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नाक से खून, कब्ज और पीसीओएस में मददगार, जानें आयुर्वेद में दूब का महत्व, कई बीमारियों में असरदार – Uttar Pradesh News

नाक से खून आना

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सनन्दन उपाध्याय/बलिया: हर जगह दिखने वाली साधारण घास, जो खेत से लेकर आंगन और आयुर्वेद से लेकर आस्था तक अपनी अलग पहचान रखती है. जी हां आमतौर पर पैरों तले बिछी रहने वाली यह घास औषधीय गुणों का खजाना है. इसका सही तरीके से प्रयोग कर कई रोगों से छुटकारा पाया जा सकता है. आगे विस्तार से जानिए…

सेहत की दुनिया में दूब घास को प्राकृतिक उपचार के रूप में बेहद उपयोगी बताया गया है. इसे शीतल, रक्तस्तंभक और पाचन सुधारक भी कहा गया है. इसके अलावा, नकसीर यानी नाक से खून आने पर दूब का ताजा रस माथे पर लगाने और कुछ मात्रा में सेवन करने से राहत मिल सकती है. यहीं नहीं, गर्मियों में शरीर की आंतरिक गर्मी शांत करने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जाता है.

रक्तस्राव और दर्द

दुर्वा यानी दूब महिलाओं के लिए भी फायदेमंद है. पीसीओएस जैसी हार्मोनल असंतुलन की स्थिति में भी दूब का रस दही के साथ लेने से अत्यधिक रक्तस्राव और दर्द में आराम मिल सकता है. ध्यान रखें कि, विशेषज्ञ सलाह के बिना किसी भी घरेलू नुस्खे को अपनाना उचित नहीं होता है. हालांकि, ग्रामीण परंपराओं में इसका प्रयोग आज भी किया जाता है.

पेट रोग

राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय नगर बलिया की सात साल अनुभवी आयुर्वेदाचार्य डॉ प्रियंका सिंह के अनुसार, दूब कब्ज से राहत दिलाने और पेट को साफ रखने में बेहद लाभकारी और गुणकारी साबित हो सकती है. इसका हल्का काढ़ा बनाकर पीने से गैस और अपच में आराम मिलने की बात कही जाती है. इसके अलावा, इसमें प्राकृतिक तत्व भी पाए जाते हैं, जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने में मददगार हैं.

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मधुमेह और एनीमिया

शुगर और खून की कमी जैसी समस्याओं में भी दूब का उल्लेख मिलता है। पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में इसके अर्क को ब्लड शुगर संतुलित करने में सहायक माना गया है. इसमें आयरन तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं, जो खून की कमी दूर करने में उपयोगी सिद्ध हो सकती है.

धार्मिक दृष्टिकोण

धार्मिक दृष्टिकोण से दूब का अत्यंत पवित्र स्थान है. हिंदू परंपरा में इसे भगवान गणेश जी को अर्पित किया जाता है और शुभ का प्रतीक माना जाता है. पूजा-पाठ में दूर्वा चढ़ाने की परंपरा केवल आस्था नहीं है, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान का संदेश भी देती है. इस छोटी सी घास को भारतीय संस्कृति से गहरा जुड़ाव है.

खेती और पशुपालन

खेती और पशुपालन में भी दूब का महत्त्व कम नहीं है. लमसम 10 से 12% प्रोटीन युक्त यह घास पशुओं के लिए पौष्टिक चारे का काम करती है. सूखे की स्थिति में भी तेजी से उगने की इसकी क्षमता रखने के कारण किसानों का भरोसेमंद साथी भी है. कई जगहों पर तो प्राकृतिक चारे के रूप में भी इसको प्राथमिकता दी जाती है.

दूब की खासियत

दूब का पर्यावरण संरक्षण में भी अहम भूमिका होती है. इसकी जड़ें मिट्टी को मजबूती से पकड़ती हैं, जिससे कटाव रुक जाती है. यही कारण है कि इसे लॉन, पार्क और गोल्फ कोर्स में बड़े पैमाने पर लगाया जाता है. कम देखभाल में भी हरी-भरी रहने वाली यह घास सचमुच धरती की हरी और मजबूत ढाल है.

