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स्ट्रोक के बाद पूरी तरह ठीक क्‍यों नहीं होता मरीज, क्या होती है गोल्डन विंडो? डॉक्‍टर ने बताई बेहद जरूरी बात

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भीषण गर्मी में अक्सर हीट स्ट्रोक के मामले देखने को मिलते हैं, इसके अलावा ब्रेन स्ट्रोक के केसेज भी आए दिन सामने आ रहे हैं. हालांकि भारत में स्ट्रोक के इलाज में पिछले कुछ साल में जबर्दस्त सुधार हुआ है. बेहतर इमरजेंसी केयर, तेज डायग्नोसिस और बेहतरीन मेडिकल सुविधाओं की वजह से अब पहले से कहीं अधिक मरीज स्ट्रोक से बच रहे हैं लेकिन इसके बावजूद एक ऐसी दिक्कत सामने आ रही है जो काफी गंभीर है. डॉक्टरों की मानें तो स्ट्रोक के इलाज के बाद मरीज जिंदा तो बच जाते हैं, लेकिन वे पूरी तरह ठीक नहीं हो पाते और उन्हें लंबे समय तक विकलांगता के साथ जीवन जीना पड़ता है.

सबसे बड़ा सवाल है कि क्या स्ट्रोक दो-चार दिन में ठीक हो जाता है? स्ट्रोक के बाद कौन सी बड़ी दिक्कतें मरीजों में देखने को मिलती हैं? स्ट्रोक में गोल्डन विंडो क्या होती है? आइए इन सभी सवालों पर एचसीएएच के को फाउंडर डॉक्टर गौरव ठुकराल से जानते हैं.

डॉक्टर ठुकराल कहते हैं, ‘आज भारत में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हम सिर्फ इलाज कर रहे हैं, या सच में मरीजों को ठीक भी कर पा रहे हैं. अस्पतालों में स्ट्रोक का इलाज हो रहा है, जानें भी बच रही हैं लेकिन क्या रिकवरी उतनी ही मजबूत हो रही है? यही वह अंतर है जो भारत को अब समझना और भरना होगा.’

वे कहते हैं, ‘हमें स्ट्रोक के इलाज को सिर्फ जान बचाने तक सीमित नहीं रखना चाहिए. सबसे जरूरी है कि स्ट्रोक के बाद रिकवरी कितनी जल्दी, कितनी संरचित और कितनी प्रभावी तरीके से शुरू होती है?’ डॉक्टर ठुकराल आगे कहते हैं कि स्ट्रोक के इलाज के बावजूद कुछ ऐसी बीमारियां हैं जो शरीर में बहुत तेजी से बढ़ती हैं. यही वजह है कि स्ट्रोक आने के बाद मरीज 2-4 दिन में सही नहीं होता बल्कि उसे पूरी तरह रिकवर होने में पूरे 3 महीने लग सकते हैं.

वे बताते हैं कि स्ट्रोक के बाद मरीजों को हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, मोटापा और बैठकर रहने वाली जीवनशैली की समस्याएं सबसे ज्यादा होती हैं जो उनकी क्ववालिटी लाइफ को पूरी तरह खराब कर देती हैं.

स्ट्रोक के बाद के हफ्ते बेहद अहम
डॉक्टर ठुकराल कहते हैं कि स्ट्रोक के बाद शुरुआती कुछ हफ्ते बेहद अहम होते हैं.इस दौरान दिमाग न्यूरोप्लास्टिसिटी की अवस्था में होता है, जहां वह खुद को फिर से व्यवस्थित करने और नई क्षमताएं विकसित करने में सक्षम होता है. अगर इस समय सही और लगातार रिहेबिलिटेट किया जाए, तो मरीज दोबारा चलना, बोलना और अपनी स्वतंत्रता वापस पा सकता है.’

