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जब इरफान खान डकैत बने, एड़ी में चोट लगी थी:लंगड़ाते हुए 'पान सिंह तोमर' की शूटिंग करने पहुंचे, एक्शन सुन लगा देते थे दौड़

जब इरफान खान डकैत बने, एड़ी में चोट लगी थी:लंगड़ाते हुए 'पान सिंह तोमर' की शूटिंग करने पहुंचे, एक्शन सुन लगा देते थे दौड़

29 अप्रैल को इरफान खान की 6वीं पुण्यतिथि सिर्फ तारीख नहीं, बल्कि यादों का सैलाब है- एक ऐसे कलाकार की, जिसने अभिनय को सच्चाई की तरह जिया। उनकी जिंदगी, किरदार और सफर किसी फिल्मी कहानी से कम नहीं रहा। इस सफर को रंजीता कौर ने अपनी डॉक्यूमेंट्री ‘अ स्टोरी दैट रिफ्यूज्ड टू डाई’ में सहेजा है, जो पान सिंह तोमर की मेकिंग और इरफान की अनदेखी दुनिया दिखाती है। आज इसकी स्क्रीनिंग मुंबई के नीता मुकेश अंबानी कल्चरल सेंटर में रखी गई है। यह सिर्फ डॉक्यूमेंट्री नहीं, बल्कि उन पलों की विरासत है। चोट के बावजूद इरफान शूटिंग करते रहे। वो बकरी के बच्चे के साथ खेलते नजर आए। हर छोटी चीज में खुशी ढूंढते थे और किरदार की सच्चाई के लिए खुद को मिटा देते थे। रंजीता के शब्दों में, इरफान सिर्फ एक्टर नहीं, बल्कि एक एहसास थे, जिन्होंने हर दिल में जगह बनाई। उनकी कहानी सच में मरने से इंकार करती है, क्योंकि इरफान आज भी अपने काम, सादगी और गहराई के जरिए हमारे बीच जिंदा हैं। इरफान खान की 6वीं डेथ एनिवर्सरी पर रंजीता कौर ने उनके जीवन के कुछ अनसुने किस्से सुनाए ‘स्टोरी दैट रिफ्यूज्ड टू डाई’– एक टाइटल, जो इरफान की सोच से जन्मा रंजीता कौर कहती हैं कि डॉक्यूमेंट्री का टाइटल सिर्फ क्रिएटिव नाम नहीं, बल्कि इरफान खान की सोच और फिल्म की जर्नी का सार है। उनके मुताबिक, पान सिंह तोमर बनाना आसान नहीं था। फिल्म ने कई मुश्किलें देखीं- लोकेशन की चुनौतियां, सीमित संसाधन और शूटिंग की बाधाएं। रंजीता कहती हैं कि वो इस प्रक्रिया को बाहर से देख रही थीं, लेकिन हर दिन महसूस कर रही थीं कि फिल्म हार मानने वाली नहीं है। हर दिक्कत के बाद टीम और मजबूत होती थी। इंटरव्यू के दौरान इरफान ने कहा- “यह कहानी मरने को तैयार नहीं थी।” यही पल रंजीता को झकझोर गया। उन्हें लगा, मन की भावना को शब्द इरफान ने दे दिए। इसलिए वह टाइटल का श्रेय इरफान को देती हैं। उनके मुताबिक, यह सिर्फ डॉक्यूमेंट्री नहीं, बल्कि इरफान की जिंदगी का प्रतीक है- एक ऐसी यात्रा, जिसने हर मुश्किल के बावजूद हार नहीं मानी। इरफान खान क्यों थे सबसे अलग? आम लोगों के दिल में बसने वाले कलाकार रंजीता के अनुसार, इरफान खान की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उन्हें समझने के लिए सिनेमा एक्सपर्ट होना जरूरी नहीं था। वो ऐसे कलाकार थे, जिनकी छाप हर वर्ग पर पड़ती थी- चाहे गहराई से समझने वाला दर्शक हो या मनोरंजन के लिए फिल्म देखने वाला आम इंसान। वह कहती हैं कि घर-परिवार या आसपास के लोगों से पूछें, तो हर कोई कहेगा कि यह आदमी अलग