Wednesday, 27 May 2026 | 09:25 PM

Trending :

EXCLUSIVE

Asha Bhosle Passes Away at 92

Asha Bhosle Passes Away at 92

16 मिनट पहले

  • कॉपी लिंक

भारतीय संगीत जगत की सबसे वर्सेटाइल सिंगर आशा भोसले का 92 साल की उम्र में निधन हो गया है। उन्होंने अपनी आवाज से सात दशकों तक फिल्म इंडस्ट्री पर राज किया।

10 साल की उम्र से करियर शुरू करने वाली आशा ताई को शुरुआती दौर में ‘खराब आवाज’ कहकर स्टूडियो से रिजेक्ट कर दिया गया था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

अपनी बड़ी बहन लता मंगेशकर के साये से बाहर निकलकर उन्होंने संगीत की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई और 12,000 से ज्यादा गानों के साथ अपना नाम ‘गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स’ में दर्ज कराया।

आशा भोसले ने शास्त्रीय संगीत से लेकर कैबरे, पॉप और गजल तक हर शैली में अपनी महारत साबित की।

दिवंगत गायिका आशा भोसले।

दिवंगत गायिका आशा भोसले।

महाराष्ट्र के सांगली में जन्म, पिता शास्त्रीय गायक रहे

आशा भोसले का जन्म 8 सितंबर 1933 को महाराष्ट्र के सांगली में हुआ था। वह प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक और थिएटर कलाकार पंडित दीनानाथ मंगेशकर की बेटी थीं। घर में संगीत का माहौल शुरू से ही था। उनके भाई-बहन लता मंगेशकर, मीना खडीकर, उषा मंगेशकर और हृदयनाथ मंगेशकर भी संगीत की दुनिया से ही जुड़े रहे।

जब आशा सिर्फ 9 साल की थीं, तब 1942 में उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर का निधन हो गया। पिता के जाने के बाद परिवार पर आर्थिक संकट आ गया। परिवार को सहारा देने के लिए लता और आशा ने बहुत कम उम्र में गाना और फिल्मों में छोटी भूमिकाएं निभाना शुरू कर दिया था।

मराठी फिल्म से बॉलीवुड तक का सफर

आशा भोसले ने अपने सिंगिंग करियर की शुरुआत 1943 में एक मराठी फिल्म ‘माझा बाळ’ के गाने ‘चला चला नव बाड़ा’ से की थी। हिंदी सिनेमा में उन्हें पहला मौका 1948 में फिल्म ‘चुनरिया’ के गाने ‘सावन आया’ से मिला।

शुरुआती दौर में आशा को वे गाने मिलते थे जिन्हें प्रमुख गायिकाएं जैसे लता मंगेशकर, शमशाद बेगम या गीता दत्त छोड़ देती थीं। उस समय उन्हें अक्सर फिल्मों में विलेन, डांसर या साइड किरदारों के लिए गाने के लिए बुलाया जाता था।

आवाज को खराब बताया, स्टूडियो से रिजेक्शन मिला

आज जो आवाज दुनिया भर में पहचानी जाती है, एक समय उसे भी नकारा गया था। 1947 में, जब आशा अपने करियर के शुरुआती दौर में थीं, तब फिल्म ‘जान पहचान’ (संगीतकार: खेमचंद प्रकाश) के एक गाने की रिकॉर्डिंग के लिए वे किशोर कुमार के साथ फेमस स्टूडियो गई थीं। वहां के रिकॉर्डिस्ट रॉबिन चटर्जी ने उनकी आवाज सुनने के बाद कहा था, “यह आवाज नहीं चलेगी, इनका गला खराब है, किसी और को बुलाओ।”

उस समय आशा को यह कहकर स्टूडियो से बाहर कर दिया गया था कि उनकी आवाज अच्छी नहीं है। इस घटना से किशोर कुमार काफी दुखी हुए थे। रात के 2 बज चुके थे और दोनों महालक्ष्मी रेलवे स्टेशन पर उदास बैठे थे।

तब आशा ने ही किशोर दा को ढांढस बंधाते हुए कहा था कि उनकी आवाज को कोई नहीं रोक सकता। इस रिजेक्शन ने आशा को तोड़ा नहीं, बल्कि और बेहतर बनने की प्रेरणा दी।

आरडी बर्मन रहे करियर के बड़े टर्निंग पॉइंट्स

50 और 60 के दशक में बॉलीवुड में लता मंगेशकर, शमशाद बेगम और गीता दत्त का दबदबा था। शमशाद बेगम अपनी खनकदार आवाज और गीता दत्त अपने दर्द भरे और वेस्टर्न अंदाज वाले गानों के लिए मशहूर थीं।

