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Oscar Speech on Deathbed, Refused Nehru Docu; First Film Loan

Oscar Speech on Deathbed, Refused Nehru Docu; First Film Loan

मुंबई1 घंटे पहलेलेखक: अभय पांडेय

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सत्यजीत रे को 1992 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया था।

एक फिल्ममेकर ने एक फिल्म बनाने की सोची, चूंकि उसमें न एक्शन था, न रोमांस, न गाने, इसलिए कोई भी प्रोड्यूसर पैसा लगाने के लिए राजी नहीं हुआ। तब उन्होंने फिल्म के लिए अपनी सेविंग, LIC पॉलिसी और यहां तक कि बीवी के जेवर भी गिरवी रख दिए और किसी तरह शूटिंग शुरू की।

लेकिन बीच में ही पैसे खत्म होने के चलते शूटिंग रुक गई, तब सरकार ने लोन समझकर फिल्म बनाने के लिए पैसा दिया। जिसके चलते फिल्म किसी तरह पूरी हुई।

जब फिल्म रिलीज हुई, तो पहले दो हफ्तों में रिस्पॉन्स ठंडा रहा, लेकिन तीसरे हफ्ते से हर रोज फिल्म हाउसफुल होने लगी और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी इस फिल्म से बेहद प्रभावित हुए। फिल्म ने नेशनल अवॉर्ड समेत इंटरनेशनल लेवल पर भी कई अवॉर्ड जीते और इंडियन सिनेमा को नई पहचान दी। यह फिल्म थी पाथेर पांचाली और फिल्ममेकर थे सत्यजीत रे।

सत्यजीत रे की आज 34वीं डेथ एनिवर्सरी है। आइए, उनकी जिंदगी से जुड़े कुछ किस्से जानते हैं।

किस्सा-1 इटैलियन फिल्म देखकर फिल्ममेकिंग का फैसला किया

सत्यजीत रे का जन्म 2 मई 1921 को कलकत्ता (अब कोलकाता) में हुआ। उनका परिवार साहित्य और कला से जुड़ा था। पिता सुकुमार रे फेमस लेखक और चित्रकार थे। रे जब वे बहुत छोटे थे, उनके पिता का निधन हो गया। इससे उनके परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर हो गई।

पिता के निधन के बाद घर की सारी जिम्मेदारी मां पर आ गई। मां ने पूरे घर को संभाला, खर्च चलाया और साथ ही नौकरी भी की। रे ने कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से पढ़ाई पूरी करने के बाद शांतिनिकेतन में कला का अध्ययन किया था।

सत्यजीत रे के पिता और माता की तस्वीर।

सत्यजीत रे के पिता और माता की तस्वीर।

सत्यजीत रे ने अपने करियर की शुरुआत एडवरटाइजिंग एजेंसी डी.जे. कीमर में ग्राफिक डिजाइनर के तौर पर की थी। उन्होंने बुक कवर डिजाइनर के तौर पर भी काम किया। उन्होंने नेहरू की डिस्कवरी ऑफ इंडिया समेत कई किताबों के कवर बनाए थे।

डी.जे. कीमर के लिए सत्यजीत रे द्वारा डिजाइन किया गया एक एड। (सोर्स: सत्यराज रे की किताब 'माई इयर्स विद अपू')

डी.जे. कीमर के लिए सत्यजीत रे द्वारा डिजाइन किया गया एक एड। (सोर्स: सत्यराज रे की किताब ‘माई इयर्स विद अपू’)

इसी दौरान उन्हें फिल्मों में दिलचस्पी बढ़ने लगी। 1947 में उन्होंने साथियों के साथ मिलकर एक फिल्म सोसाइटी बनाई, जहां विदेशी फिल्में दिखाई जाती थीं।

1949 में उनकी मुलाकात फ्रेंच डायरेक्टर ज्यां रेनॉए से हुई, जिन्होंने उन्हें फिल्में बनाने के लिए प्रेरित किया। 1950 में वे एक काम के लिए लंदन गए। वहां उन्होंने कई फिल्में देखीं, लेकिन इटैलियन फिल्म बाइसिकल थीव्स का उन पर सबसे गहरा असर हुआ। इस फिल्म को देखने के बाद उन्होंने तय किया कि वे फिल्म डायरेक्टर बनेंगे।