था। यह अलगपन अभिनय से ज्यादा उनकी सच्चाई में था। इरफान ने दिखावा नहीं किया, न स्टारडम के पीछे भागे। उन्होंने अपने आर्ट को समय दिया, निखारा और ईमानदारी से काम किया। उनकी यात्रा अचानक नहीं बनी थी। उन्होंने सालों तक छोटे रोल किए, संघर्ष किया, रिजेक्शन झेले और खुद को साबित किया। इसलिए सफलता सिर्फ ग्लैमर नहीं, बल्कि मेहनत और सच्चाई का परिणाम थी। चोट के बावजूद शूटिंग: पेनकिलर लेकर दौड़ते थे इरफान ‘पान सिंह तोमर’ की शूटिंग के दौरान एक दौर आया, जिसे रंजीता आज भी नहीं भूल पातीं। फिल्म के बीच में इरफान खान को एड़ी में गंभीर चोट लगी। आमतौर पर ऐसे हालात में शूटिंग रोक दी जाती है, लेकिन यहां कहानी अलग थी। रंजीता बताती हैं कि उन्होंने देखा कि इरफान लंगड़ाते हुए सेट पर आते थे। कई बार सहारे के लिए उनके हाथ में डंडा होता था। लेकिन कैमरा रोल होते ही वो दर्द छोड़कर किरदार में उतर जाते। सबसे चुनौतीपूर्ण यह था कि फिल्म के कई अहम सीन, जैसे रनिंग सीक्वेंस और एक्शन बाकी थे। इसके बावजूद उन्होंने शूटिंग नहीं रोकी। पेनकिलर लेकर सीन करते थे और दर्द बढ़ने पर थोड़ा ब्रेक लेकर लौट आते थे। रंजीता कहती हैं कि उन्होंने कभी नहीं कहा कि मैं नहीं कर पाऊंगा या बाद में करेंगे। उनकी प्रतिबद्धता टीम के लिए प्रेरणा बनी। यही समर्पण ‘पान सिंह तोमर’ को असली और असरदार बनाता है। छोटी-छोटी चीजों में खुशी ढूंढने वाला बड़ा कलाकार रंजीता कौर के लिए इरफान खान का एक पहलू खास था- उनका बच्चा-सा स्वभाव। वह बताती हैं कि इरफान जितने बड़े कलाकार थे, उतने ही सरल इंसान थे। सेट पर उनका व्यवहार स्टार जैसा नहीं लगता था। वो हर किसी से बात करते थे- चाहे टेक्नीशियन, लाइटमैन या जूनियर आर्टिस्ट। उनके अंदर सहजता थी, जो माहौल को हल्का और खुशनुमा बनाती थी। रंजीता याद करती हैं कि उनका सेंस ऑफ ह्यूमर प्यारा था। वो छोटी बातों में मजाक करते थे और सेट हंसी से भर जाता था। वो हर चीज में दिलचस्पी लेते थे- किताबें, बातचीत या छोटी घटनाएं। उनके लिए खुशी बड़ी चीजों में नहीं, बल्कि रोजमर्रा के पलों में थी। उनके साथ काम करना प्रोफेशनल अनुभव से बढ़कर भावनात्मक जुड़ाव था। किरदार में डूब जाने की कला: इरफान का अनोखा प्रोसेस रंजीता बताती हैं कि इरफान खान का एक्टिंग प्रोसेस बेहद इंटरनल था। वो इसे शब्दों में पूरी तरह नहीं समझा सकतीं, लेकिन उसे महसूस किया जा सकता था। उनके मुताबिक, इरफान किरदार की सच्चाई पकड़ते थे। जब तक उन्हें नहीं लगता था कि वो उसे समझ गए हैं, तब तक खुद को उसमें नहीं डालते थे। लेकिन उस स्तर तक पहुंचते ही किरदार उनका हिस्सा बन जाता था। रंजीता ने नोटिस किया कि शूट खत्म होने के बाद भी वो पूरी तरह किरदार से बाहर नहीं आते थे। बातचीत और चलते-फिरते भी वह लेयर बनी रहती थी। इसका असर उनके परफॉर्मेंस में दिखता था। वो एक्टिंग करते नहीं लगते थे। ऐसा लगता था कि वो वही इंसान हैं, जिसकी कहानी पर्दे