गोल्डन विंडो का केयरटेकर भी रखें ध्यान
मरीज की रिकवरी का यह समय सीमित होता है. आमतौर पर यह अवधि कुछ हफ्तों से लेकर तीन महीने तक की होती है. अगर इस ‘गोल्डन विंडो’ को खो दिया जाए, तो रिकवरी की गति और प्रभाव दोनों ही काफी कम हो जाते हैं. जो सुधार कुछ हफ्तों में संभव था, वह महीनों में भी अधूरा रह सकता है या कभी पूरी तरह वापस नहीं आता.वे कहते हैं कि आज भारत में स्ट्रोक का इलाज मजबूत हो चुका है, लेकिन रिकवरी अभी भी कमजोर कड़ी बनी हुई है. देश को अब एक ऐसे हेल्थकेयर मॉडल की जरूरत है जहां रिकवरी को उतनी ही प्राथमिकता दी जाए जितनी इलाज को दी जाती है.

रिकवरी कोई हल्की या कभी-कभार होने वाली प्रक्रिया नहीं है. यह एक गहन, अनुशासित और समयबद्ध उपचार है, जिसमें रोजाना कई बार थेरेपी की जरूरत होती है और यह कई हफ्तों तक लगातार चलती है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शुरुआती चरण में गहन और बार-बार होने वाली थेरेपी को ही बेहतर परिणामों की कुंजी माना जाता है. इसका ध्यान स्ट्रोक के पेशेंट के साथ रहने वाले अटेंडेंट और केयरटेकर को भी रखना चाहिए.

क्या कहते हैं आंकड़े
आंकड़े बताते हैं कि भारत में 6.3 करोड़ से अधिक लोग किसी न किसी प्रकार की विकलांगता के साथ जीवन जी रहे हैं. स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इस बोझ का बड़ा हिस्सा समय पर और सही पुनर्वास के जरिए कम किया जा सकता है. इसके बावजूद, देश में पुनर्वास सेवाओं का ढांचा बेहद सीमित है. पूरे देश में लगभग 1,251 स्ट्रोक रिहैबिलिटेशन सेंटर ही मौजूद हैं, जो आबादी के अनुपात में बेहद कम हैं. इसका सीधा असर यह होता है कि लाखों मरीज समय पर और सही और पूरे उपचार से वंचित रह जाते हैं.

इस वजह से हो रहा नुकसान

  1. डॉ. ठुकराल आगे कहते हैं कि समस्या सिर्फ सुविधाओं की नहीं है, बल्कि सोच और सिस्टम दोनों की है. अस्पतालों में डिस्चार्ज के समय मरीजों को स्पष्ट रिकवरी रोडमैप नहीं दिया जाता. न ही यह बताया जाता है कि शुरुआती 6 से 8 हफ्तों में गहन और निरंतर थेरेपी कितनी जरूरी है. परिणामस्वरूप, परिवार अक्सर इसे वैकल्पिक मानकर टाल देते हैं.
  2. आर्थिक पहलू इस चुनौती को और जटिल बना देता है. पुनर्वास सेवाएं अभी भी बीमा कवरेज के दायरे में पूरी तरह शामिल नहीं हैं. ऐसे में परिवार इसे एक अतिरिक्त खर्च के रूप में देखते हैं, जबकि वास्तव में यह एक दीर्घकालिक निवेश है.
  3. जब मरीज पूरी तरह रिकवर नहीं कर पाता, तो इसका असर सिर्फ स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहता. उसकी काम करने की क्षमता प्रभावित होती है, परिवार पर देखभाल का दबाव बढ़ता है और धीरे-धीरे यह एक सामाजिक और आर्थिक बोझ में बदल जाता है.
  4. कोविड-19 महामारी ने इन खामियों को और उजागर किया. इलाज में आई रुकावटों और सेवाओं की कमी ने कई मरीजों की रिकवरी को प्रभावित किया और विकलांगता का बोझ बढ़ा दिया.

तेजी से रिकवरी है जरूरी
डॉक्टर कहते हैं कि तेजी से रिकवरी कोई विकल्प नहीं है, बल्कि जरूरत है. अगर हमें देश में विकलांगता का बोझ कम करना है, तो पुनर्वास को इलाज की निरंतर और अनिवार्य कड़ी के रूप में देखना होगा.

