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क्या सबकुछ आसानी से मिल जाना खतरनाक? मनोवैज्ञानिक से जानिए ये नई पीढ़ी के लिए कितना घातक

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Mental Health Tips : आधुनिक जीवनशैली में लोगों को अब सबकुछ आसानी से मिल रहा है लेकिन ‘लो फ्रस्ट्रेशन टॉलरेंस’ के चलते लोगों का खुद पर कंट्रोल नहीं है. पिछले दिनों एक डॉक्टर ने ही खुदकुशी कर ली. कहा जा रहा है कि उन्हें अपना मानसिक शोषण और पिता की बेइज्जती बर्दाश्त नहीं हुई. देहरादून के मनोवैज्ञानिक डॉ. मुकुल शर्मा लोकल 18 से बताते हैं कि वक्त बदलने के साथ-साथ लोगों के व्यवहार पर भी असर पड़ा है. आज की युवा पीढ़ी पुराने समय की युवा पीढ़ी से बिल्कुल अलग है. इसमें सहनशीलता नहीं है.

देहरादून. आजकल के बिजी शेड्यूल और स्ट्रेस के लगातार बने रहने से लोग अपनी परेशानियों को दूसरे को नहीं बता पाते हैं और धीरे-धीरे डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं. कई बार खुद की जान तक ले लेते हैं. कई बार गुस्से में लोग दूसरों की जान भी ले लेते हैं. वक्त बदलने के साथ-साथ लोगों के व्यवहार पर भी असर पड़ा है. आज की युवा पीढ़ी पुराने समय की युवा पीढ़ी से बिल्कुल अलग है. इसमें सहनशीलता नहीं है. देहरादून में दो छात्र गुटों के झगड़े में मौत और एक डॉक्टर का खुदकुशी करना, इस बात का ताजा उदाहरण है.

फिर करें क्या

देहरादून के मनोवैज्ञानिक डॉ. मुकुल शर्मा बताते हैं कि आधुनिक जीवनशैली में आपको सब कुछ आसानी से मिलता जा रहा है, लेकिन ‘लो फ्रस्ट्रेशन टॉलरेंस’ के चलते लोगों का खुद पर कंट्रोल नहीं है. हाल ही में एक दुखद घटना सामने आई है, जिसमें एक क्वालिफाइड डॉक्टर जो पीजी कर रही थी, उन्होंने कथित तौर पर खुदकुशी कर ली. डॉ. मुकुल कहते हैं कि मानसिक शोषण काम करने के दौरान होता है, कई तरह की परेशानियां भी होती हैं, लेकिन आत्महत्या इसका समाधान नहीं है. हर परेशानी का हल है. उन्हें अपने मानसिक शोषण के साथ ही अपने पिता की बेइज्जती बर्दाश्त नहीं हुई. इससे उनके अभिभावकों को उम्र भर परेशानी होगी. वह अपने सीनियर्स से मदद ले सकती थीं, परिवार से बात कर सकती थीं. डॉक्टर दूसरों का जीवन बचाते हैं. इस तरह के कदम समाज के लिए अच्छे नहीं हैं.

घरवाले क्या करें

डॉ. मुकुल कहते हैं कि आजकल युवाओं का बिजी शेड्यूल और डिजिटल आइसोलेशन उनके व्यवहार में बदलाव ला रहा है. पहले लोग सोशल होते थे. कोई भी परेशानी होती थी तो एक-दूसरे से साझा करते थे, लेकिन आज अपने में ही सिमटे रहते हैं, जिससे उनका गुस्सा, चिड़चिड़ापन और स्ट्रेस दूर नहीं हो पता है. धीरे-धीरे में डिप्रेशन में चले जाते हैं. एक-दूसरे से ईर्ष्या रखना और हिंसक बनाना सोशल मीडिया का नतीजा हो सकता है. इसलिए खुद को थोड़ा समय दें. जिन काम से आपको स्ट्रेस रिलीफ मिलता है, वह काम करें. इमोशनल सपोर्ट सिस्टम को मजबूत करने की कोशिश करें. अभिभावकों और टीचर्स को भी इमोशनल इंटेलिजेंस पर जोर देने की जरूरत है.

About the Author

Priyanshu Gupta

Priyanshu has more than 10 years of experience in journalism. Before News 18 (Network 18 Group), he had worked with Rajsthan Patrika and Amar Ujala. He has Studied Journalism from Indian Institute of Mass Commu…और पढ़ें

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देहरादून. आजकल के बिजी शेड्यूल और स्ट्रेस के लगातार बने रहने से लोग अपनी परेशानियों को दूसरे को नहीं बता पाते हैं और धीरे-धीरे डिप्रेशन के शिकार हो जाते हैं. कई बार खुद की जान तक ले लेते हैं. कई बार गुस्से में लोग दूसरों की जान भी ले लेते हैं. वक्त बदलने के साथ-साथ लोगों के व्यवहार पर भी असर पड़ा है. आज की युवा पीढ़ी पुराने समय की युवा पीढ़ी से बिल्कुल अलग है. इसमें सहनशीलता नहीं है. देहरादून में दो छात्र गुटों के झगड़े में मौत और एक डॉक्टर का खुदकुशी करना, इस बात का ताजा उदाहरण है.

फिर करें क्या

देहरादून के मनोवैज्ञानिक डॉ. मुकुल शर्मा बताते हैं कि आधुनिक जीवनशैली में आपको सब कुछ आसानी से मिलता जा रहा है, लेकिन ‘लो फ्रस्ट्रेशन टॉलरेंस’ के चलते लोगों का खुद पर कंट्रोल नहीं है. हाल ही में एक दुखद घटना सामने आई है, जिसमें एक क्वालिफाइड डॉक्टर जो पीजी कर रही थी, उन्होंने कथित तौर पर खुदकुशी कर ली. डॉ. मुकुल कहते हैं कि मानसिक शोषण काम करने के दौरान होता है, कई तरह की परेशानियां भी होती हैं, लेकिन आत्महत्या इसका समाधान नहीं है. हर परेशानी का हल है. उन्हें अपने मानसिक शोषण के साथ ही अपने पिता की बेइज्जती बर्दाश्त नहीं हुई. इससे उनके अभिभावकों को उम्र भर परेशानी होगी. वह अपने सीनियर्स से मदद ले सकती थीं, परिवार से बात कर सकती थीं. डॉक्टर दूसरों का जीवन बचाते हैं. इस तरह के कदम समाज के लिए अच्छे नहीं हैं.

घरवाले क्या करें

डॉ. मुकुल कहते हैं कि आजकल युवाओं का बिजी शेड्यूल और डिजिटल आइसोलेशन उनके व्यवहार में बदलाव ला रहा है. पहले लोग सोशल होते थे. कोई भी परेशानी होती थी तो एक-दूसरे से साझा करते थे, लेकिन आज अपने में ही सिमटे रहते हैं, जिससे उनका गुस्सा, चिड़चिड़ापन और स्ट्रेस दूर नहीं हो पता है. धीरे-धीरे में डिप्रेशन में चले जाते हैं. एक-दूसरे से ईर्ष्या रखना और हिंसक बनाना सोशल मीडिया का नतीजा हो सकता है. इसलिए खुद को थोड़ा समय दें. जिन काम से आपको स्ट्रेस रिलीफ मिलता है, वह काम करें. इमोशनल सपोर्ट सिस्टम को मजबूत करने की कोशिश करें. अभिभावकों और टीचर्स को भी इमोशनल इंटेलिजेंस पर जोर देने की जरूरत है.

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