पर दिखाई जा रही है। उनकी सबसे बड़ी ताकत सच्चाई से जुड़ना और उसे दर्शकों तक पहुंचाना थी। हर चीज जानने की बेचैन जिज्ञासा: इरफान का ‘लर्निंग मोड’ हमेशा ऑन था रंजीता कौर बताती हैं कि इरफान खान की खास बातों में एक उनकी असीम जिज्ञासा थी। वो सिर्फ किरदार तक सीमित नहीं रहते थे, बल्कि हर छोटी-बड़ी चीज को समझने की कोशिश करते थे। धौलपुर में शूटिंग के दौरान टीम को पास की एक दरगाह के बारे में पता चला। रंजीता वहां गईं और इरफान को बताया। जिक्र करते ही इरफान उत्सुक हो गए- “किसकी दरगाह है? वहां क्या खास है?” वो औपचारिक तौर पर नहीं सुनते थे, बल्कि दिलचस्पी से हर बात समझते थे। रंजीता ने तस्वीरें दिखाईं, तो वो ध्यान से देखते और सवाल पूछते रहे। किताबों को लेकर भी उनकी यही जिज्ञासा थी। एक बार बातचीत में उपन्यास के किरदार का जिक्र आया, तो इरफान उसके बारे में ऐसे बात करने लगे, जैसे उसे जी रहे हों। रंजीता के मुताबिक, इरफान के भीतर सीखने की भूख ही उन्हें बेहतर बनाती रही। यही वजह थी कि वो हर किरदार में नई गहराई जोड़ पाते थे। ‘मैं रिजेक्शन हैंडल नहीं करता’- इरफान का अलग नजरिया जब रंजीता ने इरफान खान से पूछा कि उन्होंने करियर में रिजेक्शन को कैसे संभाला, तो उनका जवाब था- “मैं रिजेक्शन हैंडल नहीं करता।” पहली नजर में यह जवाब चौंकाने वाला लगता है, लेकिन रंजीता के मुताबिक इसके पीछे गहरी सोच थी। इरफान का मतलब था कि वो रिजेक्शन को अपनी पहचान नहीं बनने देते थे। उन्होंने करियर में कई बार ठुकराए जाने का सामना किया, लेकिन उसे दिल पर हावी नहीं होने दिया। वो अपने काम में लगे रहे, सीखते रहे और आगे बढ़ते रहे। उनके लिए असफलता ठहराव नहीं, बल्कि प्रक्रिया का हिस्सा थी। वो उसे स्वीकार करते थे, लेकिन उसमें उलझते नहीं थे। रंजीता के मुताबिक, यही सोच उन्हें अलग बनाती थी। जहां कई लोग रिजेक्शन से टूट जाते हैं, वहीं इरफान उसे नजरअंदाज कर अपने रास्ते पर चलते रहते थे। बकरी के बच्चे के साथ खेलते इरफान: जिंदगी से बेइंतहा प्यार रंजीता कौर के पास इरफान खान से जुड़ा एक मासूम और खूबसूरत किस्सा है, जो उनके व्यक्तित्व का असली चेहरा दिखाता है। वो बताती हैं कि गांव में शूटिंग के दौरान उन्होंने देखा कि इरफान बकरी के बच्चे के साथ खेल रहे थे। यह पब्लिक मोमेंट नहीं था, न ही कैमरे के लिए था। यह पूरी तरह स्वाभाविक था। वो उस छोटे जानवर के साथ ऐसे जुड़ गए थे, जैसे बच्चा खेलता है। आसपास के बच्चों के साथ भी वो सहजता से घुल-मिल जाते थे। रंजीता कहती हैं कि यह देखकर उन्हें एहसास हुआ कि इरफान को जिंदगी से कितना प्यार था। वो किसी चीज को अनदेखा नहीं करते थे- चाहे इंसान, जानवर या छोटा पल हो। उनके लिए हर अनुभव मायने रखता था। इसलिए उनकी जिंदगी सिर्फ काम तक सीमित नहीं थी, बल्कि हर छोटी चीज में खुशी ढूंढने का नजरिया था। यही सादगी और संवेदनशीलता उन्हें बेहतरीन इंसान बनाती थी। ‘पान सिंह तोमर’ और