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Left Govt Ends, Congress Returns

Left Govt Ends, Congress Returns

23 मिनट पहलेलेखक: ऐश्वर्य राज

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केरलम विधानसभा चुनाव में पिनराई विजयन की अगुवाई वाले लेफ्ट एलायंस LDF को हार का सामना करना पड़ा है। कांग्रेस की अगुवाई वाली UDF ने 140 में से 90 से ज्यादा सीटें जीतकर 10 साल बाद सत्ता में वापसी कर ली है।

केरलम में इस हार के बाद 49 साल में यह पहली होने जा रहा है जब देश के किसी भी राज्य में लेफ्ट की सरकार नहीं है। जानते हैं देश में वामपंथ के विस्तार, जीत और हार से जुड़ी प्रमुख बातें… इससे पहले जानिए लेफ्ट यानी कम्युनिस्ट विचारधारा के बारे में।

1947 में मिली आजादी को मानने से इंकार किया

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) ने 1947 में भारत को मिली आजादी को असली आजादी मानने से इंकार कर दिया था। उस वक्त पार्टी का कहना था कि यह आजादी अधूरी और समझौतों का परिणाम है, जिसे उन्होंने ‘झूठी आजादी’ का नाम दिया। इस हकीकत को पूरी तरह स्वीकार करने में पार्टी को 5 साल से ज्यादा का समय लग गया।

मार्च 1948 में पार्टी के भीतर एक बड़ा बदलाव हुआ। पीसी. जोशी की जगह बीटी. रणदिवे (BTR) नए जनरल सेक्रेटरी बने। उनके आते ही पार्टी में ‘रणदिवे लाइन’ लागू हुई, जो बेहद कट्टर और आक्रामक थी। इसी सोच के तहत जनवरी 1950 में संविधान लागू होने से पहले ही CPI ने इसका विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि कांग्रेस के नेता भारतीय जनता पर ‘गुलामी का संविधान’ थोप रहे हैं।

लेफ्ट पार्टी ने नेहरू सरकार को हिंसक तरीके से उखाड़ फेंकने का आह्वान किया। 1948 और 1949 के दौरान यह नीति पूरी तरह विफल रही। इसके बाद मई-जून 1950 में बीटी. रणदिवे को पद से हटा दिया गया।

पार्टी की सेंट्रल कमेटी ने यह स्वीकार किया कि बिना सोचे-समझे 9 मार्च 1949 को देशव्यापी हड़ताल और विद्रोह का जो आह्वान किया गया था, वह बड़ी भूल थी। करीब 6 साल के बाद CPI अपनी कट्टर विचारधारा छोड़कर देश की आजादी की सच्चाई स्वीकार करने के लिए मजबूर हुई।

दुनिया की पहली चुनी हुई लोकतांत्रिक लेफ्ट सरकार

5 अप्रैल 1957, केरल के पहले सीएम के रूप में शपथ लेते हुए ईएमएस नंबूदरीपाद।

5 अप्रैल 1957, केरल के पहले सीएम के रूप में शपथ लेते हुए ईएमएस नंबूदरीपाद।

1956 में त्रावणकोर, कोचीन और मालाबार को मिलाकर एक नया राज्य केरलम बना। मार्च 1957 में यहां पहली बार विधानसभा चुनाव हुए। 126 सीटों वालीं विधानसभा में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया यानी CPI को 60 सीट मिलीं। 5 निर्दलीय को मिलाकर उसने सरकार बना ली। ये दुनिया में लेफ्ट की पहली चुनी हुई सरकार थी।

ईएमएस नंबूदरीपाद ने मुख्यमंत्री बनने के एक हफ्ते बाद ही दो बड़े कानून लागू किए। पहला- भूमि सुधार कानून और दूसरा- शिक्षा में सुधार को लेकर। भूमि सुधार कानून के बाद बटाईदार किसानों को जमीन खरीदने की छूट मिल गई। लैंडहोल्डिंग की लिमिट तय हो गई। वहीं, एजुकेशन बिल के जरिए प्राइवेट संस्थानों को रेगुलेट करने के लिए सख्त नियम बना दिए।

