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मूवी रिव्यूः टोस्टर:कंजूसी का मजेदार आइडिया, लेकिन कमजोर कहानी और बिखरा स्क्रीनप्ले फिल्म को बना देता है बोझिल

मूवी रिव्यूः टोस्टर:कंजूसी का मजेदार आइडिया, लेकिन कमजोर कहानी और बिखरा स्क्रीनप्ले फिल्म को बना देता है बोझिल

रेटिंग: 2/5 कास्टः राजकुमार राव, सान्या मल्होत्रा डायरेक्टरः विवेक दास चौधरी टोस्टर का कॉन्सेप्ट सुनने में दिलचस्प है और फिल्म की शुरुआत भी उम्मीद जगाती है। पहले कुछ मिनटों में एक अलग तरह का टोन दिखता है, जिसमें हल्की कॉमेडी के साथ एक अजीब सा सस्पेंस भी है। लेकिन यह इंटरेस्ट ज्यादा देर टिक नहीं पाता। फिल्म जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, अपनी पकड़ खोती चली जाती है और जो शुरुआत में ताजगी लगती है, वही बाद में बोझ बन जाती है। कैसी है फिल्म की कहानी? कहानी रमाकांत (राजकुमार राव) की है, जो बेहद कंजूस इंसान है और अपनी दी हुई चीजें भी वापस लेने से नहीं हिचकता। शादी में दिया हुआ एक टोस्टर जब वह वापस मांगता है, तो वही टोस्टर एक मर्डर केस से जुड़ जाता है। इसके बाद रामाकांत उसे छुपाने और वापस पाने की कोशिश में उलझता जाता है। कहानी में मर्डर, ब्लैकमेल और सीक्रेट्स जैसे कई एलिमेंट्स आते हैं, लेकिन ये सब बार-बार रिपीट होते रहते हैं, जिससे कहानी आगे बढ़ने के बजाय वहीं घूमती नजर आती है। कैसी है स्टारकास्ट की एक्टिंग? एक्टिंग की बात करें तो राजकुमार राव पूरी फिल्म को संभालने की कोशिश करते हैं और कई जगहों पर सफल भी होते हैं। उनका किरदार इरिटेटिंग होते हुए भी रिलेटेबल लगता है और कुछ सीन में वे हंसाने में कामयाब रहते हैं। सान्या मल्होत्रा का रोल सीमित है और उन्हें ज्यादा कुछ करने का मौका नहीं मिलता। अभिषेक बनर्जी, सीमा पाहवा और अर्चना पूरन सिंह जैसे कलाकार भी कमजोर लेखन की वजह से असर नहीं छोड़ पाते। कैसा है फिल्म का डायरेक्शन? डायरेक्शन की बात करें तो विवेक दास चौधरी का आइडिया नया जरूर था, लेकिन उसे पर्दे पर सही तरह से उतारने में कमी रह गई। फिल्म का सेकेंड हाफ खिंचा हुआ लगता है और स्क्रीनप्ले बिखरा हुआ नजर आता है। क्लाइमैक्स में बहुत ज्यादा कन्फ्यूजन है, जिससे कहानी का असर खत्म हो जाता है। तकनीकी तौर पर सिनेमैटोग्राफी ठीक है, लेकिन एडिटिंग और बैकग्राउंड स्कोर फिल्म को सपोर्ट नहीं कर पाते। कैसा है फिल्म का म्यूजिक? संगीत और बैकग्राउंड स्कोर दोनों ही कमजोर हैं और फिल्म के इमोशनल या कॉमिक मोमेंट्स को उभार नहीं पाते। फाइनल वर्डिक्टः फिल्म देखें या नहीं? कुल मिलाकर, टोस्टर एक अच्छा आइडिया लेकर आती है, लेकिन कमजोर लेखन और ढीले निर्देशन की वजह से असर नहीं छोड़ पाती। फिल्म के कुछ हिस्से मनोरंजन करते हैं, लेकिन फिल्म पूरे समय बांधे रखने में नाकाम रहती है। यह एक ऐसी फिल्म है जिसे बेहतर बनाया जा सकता था, लेकिन वह मौका गंवा दिया गया।