इरफान का इकलौता नेशनल अवॉर्ड रंजीता बताती हैं कि लंबे समय तक उन्हें लगा कि इरफान खान को कई नेशनल अवॉर्ड मिले हैं। लेकिन बाद में पता चला कि उनका पहला और इकलौता नेशनल अवॉर्ड पान सिंह तोमर के लिए था। जब यह बात कन्फर्म हुई, तो एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। उनके अनुसार, यह एहसास दो भावनाएं लाया- एक तरफ गर्व कि इस फिल्म के लिए सम्मान मिला, और दूसरी तरफ अफसोस कि इतने बड़े कलाकार को और अवॉर्ड मिलने चाहिए थे। रंजीता मानती हैं कि इरफान का काम अवॉर्ड का मोहताज नहीं था, लेकिन यह चुभता है कि उनकी प्रतिभा को उतना सम्मान नहीं मिला, जितना मिलना चाहिए था। फिर भी, पान सिंह तोमर का यह सम्मान उनकी विरासत का अहम हिस्सा बन गया।
तिग्मांशु धूलिया के साथ गहरी दोस्ती और भरोसा रंजीता के मुताबिक, इरफान खान और तिग्मांशु धुलिया का रिश्ता सिर्फ डायरेक्टर-एक्टर का नहीं था। यह गहरी दोस्ती और समझ पर आधारित था। वो बताती हैं कि सेट पर दोनों के बीच खास तालमेल दिखता था। बिना ज्यादा शब्दों के वो एक-दूसरे को समझ जाते थे। काम और निजी पलों में भी उनका कनेक्शन साफ नजर आता था। कई बार लगता था कि दोनों एक ही सोच साझा करते हैं। यही वजह थी कि पान सिंह तोमर इतनी सच्चाई से बन पाई। रंजीता कहती हैं कि यह रिश्ता खास था। ऐसा कनेक्शन हर किसी के साथ नहीं बनता। यह सिर्फ प्रोफेशनल तालमेल नहीं, बल्कि गहरी दोस्ती की मिसाल था। हमेशा सीखते रहने का जज्बा: इरफान की असली विरासत रंजीता कौर अंत में कहती हैं कि इरफान खान की सबसे बड़ी विरासत उनकी सीखने की भूख है। वो खुद से सवाल करते थे, काम बेहतर करने की कोशिश करते थे और कभी संतुष्ट नहीं होते थे। उनके भीतर लर्निंग बटन हमेशा ऑन रहता था। यही बात उनकी फिल्मों में दिखती है। हर किरदार पिछले से अलग और गहरा होता था। रंजीता मानती हैं कि उनकी जिंदगी और काम एक ही सीख देता है- अगर किसी चीज को सच्चाई से मानते हैं, तो उसे ईमानदारी से करते रहें और हार न मानें। यही सोच पान सिंह तोमर की जर्नी और उनकी डॉक्यूमेंट्री में भी थी। इसे इरफान जी की पत्नी सुतापा जी ने देखी है, और यह उनके लिए खास इसलिए है क्योंकि उन्होंने इसे हाल ही में देखा। बाबिल और आयन ने अभी तक इसे नहीं देखा है, इसलिए उनके देखने का अभी इंतजार है। __________________________________________________________ बॉलीवुड की यह खबर भी पढ़ें.. दीपिका पादुकोण को हिट फिल्म के बाद भी ताने मिले:बोलने के तरीके का मजाक उड़ाया, डिप्रेशन का शिकार हुईं; नेटवर्थ ₹500 करोड़ से ज्यादा दीपिका पादुकोण ने 2007 में फिल्म ‘ओम शांति ओम’ से डेब्यू कर स्टारडम हासिल किया, लेकिन उन्हें आलोचना और तानों का सामना करना पड़ा। उनकी डायलॉग डिलीवरी और एक्सेंट का मजाक उड़ाया गया, जिससे वह मानसिक रूप से टूटने लगीं। करियर के पीक पर होने के बावजूद 2014 के आसपास वह डिप्रेशन का शिकार हुईं।पूरी खबर पढ़ें..

