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तीन वनकर्मियों का शिकार करने वाले बाघ 'विक्रम' की मौत:21 साल जीवित रहकर बनाया रिकॉर्ड, नैनीताल चिड़ियाघर का पिंजड़ा तोड़कर निकला था बाहर

तीन वनकर्मियों का शिकार करने वाले बाघ 'विक्रम' की मौत:21 साल जीवित रहकर बनाया रिकॉर्ड, नैनीताल चिड़ियाघर का पिंजड़ा तोड़कर निकला था बाहर

उत्तराखंड के नैनीताल में स्थित जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क के ढेला रेंज के रेस्क्यू सेंटर में रखे गए नर बाघ ‘विक्रम’ की मौत हो गई है, जिसे देश के सबसे उम्रदराज बाघों में गिना जाता था। करीब 21 साल की उम्र तक जीवित रहकर विक्रम ने एक अनोखा रिकॉर्ड बनाया। सामान्य तौर पर बाघों की उम्र जहां सीमित मानी जाती है। वहीं विक्रम ने इस सीमा को पार कर वन्यजीव जगत में अपनी अलग पहचान बनाई। कॉर्बेट प्रशासन के मुताबिक, प्रथम दृष्टया उसकी मौत का कारण वृद्धावस्था माना जा रहा है। लंबे समय से रेस्क्यू सेंटर में रह रहा विक्रम अब इतिहास का हिस्सा बन गया है, लेकिन उसकी कहानी हमेशा याद रखी जाएगी। खूंखार शिकारी के तौर पर थी पहचान
विक्रम की पहचान सिर्फ एक उम्रदराज बाघ के रूप में नहीं, बल्कि एक ‘खूंखार शिकारी’ के रूप में भी रही है। साल 2019 में ढिकाला जोन में इस बाघ ने तीन वनकर्मियों को अपना शिकार बनाया था। उस समय क्षेत्र में घास बेहद ऊंची थी और कई बाघ मौजूद थे। जिससे असली हमलावर की पहचान करना बेहद मुश्किल हो गया था, लेकिन विक्रम के विशालकाय शरीर और गतिविधियों के आधार पर उसे चिन्हित किया गया। इसके बाद कॉर्बेट प्रशासन ने कड़ी मशक्कत के बाद उसे ट्रेंकुलाइज कर पकड़ लिया। तीन वनकर्मियों का शिकार करने के बाद विक्रम को खुले जंगल में छोड़ना खतरे से खाली नहीं था। ऐसे में उसे रेस्क्यू सेंटर में ही रखा गया। करीब 7 साल तक उसने कैद में जीवन बिताया। इस दौरान उसकी देखभाल बेहद बेहतर तरीके से की गई। भोजन में उसे ताजा मांस, विटामिन और मिनरल सप्लीमेंट दिए जाते थे। नियमित स्वास्थ्य परीक्षण के लिए उसके सैंपल बरेली स्थित आईवीआरआई (भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान) भेजे जाते थे। 15 नवंबर 2019 को पकड़ा गया था खूंखार शिकारी
कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के डायरेक्टर डॉ. साकेत बडोला ने बताया कि विक्रम को 15 नवंबर 2019 को ढिकाला रेंज से रेस्क्यू किया गया था। इसके बाद उसे नैनीताल चिड़ियाघर भेजा गया। शरीर से हष्ट पुष्ट विक्रम चिड़ियाघर में भी पिंजरा तोड़कर बाहर आ गया था। 20 अप्रैल 2021 को उसे वापस कॉर्बेट के ढेला रेंज स्थित रेस्क्यू सेंटर में स्थानांतरित किया गया, जहां उसकी विशेष निगरानी में देखभाल की जा रही थी। रेस्क्यू सेंटर में उसे 600 वर्ग मीटर के बड़े बाड़े में रखा गया था, जिसमें वाटर पूल और प्राकृतिक माहौल तैयार किया गया था। वर्ष 2025 में वृद्धावस्था के कारण विक्रम को ट्यूमर की गंभीर बीमारी हो गई थी। कॉर्बेट के वरिष्ठ वन्यजीव चिकित्साधिकारी डॉ. दुष्यन्त शर्मा और उनकी टीम ने उसका ऑपरेशन किया था। ऑपरेशन के बाद कुछ समय तक उसकी स्थिति स्थिर रही, लेकिन उम्र का असर धीरे-धीरे बढ़ता गया और एक साल बाद आखिरकार उसने दम तोड़ दिया। मृत्यु के बाद एनटीसीए की गाइडलाइन के अनुसार पोस्टमॉर्टम किया गया और फिर शव को मौके पर ही नष्ट कर दिया गया। उम्र भी रिहाई में बाधा बनी
