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चीड़ के फल को ‘स्यूत ठिट’ और बीज को ‘स्यूत’ भी कहते हैं. यह बीज खाने में इतना स्वादिष्ट होता है कि इसकी तुलना सीधा काजू-बादाम से की जाती है. लोकल 18 से बात करते हुए बागेश्वर के किसान रमेश पांडे बताते हैं कि ये हमें बचपन की याद दिलाता है. चीड़ का फल पहले हरा होता है फिर धीरे-धीरे समय के साथ भूरा हो जाता है. इसमें ही बीज बनते हैं, जिसे स्यूत कहा जाता है. खाने में इनका स्वाद हल्का मीठा होता है. मूंगफली की तरह छीलकर खाया जाता है. आयुष चिकित्सक डॉ. एजेल पटेल बताते हैं कि शरीर की कमजोरी को दूर करते हैं. सूजन कम करने में मददगार हैं.

बागेश्वर. अगर आप कभी उत्तराखंड आए हैं, तो रास्ते में बहुत सारे चीड़ के पेड़ जरूर देखे होंगे. लेकिन क्या आपको पता है कि चीड़ का बीज कितना स्वादिष्ट होता है. उत्तराखंड की लोकल लैंग्वेज में चीड़ के फल को ‘स्यूत ठिट’ और बीज को ‘स्यूत’ बोला जाता है. यह बीज खाने में इतना स्वादिष्ट होता है कि इसकी तुलना काजू-बादाम से की जाती है. बागेश्वर के किसान रमेश पांडे लोकल 18 से बताते हैं कि बताया कि बचपन में जब वे गांव में रहा करते थे, तो वे इन बीजों को खूब खाते थे. चीड़ का फल पहले हरा होता है, धीरे-धीरे समय के साथ यह भूरा हो जाता है, और इसके अंदर चीड़ के बीज बनते हैं, जिसे स्यूत कहा जाता है.

जब पतझड़ का मौसम आता है, तो इसका फल खुद जमीन पर गिरता है. इससे चीड़ का बीज निकलता है. उत्तराखंड में गांव के बच्चे आज भी इन बीजों को इकट्ठा करते हैं और इसे खाते हैं. इन बीजों से आज भी बचपन की यादें जुड़ी हैं. खाने में इनका स्वाद हल्का मीठा होता है. इन्हें मूंगफली की तरह छीलकर खाना पड़ता है.

चीड़ के बीजों को इकट्ठा करना बड़ी मेहनत का काम है. इसलिए यह स्वादिष्ट और पौष्टिक के साथ-साथ आयुर्वेदिक गुणों से भरपूर होने के बावजूद भी बाजार में अपनी अच्छी पकड़ नहीं बन पाया है, क्योंकि इसे इकट्ठा करना बेहद ही मुश्किल का काम है. इसका बनना और बिगड़ना पूरी तरीके से नेचर पर डिपेंड रहता है. जिस कारण इसे जरूरत के हिसाब से इकट्ठा नहीं किया जा सकता है. चीड़ के फल में बीज लंबे समय तक भी कम टिक पाता है.

कितने फायदे

आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. एजेल पटेल बताते हैं कि चीड़ के बीजों में विटामिन, खनिज और एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं, जो शरीर की कमजोरी को दूर करते हैं, सूजन कम करने में मददगार होते हैं. कफ कोल्ड से राहत देते हैं. इम्युनिटी को बढ़ाते हैं, इनमें एंटीसेप्टिक गुण होते हैं. इनका इस्तेमाल पारंपरिक रूप से घाव, त्वचा संक्रमण और दर्द में किया जाता है.

About the Author

Priyanshu Gupta

Priyanshu has more than 10 years of experience in journalism. Before News 18 (Network 18 Group), he had worked with Rajsthan Patrika and Amar Ujala. He has Studied Journalism from Indian Institute of Mass Commu…और पढ़ें

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बागेश्वर. अगर आप कभी उत्तराखंड आए हैं, तो रास्ते में बहुत सारे चीड़ के पेड़ जरूर देखे होंगे. लेकिन क्या आपको पता है कि चीड़ का बीज कितना स्वादिष्ट होता है. उत्तराखंड की लोकल लैंग्वेज में चीड़ के फल को ‘स्यूत ठिट’ और बीज को ‘स्यूत’ बोला जाता है. यह बीज खाने में इतना स्वादिष्ट होता है कि इसकी तुलना काजू-बादाम से की जाती है. बागेश्वर के किसान रमेश पांडे लोकल 18 से बताते हैं कि बताया कि बचपन में जब वे गांव में रहा करते थे, तो वे इन बीजों को खूब खाते थे. चीड़ का फल पहले हरा होता है, धीरे-धीरे समय के साथ यह भूरा हो जाता है, और इसके अंदर चीड़ के बीज बनते हैं, जिसे स्यूत कहा जाता है.

जब पतझड़ का मौसम आता है, तो इसका फल खुद जमीन पर गिरता है. इससे चीड़ का बीज निकलता है. उत्तराखंड में गांव के बच्चे आज भी इन बीजों को इकट्ठा करते हैं और इसे खाते हैं. इन बीजों से आज भी बचपन की यादें जुड़ी हैं. खाने में इनका स्वाद हल्का मीठा होता है. इन्हें मूंगफली की तरह छीलकर खाना पड़ता है.

चीड़ के बीजों को इकट्ठा करना बड़ी मेहनत का काम है. इसलिए यह स्वादिष्ट और पौष्टिक के साथ-साथ आयुर्वेदिक गुणों से भरपूर होने के बावजूद भी बाजार में अपनी अच्छी पकड़ नहीं बन पाया है, क्योंकि इसे इकट्ठा करना बेहद ही मुश्किल का काम है. इसका बनना और बिगड़ना पूरी तरीके से नेचर पर डिपेंड रहता है. जिस कारण इसे जरूरत के हिसाब से इकट्ठा नहीं किया जा सकता है. चीड़ के फल में बीज लंबे समय तक भी कम टिक पाता है.

कितने फायदे

आयुर्वेदिक चिकित्सक डॉ. एजेल पटेल बताते हैं कि चीड़ के बीजों में विटामिन, खनिज और एंटीऑक्सीडेंट पाए जाते हैं, जो शरीर की कमजोरी को दूर करते हैं, सूजन कम करने में मददगार होते हैं. कफ कोल्ड से राहत देते हैं. इम्युनिटी को बढ़ाते हैं, इनमें एंटीसेप्टिक गुण होते हैं. इनका इस्तेमाल पारंपरिक रूप से घाव, त्वचा संक्रमण और दर्द में किया जाता है.

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