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आम लोगों के दिल में बसने वाले कलाकार रंजीता के अनुसार, इरफान खान की सबसे बड़ी खासियत यह थी कि उन्हें समझने के लिए सिनेमा एक्सपर्ट होना जरूरी नहीं था। वो ऐसे कलाकार थे, जिनकी छाप हर वर्ग पर पड़ती थी- चाहे गहराई से समझने वाला दर्शक हो या मनोरंजन के लिए फिल्म देखने वाला आम इंसान। वह कहती हैं कि घर-परिवार या आसपास के लोगों से पूछें, तो हर कोई कहेगा कि यह आदमी अलग था। यह अलगपन अभिनय से ज्यादा उनकी सच्चाई में था। इरफान ने दिखावा नहीं किया, न स्टारडम के पीछे भागे। उन्होंने अपने आर्ट को समय दिया, निखारा और ईमानदारी से काम किया। उनकी यात्रा अचानक नहीं बनी थी। उन्होंने सालों तक छोटे रोल किए, संघर्ष किया, रिजेक्शन झेले और खुद को साबित किया। इसलिए सफलता सिर्फ ग्लैमर नहीं, बल्कि मेहनत और सच्चाई का परिणाम थी। चोट के बावजूद शूटिंग: पेनकिलर लेकर दौड़ते थे इरफान ‘पान सिंह तोमर’ की शूटिंग के दौरान एक दौर आया, जिसे रंजीता आज भी नहीं भूल पातीं। फिल्म के बीच में इरफान खान को एड़ी में गंभीर चोट लगी। आमतौर पर ऐसे हालात में शूटिंग रोक दी जाती है, लेकिन यहां कहानी अलग थी। रंजीता बताती हैं कि उन्होंने देखा कि इरफान लंगड़ाते हुए सेट पर आते थे। कई बार सहारे के लिए उनके हाथ में डंडा होता था। लेकिन कैमरा रोल होते ही वो दर्द छोड़कर किरदार में उतर जाते। सबसे चुनौतीपूर्ण यह था कि फिल्म के कई अहम सीन, जैसे रनिंग सीक्वेंस और एक्शन बाकी थे। इसके बावजूद उन्होंने शूटिंग नहीं रोकी। पेनकिलर लेकर सीन करते थे और दर्द बढ़ने पर थोड़ा ब्रेक लेकर लौट आते थे। रंजीता कहती हैं कि उन्होंने कभी नहीं कहा कि मैं नहीं कर पाऊंगा या बाद में करेंगे। उनकी प्रतिबद्धता टीम के लिए प्रेरणा बनी। यही समर्पण ‘पान सिंह तोमर’ को असली और असरदार बनाता है। छोटी-छोटी चीजों में खुशी ढूंढने वाला बड़ा कलाकार रंजीता कौर के लिए इरफान खान का एक पहलू खास था- उनका बच्चा-सा स्वभाव। वह बताती हैं कि इरफान जितने बड़े कलाकार थे, उतने ही सरल इंसान थे। सेट पर उनका व्यवहार स्टार जैसा नहीं लगता था। वो हर किसी से बात करते थे- चाहे टेक्नीशियन, लाइटमैन या जूनियर आर्टिस्ट। उनके अंदर सहजता थी, जो माहौल को हल्का और खुशनुमा बनाती थी। रंजीता याद करती हैं कि उनका सेंस ऑफ ह्यूमर प्यारा था। वो छोटी बातों में मजाक करते थे और सेट हंसी से भर जाता था। वो हर चीज में दिलचस्पी लेते थे- किताबें, बातचीत या छोटी घटनाएं। उनके लिए खुशी बड़ी चीजों में नहीं, बल्कि रोजमर्रा के पलों में थी। उनके साथ काम करना प्रोफेशनल अनुभव से बढ़कर भावनात्मक जुड़ाव था। किरदार में डूब जाने की कला: इरफान का अनोखा प्रोसेस रंजीता बताती हैं कि इरफान खान का एक्टिंग प्रोसेस बेहद इंटरनल था। वो इसे शब्दों में पूरी तरह नहीं समझा सकतीं, लेकिन उसे महसूस किया जा सकता था। उनके मुताबिक, इरफान किरदार की सच्चाई पकड़ते थे। जब तक उन्हें नहीं लगता था कि वो उसे समझ गए हैं, तब तक खुद को उसमें नहीं डालते थे। लेकिन उस स्तर तक पहुंचते ही किरदार उनका हिस्सा