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Bangladesh BNP Welcomes BJP Win in West Bengal; Teesta Deal Hopes Rise

Bangladesh BNP Welcomes BJP Win in West Bengal; Teesta Deal Hopes Rise

ढाका2 मिनट पहले

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बांग्लादेश की सत्ताधारी पार्टी BNP ने पश्चिम बंगाल में BJP की जीत पर खुशी जताई है। न्यूज एजेंसी ANI से बात करते हुए BNP के सूचना सचिव अजीजुल बारी हेलाल ने BJP को जीत की बधाई दी और कहा कि इससे भारत-बांग्लादेश संबंध मजबूत हो सकते हैं।

उन्होंने ममता बनर्जी सरकार पर तीस्ता जल बंटवारे समझौते में देरी करने का आरोप लगाया और कहा कि वह इसमें सबसे बड़ी रुकावट थी। उन्होंने दावा किया कि यह समझौता बांग्लादेश सरकार और मोदी सरकार दोनों ही चाहते थे।

हेलाल ने उम्मीद जताई कि सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में बनी सरकार भारत और बांग्लादेश के रिश्तों को बेहतर बनाएगी और तीस्ता समझौते को आगे बढ़ाने में मदद करेगी।

उन्होंने कहा कि भारत के राज्यों में बांग्लादेश के साथ सबसे लंबी सीमा पश्चिम बंगाल की ही लगती है। इसलिए वहां की राजनीति का असर सीधे दोनों के संबंधों पर पड़ता है। वहां सत्ता बदलना दोनों देशों के लिए अच्छा है। इससे दोनों देशों के बीच सीमा मुद्दों पर भी सुधार हो सकता है।

तीस्ता नदी का 50% पानी चाहता है बांग्लादेश

तीस्ता नदी हिमालय के पाहुनरी ग्लेशियर से निकलती है। यह सिक्किम से पश्चिम बंगाल होते हुए बांग्लादेश जाती है और बाद में ब्रह्मपुत्र में मिल जाती है। यह नदी कुल 414 किलोमीटर का रास्ता तय करती है। इस नदी से बांग्लादेश की 2 करोड़ और भारत की 1 करोड़ की आबादी का जीवन-यापन जुड़ा है।

इस लंबी यात्रा के दौरान तीस्ता नदी की 83% यात्रा भारत में और 17% यात्रा बांग्लादेश में होती है। भारत और बांग्लादेश के बीच तीस्ता नदी के पानी के बंटवारे को लेकर कई सालों से विवाद है।

बांग्लादेश तीस्ता का 50 फीसदी पानी पर अधिकार चाहता है। जबकि भारत खुद 55 फीसदी पानी चाहता है। जानकारों के मुताबिक अगर तीस्ता नदी जल समझौता होता है तो पश्चिम बंगाल नदी के पानी का मनमुताबिक इस्तेमाल नहीं कर पाएगा। यही वजह है कि ममता बनर्जी इसे टालती रही।

लंबे समय से अटका है जल बंटवारा समझौता

1815 में नेपाल के राजा और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच तीस्ता नदी के पानी को लेकर समझौता हुआ था। तब राजा ने नदी के बड़े हिस्से पर नियंत्रण अंग्रेजों को सौंप दिया। बांग्लादेश के आजाद होने के 12 साल बाद 1983 में दोनों देशों के बीच अंतरिम समझौता हुआ।

इससमें बांग्लादेश को 36% और भारत को 39% पानी देने की बात थी, जबकि 25% हिस्से पर बाद में फैसला होना था। लेकिन यह समझौता भी पूरी तरह लागू नहीं हो पाया। बाद में बांग्लादेश ने कहना शुरू किया कि उसे जितना पानी मिल रहा है, वो उसकी जरूरत के हिसाब से कम है। सूखे में उसका इतने पानी से गुजारा नहीं हो पाता है।

साल 2008 में शेख हसीना के पीएम बनने के बाद से बांग्लादेश की मांग तेज होने लगी। 2011 में जब कांग्रेस की सरकार थी तब भारत, तीस्ता नदी जल समझौता पर दस्तखत करने को तैयार हो गया था। इसमें बांग्लादेश को 37.5% और भारत को 42.5% पानी देने की बात थी। बाकी 20% किसी देश को देने के लिए तय नहीं था। इसे ‘अनएलोकेटेड’ या रिजर्व पानी माना गया था।

