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CITU Demands Noida Protest Workers Release

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9 मिनट पहले

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आज ‘इंटरनेशनल लेबर डे’ है। एक ओर दुनिया इस दिन को मजदूरों के योगदान और उनके अधिकारों को बढ़ावा देने के रूप में मना रही है, तो वहीं दूसरी तस्वीर अपने हक के लिए प्रदर्शन करते भारतीय मजदूरों की है, जिनके हिस्से आपराधिक मुकदमे और जेल की चारदीवारी आई। ये मजदूर नोएडा प्रोटेस्ट में अपने हक की मांग करते प्रदर्शनकारी हैं।

नोएडा के गौतम बुद्ध नगर में फैक्ट्री वर्कर्स प्रोटेस्ट के बाद अब 1 मई को ‘लेबर डे’ के अवसर पर पहले से ही सिक्योरिटी टाइट कर दी गई है। बड़ी कंपनियों के बाहर पुलिस बल तैनात किया गया है। पुलिस के मुताबिक लॉ एंड ऑर्डर बनाए रखने के लिए ड्रोन कैमरे से इंडस्ट्रियल इलाकों में निगरानी भी की जा रही है।

नोएडा में सैलरी बढ़ाने की मांग को लेकर प्रोटेस्ट हुए थे

नोएडा में 9 अप्रैल से फैक्ट्री वर्कर्स ने सैलरी बढ़ाने और बेहतर वर्किंग कंडिशन जैसी मांगों को लेकर प्रोटेस्ट किया था। 13 अप्रैल को प्रदर्शन हिंसक हो गया था। भीड़ पर काबू पाने के लिए पुलिस बल ने लाठीचार्ज किया था।

कुछ मजदूरों पर FIR दर्ज कर कई प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया गया था। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, पुलिस ने लगभग 350 प्रोटेस्टर्स को जेल में डाला था।

सरकार और पुलिस की इस कार्रवाई के खिलाफ 27 अप्रैल को दिल्ली की सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन यानी CITU ने इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन (ILO) को लिखित शिकायत भेजी है।

नाबालिग समेत 1100 से ज्यादा मजदूर हिरासत में

यूनियन नेताओं का कहना है कि जब हड़ताल शुरू हुई थी, तब उत्तर प्रदेश में अनस्किल्ड लेबर्स की न्यूनतम मजदूरी सिर्फ 11,314 रुपए थी। उनका कहना है कि दिल्ली-NCR जैसे महंगे इलाके में मजदूरों से इतनी कम कमाई में गुजारा करने की उम्मीद की जा रही है, जिसमें बुनियादी जरूरतें भी पूरी नहीं होतीं।

पिछले दस साल में यहां रहने का खर्च कई गुना बढ़ चुका है, लेकिन वर्कर्स के लिए मिनिमम वेज उसके मुताबिक नहीं बढ़ा है।

शिकायत में यह भी कहा गया है कि करीब 350 नाबालिग और 800 वयस्कों को कासना (गाजियाबाद) में हिरासत में रखा गया है।

पुलिस और सरकार की ज्यादती की स्वतंत्र जांच की मांग

इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन (ILO) को लिखित शिकायत में CITU ने नोएडा में वर्कर्स के मौलिक अधिकारों से वंचित रखने और ट्रेड यूनियन के अधिकारों के उल्लंघन की बात कही है। साथ ही नोएडा के प्रदर्शनकारियों की रिहाई और पुलिस और सरकार की ज्यादती पर स्वतंत्र जांच बैठाने की मांग की।

कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया CPI(M) से जुड़े इस ट्रेड यूनियन ने ILO की ‘कमेटी ऑन फ्रीडम ऑफ एसोसिएशन’ (CFA) को भेजे अपने पिटीशन में वर्कर्स और यूनियन अधिकारों के बहुत गंभीर, बड़े स्तर पर और सिस्टमैटिक उल्लंघन की बात उठाई है।

CITU- ‘वर्कर्स को शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने का हक’

