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OTT से हटी, गुरुद्वारों में फ्री दिखेगी दिलजीत की 'सतलुज':स्पेशल स्क्रीनिंग शुरू; फिल्म में पंजाब में फर्जी मुठभेड़ में 25 हजार हत्याओं का दावा

OTT से हटी, गुरुद्वारों में फ्री दिखेगी दिलजीत की 'सतलुज':स्पेशल स्क्रीनिंग शुरू; फिल्म में पंजाब में फर्जी मुठभेड़ में 25 हजार हत्याओं का दावा

OTT प्लेटफॉर्म से हटाई गई दिलजीत दोसांझ स्टारर फिल्म ‘सतलुज’ अब फ्री में पंजाब में गुरुद्वारों दिखाई जाएगी। यह फिल्म पंजाब में आतंकवाद के दौर यानी 90 के दशक में फर्जी मुठभेड़ में 25 हजार युवाओं की हत्या का दावा करने वाले ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट जसवंत खालड़ा की जिंदगी पर आधारित है। गुरदासपुर से गुरुद्वारों में फिल्म दिखाने की शुरूआत हो चुकी है। यहां गांव मानचोपड़ा में गुरुद्वारा साहिब से अनाउंसमेंट कर गांव के लोगों को फिल्म दिखाई गई। मोगा के गुरुद्वारे में भी फिल्म दिखाई गई। अब बुधवार और गुरुवार को पठानकोट के 2 प्रमुख गुरुद्वारों गुरुद्वारा सिंह सभा, मॉडल टाउन और गुरुद्वारा सिंह सभा सेंट्रल (रानीपुर) में इसकी स्क्रीनिंग का ऐलान कर दिया गया है। भारतीय किसान यूनियन के पंजाब यूथ अध्यक्ष इंद्रपाल सिंह बैंस ने कहा कि फिल्म को पंजाब के अन्य जिलों और गांव-गांव तक ले जाया जाएगा, ताकि ज्यादा से ज्यादा लोग इसे देख सकें। वहीं दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (DSGMC) ने स्कूल-कॉलेजों में भी फिल्म की स्क्रीनिंग का ऐलान कर दिया है। गुरुद्वारा प्रबंधकों का दावा- इतिहास दबाने की कोशिश हुई
पठानकोट के गुरुद्वारा प्रबंधक मनप्रीत सिंह का कहना है कि फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता भाई जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन और संघर्ष पर आधारित है। उनका आरोप है कि पंजाब के इतिहास के एक अहम अध्याय को लोगों तक पहुंचने से रोकने के लिए फिल्म को जानबूझकर OTT प्लेटफॉर्म से हटाया गया। उनका कहना है कि अगर डिजिटल प्लेटफॉर्म पर फिल्म नहीं दिखाई जाएगी तो गुरुघरों के माध्यम से इसे लोगों तक पहुंचाया जाएगा, ताकि नई पीढ़ी खालड़ा के संघर्ष, मानवाधिकारों की लड़ाई और उनके बलिदान से परिचित हो सके। सीनियर वकील बोले- गुरुद्वारों में स्क्रीनिंग गैरकानूनी नहीं
OTT से हटाने के बावजूद इसकी सार्वजनिक स्क्रीनिंग को लेकर पठानकोट के सीनियर एडवोकेट विशाल कोहली ने कहा कि गुरुद्वारों में संगत के लिए फिल्म की स्क्रीनिंग करना किसी कानून का उल्लंघन नहीं है। उनके मुताबिक, फिल्म की सामग्री पहले ही अलग-अलग ऑनलाइन माध्यमों पर लोगों तक पहुंच चुकी है। ऐसे में सामाजिक जागरूकता के उद्देश्य से इसका प्रदर्शन करना गैरकानूनी नहीं माना जा सकता। DSGMC का ऐलान- गुरुद्वारों के साथ स्कूल-कॉलेजों में भी दिखाई जाएगी फिल्म
दिल्ली सिख गुरुद्वारा मैनेजमेंट कमेटी (DSGMC) भी फिल्म के समर्थन में खुलकर सामने आ गई है। कमेटी के अध्यक्ष हरमीत सिंह कालका ने कहा कि जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर बनी इस फिल्म को रोकना इतिहास को दबाने की कोशिश है। उन्होंने घोषणा की कि दिल्ली के गुरुद्वारों में फिल्म की सार्वजनिक स्क्रीनिंग कराई जाएगी। साथ ही स्कूलों और कॉलेजों में जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन, संघर्ष और मानवाधिकारों पर सेमिनार आयोजित किए जाएंगे। सभी गुरुद्वारा कमेटियों से फिल्म को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने की अपील भी की गई है। दिलजीत की फिल्म में क्या दिखाया गया, जिस पर एतराज?