'पाथेर पांचाली' में बंगाल के एक गरीब ग्रामीण परिवार की कहानी थी, जिसे मुख्य रूप से दो बच्चों अपू और उसकी बड़ी बहन दुर्गा की नजरों से दिखाया गया है।

‘पाथेर पांचाली’ में बंगाल के एक गरीब ग्रामीण परिवार की कहानी थी, जिसे मुख्य रूप से दो बच्चों अपू और उसकी बड़ी बहन दुर्गा की नजरों से दिखाया गया है।

किस्सा-2 पहली फिल्म के लिए पत्नी के गहने गिरवी रखे

सत्यजीत रे के फिल्मी करियर की पहली फिल्म पाथेर पांचाली (1955) थी। यह फिल्म बंगाली लेखक विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय के उपन्यास पर आधारित थी। रे इस उपन्यास से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने इस पर अपनी पहली फिल्म बनाने का फैसला किया। हालांकि, फिल्म बनाना आसान नहीं था।

रे ने फिल्म के लिए नई और अनुभवहीन टीम बनाई। फिल्म में बड़े स्टार, गाने और एक्शन नहीं था, इसलिए कोई प्रोड्यूसर पैसा लगाने को तैयार नहीं था।

उन्होंने पैसे जुटाने के लिए नौकरी जारी रखी, बीमा पॉलिसी गिरवी रखी। यहां तक अपनी पत्नी ने भी गहने गिरवी रखे। इस तरह लगभग 17,000 रुपए जुटाकर उन्होंने 1952 में फिल्म की शूटिंग शुरू की। शूटिंग के दौरान उन्हें कई तकनीकी समस्याओं का सामना करना पड़ा।

उन्होंने शुरुआत में 16mm कैमरे से शूट कर उसे 35mm में बदलने का प्रयोग किया, ताकि खर्च कम हो, लेकिन प्रयोग असफल रहा। फुटेज सही नहीं आया और उन्हें फिर से शुरुआत करनी पड़ी। एक और बड़ी लोकेशन समस्या थी। एक बार तो उन्होंने एक गांव चुना था, जहां फूलों के बीच ट्रेन का सीन शूट करना था, लेकिन दोबारा पहुंचने पर गाय-भैंसों ने सारे फूल खा लिए थे। पूरा सीन खराब हो गया। फिर शूटिंग के बीच में पैसे खत्म हो गए और शूटिंग लगभग एक साल के लिए रुक गई।

सत्यजीत रे की फिल्म 'पाथेर पांचाली' का शाब्दिक अर्थ ‘छोटे रास्ते का गीत’ होता है।

सत्यजीत रे की फिल्म ‘पाथेर पांचाली’ का शाब्दिक अर्थ ‘छोटे रास्ते का गीत’ होता है।

किस्सा-3 घर में बैठ गया उल्लू; सरकार से लोन मिल गया

सत्यजीत रे के पाथेर पंचाली बनाने के संघर्ष के दौरान एक बहुत ही दिलचस्प और रहस्यमयी घटना हुई, जिसका जिक्र उनकी किताब ‘माई इयर्स विद अपू’ में है।

जैसा आपको बताया पैसे खत्म हो चुके थे और फिल्म की शूटिंग रुक चुकी थी। एक दिन सुबह जब रे जागे, तो उन्होंने अपने कमरे की खिड़की के बाहर एक सफेद-भूरा उल्लू बैठा था और लगातार उनकी तरफ देख रहा था। यह कोई सामान्य बात नहीं थी क्योंकि शहर में इस तरह का सीन बहुत कम देखने को मिलता है।

धीरे-धीरे यह खबर आसपास के लोगों तक पहुंच गई। पड़ोसी अपने-अपने घरों से झांककर उस उल्लू को देखने लगे। कुछ लोग उसे भगाने की कोशिश कर रहे थे, कुछ उसे बुलाने के लिए आवाजें निकाल रहे थे, लेकिन सबसे आश्चर्यजनक बात यह थी कि उल्लू बिल्कुल भी नहीं हिला, वह लगातार वहीं बैठा रहा और उसकी नजरें रे पर टिकी रहीं।

भारतीय मान्यता के अनुसार, उल्लू को देवी लक्ष्मी का वाहन माना जाता है। इसलिए लोग मानते हैं कि यदि उल्लू घर के पास दिखाई दे, तो यह धन और सौभाग्य का संकेत होता है। यही कारण था कि पड़ोसियों में उत्सुकता और थोड़ी ईर्ष्या भी थी।