जब गीता दत्त अपनी निजी जिंदगी की परेशानियों के चलते रिकॉर्डिंग से दूर होने लगीं, तब ओ.पी. नैयर और एस.डी. बर्मन जैसे संगीतकारों ने आशा भोसले की तरफ रुख किया।

1950 के दशक में नैयर ने आशा की आवाज की खनक को पहचाना। 1954 में फिल्म ‘मंगू’ से शुरू हुआ उनका साथ ‘सीआईडी’ (1956) और ‘नया दौर’ (1957) तक आते-आते ब्लॉकबस्टर साबित हुआ। नया दौर का गाना ‘मांग के साथ तुम्हारा’ और ‘उड़े जब जब जुल्फें तुम्हारी’ ने उन्हें मुख्यधारा की टॉप सिंगर्स में शामिल कर दिया।

इसके बाद 1960 और 70 के दशक में संगीतकार आरडी बर्मन (पंचम दा) के साथ उनकी जोड़ी ने संगीत की परिभाषा बदल दी। पंचम दा ने आशा से ‘दम मारो दम’ (हरे रामा हरे कृष्णा) और ‘पिया तू अब तो आजा’ (कारवां) जैसे वेस्टर्न और जैज स्टाइल के गाने गवाए, जिन्होंने आशा को ‘क्वीन ऑफ इंडिपॉप’ बना दिया।

जब लता के साये से बाहर आईं आशा

आशा भोसले के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपनी ही बहन लता मंगेशकर के साथ कॉम्पिटिशन करना था। उस दौर में लता जी की आवाज को ‘आदर्श’ माना जाता था। आशा ने चतुराई से अपनी आवाज के साथ प्रयोग किए। उन्होंने महसूस किया कि अगर वह लता जैसी ही शैली अपनाएंगी, तो वह कभी अपनी पहचान नहीं बना पाएंगी।

उन्होंने वेस्टर्न टच, मॉड्यूलेशन को अपनी आवाज में पिरोया, जो उस समय किसी अन्य सिंगर के पास नहीं था। उन्होंने गीता दत्त और शमशाद बेगम जैसे सिंगर्स को उनके ही दौर में कड़ी टक्कर दी और बाद में अलका याग्निक, कविता कृष्णमूर्ति और सुनिधि चौहान जैसी पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा बनीं।

जब लोगों को लगा कि वे सिर्फ कैबरे गा सकती हैं, तब 1981 में फिल्म ‘उमराव जान’ आई। संगीतकार खय्याम के निर्देशन में आशा ने ‘दिल चीज क्या है’ और ‘इन आंखों की मस्ती के’ जैसी बेहतरीन गजलें गाकर क्लासिकल गायिकी में भी लता मंगेशकर के बराबर अपनी जगह पक्की कर ली।

आशा भोसले का पहला बड़ा सम्मान और वर्ल्ड रिकॉर्ड

  • पहला फिल्मफेयर अवॉर्ड: उन्हें अपना पहला फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका का पुरस्कार 1968 में फिल्म ‘दस लाख’ के गाने ‘गरीबों की सुनो’ के लिए मिला था।
  • कुल फिल्मफेयर अवॉर्ड: उन्होंने कुल 7 बार यह अवॉर्ड जीता। इसके बाद उन्होंने खुद को नॉमिनेशन से अलग कर लिया ताकि नई प्रतिभाओं को मौका मिल सके। 2001 में उन्हें ‘लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड’ से नवाजा गया।
  • नेशनल अवार्ड्स: उन्हें फिल्म ‘उमराव जान’ (1981) और ‘इजाजत’ (1987) के लिए दो बार नेशनल फिल्म अवॉर्ड मिला।
  • पद्म विभूषण: साल 2000 में भारत सरकार ने उन्हें सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान ‘दादा साहब फाल्के अवॉर्ड’ और 2008 में ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया।
  • गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स: साल 2011 में गिनीज बुक ने आधिकारिक तौर पर उन्हें संगीत इतिहास में सबसे अधिक स्टूडियो रिकॉर्डिंग (सर्वाधिक गाने) करने वाली कलाकार के रूप में मान्यता दी। आशा 20 भाषाओं में 12 हजार से ज्यादा गाने गा चुकीं थीं।

