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आर्थिक संकट में देश संभालना बड़ी जिम्मेदारी:मनोज बाजपेयी बोले- आम आदमी खर्च नियंत्रित कर सकता है, लेकिन देश को संकट से एक्सपर्ट्स ही निकालते हैं

आर्थिक संकट में देश संभालना बड़ी जिम्मेदारी:मनोज बाजपेयी बोले- आम आदमी खर्च नियंत्रित कर सकता है, लेकिन देश को संकट से एक्सपर्ट्स ही निकालते हैं

1991 के आर्थिक संकट पर बनी फिल्म ‘गवर्नर: द साइलेंट सेवियर’ को लेकर मनोज बाजपेयी ने दैनिक भास्कर से बातचीत की। उन्होंने कहा कि फिल्म में एक आरबीआई गवर्नर के देश की उम्मीद बनने और देश को संकट से निकालने की जंग दिखाई गई है। मनोज ने इसे ‘इकोनॉमिक थ्रिलर’ बताया। उन्होंने वैश्विक हालात, ईरान-यूएस तनाव, आम आदमी की परेशानियों, ओटीटी और थिएटर की कमी पर भी राय रखी। सवाल: फिल्म ‘गवर्नर: द साइलेंट सेवियर’ किस बारे में है? जवाब: यह सिर्फ एक आरबीआई गवर्नर नहीं, बल्कि बड़ी जिम्मेदारी की कहानी है। आर्थिक संकट के समय हर नजर आप पर हो तो कितना दबाव होता है, फिल्म यही दिखाती है। ऐसे समय परिवार और निजी जिंदगी पीछे छूट जाती है। फिल्म उसी संघर्ष और दबाव को दिखाती है। सवाल: फिल्म में इकोनॉमिक्स और आरबीआई जैसे कठिन विषय हैं। आम दर्शक इसे कैसे समझ पाएंगे? जवाब: फिल्म में जीडीपी, फिस्कल डेफिसिट और इन्फ्लेशन जैसे शब्द हैं, लेकिन उन्हें आसान तरीके से दिखाया गया है। यह क्लासरूम वाली फिल्म नहीं, बल्कि ‘इकोनॉमिक थ्रिलर’ है। यहां कम समय में देश को आर्थिक संकट से बाहर निकालने की चुनौती ही रोमांच पैदा करती है। सवाल: इस किरदार की तैयारी कैसे की? जवाब: मैंने स्क्रिप्ट कई बार पढ़ी और जो बातें समझ नहीं आईं, उन्हें डायरेक्टर व राइटर्स से समझा। डायरेक्टर पढ़ने का मटेरियल और वीडियो भेजते थे। किरदार का लुक और बोलने का तरीका तय किया गया। करीब ढाई महीने तैयारी चली। टेक्निकल शब्दों को समझकर उन्हें आसान तरीके से दर्शकों तक पहुंचाना सबसे मुश्किल था। सवाल: एक तरफ आप राम गोपाल वर्मा की फिल्म कर रहे थे, जहां माहौल बिल्कुल अलग था, जबकि ‘गवर्नर’ के सेट पर लोग आपको बहुत शांत और गंभीर इंसान के तौर पर देखने लगे थे। ऐसा क्या था इस किरदार में? जवाब: यह किरदार कम बोलने वाला इंसान है, जो ज्यादातर अपने विचारों में व्यस्त रहता है। नंबर, गणित और बड़ी जिम्मेदारियों से जुड़े लोग अक्सर शांत होते हैं और लगातार चुनौतियों पर सोचते रहते हैं। आरबीआई गवर्नर भी हर समय संकट सुलझाने में लगा रहता है, इसलिए यह गंभीर नहीं बल्कि भीतर से लगातार सोचने वाले व्यक्ति का किरदार है। सवाल: क्या फिल्म में गंभीरता के साथ ह्यूमर भी देखने को मिलेगा? जवाब: बिल्कुल। फिल्म में फैमिली बॉन्डिंग है। मधु मेरी पत्नी का रोल कर रही हैं। उनकी फिल्म ‘रोजा’ देखकर पागल हो गए थे। उनके साथ के सीन हल्के और प्यारे हैं। ऑफिस के कुछ हिस्सों में भी ह्यूमर है। थ्रिलर होने के कारण दर्शक कहानी से जुड़े रहेंगे। सवाल: आप इतिहास के छात्र भी रहे हैं। 