दिलजीत की इस फिल्म में पूर्व CM बेअंत सिंह की बम ब्लास्ट में हत्या का सीन भी दिखाया गया है। फिल्म की कहानी के लिए इस सीन को पुलिस की क्रूरता के एक टर्निंग पॉइंट के रूप में दिखाया गया है। फिल्म में यह भी दिखाया गया है कि कैसे पुलिस की क्रूरता और निर्दोष लोगों पर बढ़ते अत्याचारों के कारण एक आम आदमी अंदर से टूट जाता है और आतंकवाद या इस तरह के कदम उठाने के लिए मजबूर हो जाता है। इसमें तत्कालीन DGP केपीएल गिल को IPS बिट्‌टा के तौर पर दिखाया गया है। फिल्म में दिखाया गया है 31 अगस्त 1995 को तत्कालीन सीएम बेअंत सिंह की हत्या होती है और इस घटना के ठीक एक हफ्ते बाद यानी 6 सितंबर 1995 को जसवंत सिंह खालड़ा का भी अपहरण कर लिया जाता है। मुख्यमंत्री की मौत के बाद जब राजनीतिक माहौल बदला, तो पुलिस को डर था कि खालड़ा उनके इस 25 हजार अवैध दाह-संस्कार के काले राज को दुनिया के सामने न ले आएं, इसलिए वे खालड़ा का अपहरण करने का कदम उठाते हैं। फिल्म हटाने को लेकर केंद्र की क्या चिंता, आगे क्या फैसला लिया?
केंद्र ने फिल्म हटाने को लेकर अभी औपचारिक तौर पर कुछ नहीं कहा है। हालांकि सरकारी सोर्सेज के जरिए मीडिया के मुताबिक फिल्म के कुछ हिस्सों का भारत विरोधी ताकतों द्वारा दुरुपयोग किए जाने की आशंका है। सूत्रों के मुताबिक, चिंता है कि फिल्म के कुछ दृश्य और सामग्री का इस्तेमाल खालिस्तान समर्थक आंदोलन के पक्ष में माहौल बनाने के लिए किया जा सकता है। खासकर पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले ऐसा हो सकता है। सरकार का मानना है कि “ऐसे मामलों में राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे सबसे ऊपर होते हैं। यह राजनीति का विषय नहीं है। हालांकि केंद्र ने भाजपा के पंजाब प्रधान केवल सिंह ढिल्लों की अपील के बाद इस पर रिव्यू कमेटी बनाई है। कमेटी फिल्म की सामग्री, तथ्यों और प्रस्तुत किए गए विषयों का अध्ययन करेगी। जसवंत सिंह खालड़ा के बारे में जानिए, जिनके जीवन पर यह फिल्म बनी बैंक में काम करते थे, लावारिश लाशें खोजनी शुरू कर दीं
1990 के दशक के पंजाब के कई इलाकों में खालिस्तान की मांग जोर पकड़ रही थी। ऑपरेशन ‘ब्लू स्टार’ में 6 जून 1984 को खालिस्तान समर्थक जरनैल सिंह ‘भिंडरांवाले’ की मौत हो गई। जवाब में 31 अक्टूबर, 1984 को पीएम इंदिरा गांधी की उनके ही 2 सिख बॉडीगार्ड्स ने हत्या कर दी। इसके बाद खालिस्तान मूवमेंट को कुचलने का दौर शुरू हुआ। 1992 में बेअंत सिंह सीएम बने। तब के पंजाब पुलिस के DGP कंवर पाल सिंह गिल (केपीएस गिल) ने एंटी-टेररिज्म अभियान चलाया। पुलिस को खुली छूट थी। पंजाब के कई इलाकों से हजारों नौजवान रातोंरात गायब हो रहे थे। पुलिस पर निहत्थे लोगों को हिरासत में लेने और फर्जी एनकाउंटर के आरोप लग रहे थे। 