ये हिस्सा नदी के प्राकृतिक बहाव, पर्यावरण और जरूरत के हिसाब से छोड़ा जाता है, ताकि नदी सूख न जाए और इकोसिस्टम बना रहे। हालांकि तब ममता बनर्जी की नाराजगी की वजह से मनमोहन सरकार को अपने कदम पीछे खींचने पड़े थे।

साल 2014 में जब नरेंद्र मोदी PM बने। एक साल बाद वो बंगाल की CM ममता बनर्जी के साथ बांग्लादेश गए। इस दौरान दोनों नेताओं ने बांग्लादेश को तीस्ता के बंटवारे पर एक सहमति का यकीन दिलाया था। लेकिन 11 साल बीतने के बावजूद अब तक तीस्ता नदी जल समझौते का समाधान नहीं निकल पाया है।

ममता सरकार इस समझौते का विरोध क्यों करती रही

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी लगातार तीस्ता और फरक्का जल बंटवारे के समझौतों का विरोध करती रही हैं। उनके मुताबिक इसका सीधा असर राज्य के लोगों की आजीविका पर पड़ेगा।

उनका तर्क है कि पहले ही तीस्ता नदी में पानी का प्रवाह कम हो चुका है, ऐसे में अगर बांग्लादेश के साथ अतिरिक्त पानी साझा किया गया तो उत्तर बंगाल में सिंचाई और पीने के पानी का संकट गहरा सकता है। साथ ही फरक्का बैराज से पानी मोड़ना कोलकाता पोर्ट की नौवहन क्षमता बनाए रखने के लिए जरूरी माना जाता है।

ममता सरकार का यह भी कहना रहा है कि इस तरह के संवेदनशील फैसलों में राज्य सरकार को भरोसे में लिए बिना कोई समझौता नहीं होना चाहिए, क्योंकि सबसे ज्यादा असर स्थानीय लोगों पर ही पड़ता है।

प्रधानमंत्री मोदी, बांग्लादेशी पीएम शेख हसीना और बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ये तस्वीर 2016 की है। तीनों शांति निकेतन में एक कार्यक्रम में पहुंचे थे।

प्रधानमंत्री मोदी, बांग्लादेशी पीएम शेख हसीना और बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ये तस्वीर 2016 की है। तीनों शांति निकेतन में एक कार्यक्रम में पहुंचे थे।

भारत-बांग्लादेश में सिर्फ 2 नदियों पर समझौते हुए

भारत और बांग्लादेश के बीच करीब 54 साझा नदियां हैं। लेकिन अब तक सिर्फ दो बड़ी नदियों पर ही औपचारिक समझौते हो पाए हैं। पहला गंगा नदी पर 1996 में हुआ समझौता और दूसरा कुशियारा नदी पर हाल का समझौता।

गंगा जल संधि 1996 30 साल के लिए किया गया था, जिसकी अवधि 2026 में पूरी हो रही है। यानी अब इस पर दोबारा बातचीत की जरूरत पड़ेगी।

तीस्ता नदी पर अब तक कोई स्थायी समझौता नहीं हो पाया है और यह सबसे बड़ा विवाद बना हुआ है। वहीं फेनी नदी के मामले में पूरी तरह बड़ा समझौता नहीं हुआ, लेकिन 2019 में सीमित स्तर पर पानी देने को लेकर सहमति बनी थी।

जब भारत किसी नदी पर समझौता नहीं कर पाता, तो बांग्लादेश में यह धारणा बनती है कि भारत अपनी घरेलू राजनीति, खासकर राज्यों के दबाव की वजह से फैसले टाल रहा है। दूसरी तरफ भारत के लिए यह संतुलन का मामला है, क्योंकि उसे एक तरफ पड़ोसी देश के साथ रिश्ते संभालने होते हैं और दूसरी तरफ अपने राज्यों, जैसे पश्चिम बंगाल की जरूरतों का भी ध्यान रखना पड़ता है।

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यह खबर भी पढ़ें…

कर्ज से परेशान पाकिस्तान ने शराब एक्सपोर्ट शुरू किया:गैर मुस्लिम देशों को सप्लाई, 50 साल पहले इस्लाम का हवाला देकर बैन किया था

कर्ज से जूझ रहे पाकिस्तान ने 50 साल बाद फिर से दूसरे देशों को शराब बेचना शुरू कर दिया है। देश की इकलौती लोकल कंपनी मरी ब्रूअरी ने अप्रैल 2026 में ब्रिटेन, जापान, पुर्तगाल और थाईलैंड जैसे देशों को बीयर और अन्य अल्कोहलिक ड्रिंक्स एक्सपोर्ट की हैं।