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भीषण गर्मी में अक्सर हीट स्ट्रोक के मामले देखने को मिलते हैं, इसके अलावा ब्रेन स्ट्रोक के केसेज भी आए दिन सामने आ रहे हैं. हालांकि भारत में स्ट्रोक के इलाज में पिछले कुछ साल में जबर्दस्त सुधार हुआ है. बेहतर इमरजेंसी केयर, तेज डायग्नोसिस और बेहतरीन मेडिकल सुविधाओं की वजह से अब पहले से कहीं अधिक मरीज स्ट्रोक से बच रहे हैं लेकिन इसके बावजूद एक ऐसी दिक्कत सामने आ रही है जो काफी गंभीर है. डॉक्टरों की मानें तो स्ट्रोक के इलाज के बाद मरीज जिंदा तो बच जाते हैं, लेकिन वे पूरी तरह ठीक नहीं हो पाते और उन्हें लंबे समय तक विकलांगता के साथ जीवन जीना पड़ता है.

सबसे बड़ा सवाल है कि क्या स्ट्रोक दो-चार दिन में ठीक हो जाता है? स्ट्रोक के बाद कौन सी बड़ी दिक्कतें मरीजों में देखने को मिलती हैं? स्ट्रोक में गोल्डन विंडो क्या होती है? आइए इन सभी सवालों पर एचसीएएच के को फाउंडर डॉक्टर गौरव ठुकराल से जानते हैं.

डॉक्टर ठुकराल कहते हैं, ‘आज भारत में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या हम सिर्फ इलाज कर रहे हैं, या सच में मरीजों को ठीक भी कर पा रहे हैं. अस्पतालों में स्ट्रोक का इलाज हो रहा है, जानें भी बच रही हैं लेकिन क्या रिकवरी उतनी ही मजबूत हो रही है? यही वह अंतर है जो भारत को अब समझना और भरना होगा.’

वे कहते हैं, ‘हमें स्ट्रोक के इलाज को सिर्फ जान बचाने तक सीमित नहीं रखना चाहिए. सबसे जरूरी है कि स्ट्रोक के बाद रिकवरी कितनी जल्दी, कितनी संरचित और कितनी प्रभावी तरीके से शुरू होती है?’ डॉक्टर ठुकराल आगे कहते हैं कि स्ट्रोक के इलाज के बावजूद कुछ ऐसी बीमारियां हैं जो शरीर में बहुत तेजी से बढ़ती हैं. यही वजह है कि स्ट्रोक आने के बाद मरीज 2-4 दिन में सही नहीं होता बल्कि उसे पूरी तरह रिकवर होने में पूरे 3 महीने लग सकते हैं.

वे बताते हैं कि स्ट्रोक के बाद मरीजों को हाई ब्लड प्रेशर, डायबिटीज, मोटापा और बैठकर रहने वाली जीवनशैली की समस्याएं सबसे ज्यादा होती हैं जो उनकी क्ववालिटी लाइफ को पूरी तरह खराब कर देती हैं.

स्ट्रोक के बाद के हफ्ते बेहद अहम
डॉक्टर ठुकराल कहते हैं कि स्ट्रोक के बाद शुरुआती कुछ हफ्ते बेहद अहम होते हैं.इस दौरान दिमाग न्यूरोप्लास्टिसिटी की अवस्था में होता है, जहां वह खुद को फिर से व्यवस्थित करने और नई क्षमताएं विकसित करने में सक्षम होता है. अगर इस समय सही और लगातार रिहेबिलिटेट किया जाए, तो मरीज दोबारा चलना, बोलना और अपनी स्वतंत्रता वापस पा सकता है.’