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नाक से खून आना

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सनन्दन उपाध्याय/बलिया: हर जगह दिखने वाली साधारण घास, जो खेत से लेकर आंगन और आयुर्वेद से लेकर आस्था तक अपनी अलग पहचान रखती है. जी हां आमतौर पर पैरों तले बिछी रहने वाली यह घास औषधीय गुणों का खजाना है. इसका सही तरीके से प्रयोग कर कई रोगों से छुटकारा पाया जा सकता है. आगे विस्तार से जानिए…

सेहत की दुनिया में दूब घास को प्राकृतिक उपचार के रूप में बेहद उपयोगी बताया गया है. इसे शीतल, रक्तस्तंभक और पाचन सुधारक भी कहा गया है. इसके अलावा, नकसीर यानी नाक से खून आने पर दूब का ताजा रस माथे पर लगाने और कुछ मात्रा में सेवन करने से राहत मिल सकती है. यहीं नहीं, गर्मियों में शरीर की आंतरिक गर्मी शांत करने के लिए भी इसका इस्तेमाल किया जाता है.

रक्तस्राव और दर्द

दुर्वा यानी दूब महिलाओं के लिए भी फायदेमंद है. पीसीओएस जैसी हार्मोनल असंतुलन की स्थिति में भी दूब का रस दही के साथ लेने से अत्यधिक रक्तस्राव और दर्द में आराम मिल सकता है. ध्यान रखें कि, विशेषज्ञ सलाह के बिना किसी भी घरेलू नुस्खे को अपनाना उचित नहीं होता है. हालांकि, ग्रामीण परंपराओं में इसका प्रयोग आज भी किया जाता है.

पेट रोग

राजकीय आयुर्वेदिक चिकित्सालय नगर बलिया की सात साल अनुभवी आयुर्वेदाचार्य डॉ प्रियंका सिंह के अनुसार, दूब कब्ज से राहत दिलाने और पेट को साफ रखने में बेहद लाभकारी और गुणकारी साबित हो सकती है. इसका हल्का काढ़ा बनाकर पीने से गैस और अपच में आराम मिलने की बात कही जाती है. इसके अलावा, इसमें प्राकृतिक तत्व भी पाए जाते हैं, जो शरीर की प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत करने में मददगार हैं.

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मधुमेह और एनीमिया

शुगर और खून की कमी जैसी समस्याओं में भी दूब का उल्लेख मिलता है। पारंपरिक चिकित्सा पद्धतियों में इसके अर्क को ब्लड शुगर संतुलित करने में सहायक माना गया है. इसमें आयरन तत्व भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं, जो खून की कमी दूर करने में उपयोगी सिद्ध हो सकती है.

धार्मिक दृष्टिकोण

धार्मिक दृष्टिकोण से दूब का अत्यंत पवित्र स्थान है. हिंदू परंपरा में इसे भगवान गणेश जी को अर्पित किया जाता है और शुभ का प्रतीक माना जाता है. पूजा-पाठ में दूर्वा चढ़ाने की परंपरा केवल आस्था नहीं है, बल्कि प्रकृति के प्रति सम्मान का संदेश भी देती है. इस छोटी सी घास को भारतीय संस्कृति से गहरा जुड़ाव है.

खेती और पशुपालन

खेती और पशुपालन में भी दूब का महत्त्व कम नहीं है. लमसम 10 से 12% प्रोटीन युक्त यह घास पशुओं के लिए पौष्टिक चारे का काम करती है. सूखे की स्थिति में भी तेजी से उगने की इसकी क्षमता रखने के कारण किसानों का भरोसेमंद साथी भी है. कई जगहों पर तो प्राकृतिक चारे के रूप में भी इसको प्राथमिकता दी जाती है.

दूब की खासियत

दूब का पर्यावरण संरक्षण में भी अहम भूमिका होती है. इसकी जड़ें मिट्टी को मजबूती से पकड़ती हैं, जिससे कटाव रुक जाती है. यही कारण है कि इसे लॉन, पार्क और गोल्फ कोर्स में बड़े पैमाने पर लगाया जाता है. कम देखभाल में भी हरी-भरी रहने वाली यह घास सचमुच धरती की हरी और मजबूत ढाल है.

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