2 फरवरी 1959 को इंदिरा गांधी कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष बनीं। इसके बाद वो केरलम गईं। वहां से लौटने के बाद उन्होंने अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री नेहरू को सौंप दी। 31 जुलाई 1959 को केरलम सरकार बर्खास्त कर दी गई।

गांधी की तस्वीरें हटाईं, माओ–स्टालिन की लगाईं

इसी बीच केरलम के स्कूल-कॉलेजों से गांधी की तस्वीर हटाकर माओ और स्टालिन की तस्वीर लगाई जाने लगीं। कहा जाने लगा कि नंबूदरीपाद की सरकार बनाने के लिए कम्युनिस्ट देशों ने फंड भेजे हैं।

इसके विरोध में केरलम के गांधी कहे जाने वाले मन्नथ पिल्लई की अगुआई में लाखों लोग सड़कों पर उतर गए। हजारों लोग जेल में डाल दिए गए। आंदोलन को दबाने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज किया। इसमें मछुआरे कम्युनिटी की एक प्रेग्नेंट महिला की जान चली गई। आंदोलन और भड़क उठा। जगह-जगह हिंसा होने लगीं।

चीन युद्ध पर सरकार से अलग रुख के कारण दूसरा बड़ा विभाजन

1962 के भारत–चीन युद्ध ने CPI के भीतर वैचारिक दरार बढ़ा दिया। पार्टी का एक धड़ा नेहरू सरकार के समर्थन में था। दूसरा धड़ा चीन को आक्रमणकारी मानने को तैयार नहीं था। ‘राष्ट्रवाद बनाम अंतरराष्ट्रीय साम्यवाद’ की इस बहस के बीच, चीन समर्थक माने जाने वाले नेताओं को जेल में डाल दिया गया। इसी तनाव ने पार्टी के आधार को हिला दिया और कम्युनिस्ट आंदोलन दो फाड़ हो गया।

युद्ध के दो साल बाद, 1964 में मतभेद इतने बढ़ गए कि कम्युनिस्ट पार्टी आधिकारिक रूप से विभाजित हो गई। सोवियत संघ की नरम नीति के समर्थक CPI में रहे, जबकि क्रांतिकारी रुख अपनाने वाले नेताओं ने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPI-M) का गठन किया।

साल 1964, CPI (M) की स्थापना के दौरान बाएं से दूसरे नंबर पर ज्योति बसु (पश्चिम बंगाल के पूर्व सीएम) और दूसरी पंक्ति में बाएं से तीसरे नंबर पर केरल के पहले सीएम ईएमएस नंबूदिरीपाद।

साल 1964, CPI (M) की स्थापना के दौरान बाएं से दूसरे नंबर पर ज्योति बसु (पश्चिम बंगाल के पूर्व सीएम) और दूसरी पंक्ति में बाएं से तीसरे नंबर पर केरल के पहले सीएम ईएमएस नंबूदिरीपाद।

बंगाल में 1967 में लेफ्ट

पश्चिम बंगाल में पहली बार लेफ्ट ने 1967 में ‘यूनाइटेड फ्रंट’ गठबंधन के जरिए सरकार में आई। उस समय अजय मुखर्जी मुख्यमंत्री बने थे और ज्योति बसु डिप्टी सीएम थे। हालांकि, सरकार बहुत अस्थिर रही।

1975 में जब इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगाई, तो CPI ने शुरुआत में इंदिरा गांधी और इमरजेंसी का समर्थन किया था, जबकि CPI(M) ने इसका विरोध किया था और उनके कई नेता जेल भी गए थे।

1977 के विधानसभा चुनावों में लेफ्ट को बंगाल में भारी बहुमत मिला और यहीं से राज्य में कम्युनिस्टों के लंबे शासन की असली शुरुआत हुई। ज्योति बसु मुख्यमंत्री बने और लगातार 2000 तक राज्य के सीएम रहे। उनके बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य मुख्यमंत्री बने, जिन्होंने राज्य में उद्योगों को लाने की कोशिश की।