CITU का कहना है कि वर्कर्स के पास न तो संघ से जुड़ने की आजादी है, न संगठित होने का अधिकार है, न कलेक्टिव बार्गेन और न ही वो शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन करने का हक रखते हैं।

साथ ही CITU ने केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार पर ILO के मौलिक सिद्धांतों के उल्लंघन का भी आरोप लगाया है।

CITU ने ILO को सौंपे पिटीशन में नोएडा–प्रोटेस्ट से जुड़ी 3 मुख्य मांगें उठाई हैं:

  • यूनियन ने प्रोटेस्ट के दौरान गिरफ्तार हुए प्रदर्शनकारियों को तुरंत जेल से रिहा करने और उन पर लगे आपराधिक मामलों की वापसी की मांग की है।
  • CITU ने पुलिस के वर्कर्स पर किए गए अतिक्रमणों (पुलिस एक्सेसेस) की पारदर्शी जांच के लिए एक स्वतंत्र न्यायिक जांच की मांग की है।
  • CITU ने ट्रेड यूनियन के जरिए सामूहिक बातचीत यानी क्लेक्टिव बार्गेन सिस्टम को वापस रिस्टोर करने की मांग उठाई है।
  • कंपनी और वर्कर के बीच बातचीत और सैलरी/वर्किंग कंडीशन तय करने को लेकर यूनियन के पास बार्गेन का ऑप्शन यानी अपनी मजदूरी तय करने का हक होना चाहिए, न कि ये सिर्फ एक तरफा हो।

‘ILO के फंडामेंटल प्रिंसिपल्स को अपनाए भारत’

पिटीशन में CITU ने ILO से गुजारिश की है कि वे देखें कि भारत ILO कन्वेंशन नंबर 98 और फंडामेंटल प्रिंसिपल्स पर ILO की घोषणा को अपनाए और उसका पालन करे।

ILO कन्वेंशन 98 सामूहिक सौदेबाजी यानी कलेक्टिव बार्गेनिंग के सिस्टम के बेसिक प्रिंसिपल्स तय करता है। इसका मतलब ऐसे सिस्टम से है जहां वर्कर्स, एंप्लॉयर्स और सरकारें, सैलरी, काम के घंटे और काम की शर्तों पर एक साथ बात कर सकें।

ILO के 10 मुख्य कन्वेंशन यानी बुनियादी मानवाधिकारों से जुड़े नियम

ILO ने वर्कर्स के अधिकारों की रक्षा के लिए कुछ अहम कन्वेंशन बनाए हैं। इनमें से कुछ को तो भारत ने मान लिया है, लेकिन कुछ को अभी तक नहीं अपनाया है।

भारत ने जिन कन्वेंशन को अपनाया है उनमें:

1. जबरन मजदूरी न कराना (Forced Labour Convention, No. 29)

2. जबरन मजदूरी को पूरी तरह खत्म करना (Abolition of Forced Labour, No. 105)

3. समान काम के लिए समान वेतन (Equal Remuneration, No. 100)

4. नौकरी में भेदभाव न हो (Discrimination Convention, No. 111)

5. बच्चों के काम करने की न्यूनतम उम्र तय करना (Minimum Age, No. 138)

6. बाल मजदूरी खत्म करना (Worst Forms of Child Labour, No. 182)

भारत ने अभी तक जिन कन्वेंशन को नहीं अपनाया है:

7. मजदूरों को यूनियन बनाने की आजादी (Freedom of Association, No. 87)

8. संगठन बनाने और सामूहिक बातचीत का अधिकार (Right to Organise & Collective Bargaining, No. 98)

9. काम की जगह पर सुरक्षा और स्वास्थ्य का अधिकार (Occupational Safety and Health 1981, No. 155)

10. काम की सुरक्षा और स्वास्थ्य को बढ़ावा देने का ढांचा (Promotional Framework for Occupational Safety and Health 2006, No. 187)

ILO वर्कर्स के अधिकारों की रक्षा के लिए

इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन (ILO) संयुक्त राष्ट्र (UN) की एजेंसी है, जो वर्कर्स के हक, सैलरी, उनकी सुरक्षा और काम की शर्तों पर नजर रखती है।