रे ने इस घटना को बड़े ध्यान से देखा। सबसे हैरानी की बात यह थी कि वह उल्लू लगातार दो हफ्तों तक वहीं बैठा रहा। हर सुबह जब रे उठते, तो वह उसी जगह, उसी तरह बैठा मिलता जैसे वह खास तौर पर उनके लिए ही आया हो।

फिर एक दिन अचानक वह उल्लू गायब हो गया। कोई नहीं जानता कि वह कब और कैसे चला गया, लेकिन उसके जाने के कुछ समय बाद ही रे को एक बहुत अहम खबर मिली उन्हें पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. बी.सी. रॉय से मिलने का बुलावा आया।

मुख्यमंत्री से मुलाकात के बाद सरकार ने उनकी फिल्म को गांव के विकास से जुड़ा समझकर लोन दिया था, जिससे शूटिंग पूरी हो सकी। इस तरह काफी दिक्कतों के बाद शूटिंग शुरू होने के बाद 3 साल बाद 1955 में फिल्म रिलीज हुई।

सत्यजीत रे ने अपने करियर में 36 फिल्मों का निर्देशन किया था।

सत्यजीत रे ने अपने करियर में 36 फिल्मों का निर्देशन किया था।

किस्सा-4 नेहरू ने फिल्म देखी और प्रभावित हुए

पाथेर पंचाली की शूटिंग तो हो गई, लेकिन शुरुआत में लोग फिल्म को रिलीज करने के लिए ज्यादा उत्साहित नहीं थे। फिल्म लगभग तीन महीने तक बिना रिलीज हुए पड़ी रही। जब इसे रिलीज किया गया, तो पहले दो हफ्तों में इसका प्रदर्शन खास नहीं रहा, लेकिन तीसरे हफ्ते से हर दिन हाउसफुल होने लगा।

भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने फिल्म देखी और बहुत प्रभावित हुए। फिल्म को पहले सिर्फ छह हफ्तों के लिए थिएटर मिला था, क्योंकि उतना ही समय उपलब्ध था। इन छह हफ्तों के बाद फिल्म को दूसरे थिएटर में लगाया गया, जहां यह सात हफ्तों तक और चली। यानी कुल 13 हफ्तों में सरकार ने अपनी पूरी लागत निकाल ली और उसके बाद जो भी कमाई हुई, वह मुनाफा थी।

यह फिल्म अपू ट्राईलॉजी का पहला भाग थी, जिसके अन्य दो भाग अपराजितो (1956) और अपूर संसार (1959) थे।

किस्सा-5 कजिन से गुपचुप शादी की

सत्यजीत रे की मोहब्बत की कहानी भी काफी दिलचप्प रही है। उन्होंने अपनी फर्स्ट कजिन बिजोया दास से शादी की थी। बिजोया के पिता, सत्यजीत रे की मां के सौतेले बड़े भाई थे।

बिजोया एक एक्ट्रेस रही हैं। उन्होंने शेष रक्षा, मशाल जैसी फिल्मों में काम किया था। बिजोया का बचपन पटना में बीता, लेकिन 1931 में, जब वह तेरह साल की थीं, उनके पिता की मौत हो गई और उन्हें, उनकी मां और बहनों को कलकत्ता में अपने मामा प्रशांत दास के घर आना पड़ा। यहीं उनकी और सत्यजीत की पहली मुलाकात हुई।

फिर धीरे-धीरे दोनों के बीच अच्छी दोस्ती हो गई। एक ही घर में रहते-रहते ये दोस्ती मोहब्बत में बदल गई, लेकिन दोनों ने अपने रिश्ते को लंबे वक्त तक सीक्रेट रखा। रे ने पहले रजिस्ट्री ऑफिस में शादी की सोची, लेकिन इसके लिए विजया की मां तैयार नहीं थी। आखिरकार दोनों ने अपने घरवालों को बिना बताए, बिजोया की बहन के घर 20 अक्टूबर 1949 को चुपचाप शादी की।