लेकिन सिंगूर और नंदीग्राम जैसे भूमि अधिग्रहण विवादों के बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस ने 2011 में कम्युनिस्टों के 34 साल पुराने शासन को खत्म कर दिया। उस वक्त के सीएम बुद्धदेव भट्टाचार्य खुद अपना चुनाव हार गए।

90 के दशक में ज्योति बसु को 3 बार PM बनाने का मौका

CBI के पूर्व डायरेक्टर अरुण प्रसाद मुखर्जी ने अपनी किताब ‘राजीव गांधी, ज्योति बसु, इंद्रजीत गुप्त के अनछुए पहलू’ में बताया है कि 1990 और 1991 के उथल-पुथल भरे दौर में राजीव गांधी चाहते थे कि ज्योति बसु देश के प्रधानमंत्री बनें।

पहली बार अक्टूबर 1990 में राजीव गांधी ने ज्योति बसु से मिलने की इच्छा जताई थी, लेकिन तब बसु ने यह कहकर मना कर दिया कि यह उनका निजी फैसला नहीं हो सकता और केवल उनकी पार्टी (CPM) ही इस पर निर्णय ले सकती है। लेफ्ट नेताओं के मना करने के बाद ही चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने थे।

इसके बाद साल 1991 में जब चंद्रशेखर सरकार गिर गई, तो राजीव गांधी ने एक बार फिर ज्योति बसु से संपर्क साधा। इस बार भी ज्योति बसु ने फैसला पार्टी के नेतृत्व पर छोड़ दिया और प्रधानमंत्री बनने से इनकार कर दिया।

इसके बाद 1996 में यूनाइटेड फ्रंट के सांसदों ने फिर से बसु को पीएम बनने का ऑफर दिया। इस बार भी पार्टी के अधिकतर नेता नहीं माने। लेफ्ट के बड़े नेता सीताराम येचुरी बताते हैं कि ज्यादातर लोगों का उस समय मानना था कि लेफ्ट मोर्चे के पास सिर्फ 32 सांसद हैं, इसलिए एक कमजोर सरकार का हिस्सा बनना सही नहीं रहेगा।

2004 में सबसे बड़ा लेफ्ट मोर्चा

2004 के लोकसभा चुनावों में वामपंथी दलों ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। लेफ्ट मोर्चे ने 80 सीटें जीती। मनमोहन सिंह की पहली UPA सरकार पूरी तरह से लेफ्ट के समर्थन पर टिकी थी। नरेगा (MGNREGA) और RTI जैसे कानूनों को लागू करवाने में उनकी प्रमुख भूमिका रही।

2008, न्यूक्लियर डील: गठबंधन से अलगाव

भारत-अमेरिका परमाणु समझौते (Indo-US Nuclear Deal) के मुद्दे पर वामपंथियों ने UPA का विरोध किया। उन्होंने UPA-1 से अपना समर्थन वापस ले लिया। इसके बाद से 18 सालों में कभी लेफ्ट केंद्र की सत्ता के आस-पास भी नहीं आया।

2011 में बंगाल, 2018 में त्रिपुरा और 2021 में केरलम में हार

  • पश्चिम बंगाल (2011): 34 साल के निरंतर शासन के बाद ममता बनर्जी ने लेफ्ट को सत्ता से बहार किया। लगातार दो विधानसभा चुनावों में बंगाल में लेफ्ट का एक भी विधायक नहीं है।
  • त्रिपुरा (2018): 25 साल से सरकार में लेफ्ट माणिक सरकार के नेतृत्व में चुनाव में गई। भाजपा ने ‘चलो पलटाई’ के नारे के साथ उन्हें हरा दिया। आज त्रिपुरा में लेफ्ट तीसरे नम्बर का मोर्चा है।
  • केरलम (2026): केरलम लेफ्ट का आखिरी गढ़ माना जा रहा है। लेकिन अब पार्टी चुनाव में हार के बाद यहां भी सत्ता से बाहर हो चुकी है।