बन जाता था। रंजीता ने नोटिस किया कि शूट खत्म होने के बाद भी वो पूरी तरह किरदार से बाहर नहीं आते थे। बातचीत और चलते-फिरते भी वह लेयर बनी रहती थी। इसका असर उनके परफॉर्मेंस में दिखता था। वो एक्टिंग करते नहीं लगते थे। ऐसा लगता था कि वो वही इंसान हैं, जिसकी कहानी पर्दे पर दिखाई जा रही है। उनकी सबसे बड़ी ताकत सच्चाई से जुड़ना और उसे दर्शकों तक पहुंचाना थी। हर चीज जानने की बेचैन जिज्ञासा: इरफान का ‘लर्निंग मोड’ हमेशा ऑन था रंजीता कौर बताती हैं कि इरफान खान की खास बातों में एक उनकी असीम जिज्ञासा थी। वो सिर्फ किरदार तक सीमित नहीं रहते थे, बल्कि हर छोटी-बड़ी चीज को समझने की कोशिश करते थे। धौलपुर में शूटिंग के दौरान टीम को पास की एक दरगाह के बारे में पता चला। रंजीता वहां गईं और इरफान को बताया। जिक्र करते ही इरफान उत्सुक हो गए- “किसकी दरगाह है? वहां क्या खास है?” वो औपचारिक तौर पर नहीं सुनते थे, बल्कि दिलचस्पी से हर बात समझते थे। रंजीता ने तस्वीरें दिखाईं, तो वो ध्यान से देखते और सवाल पूछते रहे। किताबों को लेकर भी उनकी यही जिज्ञासा थी। एक बार बातचीत में उपन्यास के किरदार का जिक्र आया, तो इरफान उसके बारे में ऐसे बात करने लगे, जैसे उसे जी रहे हों। रंजीता के मुताबिक, इरफान के भीतर सीखने की भूख ही उन्हें बेहतर बनाती रही। यही वजह थी कि वो हर किरदार में नई गहराई जोड़ पाते थे। ‘मैं रिजेक्शन हैंडल नहीं करता’- इरफान का अलग नजरिया जब रंजीता ने इरफान खान से पूछा कि उन्होंने करियर में रिजेक्शन को कैसे संभाला, तो उनका जवाब था- “मैं रिजेक्शन हैंडल नहीं करता।” पहली नजर में यह जवाब चौंकाने वाला लगता है, लेकिन रंजीता के मुताबिक इसके पीछे गहरी सोच थी। इरफान का मतलब था कि वो रिजेक्शन को अपनी पहचान नहीं बनने देते थे। उन्होंने करियर में कई बार ठुकराए जाने का सामना किया, लेकिन उसे दिल पर हावी नहीं होने दिया। वो अपने काम में लगे रहे, सीखते रहे और आगे बढ़ते रहे। उनके लिए असफलता ठहराव नहीं, बल्कि प्रक्रिया का हिस्सा थी। वो उसे स्वीकार करते थे, लेकिन उसमें उलझते नहीं थे। रंजीता के मुताबिक, यही सोच उन्हें अलग बनाती थी। जहां कई लोग रिजेक्शन से टूट जाते हैं, वहीं इरफान उसे नजरअंदाज कर अपने रास्ते पर चलते रहते थे। बकरी के बच्चे के साथ खेलते इरफान: जिंदगी से बेइंतहा प्यार रंजीता कौर के पास इरफान खान से जुड़ा एक मासूम और खूबसूरत किस्सा है, जो उनके व्यक्तित्व का असली चेहरा दिखाता है। वो बताती हैं कि गांव में शूटिंग के दौरान उन्होंने देखा कि इरफान बकरी के बच्चे के साथ खेल रहे थे। यह पब्लिक मोमेंट नहीं था, न ही कैमरे के लिए था। यह पूरी तरह स्वाभाविक था। वो उस छोटे जानवर के साथ ऐसे जुड़ गए थे, जैसे बच्चा खेलता है। आसपास के बच्चों के साथ भी वो सहजता से घुल-मिल जाते थे। रंजीता कहती हैं कि यह देखकर उन्हें एहसास हुआ कि इरफान को जिंदगी से कितना प्यार था। वो किसी चीज को अनदेखा नहीं करते थे- चाहे इंसान, जानवर या छोटा पल हो। उनके लिए हर अनुभव मायने रखता था। इसलिए उनकी जिंदगी सिर्फ काम तक सीमित नहीं थी, बल्कि