1991 के आर्थिक संकट और आज के हालात में क्या समानता देखते हैं? जवाब: 1991 में गल्फ वॉर के दौरान तेल के दाम बढ़ रहे थे और भारत आर्थिक संकट से जूझ रहा था। आज भी यूएस-ईरान जैसे तनावों का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। तेल महंगा होता है, डॉलर मजबूत होता है और भारत जैसे देशों पर दबाव बढ़ता है। इतिहास पूरी तरह नहीं दोहराता, लेकिन उसकी झलक जरूर दिखती है। सवाल: ऐसे संकट के समय आम आदमी क्या कर सकता है? जवाब: बड़े आर्थिक फैसले एक्सपर्ट्स और सरकारों का काम हैं। आम आदमी अपने खर्च नियंत्रित कर सकता है। मुश्किल समय में लोग फिजूल खर्च, घर खरीदने, घूमने और बड़े खर्चों से बचते हैं। लोग संभलकर चलते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि आगे का समय कठिन हो सकता है। सवाल: क्या आम आदमी सिस्टम बदल सकता है? जवाब: सिस्टम तभी तक मजबूत रहता है, जब तक आम आदमी सवाल नहीं पूछता। समस्याएं नहीं सुनी जाएं तो लोग आवाज उठाते हैं। इतिहास में कई बार आम आदमी ने बदलाव लाया है। इमरजेंसी और 1991 के संकट जैसे दौरों में भी लोगों की ताकत सामने आई है। सवाल: फिल्म की रिलीज के साथ दूसरी बड़ी फिल्में भी आ रही हैं। क्या ऐसी फिल्मों को सोलो रिलीज मिलनी चाहिए? जवाब: भारत में सबसे बड़ी समस्या थिएटर की कमी है। सरकार और इंडस्ट्री ज्यादा सिनेमाघर बनवाएं तो छोटी-बड़ी सभी फिल्मों को बराबर मौका मिलेगा। हर फिल्म को दर्शकों तक पहुंचने का अधिकार है। सवाल: क्या कुछ बड़े प्रोडक्शन हाउस की मोनोपोली भी खत्म होनी चाहिए? जवाब: हां। यह तय होना चाहिए कि किस बजट की फिल्म को कितने शो मिलें। छोटी फिल्मों को बड़ी फिल्मों के ज्यादा स्क्रीन लेने से नुकसान नहीं होना चाहिए। हर फिल्म को दर्शकों तक पहुंचने का बराबर मौका मिलना चाहिए। सवाल: ओटीटी ने इस तरह की फिल्मों को कितना फायदा पहुंचाया? जवाब: ओटीटी ने बहुत फायदा पहुंचाया और मुझे भी अच्छा काम करने का मौका मिला। लेकिन अब प्लेटफॉर्म ज्यादा कमर्शियल और असुरक्षित हो गए हैं। पहले अलग तरह की कहानियों को ज्यादा मौका मिलता था, जो अब कम हो गया है। सवाल: दर्शक इस फिल्म से क्या लेकर जाएंगे? जवाब: इस फिल्म का सबसे बड़ा संदेश “जिद” है, लेकिन समझदारी वाली जिद। यह किरदार हर मुश्किल में रास्ता निकालने की कोशिश करता है और आखिर तक हार नहीं मानता। सवाल: क्या आपको लगता है कि आपकी जिंदगी और इस किरदार में कुछ समानता है? जवाब: हां, मेरी जिंदगी में भी जिद रही है। कभी समझदारी वाली, तो कभी थोड़ी बेवकूफी वाली जिद। लेकिन उसी जिद ने मुझे यहां तक पहुंचाया है।