ILO की 7 प्रमुख जिम्मेदारियां:

1. इंटरनेशनल श्रम नियम बनाना और देखना कि देश उन्हें मान रहे हैं या नहीं

  • ILO हर साल इंटरनेशनल लेबर कन्वेंशन में रिकमेंडेशन बनाता है: जैसे संगठित होने की आजादी, कलेक्टिव बार्गेन, बाल मजदूरी पर बैन।
  • ILO ये चेक भी करता है कि उस देश ने अपने राष्ट्रीय कानून में इन बातों को लागू किया या नहीं, और हर साल देशों से रिपोर्ट लेकर उन पर नजर रखता है।

2. सरकारों को लेबर-पॉलिसी और प्रोग्राम बनाने में मदद करना

  • ILO देशों को टेक्निकल और फाइनेंशियल सपोर्ट देता है: जैसे रोजगार बढ़ाना, स्किल डेवलपमेंट, लेबर-सेफ्टी।
  • यही वजह है कि विकासशील देशों में ILO के नाम से कई प्रोजेक्ट और ट्रेनिंग‑प्रोग्राम चलते हैं, जो सीधे कामगरों या छोटे‑उद्योगों पर असर डालते हैं।

3. लेबर राइट्स के उल्लंघन की शिकायतें सुनना और जांच करना

  • अगर किसी देश में लेबर्स/वर्कर्स के अधिकारों का उल्लंघन हो रहा हो, तो ट्रेड यूनियन या एंप्लॉयर भी ILO के पास शिकायत भेज सकते हैं, जैसा कि CITU ने नोएडा मामले में किया है।
  • ILO इन शिकायतों को फ्रीडम ऑफ एसोसिएशन (CFA) जैसी समितियों के सामने रखता है, जो गंभीरता से जांच करती हैं और फिर सरकार को चेतावनी या सुझाव देती हैं।

4. सीधे सजा नहीं देती, लेकिन दबाव बनाती है

  • ILO किसी देश को जबर्दस्ती सजा नहीं दे सकता, लेकिन उसकी नीति को नोट में रखकर रिपोर्ट जारी कर सकता है, जिससे इंटरनेशनल मीडिया के जरिए राजनैतिक दबाव बन सकता है।

5. मजदूरों के मौलिक अधिकार को मानवाधिकार समान बनाना

ILO ने जो कोर लेबर स्टैंडर्ड्स बनाए हैं, उनमें ये जरूरी बातें शामिल हैं:

  • यूनियन बनाने या फ्री एसोसिएशन की आजादी
  • कलेक्टिव बार्गेन का अधिकार
  • जाति, धर्म, लिंग या राजनैतिक राय पर भेदभाव न करना,
  • बंधुआ, जबरन या गुलामी जैसी स्थितियां खत्म करना, और
  • चाइल्ड लेबर पर सख्त पाबंदी।

स्टोरी- सोनाली राय ————————–

ये खबर भी पढ़ें…

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नोएडा के गौतम बुद्ध नगर में फैक्ट्री वर्कर्स प्रोटेस्ट के बाद अब 1 मई को ‘लेबर डे’ के अवसर पर पहले से ही सिक्योरिटी टाइट कर दी गई है। बड़ी कंपनियों के बाहर पुलिस बल तैनात किया गया है। पुलिस के मुताबिक लॉ एंड ऑर्डर बनाए रखने के लिए ड्रोन कैमरे से इंडस्ट्रियल इलाकों में निगरानी भी की जा रही है।

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सरकार और पुलिस की इस कार्रवाई के खिलाफ 27 अप्रैल को दिल्ली की सेंटर ऑफ इंडियन ट्रेड यूनियन यानी CITU ने इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन (ILO) को लिखित शिकायत भेजी है।