1952 में अमृतसर जिले के खालड़ा गांव में जन्मे जसवंत सिंह, तब अमृतसर के एक बैंक में काम करते थे। जनवरी 1995 में वे शिरोमणि अकाली दल की मानवाधिकार यूनिट के महासचिव भी थे। लापता लोगों के डेथ सर्टिफिकेट न होने के चलते उनके परिवार वाले न उनकी संपत्ति पर दावा कर सकते थे और न ही बैंक में उनके खातों से पैसा निकाल पा रहे थे। ऐसे में जसवंत ने लापता लोगों, पुलिस हिरासत में हुई मौतों और श्मशानों में जलाई जा रही लावारिस लाशों के बीच कनेक्शन खोजना शुरू किया। उन्होंने अमृतसर और तरनतारन के श्मशान घाटों में जली लाशों के डिटेल्स इकट्ठा किए। खालड़ा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर 4 बड़े दावे किए इस मामले में खालड़ा का कहना था कि पुलिस अधिनियम 1861 के तहत पंजाब पुलिस रूल्स, 1934 के चैप्टर 25 में नियम है कि किसी लाश का अंतिम संस्कार तभी हो सकता है, जब उसकी पहचान तय हो, लेकिन यहां तो सिस्टम खुद ही पहचान मिटा रहा था। दो दिन बाद DGP केपीएस गिल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में जवाब दिया, ‘हजारों सिख युवा फर्जी दस्तावेजों से विदेश चले गए हैं। उन्हीं की गुमशुदगी को खालड़ा पुलिस पर थोप रहे हैं।’ इसके बाद खालड़ा ने गिल को ओपन डिबेट की चुनौती दी। उनके दावों के आधार पर पंजाब के लोकल अखबार खबरें छाप रहे थे। प्रशासन पर दबाव बढ़ा, तो उसने उल्टा खालड़ा से पूछताछ शुरू कर दी। इसी बीच 31 अगस्त को सीएम बेअंत सिंह की खालिस्तानी आतंकी संगठन ‘बब्बर खालसा इंटरनेशनल’(BKI) ने बम धमाके में हत्या कर दी। इसके बाद 6 सितंबर 1995 का दिन आया। जसवंत सिंह अमृतसर के कबीर पार्क स्थित अपने घर के बाहर कार धो रहे थे। तभी एक सफेद गाड़ी आई। इसमें मौजूद हथियारबंद लोग उन्हें अगवा कर ले गए। पुलिस का कहना था कि जसवंत कैसे गायब हुए, इसकी जानकारी नहीं है। खालड़ा के मामले में जांच के बाद CBI ने अपनी रिपोर्ट में लिखा, ‘जसवंत सिंह ने लावारिस लाशों के मामले में आवाज उठाई। स्थानीय पुलिस को ये पसंद नहीं आया और उन्हें घर से अगवा कर लिया। उन्हें गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखने के बाद उनकी हत्या करके लाश हरीके इलाके में नहर में फेंक दी गई।’ खालड़ा की हत्या का खुलासा कैसे हुआ
6 सितंबर को ही जसवंत की पत्नी परमजीत कौर ने शिकायत दर्ज करवाई कि उनके पति को पुलिस की वर्दी में कुछ लोगों ने अगवा किया है। किडनैपिंग का मामला दर्ज किया गया। जसवंत का सुराग देने पर एक लाख रुपए का इनाम भी रखा गया। हालांकि पुलिस ने जांच आगे नहीं बढ़ाई, तो परमजीत ने कोर्ट का रुख किया और नवंबर 1995 में कोर्ट ने CBI को जांच का आदेश दिया। CBI की रिपोर्ट के मुताबिक, जसवंत के पड़ोसी किरपाल सिंह रंधावा ने बताया कि