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मूवी रिव्यूः टोस्टर:कंजूसी का मजेदार आइडिया, लेकिन कमजोर कहानी और बिखरा स्क्रीनप्ले फिल्म को बना देता है बोझिल

रेटिंग: 2/5 कास्टः राजकुमार राव, सान्या मल्होत्रा डायरेक्टरः विवेक दास चौधरी टोस्टर का कॉन्सेप्ट सुनने में दिलचस्प है और फिल्म की शुरुआत भी उम्मीद जगाती है। पहले कुछ मिनटों में एक अलग तरह का टोन दिखता है, जिसमें हल्की कॉमेडी के साथ एक अजीब सा सस्पेंस भी है। लेकिन यह इंटरेस्ट ज्यादा देर टिक नहीं पाता। फिल्म जैसे-जैसे आगे बढ़ती है, अपनी पकड़ खोती चली जाती है और जो शुरुआत में ताजगी लगती है, वही बाद में बोझ बन जाती है। कैसी है फिल्म की कहानी? कहानी रमाकांत (राजकुमार राव) की है, जो बेहद कंजूस इंसान है और अपनी दी हुई चीजें भी वापस लेने से नहीं हिचकता। शादी में दिया हुआ एक टोस्टर जब वह वापस मांगता है, तो वही टोस्टर एक मर्डर केस से जुड़ जाता है। इसके बाद रामाकांत उसे छुपाने और वापस पाने की कोशिश में उलझता जाता है। कहानी में मर्डर, ब्लैकमेल और सीक्रेट्स जैसे कई एलिमेंट्स आते हैं, लेकिन ये सब बार-बार रिपीट होते रहते हैं, जिससे कहानी आगे बढ़ने के बजाय वहीं घूमती नजर आती है। कैसी है स्टारकास्ट की एक्टिंग? एक्टिंग की बात करें तो राजकुमार राव पूरी फिल्म को संभालने की कोशिश करते हैं और कई जगहों पर सफल भी होते हैं। उनका किरदार इरिटेटिंग होते हुए भी रिलेटेबल लगता है और कुछ सीन में वे हंसाने में कामयाब रहते हैं। सान्या मल्होत्रा का रोल सीमित है और उन्हें ज्यादा कुछ करने का मौका नहीं मिलता। अभिषेक बनर्जी, सीमा पाहवा और अर्चना पूरन सिंह जैसे कलाकार भी कमजोर लेखन की वजह से असर नहीं छोड़ पाते। कैसा है फिल्म का डायरेक्शन? डायरेक्शन की बात करें तो विवेक दास चौधरी का आइडिया नया जरूर था, लेकिन उसे पर्दे पर सही तरह से उतारने में कमी रह गई। फिल्म का सेकेंड हाफ खिंचा हुआ लगता है और स्क्रीनप्ले बिखरा हुआ नजर आता है। क्लाइमैक्स में बहुत ज्यादा कन्फ्यूजन है, जिससे कहानी का असर खत्म हो जाता है। तकनीकी तौर पर सिनेमैटोग्राफी ठीक है, लेकिन एडिटिंग और बैकग्राउंड स्कोर फिल्म को सपोर्ट नहीं कर पाते। कैसा है फिल्म का म्यूजिक? संगीत और बैकग्राउंड स्कोर दोनों ही कमजोर हैं और फिल्म के इमोशनल या कॉमिक मोमेंट्स को उभार नहीं पाते। फाइनल वर्डिक्टः फिल्म देखें या नहीं? कुल मिलाकर, टोस्टर एक अच्छा आइडिया लेकर आती है, लेकिन कमजोर लेखन और ढीले निर्देशन की वजह से असर नहीं छोड़ पाती। फिल्म के कुछ हिस्से मनोरंजन करते हैं, लेकिन फिल्म पूरे समय बांधे रखने में नाकाम रहती है। यह एक ऐसी फिल्म है जिसे बेहतर बनाया जा सकता था, लेकिन वह मौका गंवा दिया गया।

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