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आर्थिक संकट में देश संभालना बड़ी जिम्मेदारी:मनोज बाजपेयी बोले- आम आदमी खर्च नियंत्रित कर सकता है, लेकिन देश को संकट से एक्सपर्ट्स ही निकालते हैं

आर्थिक संकट में देश संभालना बड़ी जिम्मेदारी:मनोज बाजपेयी बोले- आम आदमी खर्च नियंत्रित कर सकता है, लेकिन देश को संकट से एक्सपर्ट्स ही निकालते हैं

1991 के आर्थिक संकट पर बनी फिल्म ‘गवर्नर: द साइलेंट सेवियर’ को लेकर मनोज बाजपेयी ने दैनिक भास्कर से बातचीत की। उन्होंने कहा कि फिल्म में एक आरबीआई गवर्नर के देश की उम्मीद बनने और देश को संकट से निकालने की जंग दिखाई गई है। मनोज ने इसे ‘इकोनॉमिक थ्रिलर’ बताया। उन्होंने वैश्विक हालात, ईरान-यूएस तनाव, आम आदमी की परेशानियों, ओटीटी और थिएटर की कमी पर भी राय रखी। सवाल: फिल्म ‘गवर्नर: द साइलेंट सेवियर’ किस बारे में है? जवाब: यह सिर्फ एक आरबीआई गवर्नर नहीं, बल्कि बड़ी जिम्मेदारी की कहानी है। आर्थिक संकट के समय हर नजर आप पर हो तो कितना दबाव होता है, फिल्म यही दिखाती है। ऐसे समय परिवार और निजी जिंदगी पीछे छूट जाती है। फिल्म उसी संघर्ष और दबाव को दिखाती है। सवाल: फिल्म में इकोनॉमिक्स और आरबीआई जैसे कठिन विषय हैं। आम दर्शक इसे कैसे समझ पाएंगे? जवाब: फिल्म में जीडीपी, फिस्कल डेफिसिट और इन्फ्लेशन जैसे शब्द हैं, लेकिन उन्हें आसान तरीके से दिखाया गया है। यह क्लासरूम वाली फिल्म नहीं, बल्कि ‘इकोनॉमिक थ्रिलर’ है। यहां कम समय में देश को आर्थिक संकट से बाहर निकालने की चुनौती ही रोमांच पैदा करती है। सवाल: इस किरदार की तैयारी कैसे की? जवाब: मैंने स्क्रिप्ट कई बार पढ़ी और जो बातें समझ नहीं आईं, उन्हें डायरेक्टर व राइटर्स से समझा। डायरेक्टर पढ़ने का मटेरियल और वीडियो भेजते थे। किरदार का लुक और बोलने का तरीका तय किया गया। करीब ढाई महीने तैयारी चली। टेक्निकल शब्दों को समझकर उन्हें आसान तरीके से दर्शकों तक पहुंचाना सबसे मुश्किल था। सवाल: एक तरफ आप राम गोपाल वर्मा की फिल्म कर रहे थे, जहां माहौल बिल्कुल अलग था, जबकि ‘गवर्नर’ के सेट पर लोग आपको बहुत शांत और गंभीर इंसान के तौर पर देखने लगे थे। ऐसा क्या था इस किरदार में? जवाब: यह किरदार कम बोलने वाला इंसान है, जो ज्यादातर अपने विचारों में व्यस्त रहता है। नंबर, गणित और बड़ी जिम्मेदारियों से जुड़े लोग अक्सर शांत होते हैं और लगातार चुनौतियों पर सोचते रहते हैं। आरबीआई गवर्नर भी हर समय संकट सुलझाने में लगा रहता है, इसलिए यह गंभीर नहीं बल्कि भीतर से लगातार सोचने वाले व्यक्ति का किरदार है। सवाल: क्या फिल्म में गंभीरता के साथ ह्यूमर भी देखने को मिलेगा? जवाब: बिल्कुल। फिल्म में फैमिली बॉन्डिंग है। मधु मेरी पत्नी का रोल कर रही हैं। उनकी फिल्म ‘रोजा’ देखकर पागल हो गए थे। उनके साथ के सीन हल्के और प्यारे हैं। ऑफिस के कुछ हिस्सों में भी ह्यूमर है। थ्रिलर होने के कारण दर्शक कहानी से जुड़े रहेंगे। सवाल: आप इतिहास के छात्र भी रहे हैं। 