जिस गाड़ी से जसवंत का अपहरण हुआ, उसमें 5 पुलिस अधिकारी- DSP जसपाल सिंह, सुरिंदर पाल सिंह, SHO जसबीर सिंह, प्रिथीपाल सिंह और अमृतसर के झबाल थाने के SHO सतनाम सिंह थे। इन्हीं ने जसवंत को अगवा किया। दो दिन पहले, यानी 4 सितंबर को अवैध ड्रग्स के मामले में एक आरोपी कुलवंत सिंह झबाल थाने लाया गया था। उसने भी CBI को बताया कि DSP जसपाल सिंह और SHO सतनाम सिंह ही खालड़ा को थाने लाए थे। इस मामले में सबसे अहम गवाह बने स्पेशल पुलिस अफसर कुलदीप सिंह। उनकी तैनाती झबाल थाने में सतनाम सिंह के साथ ही थी। कुलदीप ने खालड़ा की हत्या तक के पूरे ब्योरे दिए… कुलदीप को थाने में खालड़ा को खाना खिलाने का काम मिला था। खालड़ा की सेहत बहुत खराब हो चली थी। एक शाम SSP अजीत सिंह संधू, DSP जसपाल सिंह, उनके बॉडीगार्ड अरविंदर सिंह एक बिना नंबर वाली कार में आए। दूसरी कार में SHO सतनाम सिंह, SHO जसबीर सिंह और प्रिथीपाल सिंह आए। सारे लोग खालड़ा के कमरे में गए। संधू ने खालड़ा से अपनी सारी एक्टिविटी बंद करने को कहा और उनकी पिटाई भी की। 3 दिन बाद सतनाम सिंह, खालड़ा को तरनतारन में संधू के घर ले गए। यहां बंद कमरे में बातचीत के बाद खालड़ा को वापस थाने लाया गया। कुछ दिन बाद DSP जसपाल सिंह, अरविंदर सिंह, सुरिंदर पाल सिंह, जसबीर और प्रिथीपाल दोबारा थाने आए और खालड़ा को पीटना शुरू कर दिया। कुलदीप सिंह को गर्म पानी लाने के लिए कहा गया। वो कमरे से बाहर निकले, तो उन्होंने 2 गोलियां चलने की आवाज सुनी। खालड़ा की मौत हो गई थी। शरीर से खून बह रहा था। उनकी लाश को वैन की डिक्की में रखा गया। फिर कुलदीप सिंह समेत 7 पुलिस वाले तीन कारों से पास के गांव हरीके गए। जहां खालड़ा की लाश नहर में फेंक दी गई। कुलदीप सिंह की गवाही इस केस के लिए बहुत अहम साबित हुई। नवंबर 2005 में पटियाला की एक कोर्ट ने 4 आरोपी- सतनाम सिंह , सुरिंदर पाल, जसबीर और प्रिथीपाल को किडनैपिंग के आरोप में 7 साल जेल की सजा सुनाई। जबकी DSP जसपाल सिंह और अमरजीत सिंह को हत्या के आरोप में उम्रकैद की सजा मिली। जबकि संधू ने मामले में फैसला होने से पहले ही 23 मई 1997 को खुदकुशी कर ली थी। जसवंत की पत्नी परमजीत कौर ने हाईकोर्ट में 4 आरोपियों की सजा बढ़ाने की अपील की। 2007 में पंजाब हाईकोर्ट ने अमरजीत सिंह को बरी कर दिया, जबकि 7 साल की सजा पाने वाले चारों आरोपियों की सजा बढ़ाकर उम्रकैद कर दी। आरोपी पुलिस अधिकारी हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 11 अप्रैल 2011 को उनकी अपील खारिज कर दी और हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखा। CBI ने अंतरिम रिपोर्ट में सुप्रीम कोर्ट को बताया, ‘2097 लाशों का लावारिस की तरह अंतिम संस्कार किया गया था। अकेले तरनतारन में 984 लाशों को ‘लावारिस’ के बतौर जलाया गया। पुलिस ने बड़ी संख्या में बेकसूर लोगों की हत्या की थी।’ *************