गोल्डन विंडो का केयरटेकर भी रखें ध्यान
मरीज की रिकवरी का यह समय सीमित होता है. आमतौर पर यह अवधि कुछ हफ्तों से लेकर तीन महीने तक की होती है. अगर इस ‘गोल्डन विंडो’ को खो दिया जाए, तो रिकवरी की गति और प्रभाव दोनों ही काफी कम हो जाते हैं. जो सुधार कुछ हफ्तों में संभव था, वह महीनों में भी अधूरा रह सकता है या कभी पूरी तरह वापस नहीं आता.वे कहते हैं कि आज भारत में स्ट्रोक का इलाज मजबूत हो चुका है, लेकिन रिकवरी अभी भी कमजोर कड़ी बनी हुई है. देश को अब एक ऐसे हेल्थकेयर मॉडल की जरूरत है जहां रिकवरी को उतनी ही प्राथमिकता दी जाए जितनी इलाज को दी जाती है.

रिकवरी कोई हल्की या कभी-कभार होने वाली प्रक्रिया नहीं है. यह एक गहन, अनुशासित और समयबद्ध उपचार है, जिसमें रोजाना कई बार थेरेपी की जरूरत होती है और यह कई हफ्तों तक लगातार चलती है. अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शुरुआती चरण में गहन और बार-बार होने वाली थेरेपी को ही बेहतर परिणामों की कुंजी माना जाता है. इसका ध्यान स्ट्रोक के पेशेंट के साथ रहने वाले अटेंडेंट और केयरटेकर को भी रखना चाहिए.

क्या कहते हैं आंकड़े
आंकड़े बताते हैं कि भारत में 6.3 करोड़ से अधिक लोग किसी न किसी प्रकार की विकलांगता के साथ जीवन जी रहे हैं. स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इस बोझ का बड़ा हिस्सा समय पर और सही पुनर्वास के जरिए कम किया जा सकता है. इसके बावजूद, देश में पुनर्वास सेवाओं का ढांचा बेहद सीमित है. पूरे देश में लगभग 1,251 स्ट्रोक रिहैबिलिटेशन सेंटर ही मौजूद हैं, जो आबादी के अनुपात में बेहद कम हैं. इसका सीधा असर यह होता है कि लाखों मरीज समय पर और सही और पूरे उपचार से वंचित रह जाते हैं.

इस वजह से हो रहा नुकसान

  1. डॉ. ठुकराल आगे कहते हैं कि समस्या सिर्फ सुविधाओं की नहीं है, बल्कि सोच और सिस्टम दोनों की है. अस्पतालों में डिस्चार्ज के समय मरीजों को स्पष्ट रिकवरी रोडमैप नहीं दिया जाता. न ही यह बताया जाता है कि शुरुआती 6 से 8 हफ्तों में गहन और निरंतर थेरेपी कितनी जरूरी है. परिणामस्वरूप, परिवार अक्सर इसे वैकल्पिक मानकर टाल देते हैं.
  2. आर्थिक पहलू इस चुनौती को और जटिल बना देता है. पुनर्वास सेवाएं अभी भी बीमा कवरेज के दायरे में पूरी तरह शामिल नहीं हैं. ऐसे में परिवार इसे एक अतिरिक्त खर्च के रूप में देखते हैं, जबकि वास्तव में यह एक दीर्घकालिक निवेश है.
  3. जब मरीज पूरी तरह रिकवर नहीं कर पाता, तो इसका असर सिर्फ स्वास्थ्य तक सीमित नहीं रहता. उसकी काम करने की क्षमता प्रभावित होती है, परिवार पर देखभाल का दबाव बढ़ता है और धीरे-धीरे यह एक सामाजिक और आर्थिक बोझ में बदल जाता है.
  4. कोविड-19 महामारी ने इन खामियों को और उजागर किया. इलाज में आई रुकावटों और सेवाओं की कमी ने कई मरीजों की रिकवरी को प्रभावित किया और विकलांगता का बोझ बढ़ा दिया.

तेजी से रिकवरी है जरूरी
डॉक्टर कहते हैं कि तेजी से रिकवरी कोई विकल्प नहीं है, बल्कि जरूरत है. अगर हमें देश में विकलांगता का बोझ कम करना है, तो पुनर्वास को इलाज की निरंतर और अनिवार्य कड़ी के रूप में देखना होगा.

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