सत्यजीत रे और बिजॉय की इकलौते बेटे संदीप रे के साथ तस्वीर।

सत्यजीत रे और बिजॉय की इकलौते बेटे संदीप रे के साथ तस्वीर।

किस्सा-6 फ्रांस के राष्ट्रपति खुद सम्मान देने आए थे सत्यजीत रे को उनके सिनेमा में योगदान के लिए कई पुरस्कार मिले। उन्होंने 36 राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीते, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है। उन्हें दादा साहेब फाल्के पुरस्कार, भारत रत्न और 1992 में अकादमी मानद पुरस्कार (ऑस्कर) से सम्मानित किया गया। वे एकमात्र भारतीय फिल्मकार हैं जिन्हें विश्व के तीन प्रमुख फिल्म समारोहों कान्स, वेनिस और बर्लिन में सर्वोच्च सम्मान प्राप्त हुआ।

फ्रांस के प्रेसिडेंट रहे फ्रांस्वा मिटर्रैंड प्रोटोकॉल तोड़कर सत्यजीत रे को उनके देश का सबसे बड़ा सिविलियन सम्मान देने भारत आए थे। 2 फरवरी, 1989 को रे को फ्रांस का सर्वोच्च सम्मान लीजन डि ऑनर दिया गया था।

उस समय, फ्रांस के प्रेसिडेंट खुद कोलकाता आए और नेशनल लाइब्रेरी में हुए एक समारोह में उन्हें यह सम्मान दिया। यह एक बहुत खास मौका था, क्योंकि आमतौर पर ऐसे अवॉर्ड विदेश में दिए जाते हैं, लेकिन मिटरेंड ने यह सम्मान देने भारत आए थे।

फ्रांस्वा मिटर्रैंड 1981 से 1995 तक फ्रांस के राष्ट्रपति थे।

फ्रांस्वा मिटर्रैंड 1981 से 1995 तक फ्रांस के राष्ट्रपति थे।

किस्सा-7 नेहरू पर डॉक्यूमेंट्री बनाने से इनकार किया

सत्यजीत रे ने नेहरू पर डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाने से मना कर दिया था। दरअसल, इमरजेंसी का दौर था और तत्कालिन इंदिरा सरकार नेहरू के जीवन और सामाजिक कामों पर एक डॉक्यूमेंट्री बनाना चाहती थी।

सरकार ने यह जिम्मेदारी सत्यजीत रे को देने का फैसला किया क्योंकि वह देश के जाने-माने फिल्ममेकर्स में से एक थे, लेकिन रे ने साफ मना कर दिया। जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने ऐसा क्यों किया, तो उनका सीधा जवाब था, ‘मुझे इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है।’

नेहरू के विशेष आग्रह पर सत्यजीत रे ने 1961 में रवींद्रनाथ टैगोर की जन्म शताब्दी के अवसर पर उन पर डॉक्यूमेंट्री फिल्म एक बनाई थी।

नेहरू के विशेष आग्रह पर सत्यजीत रे ने 1961 में रवींद्रनाथ टैगोर की जन्म शताब्दी के अवसर पर उन पर डॉक्यूमेंट्री फिल्म एक बनाई थी।

किस्सा-8 मृत्यु शैया पर दी ऑस्कर की स्पीच

सत्यजीत रे को साल 1992 में ऑस्कर का लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड देने की घोषणा हुई, लेकिन उस समय वे दिल की बीमारी के कारण अस्पताल में भर्ती थे। ऐसे में एक अनोखा फैसला लिया गया। ऑस्कर की टीम खुद कोलकाता पहुंची और अस्पताल के बिस्तर पर ही उन्हें यह ट्रॉफी देकर सम्मानित किया।

अस्पताल में भर्ती सत्यजीत रे ने अपनी ऑस्कर स्पीच दी थी।

अस्पताल में भर्ती सत्यजीत रे ने अपनी ऑस्कर स्पीच दी थी।

उनका स्वीकृति भाषण वहीं अस्पताल में रिकॉर्ड किया गया, जिसे 30 मार्च 1992 को ऑस्कर समारोह के दौरान पूरी दुनिया को दिखाया गया। महान अभिनेत्री ऑड्रे हेपबर्न ने उनके नाम की घोषणा की थी। इस सम्मान के करीब एक महीने बाद 23 अप्रैल 1992 को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया था।

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मुंबई1 घंटे पहलेलेखक: अभय पांडेय

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सत्यजीत रे को 1992 में भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से सम्मानित किया गया था।