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ये खबर भी पढ़ें…

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केरलम विधानसभा चुनाव में पिनराई विजयन की अगुवाई वाले लेफ्ट एलायंस LDF को हार का सामना करना पड़ा है। कांग्रेस की अगुवाई वाली UDF ने 140 में से 90 से ज्यादा सीटें जीतकर 10 साल बाद सत्ता में वापसी कर ली है।

केरलम में इस हार के बाद 49 साल में यह पहली होने जा रहा है जब देश के किसी भी राज्य में लेफ्ट की सरकार नहीं है। जानते हैं देश में वामपंथ के विस्तार, जीत और हार से जुड़ी प्रमुख बातें… इससे पहले जानिए लेफ्ट यानी कम्युनिस्ट विचारधारा के बारे में।

1947 में मिली आजादी को मानने से इंकार किया

भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) ने 1947 में भारत को मिली आजादी को असली आजादी मानने से इंकार कर दिया था। उस वक्त पार्टी का कहना था कि यह आजादी अधूरी और समझौतों का परिणाम है, जिसे उन्होंने ‘झूठी आजादी’ का नाम दिया। इस हकीकत को पूरी तरह स्वीकार करने में पार्टी को 5 साल से ज्यादा का समय लग गया।

मार्च 1948 में पार्टी के भीतर एक बड़ा बदलाव हुआ। पीसी. जोशी की जगह बीटी. रणदिवे (BTR) नए जनरल सेक्रेटरी बने। उनके आते ही पार्टी में ‘रणदिवे लाइन’ लागू हुई, जो बेहद कट्टर और आक्रामक थी। इसी सोच के तहत जनवरी 1950 में संविधान लागू होने से पहले ही CPI ने इसका विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि कांग्रेस के नेता भारतीय जनता पर ‘गुलामी का संविधान’ थोप रहे हैं।

लेफ्ट पार्टी ने नेहरू सरकार को हिंसक तरीके से उखाड़ फेंकने का आह्वान किया। 1948 और 1949 के दौरान यह नीति पूरी तरह विफल रही। इसके बाद मई-जून 1950 में बीटी. रणदिवे को पद से हटा दिया गया।

पार्टी की सेंट्रल कमेटी ने यह स्वीकार किया कि बिना सोचे-समझे 9 मार्च 1949 को देशव्यापी हड़ताल और विद्रोह का जो आह्वान किया गया था, वह बड़ी भूल थी। करीब 6 साल के बाद CPI अपनी कट्टर विचारधारा छोड़कर देश की आजादी की सच्चाई स्वीकार करने के लिए मजबूर हुई।

दुनिया की पहली चुनी हुई लोकतांत्रिक लेफ्ट सरकार

5 अप्रैल 1957, केरल के पहले सीएम के रूप में शपथ लेते हुए ईएमएस नंबूदरीपाद।

5 अप्रैल 1957, केरल के पहले सीएम के रूप में शपथ लेते हुए ईएमएस नंबूदरीपाद।

1956 में त्रावणकोर, कोचीन और मालाबार को मिलाकर एक नया राज्य केरलम बना। मार्च 1957 में यहां पहली बार विधानसभा चुनाव हुए। 126 सीटों वालीं विधानसभा में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया यानी CPI को 60 सीट मिलीं। 5 निर्दलीय को मिलाकर उसने सरकार बना ली। ये दुनिया में लेफ्ट की पहली चुनी हुई सरकार थी।

ईएमएस नंबूदरीपाद ने मुख्यमंत्री बनने के एक हफ्ते बाद ही दो बड़े कानून लागू किए। पहला- भूमि सुधार कानून और दूसरा- शिक्षा में सुधार को लेकर। भूमि सुधार कानून के बाद बटाईदार किसानों को जमीन खरीदने की छूट मिल गई। लैंडहोल्डिंग की लिमिट तय हो गई। वहीं, एजुकेशन बिल के जरिए प्राइवेट संस्थानों को रेगुलेट करने के लिए सख्त नियम बना दिए।