हर छोटी चीज में खुशी ढूंढने का नजरिया था। यही सादगी और संवेदनशीलता उन्हें बेहतरीन इंसान बनाती थी। ‘पान सिंह तोमर’ और इरफान का इकलौता नेशनल अवॉर्ड रंजीता बताती हैं कि लंबे समय तक उन्हें लगा कि इरफान खान को कई नेशनल अवॉर्ड मिले हैं। लेकिन बाद में पता चला कि उनका पहला और इकलौता नेशनल अवॉर्ड पान सिंह तोमर के लिए था। जब यह बात कन्फर्म हुई, तो एक पल के लिए सन्नाटा छा गया। उनके अनुसार, यह एहसास दो भावनाएं लाया- एक तरफ गर्व कि इस फिल्म के लिए सम्मान मिला, और दूसरी तरफ अफसोस कि इतने बड़े कलाकार को और अवॉर्ड मिलने चाहिए थे। रंजीता मानती हैं कि इरफान का काम अवॉर्ड का मोहताज नहीं था, लेकिन यह चुभता है कि उनकी प्रतिभा को उतना सम्मान नहीं मिला, जितना मिलना चाहिए था। फिर भी, पान सिंह तोमर का यह सम्मान उनकी विरासत का अहम हिस्सा बन गया।
तिग्मांशु धूलिया के साथ गहरी दोस्ती और भरोसा रंजीता के मुताबिक, इरफान खान और तिग्मांशु धुलिया का रिश्ता सिर्फ डायरेक्टर-एक्टर का नहीं था। यह गहरी दोस्ती और समझ पर आधारित था। वो बताती हैं कि सेट पर दोनों के बीच खास तालमेल दिखता था। बिना ज्यादा शब्दों के वो एक-दूसरे को समझ जाते थे। काम और निजी पलों में भी उनका कनेक्शन साफ नजर आता था। कई बार लगता था कि दोनों एक ही सोच साझा करते हैं। यही वजह थी कि पान सिंह तोमर इतनी सच्चाई से बन पाई। रंजीता कहती हैं कि यह रिश्ता खास था। ऐसा कनेक्शन हर किसी के साथ नहीं बनता। यह सिर्फ प्रोफेशनल तालमेल नहीं, बल्कि गहरी दोस्ती की मिसाल था। हमेशा सीखते रहने का जज्बा: इरफान की असली विरासत रंजीता कौर अंत में कहती हैं कि इरफान खान की सबसे बड़ी विरासत उनकी सीखने की भूख है। वो खुद से सवाल करते थे, काम बेहतर करने की कोशिश करते थे और कभी संतुष्ट नहीं होते थे। उनके भीतर लर्निंग बटन हमेशा ऑन रहता था। यही बात उनकी फिल्मों में दिखती है। हर किरदार पिछले से अलग और गहरा होता था। रंजीता मानती हैं कि उनकी जिंदगी और काम एक ही सीख देता है- अगर किसी चीज को सच्चाई से मानते हैं, तो उसे ईमानदारी से करते रहें और हार न मानें। यही सोच पान सिंह तोमर की जर्नी और उनकी डॉक्यूमेंट्री में भी थी। इसे इरफान जी की पत्नी सुतापा जी ने देखी है, और यह उनके लिए खास इसलिए है क्योंकि उन्होंने इसे हाल ही में देखा। बाबिल और आयन ने अभी तक इसे नहीं देखा है, इसलिए उनके देखने का अभी इंतजार है। __________________________________________________________ बॉलीवुड की यह खबर भी पढ़ें.. दीपिका पादुकोण को हिट फिल्म के बाद भी ताने मिले:बोलने के तरीके का मजाक उड़ाया, डिप्रेशन का शिकार हुईं; नेटवर्थ ₹500 करोड़ से ज्यादा दीपिका पादुकोण ने 2007 में फिल्म ‘ओम शांति ओम’ से डेब्यू कर स्टारडम हासिल किया, लेकिन उन्हें आलोचना और तानों का सामना करना पड़ा। उनकी डायलॉग डिलीवरी और एक्सेंट का मजाक उड़ाया गया, जिससे वह मानसिक रूप से टूटने लगीं। करियर के पीक पर होने के बावजूद 2014 के आसपास वह डिप्रेशन का शिकार हुईं।पूरी खबर पढ़ें..

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