कंपनी के एक्सपोर्ट मैनेजर रमीज शाह के मुताबिक, अभी शुरुआत में विदेशों में नेटवर्क बनाया जा रहा है और आगे चलकर प्रोडक्शन बढ़ाने की योजना है।

पाकिस्तान में मुस्लिम आबादी के लिए करीब 50 साल पहले इस्लामिक नियमों का हवाला देकर शराब पर बैन लगाया गया था। इसके बाद शराब का एक्सपोर्ट भी बंद हो गया था। हालांकि, पाकिस्तान में गैर-मुस्लिमों के लिए कुछ छूट थी। पूरी खबर पढ़ें…

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उन्होंने ममता बनर्जी सरकार पर तीस्ता जल बंटवारे समझौते में देरी करने का आरोप लगाया और कहा कि वह इसमें सबसे बड़ी रुकावट थी। उन्होंने दावा किया कि यह समझौता बांग्लादेश सरकार और मोदी सरकार दोनों ही चाहते थे।

हेलाल ने उम्मीद जताई कि सुवेंदु अधिकारी के नेतृत्व में बनी सरकार भारत और बांग्लादेश के रिश्तों को बेहतर बनाएगी और तीस्ता समझौते को आगे बढ़ाने में मदद करेगी।

उन्होंने कहा कि भारत के राज्यों में बांग्लादेश के साथ सबसे लंबी सीमा पश्चिम बंगाल की ही लगती है। इसलिए वहां की राजनीति का असर सीधे दोनों के संबंधों पर पड़ता है। वहां सत्ता बदलना दोनों देशों के लिए अच्छा है। इससे दोनों देशों के बीच सीमा मुद्दों पर भी सुधार हो सकता है।

तीस्ता नदी का 50% पानी चाहता है बांग्लादेश

तीस्ता नदी हिमालय के पाहुनरी ग्लेशियर से निकलती है। यह सिक्किम से पश्चिम बंगाल होते हुए बांग्लादेश जाती है और बाद में ब्रह्मपुत्र में मिल जाती है। यह नदी कुल 414 किलोमीटर का रास्ता तय करती है। इस नदी से बांग्लादेश की 2 करोड़ और भारत की 1 करोड़ की आबादी का जीवन-यापन जुड़ा है।

इस लंबी यात्रा के दौरान तीस्ता नदी की 83% यात्रा भारत में और 17% यात्रा बांग्लादेश में होती है। भारत और बांग्लादेश के बीच तीस्ता नदी के पानी के बंटवारे को लेकर कई सालों से विवाद है।

बांग्लादेश तीस्ता का 50 फीसदी पानी पर अधिकार चाहता है। जबकि भारत खुद 55 फीसदी पानी चाहता है। जानकारों के मुताबिक अगर तीस्ता नदी जल समझौता होता है तो पश्चिम बंगाल नदी के पानी का मनमुताबिक इस्तेमाल नहीं कर पाएगा। यही वजह है कि ममता बनर्जी इसे टालती रही।

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1815 में नेपाल के राजा और ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच तीस्ता नदी के पानी को लेकर समझौता हुआ था। तब राजा ने नदी के बड़े हिस्से पर नियंत्रण अंग्रेजों को सौंप दिया। बांग्लादेश के आजाद होने के 12 साल बाद 1983 में दोनों देशों के बीच अंतरिम समझौता हुआ।

इससमें बांग्लादेश को 36% और भारत को 39% पानी देने की बात थी, जबकि 25% हिस्से पर बाद में फैसला होना था। लेकिन यह समझौता भी पूरी तरह लागू नहीं हो पाया। बाद में बांग्लादेश ने कहना शुरू किया कि उसे जितना पानी मिल रहा है, वो उसकी जरूरत के हिसाब से कम है। सूखे में उसका इतने पानी से गुजारा नहीं हो पाता है।

साल 2008 में शेख हसीना के पीएम बनने के बाद से बांग्लादेश की मांग तेज होने लगी। 2011 में जब कांग्रेस की सरकार थी तब भारत, तीस्ता नदी जल समझौता पर दस्तखत करने को तैयार हो गया था। इसमें बांग्लादेश को 37.5% और भारत को 42.5% पानी देने की बात थी। बाकी 20% किसी देश को देने के लिए तय नहीं था। इसे ‘अनएलोकेटेड’ या रिजर्व पानी माना गया था।