2 फरवरी 1959 को इंदिरा गांधी कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष बनीं। इसके बाद वो केरलम गईं। वहां से लौटने के बाद उन्होंने अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री नेहरू को सौंप दी। 31 जुलाई 1959 को केरलम सरकार बर्खास्त कर दी गई।

गांधी की तस्वीरें हटाईं, माओ–स्टालिन की लगाईं

इसी बीच केरलम के स्कूल-कॉलेजों से गांधी की तस्वीर हटाकर माओ और स्टालिन की तस्वीर लगाई जाने लगीं। कहा जाने लगा कि नंबूदरीपाद की सरकार बनाने के लिए कम्युनिस्ट देशों ने फंड भेजे हैं।

इसके विरोध में केरलम के गांधी कहे जाने वाले मन्नथ पिल्लई की अगुआई में लाखों लोग सड़कों पर उतर गए। हजारों लोग जेल में डाल दिए गए। आंदोलन को दबाने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज किया। इसमें मछुआरे कम्युनिटी की एक प्रेग्नेंट महिला की जान चली गई। आंदोलन और भड़क उठा। जगह-जगह हिंसा होने लगीं।

चीन युद्ध पर सरकार से अलग रुख के कारण दूसरा बड़ा विभाजन

1962 के भारत–चीन युद्ध ने CPI के भीतर वैचारिक दरार बढ़ा दिया। पार्टी का एक धड़ा नेहरू सरकार के समर्थन में था। दूसरा धड़ा चीन को आक्रमणकारी मानने को तैयार नहीं था। ‘राष्ट्रवाद बनाम अंतरराष्ट्रीय साम्यवाद’ की इस बहस के बीच, चीन समर्थक माने जाने वाले नेताओं को जेल में डाल दिया गया। इसी तनाव ने पार्टी के आधार को हिला दिया और कम्युनिस्ट आंदोलन दो फाड़ हो गया।

युद्ध के दो साल बाद, 1964 में मतभेद इतने बढ़ गए कि कम्युनिस्ट पार्टी आधिकारिक रूप से विभाजित हो गई। सोवियत संघ की नरम नीति के समर्थक CPI में रहे, जबकि क्रांतिकारी रुख अपनाने वाले नेताओं ने मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी (CPI-M) का गठन किया।

साल 1964, CPI (M) की स्थापना के दौरान बाएं से दूसरे नंबर पर ज्योति बसु (पश्चिम बंगाल के पूर्व सीएम) और दूसरी पंक्ति में बाएं से तीसरे नंबर पर केरल के पहले सीएम ईएमएस नंबूदिरीपाद।

साल 1964, CPI (M) की स्थापना के दौरान बाएं से दूसरे नंबर पर ज्योति बसु (पश्चिम बंगाल के पूर्व सीएम) और दूसरी पंक्ति में बाएं से तीसरे नंबर पर केरल के पहले सीएम ईएमएस नंबूदिरीपाद।

बंगाल में 1967 में लेफ्ट

पश्चिम बंगाल में पहली बार लेफ्ट ने 1967 में ‘यूनाइटेड फ्रंट’ गठबंधन के जरिए सरकार में आई। उस समय अजय मुखर्जी मुख्यमंत्री बने थे और ज्योति बसु डिप्टी सीएम थे। हालांकि, सरकार बहुत अस्थिर रही।

1975 में जब इंदिरा गांधी ने देश में इमरजेंसी लगाई, तो CPI ने शुरुआत में इंदिरा गांधी और इमरजेंसी का समर्थन किया था, जबकि CPI(M) ने इसका विरोध किया था और उनके कई नेता जेल भी गए थे।

1977 के विधानसभा चुनावों में लेफ्ट को बंगाल में भारी बहुमत मिला और यहीं से राज्य में कम्युनिस्टों के लंबे शासन की असली शुरुआत हुई। ज्योति बसु मुख्यमंत्री बने और लगातार 2000 तक राज्य के सीएम रहे। उनके बाद बुद्धदेव भट्टाचार्य मुख्यमंत्री बने, जिन्होंने राज्य में उद्योगों को लाने की कोशिश की।