विक्रम की रिहाई को लेकर कई सवाल उठे, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार एक बार मानव का शिकार करने वाला बाघ दोबारा इंसानों के लिए खतरा बन सकता है, इसके अलावा उसकी उम्र भी रिहाई में बाधा बनी। 20 साल की उम्र पार कर चुके विक्रम के कई दांत झड़ चुके थे और बाकी घिस चुके थे। ऐसे में वह न तो खुद शिकार कर सकता था और न ही जंगल में अन्य बाघों से मुकाबला कर पाता। यही कारण रहा कि उसे जीवनभर रेस्क्यू सेंटर में ही रखा गया। रेस्क्यू सेंटर में रहता था शांत
विक्रम अपने अतीत में खौफ का पर्याय रहा, लेकिन रेस्क्यू सेंटर में उसका जीवन काफी शांत और सुरक्षित रहा। 600 वर्ग मीटर के बाड़े में वह अक्सर पानी में खेलता और मस्ती करता नजर आता था। उसकी हर गतिविधि पर नजर रखी जाती थी। उम्र के बावजूद उसका शरीर इतना मजबूत और विशाल था कि उसे देखकर लोग हैरान रह जाते थे। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, देश में कैद में रहने वाले बाघों की उम्र आमतौर पर 18 साल तक होती है। ऐसे में विक्रम का 21 साल तक जीवित रहना अपने आप में एक रिकॉर्ड है। यह इस बात का भी प्रमाण है कि रेस्क्यू सेंटर में उसकी देखभाल उच्च स्तर की थी।

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उत्तराखंड के नैनीताल में स्थित जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क के ढेला रेंज के रेस्क्यू सेंटर में रखे गए नर बाघ ‘विक्रम’ की मौत हो गई है, जिसे देश के सबसे उम्रदराज बाघों में गिना जाता था। करीब 21 साल की उम्र तक जीवित रहकर विक्रम ने एक अनोखा रिकॉर्ड बनाया। सामान्य तौर पर बाघों की उम्र जहां सीमित मानी जाती है। वहीं विक्रम ने इस सीमा को पार कर वन्यजीव जगत में अपनी अलग पहचान बनाई। कॉर्बेट प्रशासन के मुताबिक, प्रथम दृष्टया उसकी मौत का कारण वृद्धावस्था माना जा रहा है। लंबे समय से रेस्क्यू सेंटर में रह रहा विक्रम अब इतिहास का हिस्सा बन गया है, लेकिन उसकी कहानी हमेशा याद रखी जाएगी। खूंखार शिकारी के तौर पर थी पहचान
विक्रम की पहचान सिर्फ एक उम्रदराज बाघ के रूप में नहीं, बल्कि एक ‘खूंखार शिकारी’ के रूप में भी रही है। साल 2019 में ढिकाला जोन में इस बाघ ने तीन वनकर्मियों को अपना शिकार बनाया था। उस समय क्षेत्र में घास बेहद ऊंची थी और कई बाघ मौजूद थे। जिससे असली हमलावर की पहचान करना बेहद मुश्किल हो गया था, लेकिन विक्रम के विशालकाय शरीर और गतिविधियों के आधार पर उसे चिन्हित किया गया। इसके बाद कॉर्बेट प्रशासन ने कड़ी