ये हिस्सा नदी के प्राकृतिक बहाव, पर्यावरण और जरूरत के हिसाब से छोड़ा जाता है, ताकि नदी सूख न जाए और इकोसिस्टम बना रहे। हालांकि तब ममता बनर्जी की नाराजगी की वजह से मनमोहन सरकार को अपने कदम पीछे खींचने पड़े थे।

साल 2014 में जब नरेंद्र मोदी PM बने। एक साल बाद वो बंगाल की CM ममता बनर्जी के साथ बांग्लादेश गए। इस दौरान दोनों नेताओं ने बांग्लादेश को तीस्ता के बंटवारे पर एक सहमति का यकीन दिलाया था। लेकिन 11 साल बीतने के बावजूद अब तक तीस्ता नदी जल समझौते का समाधान नहीं निकल पाया है।

ममता सरकार इस समझौते का विरोध क्यों करती रही

पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी लगातार तीस्ता और फरक्का जल बंटवारे के समझौतों का विरोध करती रही हैं। उनके मुताबिक इसका सीधा असर राज्य के लोगों की आजीविका पर पड़ेगा।

उनका तर्क है कि पहले ही तीस्ता नदी में पानी का प्रवाह कम हो चुका है, ऐसे में अगर बांग्लादेश के साथ अतिरिक्त पानी साझा किया गया तो उत्तर बंगाल में सिंचाई और पीने के पानी का संकट गहरा सकता है। साथ ही फरक्का बैराज से पानी मोड़ना कोलकाता पोर्ट की नौवहन क्षमता बनाए रखने के लिए जरूरी माना जाता है।

ममता सरकार का यह भी कहना रहा है कि इस तरह के संवेदनशील फैसलों में राज्य सरकार को भरोसे में लिए बिना कोई समझौता नहीं होना चाहिए, क्योंकि सबसे ज्यादा असर स्थानीय लोगों पर ही पड़ता है।

प्रधानमंत्री मोदी, बांग्लादेशी पीएम शेख हसीना और बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की ये तस्वीर 2016 की है। तीनों शांति निकेतन में एक कार्यक्रम में पहुंचे थे।

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भारत-बांग्लादेश में सिर्फ 2 नदियों पर समझौते हुए

भारत और बांग्लादेश के बीच करीब 54 साझा नदियां हैं। लेकिन अब तक सिर्फ दो बड़ी नदियों पर ही औपचारिक समझौते हो पाए हैं। पहला गंगा नदी पर 1996 में हुआ समझौता और दूसरा कुशियारा नदी पर हाल का समझौता।

गंगा जल संधि 1996 30 साल के लिए किया गया था, जिसकी अवधि 2026 में पूरी हो रही है। यानी अब इस पर दोबारा बातचीत की जरूरत पड़ेगी।

तीस्ता नदी पर अब तक कोई स्थायी समझौता नहीं हो पाया है और यह सबसे बड़ा विवाद बना हुआ है। वहीं फेनी नदी के मामले में पूरी तरह बड़ा समझौता नहीं हुआ, लेकिन 2019 में सीमित स्तर पर पानी देने को लेकर सहमति बनी थी।

जब भारत किसी नदी पर समझौता नहीं कर पाता, तो बांग्लादेश में यह धारणा बनती है कि भारत अपनी घरेलू राजनीति, खासकर राज्यों के दबाव की वजह से फैसले टाल रहा है। दूसरी तरफ भारत के लिए यह संतुलन का मामला है, क्योंकि उसे एक तरफ पड़ोसी देश के साथ रिश्ते संभालने होते हैं और दूसरी तरफ अपने राज्यों, जैसे पश्चिम बंगाल की जरूरतों का भी ध्यान रखना पड़ता है।

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कंपनी के एक्सपोर्ट मैनेजर रमीज शाह के मुताबिक, अभी शुरुआत में विदेशों में नेटवर्क बनाया जा रहा है और आगे चलकर प्रोडक्शन बढ़ाने की योजना है।

पाकिस्तान में मुस्लिम आबादी के लिए करीब 50 साल पहले इस्लामिक नियमों का हवाला देकर शराब पर बैन लगाया गया था। इसके बाद शराब का एक्सपोर्ट भी बंद हो गया था। हालांकि, पाकिस्तान में गैर-मुस्लिमों के लिए कुछ छूट थी। पूरी खबर पढ़ें…

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