ये खबरें भी पढ़ें… दिलजीत की 2 दिन पहले रिलीज ‘सतलुज’ OTT से हटाई, दोसांझ ने पायरेसी की अपील की पंजाब के मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित दिलजीत दोसांझ की फिल्म को अचानक OTT प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया। खालड़ा ने आतंकवाद के दौर में पंजाब में फेक एनकाउंटर में 25 हजार युवाओं को मारने का दावा किया था। यह फिल्म 3 साल की रोक के बाद 2 दिन पहले ही नाम बदलकर रिलीज की गई थी। पहले इसका नाम ‘पंजाब 95’ था, जिसे ‘सतलुज’ नाम से OTT प्लेटफॉर्म पर रिलीज किया गया था (पढ़ें पूरी खबर)

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पठानकोट के गुरुद्वारा प्रबंधक मनप्रीत सिंह का कहना है कि फिल्म मानवाधिकार कार्यकर्ता भाई जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन और संघर्ष पर आधारित है। उनका आरोप है कि पंजाब के इतिहास के एक अहम अध्याय को लोगों तक पहुंचने से रोकने के लिए फिल्म को जानबूझकर OTT प्लेटफॉर्म से हटाया गया। उनका कहना है कि अगर डिजिटल प्लेटफॉर्म पर फिल्म नहीं दिखाई जाएगी तो गुरुघरों के माध्यम से इसे लोगों तक पहुंचाया जाएगा, ताकि नई पीढ़ी खालड़ा के संघर्ष, मानवाधिकारों की लड़ाई और उनके बलिदान से परिचित हो सके। सीनियर वकील बोले- गुरुद्वारों में स्क्रीनिंग गैरकानूनी नहीं
OTT से हटाने के बावजूद इसकी सार्वजनिक स्क्रीनिंग को लेकर पठानकोट के सीनियर एडवोकेट विशाल कोहली ने कहा कि गुरुद्वारों में संगत के लिए फिल्म की स्क्रीनिंग करना किसी कानून का उल्लंघन नहीं है। उनके मुताबिक, फिल्म की सामग्री पहले ही अलग-अलग ऑनलाइन माध्यमों पर लोगों तक पहुंच चुकी है। ऐसे में सामाजिक जागरूकता के उद्देश्य से इसका प्रदर्शन करना गैरकानूनी नहीं माना जा सकता। DSGMC का ऐलान- गुरुद्वारों के साथ स्कूल-कॉलेजों में भी दिखाई जाएगी फिल्म
दिल्ली सिख गुरुद्वारा मैनेजमेंट कमेटी (DSGMC) भी फिल्म के समर्थन में खुलकर सामने आ गई है। कमेटी के अध्यक्ष हरमीत सिंह कालका ने कहा कि जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर बनी इस फिल्म को रोकना इतिहास को दबाने की कोशिश है। उन्होंने घोषणा की कि दिल्ली के गुरुद्वारों में फिल्म की सार्वजनिक स्क्रीनिंग कराई जाएगी। साथ ही स्कूलों और कॉलेजों में जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन, संघर्ष और मानवाधिकारों पर सेमिनार आयोजित किए जाएंगे। सभी गुरुद्वारा कमेटियों से फिल्म को ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाने की अपील भी की गई है। दिलजीत की फिल्म में क्या दिखाया गया, जिस पर एतराज?