मशक्कत के बाद उसे ट्रेंकुलाइज कर पकड़ लिया। तीन वनकर्मियों का शिकार करने के बाद विक्रम को खुले जंगल में छोड़ना खतरे से खाली नहीं था। ऐसे में उसे रेस्क्यू सेंटर में ही रखा गया। करीब 7 साल तक उसने कैद में जीवन बिताया। इस दौरान उसकी देखभाल बेहद बेहतर तरीके से की गई। भोजन में उसे ताजा मांस, विटामिन और मिनरल सप्लीमेंट दिए जाते थे। नियमित स्वास्थ्य परीक्षण के लिए उसके सैंपल बरेली स्थित आईवीआरआई (भारतीय पशु चिकित्सा अनुसंधान संस्थान) भेजे जाते थे। 15 नवंबर 2019 को पकड़ा गया था खूंखार शिकारी
कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के डायरेक्टर डॉ. साकेत बडोला ने बताया कि विक्रम को 15 नवंबर 2019 को ढिकाला रेंज से रेस्क्यू किया गया था। इसके बाद उसे नैनीताल चिड़ियाघर भेजा गया। शरीर से हष्ट पुष्ट विक्रम चिड़ियाघर में भी पिंजरा तोड़कर बाहर आ गया था। 20 अप्रैल 2021 को उसे वापस कॉर्बेट के ढेला रेंज स्थित रेस्क्यू सेंटर में स्थानांतरित किया गया, जहां उसकी विशेष निगरानी में देखभाल की जा रही थी। रेस्क्यू सेंटर में उसे 600 वर्ग मीटर के बड़े बाड़े में रखा गया था, जिसमें वाटर पूल और प्राकृतिक माहौल तैयार किया गया था। वर्ष 2025 में वृद्धावस्था के कारण विक्रम को ट्यूमर की गंभीर बीमारी हो गई थी। कॉर्बेट के वरिष्ठ वन्यजीव चिकित्साधिकारी डॉ. दुष्यन्त शर्मा और उनकी टीम ने उसका ऑपरेशन किया था। ऑपरेशन के बाद कुछ समय तक उसकी स्थिति स्थिर रही, लेकिन उम्र का असर धीरे-धीरे बढ़ता गया और एक साल बाद आखिरकार उसने दम तोड़ दिया। मृत्यु के बाद एनटीसीए की गाइडलाइन के अनुसार पोस्टमॉर्टम किया गया और फिर शव को मौके पर ही नष्ट कर दिया गया। उम्र भी रिहाई में बाधा बनी
विक्रम की रिहाई को लेकर कई सवाल उठे, लेकिन विशेषज्ञों के अनुसार एक बार मानव का शिकार करने वाला बाघ दोबारा इंसानों के लिए खतरा बन सकता है, इसके अलावा उसकी उम्र भी रिहाई में बाधा बनी। 20 साल की उम्र पार कर चुके विक्रम के कई दांत झड़ चुके थे और बाकी घिस चुके थे। ऐसे में वह न तो खुद शिकार कर सकता था और न ही जंगल में अन्य बाघों से मुकाबला कर पाता। यही कारण रहा कि उसे जीवनभर रेस्क्यू सेंटर में ही रखा गया। रेस्क्यू सेंटर में रहता था शांत
विक्रम अपने अतीत में खौफ का पर्याय रहा, लेकिन रेस्क्यू सेंटर में उसका जीवन काफी शांत और सुरक्षित रहा। 600 वर्ग मीटर के बाड़े में वह अक्सर पानी में खेलता और मस्ती करता नजर आता था। उसकी हर गतिविधि पर नजर रखी जाती थी। उम्र के बावजूद उसका शरीर इतना मजबूत और विशाल था कि उसे देखकर लोग हैरान रह जाते थे। वन्यजीव विशेषज्ञों के अनुसार, देश में कैद में रहने वाले बाघों की उम्र आमतौर पर 18 साल तक होती है। ऐसे में विक्रम का 21 साल तक जीवित रहना अपने आप में एक रिकॉर्ड है। यह इस बात का भी प्रमाण है कि रेस्क्यू सेंटर में उसकी देखभाल उच्च स्तर की थी।

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