एक फिल्ममेकर ने एक फिल्म बनाने की सोची, चूंकि उसमें न एक्शन था, न रोमांस, न गाने, इसलिए कोई भी प्रोड्यूसर पैसा लगाने के लिए राजी नहीं हुआ। तब उन्होंने फिल्म के लिए अपनी सेविंग, LIC पॉलिसी और यहां तक कि बीवी के जेवर भी गिरवी रख दिए और किसी तरह शूटिंग शुरू की।

लेकिन बीच में ही पैसे खत्म होने के चलते शूटिंग रुक गई, तब सरकार ने लोन समझकर फिल्म बनाने के लिए पैसा दिया। जिसके चलते फिल्म किसी तरह पूरी हुई।

जब फिल्म रिलीज हुई, तो पहले दो हफ्तों में रिस्पॉन्स ठंडा रहा, लेकिन तीसरे हफ्ते से हर रोज फिल्म हाउसफुल होने लगी और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू भी इस फिल्म से बेहद प्रभावित हुए। फिल्म ने नेशनल अवॉर्ड समेत इंटरनेशनल लेवल पर भी कई अवॉर्ड जीते और इंडियन सिनेमा को नई पहचान दी। यह फिल्म थी पाथेर पांचाली और फिल्ममेकर थे सत्यजीत रे।

सत्यजीत रे की आज 34वीं डेथ एनिवर्सरी है। आइए, उनकी जिंदगी से जुड़े कुछ किस्से जानते हैं।

किस्सा-1 इटैलियन फिल्म देखकर फिल्ममेकिंग का फैसला किया

सत्यजीत रे का जन्म 2 मई 1921 को कलकत्ता (अब कोलकाता) में हुआ। उनका परिवार साहित्य और कला से जुड़ा था। पिता सुकुमार रे फेमस लेखक और चित्रकार थे। रे जब वे बहुत छोटे थे, उनके पिता का निधन हो गया। इससे उनके परिवार की आर्थिक स्थिति कमजोर हो गई।

पिता के निधन के बाद घर की सारी जिम्मेदारी मां पर आ गई। मां ने पूरे घर को संभाला, खर्च चलाया और साथ ही नौकरी भी की। रे ने कलकत्ता के प्रेसीडेंसी कॉलेज से पढ़ाई पूरी करने के बाद शांतिनिकेतन में कला का अध्ययन किया था।

सत्यजीत रे के पिता और माता की तस्वीर।

सत्यजीत रे के पिता और माता की तस्वीर।

सत्यजीत रे ने अपने करियर की शुरुआत एडवरटाइजिंग एजेंसी डी.जे. कीमर में ग्राफिक डिजाइनर के तौर पर की थी। उन्होंने बुक कवर डिजाइनर के तौर पर भी काम किया। उन्होंने नेहरू की डिस्कवरी ऑफ इंडिया समेत कई किताबों के कवर बनाए थे।

डी.जे. कीमर के लिए सत्यजीत रे द्वारा डिजाइन किया गया एक एड। (सोर्स: सत्यराज रे की किताब 'माई इयर्स विद अपू')

डी.जे. कीमर के लिए सत्यजीत रे द्वारा डिजाइन किया गया एक एड। (सोर्स: सत्यराज रे की किताब ‘माई इयर्स विद अपू’)

इसी दौरान उन्हें फिल्मों में दिलचस्पी बढ़ने लगी। 1947 में उन्होंने साथियों के साथ मिलकर एक फिल्म सोसाइटी बनाई, जहां विदेशी फिल्में दिखाई जाती थीं।

1949 में उनकी मुलाकात फ्रेंच डायरेक्टर ज्यां रेनॉए से हुई, जिन्होंने उन्हें फिल्में बनाने के लिए प्रेरित किया। 1950 में वे एक काम के लिए लंदन गए। वहां उन्होंने कई फिल्में देखीं, लेकिन इटैलियन फिल्म बाइसिकल थीव्स का उन पर सबसे गहरा असर हुआ। इस फिल्म को देखने के बाद उन्होंने तय किया कि वे फिल्म डायरेक्टर बनेंगे।

'पाथेर पांचाली' में बंगाल के एक गरीब ग्रामीण परिवार की कहानी थी, जिसे मुख्य रूप से दो बच्चों अपू और उसकी बड़ी बहन दुर्गा की नजरों से दिखाया गया है।