दिलजीत की इस फिल्म में पूर्व CM बेअंत सिंह की बम ब्लास्ट में हत्या का सीन भी दिखाया गया है। फिल्म की कहानी के लिए इस सीन को पुलिस की क्रूरता के एक टर्निंग पॉइंट के रूप में दिखाया गया है। फिल्म में यह भी दिखाया गया है कि कैसे पुलिस की क्रूरता और निर्दोष लोगों पर बढ़ते अत्याचारों के कारण एक आम आदमी अंदर से टूट जाता है और आतंकवाद या इस तरह के कदम उठाने के लिए मजबूर हो जाता है। इसमें तत्कालीन DGP केपीएल गिल को IPS बिट्‌टा के तौर पर दिखाया गया है। फिल्म में दिखाया गया है 31 अगस्त 1995 को तत्कालीन सीएम बेअंत सिंह की हत्या होती है और इस घटना के ठीक एक हफ्ते बाद यानी 6 सितंबर 1995 को जसवंत सिंह खालड़ा का भी अपहरण कर लिया जाता है। मुख्यमंत्री की मौत के बाद जब राजनीतिक माहौल बदला, तो पुलिस को डर था कि खालड़ा उनके इस 25 हजार अवैध दाह-संस्कार के काले राज को दुनिया के सामने न ले आएं, इसलिए वे खालड़ा का अपहरण करने का कदम उठाते हैं। फिल्म हटाने को लेकर केंद्र की क्या चिंता, आगे क्या फैसला लिया?
केंद्र ने फिल्म हटाने को लेकर अभी औपचारिक तौर पर कुछ नहीं कहा है। हालांकि सरकारी सोर्सेज के जरिए मीडिया के मुताबिक फिल्म के कुछ हिस्सों का भारत विरोधी ताकतों द्वारा दुरुपयोग किए जाने की आशंका है। सूत्रों के मुताबिक, चिंता है कि फिल्म के कुछ दृश्य और सामग्री का इस्तेमाल खालिस्तान समर्थक आंदोलन के पक्ष में माहौल बनाने के लिए किया जा सकता है। खासकर पंजाब विधानसभा चुनाव से पहले ऐसा हो सकता है। सरकार का मानना है कि “ऐसे मामलों में राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मुद्दे सबसे ऊपर होते हैं। यह राजनीति का विषय नहीं है। हालांकि केंद्र ने भाजपा के पंजाब प्रधान केवल सिंह ढिल्लों की अपील के बाद इस पर रिव्यू कमेटी बनाई है। कमेटी फिल्म की सामग्री, तथ्यों और प्रस्तुत किए गए विषयों का अध्ययन करेगी। जसवंत सिंह खालड़ा के बारे में जानिए, जिनके जीवन पर यह फिल्म बनी बैंक में काम करते थे, लावारिश लाशें खोजनी शुरू कर दीं
1990 के दशक के पंजाब के कई इलाकों में खालिस्तान की मांग जोर पकड़ रही थी। ऑपरेशन ‘ब्लू स्टार’ में 6 जून 1984 को खालिस्तान समर्थक जरनैल सिंह ‘भिंडरांवाले’ की मौत हो गई। जवाब में 31 अक्टूबर, 1984 को पीएम इंदिरा गांधी की उनके ही 2 सिख बॉडीगार्ड्स ने हत्या कर दी। इसके बाद खालिस्तान मूवमेंट को कुचलने का दौर शुरू हुआ। 1992 में बेअंत सिंह सीएम बने। तब के पंजाब पुलिस के DGP कंवर पाल सिंह गिल (केपीएस गिल) ने एंटी-टेररिज्म अभियान चलाया। पुलिस को खुली छूट थी। पंजाब के कई इलाकों से हजारों नौजवान रातोंरात गायब हो रहे थे। पुलिस पर निहत्थे लोगों को हिरासत में लेने और फर्जी एनकाउंटर के आरोप लग रहे थे। 