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डॉलर के मुकाबले रुपया ऑल टाइम लो पर आया:1 डॉलर की कीमत 95.94 रुपए हुई, इससे महंगाई बढ़ने का खतरा

डॉलर के मुकाबले रुपया ऑल टाइम लो पर आया:1 डॉलर की कीमत 95.94 रुपए हुई, इससे महंगाई बढ़ने का खतरा

रुपया आज 15 मई को डॉलर के मुकाबले 30 पैसे गिरकर 95.94 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया है। इससे पहले गुरुवार को रुपया 95.64 के ऑल टाइम लो पर पहुंचा था। पिछले कुछ दिनों से रुपए में लगातार गिरावट जारी है। साल 2026 की शुरुआत से ही रुपया दबाव में है। पिछले साल दिसंबर 2025 में पहली बार रुपया 90 के स्तर के पार गया था। इससे महंगाई बढ़ने का खतरा बढ़ गया है। मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं और जियोपॉलिटिकल तनाव कम नहीं हुआ, तो रुपया जल्द ही 100 के स्तर को भी छू सकता है। रुपए में गिरावट के प्रमुख कारण मिडिल ईस्ट तनाव: अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव और होर्मुज रूट में सप्लाई बाधित होने की आशंका ने बाजार में डर पैदा कर दिया है। युद्ध के कारण निवेशक सुरक्षित निवेश के लिए डॉलर की ओर भाग रहे हैं। कच्चे तेल के दाम: भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 107 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गया है। तेल महंगा होने से भारत को अधिक डॉलर चुकाने पड़ रहे हैं, जिससे रुपए पर दबाव बढ़ गया है। मजबूत होता डॉलर इंडेक्स: दुनिया की 6 प्रमुख करेंसी के मुकाबले डॉलर की मजबूती को मापने वाला डॉलर इंडेक्स 99.05 के स्तर पर पहुंच गया है। जब डॉलर ग्लोबल मार्केट में मजबूत होता है, तो रुपया और अन्य एशियाई करेंसी कमजोर हो जाती हैं। विदेशी निवेशकों की निकासी: विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय शेयर बाजार से लगातार पैसा निकाल रहे हैं। अकेले बुधवार को FII ने 4,700 करोड़ रुपए से ज्यादा के शेयर बेचे। बाजार से डॉलर बाहर जाने के कारण रुपए की वैल्यू घट रही है। बढ़ती महंगाई का डर: भारत में थोक महंगाई दर (WPI) साढ़े तीन साल के उच्च स्तर पर पहुंच गई है। एनर्जी की बढ़ती कीमतों से ‘इंपोर्टेड इन्फ्लेशन’ का खतरा बढ़ गया है, जिससे इकोनॉमी के सेंटीमेंट बिगड़े हैं। डॉलर महंगा, भारत में महंगाई बढ़ने का खतरा मिडिल ईस्ट संघर्ष को दशकों का सबसे गंभीर एनर्जी संकट माना जा रहा है, जिसका सीधा असर भारत पर पड़ रहा है। तेल की कीमतें: कच्चे तेल महंगे होने से भारत का इम्पोर्ट बिल बढ़ा है। जरूरी सामान महंगा: LPG, प्लास्टिक और अन्य पेट्रोकेमिकल प्रोडक्ट्स की सप्लाई प्रभावित। महंगाई का डर: डॉलर महंगा होने से पेट्रोल-डीजल और इम्पोर्टेड सामान महंगे होंगे, जिससे रिटेल महंगाई बढ़ सकती है। विदेश में पढ़ाई-घूमना महंगा: विदेश जाने या पढ़ाई के लिए डॉलर खरीदने पर अब ज्यादा रुपए खर्च करने होंगे। इलेक्ट्रॉनिक्स महंगे: मोबाइल, लैपटॉप और आयातित पार्ट्स महंगे हो सकते हैं, क्योंकि भुगतान डॉलर में होता है। तेल उत्पादन पिछले दो दशकों में सबसे निचले स्तर पर रॉयटर्स के सर्वे के मुताबिक, अप्रैल में ओपेक (OPEC) देशों का तेल उत्पादन पिछले दो दशकों में सबसे निचले स्तर पर रहा है। सऊदी अरामको के CEO अमीन नासिर