‘पाथेर पांचाली’ में बंगाल के एक गरीब ग्रामीण परिवार की कहानी थी, जिसे मुख्य रूप से दो बच्चों अपू और उसकी बड़ी बहन दुर्गा की नजरों से दिखाया गया है।

किस्सा-2 पहली फिल्म के लिए पत्नी के गहने गिरवी रखे

सत्यजीत रे के फिल्मी करियर की पहली फिल्म पाथेर पांचाली (1955) थी। यह फिल्म बंगाली लेखक विभूतिभूषण बंद्योपाध्याय के उपन्यास पर आधारित थी। रे इस उपन्यास से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने इस पर अपनी पहली फिल्म बनाने का फैसला किया। हालांकि, फिल्म बनाना आसान नहीं था।

रे ने फिल्म के लिए नई और अनुभवहीन टीम बनाई। फिल्म में बड़े स्टार, गाने और एक्शन नहीं था, इसलिए कोई प्रोड्यूसर पैसा लगाने को तैयार नहीं था।

उन्होंने पैसे जुटाने के लिए नौकरी जारी रखी, बीमा पॉलिसी गिरवी रखी। यहां तक अपनी पत्नी ने भी गहने गिरवी रखे। इस तरह लगभग 17,000 रुपए जुटाकर उन्होंने 1952 में फिल्म की शूटिंग शुरू की। शूटिंग के दौरान उन्हें कई तकनीकी समस्याओं का सामना करना पड़ा।

उन्होंने शुरुआत में 16mm कैमरे से शूट कर उसे 35mm में बदलने का प्रयोग किया, ताकि खर्च कम हो, लेकिन प्रयोग असफल रहा। फुटेज सही नहीं आया और उन्हें फिर से शुरुआत करनी पड़ी। एक और बड़ी लोकेशन समस्या थी। एक बार तो उन्होंने एक गांव चुना था, जहां फूलों के बीच ट्रेन का सीन शूट करना था, लेकिन दोबारा पहुंचने पर गाय-भैंसों ने सारे फूल खा लिए थे। पूरा सीन खराब हो गया। फिर शूटिंग के बीच में पैसे खत्म हो गए और शूटिंग लगभग एक साल के लिए रुक गई।

सत्यजीत रे की फिल्म 'पाथेर पांचाली' का शाब्दिक अर्थ ‘छोटे रास्ते का गीत’ होता है।

सत्यजीत रे की फिल्म ‘पाथेर पांचाली’ का शाब्दिक अर्थ ‘छोटे रास्ते का गीत’ होता है।

किस्सा-3 घर में बैठ गया उल्लू; सरकार से लोन मिल गया

सत्यजीत रे के पाथेर पंचाली बनाने के संघर्ष के दौरान एक बहुत ही दिलचस्प और रहस्यमयी घटना हुई, जिसका जिक्र उनकी किताब ‘माई इयर्स विद अपू’ में है।

जैसा आपको बताया पैसे खत्म हो चुके थे और फिल्म की शूटिंग रुक चुकी थी। एक दिन सुबह जब रे जागे, तो उन्होंने अपने कमरे की खिड़की के बाहर एक सफेद-भूरा उल्लू बैठा था और लगातार उनकी तरफ देख रहा था। यह कोई सामान्य बात नहीं थी क्योंकि शहर में इस तरह का सीन बहुत कम देखने को मिलता है।

धीरे-धीरे यह खबर आसपास के लोगों तक पहुंच गई। पड़ोसी अपने-अपने घरों से झांककर उस उल्लू को देखने लगे। कुछ लोग उसे भगाने की कोशिश कर रहे थे, कुछ उसे बुलाने के लिए आवाजें निकाल रहे थे, लेकिन सबसे आश्चर्यजनक बात यह थी कि उल्लू बिल्कुल भी नहीं हिला, वह लगातार वहीं बैठा रहा और उसकी नजरें रे पर टिकी रहीं।

भारतीय मान्यता के अनुसार, उल्लू को देवी लक्ष्मी का वाहन माना जाता है। इसलिए लोग मानते हैं कि यदि उल्लू घर के पास दिखाई दे, तो यह धन और सौभाग्य का संकेत होता है। यही कारण था कि पड़ोसियों में उत्सुकता और थोड़ी ईर्ष्या भी थी।