नाबालिग समेत 1100 से ज्यादा मजदूर हिरासत में

यूनियन नेताओं का कहना है कि जब हड़ताल शुरू हुई थी, तब उत्तर प्रदेश में अनस्किल्ड लेबर्स की न्यूनतम मजदूरी सिर्फ 11,314 रुपए थी। उनका कहना है कि दिल्ली-NCR जैसे महंगे इलाके में मजदूरों से इतनी कम कमाई में गुजारा करने की उम्मीद की जा रही है, जिसमें बुनियादी जरूरतें भी पूरी नहीं होतीं।

पिछले दस साल में यहां रहने का खर्च कई गुना बढ़ चुका है, लेकिन वर्कर्स के लिए मिनिमम वेज उसके मुताबिक नहीं बढ़ा है।

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पुलिस और सरकार की ज्यादती की स्वतंत्र जांच की मांग

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कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया CPI(M) से जुड़े इस ट्रेड यूनियन ने ILO की ‘कमेटी ऑन फ्रीडम ऑफ एसोसिएशन’ (CFA) को भेजे अपने पिटीशन में वर्कर्स और यूनियन अधिकारों के बहुत गंभीर, बड़े स्तर पर और सिस्टमैटिक उल्लंघन की बात उठाई है।

CITU- ‘वर्कर्स को शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन करने का हक’

CITU का कहना है कि वर्कर्स के पास न तो संघ से जुड़ने की आजादी है, न संगठित होने का अधिकार है, न कलेक्टिव बार्गेन और न ही वो शांतिपूर्ण तरीके से विरोध प्रदर्शन करने का हक रखते हैं।

साथ ही CITU ने केंद्र और उत्तर प्रदेश सरकार पर ILO के मौलिक सिद्धांतों के उल्लंघन का भी आरोप लगाया है।

CITU ने ILO को सौंपे पिटीशन में नोएडा–प्रोटेस्ट से जुड़ी 3 मुख्य मांगें उठाई हैं:

  • यूनियन ने प्रोटेस्ट के दौरान गिरफ्तार हुए प्रदर्शनकारियों को तुरंत जेल से रिहा करने और उन पर लगे आपराधिक मामलों की वापसी की मांग की है।
  • CITU ने पुलिस के वर्कर्स पर किए गए अतिक्रमणों (पुलिस एक्सेसेस) की पारदर्शी जांच के लिए एक स्वतंत्र न्यायिक जांच की मांग की है।
  • CITU ने ट्रेड यूनियन के जरिए सामूहिक बातचीत यानी क्लेक्टिव बार्गेन सिस्टम को वापस रिस्टोर करने की मांग उठाई है।
  • कंपनी और वर्कर के बीच बातचीत और सैलरी/वर्किंग कंडीशन तय करने को लेकर यूनियन के पास बार्गेन का ऑप्शन यानी अपनी मजदूरी तय करने का हक होना चाहिए, न कि ये सिर्फ एक तरफा हो।

‘ILO के फंडामेंटल प्रिंसिपल्स को अपनाए भारत’

पिटीशन में CITU ने ILO से गुजारिश की है कि वे देखें कि भारत ILO कन्वेंशन नंबर 98 और फंडामेंटल प्रिंसिपल्स पर ILO की घोषणा को अपनाए और उसका पालन करे।

ILO कन्वेंशन 98 सामूहिक सौदेबाजी यानी कलेक्टिव बार्गेनिंग के सिस्टम के बेसिक प्रिंसिपल्स तय करता है। इसका मतलब ऐसे सिस्टम से है जहां वर्कर्स, एंप्लॉयर्स और सरकारें, सैलरी, काम के घंटे और काम की शर्तों पर एक साथ बात कर सकें।

ILO के 10 मुख्य कन्वेंशन यानी बुनियादी मानवाधिकारों से जुड़े नियम

ILO ने वर्कर्स के अधिकारों की रक्षा के लिए कुछ अहम कन्वेंशन बनाए हैं। इनमें से कुछ को तो भारत ने मान लिया है, लेकिन कुछ को अभी तक नहीं अपनाया है।

भारत ने जिन कन्वेंशन को अपनाया है उनमें:

1. जबरन मजदूरी न कराना (Forced Labour Convention, No. 29)