लेकिन सिंगूर और नंदीग्राम जैसे भूमि अधिग्रहण विवादों के बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली तृणमूल कांग्रेस ने 2011 में कम्युनिस्टों के 34 साल पुराने शासन को खत्म कर दिया। उस वक्त के सीएम बुद्धदेव भट्टाचार्य खुद अपना चुनाव हार गए।

90 के दशक में ज्योति बसु को 3 बार PM बनाने का मौका

CBI के पूर्व डायरेक्टर अरुण प्रसाद मुखर्जी ने अपनी किताब ‘राजीव गांधी, ज्योति बसु, इंद्रजीत गुप्त के अनछुए पहलू’ में बताया है कि 1990 और 1991 के उथल-पुथल भरे दौर में राजीव गांधी चाहते थे कि ज्योति बसु देश के प्रधानमंत्री बनें।

पहली बार अक्टूबर 1990 में राजीव गांधी ने ज्योति बसु से मिलने की इच्छा जताई थी, लेकिन तब बसु ने यह कहकर मना कर दिया कि यह उनका निजी फैसला नहीं हो सकता और केवल उनकी पार्टी (CPM) ही इस पर निर्णय ले सकती है। लेफ्ट नेताओं के मना करने के बाद ही चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने थे।

इसके बाद साल 1991 में जब चंद्रशेखर सरकार गिर गई, तो राजीव गांधी ने एक बार फिर ज्योति बसु से संपर्क साधा। इस बार भी ज्योति बसु ने फैसला पार्टी के नेतृत्व पर छोड़ दिया और प्रधानमंत्री बनने से इनकार कर दिया।

इसके बाद 1996 में यूनाइटेड फ्रंट के सांसदों ने फिर से बसु को पीएम बनने का ऑफर दिया। इस बार भी पार्टी के अधिकतर नेता नहीं माने। लेफ्ट के बड़े नेता सीताराम येचुरी बताते हैं कि ज्यादातर लोगों का उस समय मानना था कि लेफ्ट मोर्चे के पास सिर्फ 32 सांसद हैं, इसलिए एक कमजोर सरकार का हिस्सा बनना सही नहीं रहेगा।

2004 में सबसे बड़ा लेफ्ट मोर्चा

2004 के लोकसभा चुनावों में वामपंथी दलों ने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। लेफ्ट मोर्चे ने 80 सीटें जीती। मनमोहन सिंह की पहली UPA सरकार पूरी तरह से लेफ्ट के समर्थन पर टिकी थी। नरेगा (MGNREGA) और RTI जैसे कानूनों को लागू करवाने में उनकी प्रमुख भूमिका रही।

2008, न्यूक्लियर डील: गठबंधन से अलगाव

भारत-अमेरिका परमाणु समझौते (Indo-US Nuclear Deal) के मुद्दे पर वामपंथियों ने UPA का विरोध किया। उन्होंने UPA-1 से अपना समर्थन वापस ले लिया। इसके बाद से 18 सालों में कभी लेफ्ट केंद्र की सत्ता के आस-पास भी नहीं आया।

2011 में बंगाल, 2018 में त्रिपुरा और 2021 में केरलम में हार

  • पश्चिम बंगाल (2011): 34 साल के निरंतर शासन के बाद ममता बनर्जी ने लेफ्ट को सत्ता से बहार किया। लगातार दो विधानसभा चुनावों में बंगाल में लेफ्ट का एक भी विधायक नहीं है।
  • त्रिपुरा (2018): 25 साल से सरकार में लेफ्ट माणिक सरकार के नेतृत्व में चुनाव में गई। भाजपा ने ‘चलो पलटाई’ के नारे के साथ उन्हें हरा दिया। आज त्रिपुरा में लेफ्ट तीसरे नम्बर का मोर्चा है।
  • केरलम (2026): केरलम लेफ्ट का आखिरी गढ़ माना जा रहा है। लेकिन अब पार्टी चुनाव में हार के बाद यहां भी सत्ता से बाहर हो चुकी है।

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