रे ने इस घटना को बड़े ध्यान से देखा। सबसे हैरानी की बात यह थी कि वह उल्लू लगातार दो हफ्तों तक वहीं बैठा रहा। हर सुबह जब रे उठते, तो वह उसी जगह, उसी तरह बैठा मिलता जैसे वह खास तौर पर उनके लिए ही आया हो।

फिर एक दिन अचानक वह उल्लू गायब हो गया। कोई नहीं जानता कि वह कब और कैसे चला गया, लेकिन उसके जाने के कुछ समय बाद ही रे को एक बहुत अहम खबर मिली उन्हें पश्चिम बंगाल के तत्कालीन मुख्यमंत्री डॉ. बी.सी. रॉय से मिलने का बुलावा आया।

मुख्यमंत्री से मुलाकात के बाद सरकार ने उनकी फिल्म को गांव के विकास से जुड़ा समझकर लोन दिया था, जिससे शूटिंग पूरी हो सकी। इस तरह काफी दिक्कतों के बाद शूटिंग शुरू होने के बाद 3 साल बाद 1955 में फिल्म रिलीज हुई।

सत्यजीत रे ने अपने करियर में 36 फिल्मों का निर्देशन किया था।

सत्यजीत रे ने अपने करियर में 36 फिल्मों का निर्देशन किया था।

किस्सा-4 नेहरू ने फिल्म देखी और प्रभावित हुए

पाथेर पंचाली की शूटिंग तो हो गई, लेकिन शुरुआत में लोग फिल्म को रिलीज करने के लिए ज्यादा उत्साहित नहीं थे। फिल्म लगभग तीन महीने तक बिना रिलीज हुए पड़ी रही। जब इसे रिलीज किया गया, तो पहले दो हफ्तों में इसका प्रदर्शन खास नहीं रहा, लेकिन तीसरे हफ्ते से हर दिन हाउसफुल होने लगा।

भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने फिल्म देखी और बहुत प्रभावित हुए। फिल्म को पहले सिर्फ छह हफ्तों के लिए थिएटर मिला था, क्योंकि उतना ही समय उपलब्ध था। इन छह हफ्तों के बाद फिल्म को दूसरे थिएटर में लगाया गया, जहां यह सात हफ्तों तक और चली। यानी कुल 13 हफ्तों में सरकार ने अपनी पूरी लागत निकाल ली और उसके बाद जो भी कमाई हुई, वह मुनाफा थी।

यह फिल्म अपू ट्राईलॉजी का पहला भाग थी, जिसके अन्य दो भाग अपराजितो (1956) और अपूर संसार (1959) थे।

किस्सा-5 कजिन से गुपचुप शादी की

सत्यजीत रे की मोहब्बत की कहानी भी काफी दिलचप्प रही है। उन्होंने अपनी फर्स्ट कजिन बिजोया दास से शादी की थी। बिजोया के पिता, सत्यजीत रे की मां के सौतेले बड़े भाई थे।

बिजोया एक एक्ट्रेस रही हैं। उन्होंने शेष रक्षा, मशाल जैसी फिल्मों में काम किया था। बिजोया का बचपन पटना में बीता, लेकिन 1931 में, जब वह तेरह साल की थीं, उनके पिता की मौत हो गई और उन्हें, उनकी मां और बहनों को कलकत्ता में अपने मामा प्रशांत दास के घर आना पड़ा। यहीं उनकी और सत्यजीत की पहली मुलाकात हुई।

फिर धीरे-धीरे दोनों के बीच अच्छी दोस्ती हो गई। एक ही घर में रहते-रहते ये दोस्ती मोहब्बत में बदल गई, लेकिन दोनों ने अपने रिश्ते को लंबे वक्त तक सीक्रेट रखा। रे ने पहले रजिस्ट्री ऑफिस में शादी की सोची, लेकिन इसके लिए विजया की मां तैयार नहीं थी। आखिरकार दोनों ने अपने घरवालों को बिना बताए, बिजोया की बहन के घर 20 अक्टूबर 1949 को चुपचाप शादी की।