ने चेतावनी दी है कि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से तेल निर्यात में रुकावट के कारण बाजार में स्थिरता आने में 2027 तक का समय लग सकता है। इससे हर हफ्ते करीब 10 करोड़ बैरल तेल का नुकसान हो रहा है। इन्वेस्टमेंट बैंक जेपी मॉर्गन ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज अगले महीने खुल भी जाता है, तो भी तेल की कीमतें इस साल 100 डॉलर के आसपास बनी रहेंगी। रिपोर्ट में बताया गया है कि रास्ता खुलने के बाद भी लॉजिस्टिक और टैंकरों की कमी के कारण सप्लाई सामान्य होने में समय लगेगा। प्रधानमंत्री की अपील और सरकार के कड़े कदम रुपए में लगातार आ रही गिरावट को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले हफ्ते देशवासियों से विदेशी मुद्रा भंडार बचाने के लिए अपील की थी। उन्होंने लोगों से फिजूलखर्ची कम करने और देशहित में आर्थिक अनुशासन बनाए रखने को कहा था। इसी कड़ी में सरकार ने मंगलवार रात कीमती धातुओं के आयात पर टैरिफ बढ़ा दिए थे ताकि डॉलर के बाहर जाने की रफ्तार को कम किया जा सके। ट्रेडर्स का मानना है कि आने वाले समय में रुपए में और गिरावट देखी जा सकती है। करेंसी की कीमत कैसे तय होती है? डॉलर के मुकाबले किसी करेंसी की वैल्यू घटे तो उसे मुद्रा का गिरना या कमजोरी (करेंसी डेप्रिसिएशन) कहते हैं। हर देश के पास फॉरेन करेंसी रिजर्व होता है, जिससे इंटरनेशनल ट्रांजैक्शन होते हैं। इसके घटने-बढ़ने का असर करेंसी पर पड़ता है। अगर भारत के फॉरेन रिजर्व में डॉलर पर्याप्त होंगे तो रुपया स्थिर रहेगा। डॉलर घटे तो रुपया कमजोर, बढ़े तो मजबूत होगा।

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रुपया आज 15 मई को डॉलर के मुकाबले 30 पैसे गिरकर 95.94 के रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया है। इससे पहले गुरुवार को रुपया 95.64 के ऑल टाइम लो पर पहुंचा था। पिछले कुछ दिनों से रुपए में लगातार गिरावट जारी है। साल 2026 की शुरुआत से ही रुपया दबाव में है। पिछले साल दिसंबर 2025 में पहली बार रुपया 90 के स्तर के पार गया था। इससे महंगाई बढ़ने का खतरा बढ़ गया है। मार्केट एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर कच्चे तेल की कीमतें इसी तरह बढ़ती रहीं और जियोपॉलिटिकल तनाव कम नहीं हुआ, तो रुपया जल्द ही 100 के स्तर को भी छू सकता है। रुपए में गिरावट के प्रमुख कारण मिडिल ईस्ट तनाव: अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच बढ़ते तनाव और होर्मुज रूट में सप्लाई बाधित होने की आशंका ने बाजार में डर पैदा कर दिया है। युद्ध के कारण निवेशक सुरक्षित निवेश के लिए डॉलर की ओर भाग रहे हैं। कच्चे तेल के दाम: भारत अपनी जरूरत का 85% से ज्यादा कच्चा तेल आयात करता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्रेंट क्रूड 107 डॉलर प्रति बैरल के पार निकल गया है। तेल महंगा होने से भारत को अधिक डॉलर चुकाने पड़ रहे हैं, जिससे रुपए पर दबाव बढ़ गया है। मजबूत होता डॉलर इंडेक्स: दुनिया की 6 प्रमुख करेंसी के मुकाबले डॉलर की मजबूती को मापने वाला डॉलर इंडेक्स 99.05 के स्तर पर पहुंच गया है। जब डॉलर ग्लोबल मार्केट में मजबूत होता है, तो रुपया और अन्य एशियाई करेंसी कमजोर हो