1991 के आर्थिक संकट और आज के हालात में क्या समानता देखते हैं? जवाब: 1991 में गल्फ वॉर के दौरान तेल के दाम बढ़ रहे थे और भारत आर्थिक संकट से जूझ रहा था। आज भी यूएस-ईरान जैसे तनावों का असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। तेल महंगा होता है, डॉलर मजबूत होता है और भारत जैसे देशों पर दबाव बढ़ता है। इतिहास पूरी तरह नहीं दोहराता, लेकिन उसकी झलक जरूर दिखती है। सवाल: ऐसे संकट के समय आम आदमी क्या कर सकता है? जवाब: बड़े आर्थिक फैसले एक्सपर्ट्स और सरकारों का काम हैं। आम आदमी अपने खर्च नियंत्रित कर सकता है। मुश्किल समय में लोग फिजूल खर्च, घर खरीदने, घूमने और बड़े खर्चों से बचते हैं। लोग संभलकर चलते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि आगे का समय कठिन हो सकता है। सवाल: क्या आम आदमी सिस्टम बदल सकता है? जवाब: सिस्टम तभी तक मजबूत रहता है, जब तक आम आदमी सवाल नहीं पूछता। समस्याएं नहीं सुनी जाएं तो लोग आवाज उठाते हैं। इतिहास में कई बार आम आदमी ने बदलाव लाया है। इमरजेंसी और 1991 के संकट जैसे दौरों में भी लोगों की ताकत सामने आई है। सवाल: फिल्म की रिलीज के साथ दूसरी बड़ी फिल्में भी आ रही हैं। क्या ऐसी फिल्मों को सोलो रिलीज मिलनी चाहिए? जवाब: भारत में सबसे बड़ी समस्या थिएटर की कमी है। सरकार और इंडस्ट्री ज्यादा सिनेमाघर बनवाएं तो छोटी-बड़ी सभी फिल्मों को बराबर मौका मिलेगा। हर फिल्म को दर्शकों तक पहुंचने का अधिकार है। सवाल: क्या कुछ बड़े प्रोडक्शन हाउस की मोनोपोली भी खत्म होनी चाहिए? जवाब: हां। यह तय होना चाहिए कि किस बजट की फिल्म को कितने शो मिलें। छोटी फिल्मों को बड़ी फिल्मों के ज्यादा स्क्रीन लेने से नुकसान नहीं होना चाहिए। हर फिल्म को दर्शकों तक पहुंचने का बराबर मौका मिलना चाहिए। सवाल: ओटीटी ने इस तरह की फिल्मों को कितना फायदा पहुंचाया? जवाब: ओटीटी ने बहुत फायदा पहुंचाया और मुझे भी अच्छा काम करने का मौका मिला। लेकिन अब प्लेटफॉर्म ज्यादा कमर्शियल और असुरक्षित हो गए हैं। पहले अलग तरह की कहानियों को ज्यादा मौका मिलता था, जो अब कम हो गया है। सवाल: दर्शक इस फिल्म से क्या लेकर जाएंगे? जवाब: इस फिल्म का सबसे बड़ा संदेश “जिद” है, लेकिन समझदारी वाली जिद। यह किरदार हर मुश्किल में रास्ता निकालने की कोशिश करता है और आखिर तक हार नहीं मानता। सवाल: क्या आपको लगता है कि आपकी जिंदगी और इस किरदार में कुछ समानता है? जवाब: हां, मेरी जिंदगी में भी जिद रही है। कभी समझदारी वाली, तो कभी थोड़ी बेवकूफी वाली जिद। लेकिन उसी जिद ने मुझे यहां तक पहुंचाया है।

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