1952 में अमृतसर जिले के खालड़ा गांव में जन्मे जसवंत सिंह, तब अमृतसर के एक बैंक में काम करते थे। जनवरी 1995 में वे शिरोमणि अकाली दल की मानवाधिकार यूनिट के महासचिव भी थे। लापता लोगों के डेथ सर्टिफिकेट न होने के चलते उनके परिवार वाले न उनकी संपत्ति पर दावा कर सकते थे और न ही बैंक में उनके खातों से पैसा निकाल पा रहे थे। ऐसे में जसवंत ने लापता लोगों, पुलिस हिरासत में हुई मौतों और श्मशानों में जलाई जा रही लावारिस लाशों के बीच कनेक्शन खोजना शुरू किया। उन्होंने अमृतसर और तरनतारन के श्मशान घाटों में जली लाशों के डिटेल्स इकट्ठा किए। खालड़ा ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर 4 बड़े दावे किए इस मामले में खालड़ा का कहना था कि पुलिस अधिनियम 1861 के तहत पंजाब पुलिस रूल्स, 1934 के चैप्टर 25 में नियम है कि किसी लाश का अंतिम संस्कार तभी हो सकता है, जब उसकी पहचान तय हो, लेकिन यहां तो सिस्टम खुद ही पहचान मिटा रहा था। दो दिन बाद DGP केपीएस गिल ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में जवाब दिया, ‘हजारों सिख युवा फर्जी दस्तावेजों से विदेश चले गए हैं। उन्हीं की गुमशुदगी को खालड़ा पुलिस पर थोप रहे हैं।’ इसके बाद खालड़ा ने गिल को ओपन डिबेट की चुनौती दी। उनके दावों के आधार पर पंजाब के लोकल अखबार खबरें छाप रहे थे। प्रशासन पर दबाव बढ़ा, तो उसने उल्टा खालड़ा से पूछताछ शुरू कर दी। इसी बीच 31 अगस्त को सीएम बेअंत सिंह की खालिस्तानी आतंकी संगठन ‘बब्बर खालसा इंटरनेशनल’(BKI) ने बम धमाके में हत्या कर दी। इसके बाद 6 सितंबर 1995 का दिन आया। जसवंत सिंह अमृतसर के कबीर पार्क स्थित अपने घर के बाहर कार धो रहे थे। तभी एक सफेद गाड़ी आई। इसमें मौजूद हथियारबंद लोग उन्हें अगवा कर ले गए। पुलिस का कहना था कि जसवंत कैसे गायब हुए, इसकी जानकारी नहीं है। खालड़ा के मामले में जांच के बाद CBI ने अपनी रिपोर्ट में लिखा, ‘जसवंत सिंह ने लावारिस लाशों के मामले में आवाज उठाई। स्थानीय पुलिस को ये पसंद नहीं आया और उन्हें घर से अगवा कर लिया। उन्हें गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखने के बाद उनकी हत्या करके लाश हरीके इलाके में नहर में फेंक दी गई।’ खालड़ा की हत्या का खुलासा कैसे हुआ
6 सितंबर को ही जसवंत की पत्नी परमजीत कौर ने शिकायत दर्ज करवाई कि उनके पति को पुलिस की वर्दी में कुछ लोगों ने अगवा किया है। किडनैपिंग का मामला दर्ज किया गया। जसवंत का सुराग देने पर एक लाख रुपए का इनाम भी रखा गया। हालांकि पुलिस ने जांच आगे नहीं बढ़ाई, तो परमजीत ने कोर्ट का रुख किया और नवंबर 1995 में कोर्ट ने CBI को जांच का आदेश दिया। CBI की रिपोर्ट के मुताबिक, जसवंत के पड़ोसी किरपाल सिंह रंधावा ने बताया कि जिस गाड़ी से जसवंत का अपहरण हुआ, उसमें 5 पुलिस अधिकारी- DSP जसपाल सिंह, सुरिंदर पाल सिंह, SHO जसबीर सिंह, प्रिथीपाल सिंह और अमृतसर के झबाल थाने के SHO सतनाम सिंह थे। इन्हीं ने जसवंत को अगवा किया। दो दिन पहले, यानी 4 सितंबर को अवैध ड्रग्स के मामले में एक आरोपी कुलवंत सिंह झबाल थाने लाया गया था। उसने भी CBI को बताया कि DSP जसपाल सिंह और SHO सतनाम सिंह ही खालड़ा को थाने लाए थे। इस मामले में सबसे अहम गवाह बने स्पेशल पुलिस अफसर कुलदीप सिंह। उनकी तैनाती झबाल थाने