जाती हैं। विदेशी निवेशकों की निकासी: विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय शेयर बाजार से लगातार पैसा निकाल रहे हैं। अकेले बुधवार को FII ने 4,700 करोड़ रुपए से ज्यादा के शेयर बेचे। बाजार से डॉलर बाहर जाने के कारण रुपए की वैल्यू घट रही है। बढ़ती महंगाई का डर: भारत में थोक महंगाई दर (WPI) साढ़े तीन साल के उच्च स्तर पर पहुंच गई है। एनर्जी की बढ़ती कीमतों से ‘इंपोर्टेड इन्फ्लेशन’ का खतरा बढ़ गया है, जिससे इकोनॉमी के सेंटीमेंट बिगड़े हैं। डॉलर महंगा, भारत में महंगाई बढ़ने का खतरा मिडिल ईस्ट संघर्ष को दशकों का सबसे गंभीर एनर्जी संकट माना जा रहा है, जिसका सीधा असर भारत पर पड़ रहा है। तेल की कीमतें: कच्चे तेल महंगे होने से भारत का इम्पोर्ट बिल बढ़ा है। जरूरी सामान महंगा: LPG, प्लास्टिक और अन्य पेट्रोकेमिकल प्रोडक्ट्स की सप्लाई प्रभावित। महंगाई का डर: डॉलर महंगा होने से पेट्रोल-डीजल और इम्पोर्टेड सामान महंगे होंगे, जिससे रिटेल महंगाई बढ़ सकती है। विदेश में पढ़ाई-घूमना महंगा: विदेश जाने या पढ़ाई के लिए डॉलर खरीदने पर अब ज्यादा रुपए खर्च करने होंगे। इलेक्ट्रॉनिक्स महंगे: मोबाइल, लैपटॉप और आयातित पार्ट्स महंगे हो सकते हैं, क्योंकि भुगतान डॉलर में होता है। तेल उत्पादन पिछले दो दशकों में सबसे निचले स्तर पर रॉयटर्स के सर्वे के मुताबिक, अप्रैल में ओपेक (OPEC) देशों का तेल उत्पादन पिछले दो दशकों में सबसे निचले स्तर पर रहा है। सऊदी अरामको के CEO अमीन नासिर ने चेतावनी दी है कि स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से तेल निर्यात में रुकावट के कारण बाजार में स्थिरता आने में 2027 तक का समय लग सकता है। इससे हर हफ्ते करीब 10 करोड़ बैरल तेल का नुकसान हो रहा है। इन्वेस्टमेंट बैंक जेपी मॉर्गन ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि अगर स्ट्रेट ऑफ होर्मुज अगले महीने खुल भी जाता है, तो भी तेल की कीमतें इस साल 100 डॉलर के आसपास बनी रहेंगी। रिपोर्ट में बताया गया है कि रास्ता खुलने के बाद भी लॉजिस्टिक और टैंकरों की कमी के कारण सप्लाई सामान्य होने में समय लगेगा। प्रधानमंत्री की अपील और सरकार के कड़े कदम रुपए में लगातार आ रही गिरावट को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले हफ्ते देशवासियों से विदेशी मुद्रा भंडार बचाने के लिए अपील की थी। उन्होंने लोगों से फिजूलखर्ची कम करने और देशहित में आर्थिक अनुशासन बनाए रखने को कहा था। इसी कड़ी में सरकार ने मंगलवार रात कीमती धातुओं के आयात पर टैरिफ बढ़ा दिए थे ताकि डॉलर के बाहर जाने की रफ्तार को कम किया जा सके। ट्रेडर्स का मानना है कि आने वाले समय में रुपए में और गिरावट देखी जा सकती है। करेंसी की कीमत कैसे तय होती है? डॉलर के मुकाबले किसी करेंसी की वैल्यू घटे तो उसे मुद्रा का गिरना या कमजोरी (करेंसी डेप्रिसिएशन) कहते हैं। हर देश के पास फॉरेन करेंसी रिजर्व होता है, जिससे इंटरनेशनल ट्रांजैक्शन होते हैं। इसके घटने-बढ़ने का असर करेंसी पर पड़ता है। अगर भारत के फॉरेन रिजर्व में डॉलर पर्याप्त होंगे तो रुपया स्थिर रहेगा। डॉलर घटे तो रुपया कमजोर, बढ़े तो मजबूत होगा।

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