सत्यजीत रे और बिजॉय की इकलौते बेटे संदीप रे के साथ तस्वीर।

सत्यजीत रे और बिजॉय की इकलौते बेटे संदीप रे के साथ तस्वीर।

किस्सा-6 फ्रांस के राष्ट्रपति खुद सम्मान देने आए थे सत्यजीत रे को उनके सिनेमा में योगदान के लिए कई पुरस्कार मिले। उन्होंने 36 राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीते, जो अपने आप में एक रिकॉर्ड है। उन्हें दादा साहेब फाल्के पुरस्कार, भारत रत्न और 1992 में अकादमी मानद पुरस्कार (ऑस्कर) से सम्मानित किया गया। वे एकमात्र भारतीय फिल्मकार हैं जिन्हें विश्व के तीन प्रमुख फिल्म समारोहों कान्स, वेनिस और बर्लिन में सर्वोच्च सम्मान प्राप्त हुआ।

फ्रांस के प्रेसिडेंट रहे फ्रांस्वा मिटर्रैंड प्रोटोकॉल तोड़कर सत्यजीत रे को उनके देश का सबसे बड़ा सिविलियन सम्मान देने भारत आए थे। 2 फरवरी, 1989 को रे को फ्रांस का सर्वोच्च सम्मान लीजन डि ऑनर दिया गया था।

उस समय, फ्रांस के प्रेसिडेंट खुद कोलकाता आए और नेशनल लाइब्रेरी में हुए एक समारोह में उन्हें यह सम्मान दिया। यह एक बहुत खास मौका था, क्योंकि आमतौर पर ऐसे अवॉर्ड विदेश में दिए जाते हैं, लेकिन मिटरेंड ने यह सम्मान देने भारत आए थे।

फ्रांस्वा मिटर्रैंड 1981 से 1995 तक फ्रांस के राष्ट्रपति थे।

फ्रांस्वा मिटर्रैंड 1981 से 1995 तक फ्रांस के राष्ट्रपति थे।

किस्सा-7 नेहरू पर डॉक्यूमेंट्री बनाने से इनकार किया

सत्यजीत रे ने नेहरू पर डॉक्यूमेंट्री फिल्म बनाने से मना कर दिया था। दरअसल, इमरजेंसी का दौर था और तत्कालिन इंदिरा सरकार नेहरू के जीवन और सामाजिक कामों पर एक डॉक्यूमेंट्री बनाना चाहती थी।

सरकार ने यह जिम्मेदारी सत्यजीत रे को देने का फैसला किया क्योंकि वह देश के जाने-माने फिल्ममेकर्स में से एक थे, लेकिन रे ने साफ मना कर दिया। जब उनसे पूछा गया कि उन्होंने ऐसा क्यों किया, तो उनका सीधा जवाब था, ‘मुझे इसमें कोई दिलचस्पी नहीं है।’

नेहरू के विशेष आग्रह पर सत्यजीत रे ने 1961 में रवींद्रनाथ टैगोर की जन्म शताब्दी के अवसर पर उन पर डॉक्यूमेंट्री फिल्म एक बनाई थी।

नेहरू के विशेष आग्रह पर सत्यजीत रे ने 1961 में रवींद्रनाथ टैगोर की जन्म शताब्दी के अवसर पर उन पर डॉक्यूमेंट्री फिल्म एक बनाई थी।

किस्सा-8 मृत्यु शैया पर दी ऑस्कर की स्पीच

सत्यजीत रे को साल 1992 में ऑस्कर का लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड देने की घोषणा हुई, लेकिन उस समय वे दिल की बीमारी के कारण अस्पताल में भर्ती थे। ऐसे में एक अनोखा फैसला लिया गया। ऑस्कर की टीम खुद कोलकाता पहुंची और अस्पताल के बिस्तर पर ही उन्हें यह ट्रॉफी देकर सम्मानित किया।

अस्पताल में भर्ती सत्यजीत रे ने अपनी ऑस्कर स्पीच दी थी।

अस्पताल में भर्ती सत्यजीत रे ने अपनी ऑस्कर स्पीच दी थी।

उनका स्वीकृति भाषण वहीं अस्पताल में रिकॉर्ड किया गया, जिसे 30 मार्च 1992 को ऑस्कर समारोह के दौरान पूरी दुनिया को दिखाया गया। महान अभिनेत्री ऑड्रे हेपबर्न ने उनके नाम की घोषणा की थी। इस सम्मान के करीब एक महीने बाद 23 अप्रैल 1992 को दिल का दौरा पड़ने से उनका निधन हो गया था।

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