर अभी भी पुरानी परंपरा या फिर अंध विश्वास कहे, वो जीवित है। जबलपुर के ग्राम बघौड़ा में वैशाख माह के पहले मंगलवार को सालो से चल आ रही एक प्रथा को गांव के ग्रामीणों ने आज भी जीवित रखा है,यह प्रथा है, कि इस दिन लोग अपने घरों में नहीं बल्कि गांव से बाहर खाना बनाते हैं। गांव की महिलाएं खाने-पीने का समान लेकर एक साथ पहुंचती है और पेड़ के नीच सभी का भोजन बनता है। गांव के लोग इसे बुढ़वा मंगल के रूप में मनाते हैं। बघोड़ा गांव में परंपरा यह लंबे समय से चली आ रही है। कहा जाता है कि बुढ़वा मंगल के डर के कारण ग्रामीण साल में एक दिन (मंगलवार) को बाहर खाना बनाते हैं। खाने में लजीज भोजन नहीं बल्कि गक्कड़, भरता,चटनी बनाने की परंपरा है। बताया जाता है, कि सैकड़ो साल पहले गांव में हैजा नाम से बीमारी फैली थी, और इसका कोई हल नहीं निकल रहा था। एक के बाद एक कई ग्रामीणों की मौत हो रही थी। किसी को कुछ सूझ नहीं रहा था कि क्या किया जाए। बुजुर्ग बताते हैं कि नीम,हकीम, वैध सबको दिखाया, पर गांव में हालात जस के तस बने रहे। इसी समय गांव में एक संत का आगमन हुआ, उन्होंने गांव वालों को वैशाख माह की पहले मंगल को बुढ़वा मंगल मनाने की सलाह दी। संत ने कहा कि अगर गांव के बाहर खाना बनाया गया, और घर के अंदर दोनों वक्त का चूल्हा नहीं जला तो निश्चित रूप से फायदा होगा। ग्रामीणों ने यह सब किया तो गांव में बीमारी का प्रकोप खत्म हो जाएगा। संत की बात सभी ने मानी और फिर एक साथ होकर गांव के बाहर जाकर भोजन बनाया। बताया जाता है कि यह सब करने के बाद गांव से बीमारी दूर हो गई। उस दिन के बाद से आज तक बैसाख के पहले मंगलवार को गांव के सभी लोग बाहर जाकर भोजन बनाकर खाते है। परंपरा को लेकर कहा जाता है कि अगर गांव में किसी ग्रामीण को चाय भी पीनी होती है, तो उसके लिए चाय भी बाहर बनाई जाती है। यदि किसी के घर में शादी-ब्याह भी इस दिन पड़ जाता है तो उसे घर में नहीं बल्कि बाहर ही खाना बनाना होता है। ग्रामीणों की मान्यता है कि बुढ़वा मंगल मानने से उनके गांव में बड़ी बीमारियां नहीं होती है। पुरानी परंपरा का लंबे समय से निर्वाह किया जा रहा है। सारे गांव में घर के बाहर महिलाएं पुरुष एक साथ गक्कड़-भरता बनाते हैं, भगवान को भोग लगाते है फिर खाना होता है। गांव के 70 वर्षीय सन्नू लाल पटेल बताते है कि यह परंपरा कब से चली आ रही है, यह नहीं पता, पर बिना किसी गेप के आज तक बैशाख में मंगलवार को यह किया जाता है। उन्होंने बताया बीमारी में कई लोगों की मौत हुई थी। संत के कहने पर गांव के बाहर भोजन बनाया गया था, जो कि आज भी लगातार चल रहा है। साल में एक बार बुढ़वा मंगल मनाया जाता है। अर्चना पटेल ने बताया कि जब से शादी होकर गांव आई है, तब से लेकर आज तक यह प्रथा चली आ रही है कि साल में एक दिन गांव के बाहर खाना बनाया जाए, उस दिन गांव में किसी के घर में ना ही चूल्हा जले, औ ना ही धुंआ हो। उनका कहना है, कि उस दिन के बाद से आज तक बीमारी गांव में नहीं आई है।

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