में सतनाम सिंह के साथ ही थी। कुलदीप ने खालड़ा की हत्या तक के पूरे ब्योरे दिए… कुलदीप को थाने में खालड़ा को खाना खिलाने का काम मिला था। खालड़ा की सेहत बहुत खराब हो चली थी। एक शाम SSP अजीत सिंह संधू, DSP जसपाल सिंह, उनके बॉडीगार्ड अरविंदर सिंह एक बिना नंबर वाली कार में आए। दूसरी कार में SHO सतनाम सिंह, SHO जसबीर सिंह और प्रिथीपाल सिंह आए। सारे लोग खालड़ा के कमरे में गए। संधू ने खालड़ा से अपनी सारी एक्टिविटी बंद करने को कहा और उनकी पिटाई भी की। 3 दिन बाद सतनाम सिंह, खालड़ा को तरनतारन में संधू के घर ले गए। यहां बंद कमरे में बातचीत के बाद खालड़ा को वापस थाने लाया गया। कुछ दिन बाद DSP जसपाल सिंह, अरविंदर सिंह, सुरिंदर पाल सिंह, जसबीर और प्रिथीपाल दोबारा थाने आए और खालड़ा को पीटना शुरू कर दिया। कुलदीप सिंह को गर्म पानी लाने के लिए कहा गया। वो कमरे से बाहर निकले, तो उन्होंने 2 गोलियां चलने की आवाज सुनी। खालड़ा की मौत हो गई थी। शरीर से खून बह रहा था। उनकी लाश को वैन की डिक्की में रखा गया। फिर कुलदीप सिंह समेत 7 पुलिस वाले तीन कारों से पास के गांव हरीके गए। जहां खालड़ा की लाश नहर में फेंक दी गई। कुलदीप सिंह की गवाही इस केस के लिए बहुत अहम साबित हुई। नवंबर 2005 में पटियाला की एक कोर्ट ने 4 आरोपी- सतनाम सिंह , सुरिंदर पाल, जसबीर और प्रिथीपाल को किडनैपिंग के आरोप में 7 साल जेल की सजा सुनाई। जबकी DSP जसपाल सिंह और अमरजीत सिंह को हत्या के आरोप में उम्रकैद की सजा मिली। जबकि संधू ने मामले में फैसला होने से पहले ही 23 मई 1997 को खुदकुशी कर ली थी। जसवंत की पत्नी परमजीत कौर ने हाईकोर्ट में 4 आरोपियों की सजा बढ़ाने की अपील की। 2007 में पंजाब हाईकोर्ट ने अमरजीत सिंह को बरी कर दिया, जबकि 7 साल की सजा पाने वाले चारों आरोपियों की सजा बढ़ाकर उम्रकैद कर दी। आरोपी पुलिस अधिकारी हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गए, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने 11 अप्रैल 2011 को उनकी अपील खारिज कर दी और हाईकोर्ट का फैसला बरकरार रखा। CBI ने अंतरिम रिपोर्ट में सुप्रीम कोर्ट को बताया, ‘2097 लाशों का लावारिस की तरह अंतिम संस्कार किया गया था। अकेले तरनतारन में 984 लाशों को ‘लावारिस’ के बतौर जलाया गया। पुलिस ने बड़ी संख्या में बेकसूर लोगों की हत्या की थी।’ *************
ये खबरें भी पढ़ें… दिलजीत की 2 दिन पहले रिलीज ‘सतलुज’ OTT से हटाई, दोसांझ ने पायरेसी की अपील की पंजाब के मानवाधिकार कार्यकर्ता जसवंत सिंह खालड़ा के जीवन पर आधारित दिलजीत दोसांझ की फिल्म को अचानक OTT प्लेटफॉर्म से हटा दिया गया। खालड़ा ने आतंकवाद के दौर में पंजाब में फेक एनकाउंटर में 25 हजार युवाओं को मारने का दावा किया था। यह फिल्म 3 साल की रोक के बाद 2 दिन पहले ही नाम बदलकर रिलीज की गई थी। पहले इसका नाम ‘पंजाब 95’ था, जिसे ‘सतलुज’ नाम से OTT प्लेटफॉर्म पर रिलीज किया गया था (पढ़ें पूरी खबर)

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