2. जबरन मजदूरी को पूरी तरह खत्म करना (Abolition of Forced Labour, No. 105)

3. समान काम के लिए समान वेतन (Equal Remuneration, No. 100)

4. नौकरी में भेदभाव न हो (Discrimination Convention, No. 111)

5. बच्चों के काम करने की न्यूनतम उम्र तय करना (Minimum Age, No. 138)

6. बाल मजदूरी खत्म करना (Worst Forms of Child Labour, No. 182)

भारत ने अभी तक जिन कन्वेंशन को नहीं अपनाया है:

7. मजदूरों को यूनियन बनाने की आजादी (Freedom of Association, No. 87)

8. संगठन बनाने और सामूहिक बातचीत का अधिकार (Right to Organise & Collective Bargaining, No. 98)

9. काम की जगह पर सुरक्षा और स्वास्थ्य का अधिकार (Occupational Safety and Health 1981, No. 155)

10. काम की सुरक्षा और स्वास्थ्य को बढ़ावा देने का ढांचा (Promotional Framework for Occupational Safety and Health 2006, No. 187)

ILO वर्कर्स के अधिकारों की रक्षा के लिए

इंटरनेशनल लेबर ऑर्गेनाइजेशन (ILO) संयुक्त राष्ट्र (UN) की एजेंसी है, जो वर्कर्स के हक, सैलरी, उनकी सुरक्षा और काम की शर्तों पर नजर रखती है।

ILO की 7 प्रमुख जिम्मेदारियां:

1. इंटरनेशनल श्रम नियम बनाना और देखना कि देश उन्हें मान रहे हैं या नहीं

  • ILO हर साल इंटरनेशनल लेबर कन्वेंशन में रिकमेंडेशन बनाता है: जैसे संगठित होने की आजादी, कलेक्टिव बार्गेन, बाल मजदूरी पर बैन।
  • ILO ये चेक भी करता है कि उस देश ने अपने राष्ट्रीय कानून में इन बातों को लागू किया या नहीं, और हर साल देशों से रिपोर्ट लेकर उन पर नजर रखता है।

2. सरकारों को लेबर-पॉलिसी और प्रोग्राम बनाने में मदद करना

  • ILO देशों को टेक्निकल और फाइनेंशियल सपोर्ट देता है: जैसे रोजगार बढ़ाना, स्किल डेवलपमेंट, लेबर-सेफ्टी।
  • यही वजह है कि विकासशील देशों में ILO के नाम से कई प्रोजेक्ट और ट्रेनिंग‑प्रोग्राम चलते हैं, जो सीधे कामगरों या छोटे‑उद्योगों पर असर डालते हैं।

3. लेबर राइट्स के उल्लंघन की शिकायतें सुनना और जांच करना

  • अगर किसी देश में लेबर्स/वर्कर्स के अधिकारों का उल्लंघन हो रहा हो, तो ट्रेड यूनियन या एंप्लॉयर भी ILO के पास शिकायत भेज सकते हैं, जैसा कि CITU ने नोएडा मामले में किया है।
  • ILO इन शिकायतों को फ्रीडम ऑफ एसोसिएशन (CFA) जैसी समितियों के सामने रखता है, जो गंभीरता से जांच करती हैं और फिर सरकार को चेतावनी या सुझाव देती हैं।

4. सीधे सजा नहीं देती, लेकिन दबाव बनाती है

  • ILO किसी देश को जबर्दस्ती सजा नहीं दे सकता, लेकिन उसकी नीति को नोट में रखकर रिपोर्ट जारी कर सकता है, जिससे इंटरनेशनल मीडिया के जरिए राजनैतिक दबाव बन सकता है।

5. मजदूरों के मौलिक अधिकार को मानवाधिकार समान बनाना

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  • यूनियन बनाने या फ्री एसोसिएशन की आजादी
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  • जाति, धर्म, लिंग या राजनैतिक राय पर भेदभाव न करना,
  • बंधुआ, जबरन या गुलामी जैसी स्थितियां खत्म करना, और
  • चाइल्ड लेबर पर सख्त पाबंदी।

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