आशा भोसले के करियर के सबसे हिट गाने

  • नया दौर (1957): उड़े जब जब जुल्फें तुम्हारी
  • हावड़ा ब्रिज (1958): आइए मेहरबान
  • वक्त (1965): आगे भी जाने न तू
  • तीसरी मंजिल (1966): ओ हसीना जुल्फों वाली, ओ मेरे सोना रे
  • ज्वेल थीफ (1967): रात अकेली है
  • कारवां (1971): पिया तू अब तो आजा
  • हरे रामा हरे कृष्णा (1971): दम मारो दम
  • यादों की बारात (1973): चुरा लिया है तुमने जो दिल को
  • उमराव जान (1981): इन आंखों की मस्ती, दिल चीज क्या है
  • रंगीला (1995): तन्हा तन्हा, रंगीला रे

सिंगिंग के अलावा कुकिंग और सफल रेस्तरां बिजनेस

आशा भोसले केवल एक महान गायिका ही नहीं, बल्कि एक शानदार कुक भी थीं। वह अक्सर कहती थीं कि अगर वह सिंगर न होतीं, तो एक रसोइया होतीं। उनके हाथ के बने ‘कढ़ाई गोश्त’ और ‘बिरयानी’ के मुरीद राज कपूर से लेकर ऋषि कपूर तक रहे।

अपने इसी शौक को उन्होंने बिजनेस में बदला। उन्होंने ‘Asha’s’ नाम से रेस्तरां की एक ग्लोबल चैन शुरू की। उनका पहला रेस्तरां दुबई में खुला, जिसके बाद कुवैत, बर्मिंघम, मैनचेस्टर और अबू धाबी जैसे शहरों में भी इसे विस्तार मिला। वह अपने रेस्तरां के शेफ्स को खुद ट्रेनिंग देती थीं।

ब्रिटिश बैंड के साथ गाया आखिरी गाना

आशा भोसले की आवाज सिर्फ बॉलीवुड तक सीमित नहीं थी, बल्कि इंटरनेशनल म्यूजिक वर्ल्ड में भी उनका उतना ही सम्मान था। मार्च 2026 में रिलीज हुई मशहूर ब्रिटिश वर्चुअल बैंड ‘गोरिल्लाज’ की नौवीं एल्बम ‘द माउंटेन’ (पर्वत) में उनका गाना शामिल है।

“द शैडोई लाइट” नाम के इस ट्रैक को अब उनके शानदार करियर के आखिरी अध्याय के रूप में देखा जा रहा है। इसमें उन्होंने ब्रिटिश आर्टिस्ट ग्रफ राइस और सरोद उस्ताद अमान-अयान अली बंगश के साथ काम किया था।

इस एल्बम के पोस्टर में आशा हरी रंग की साड़ी में खड़ी दिखाई दे रही हैं।

इस एल्बम के पोस्टर में आशा हरी रंग की साड़ी में खड़ी दिखाई दे रही हैं।

गोरिल्लाज बैंड बनाने वाले डेमन अलबर्न असल में 70 के दशक के बॉलीवुड संगीत और आरडी बर्मन के बहुत बड़े फैन हैं। उन्होंने कई इंटरव्यू में आशा भोसले की आवाज को ‘साइकडेलिक’ और ‘एक्सपेरिमेंटल’ बताया था। यही वजह थी कि उन्होंने अपनी इस नई एल्बम को भारत में रिकॉर्ड किया। इस एल्बम में आशा ताई के अलावा अनुष्का शंकर ने भी साथ काम किया है।

वहीं आशा अपने अंतिम वर्षों में म्यूजिक रियलिटी शोज में जज के रूप में और लाइव कॉन्सर्ट्स में सक्रिय रहीं। 2023 में भी उन्होंने अपने 90वें जन्मदिन पर दुबई में परफॉर्म किया था। उनकी आवाज में जो ताजगी 1950 में थी, वही 92 साल की उम्र तक बरकरार रही।

WhatsApp
Facebook
Twitter
LinkedIn

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

लेटेस्ट टॉप अपडेट

सच्चाई की दहाड़

ब्रेकिंग खबरें सीधे अपने ईमेल पर पाने के लिए रजिस्टर करें।

You have been successfully Subscribed! Ops! Something went wrong, please try again.

ग्लोबल करेंसी अपडेट

Provided by IFC Markets
हिमाचल में अप्रैल में सामान्य से 142% ज्यादा बारिश:आज फिर 5 जिलों में तूफान का अलर्ट; 24 घंटे में 3.2 डिग्री बढ़ा टेंपरेचर

April 11, 2026/
5:05 am

हिमाचल की राजधानी शिमला समेत प्रदेश के ज्यादातर भागों में आज सुबह से ही आसमान में बादल छाए हुए है।...

इंदौर में चलती कार में अचानक भभक उठी आग:शहर के व्यस्ततम चौराहे पर पुलिस ने रोकी कार, टला बड़ा हादसा

April 12, 2026/
10:22 pm

ट्रैफिक पुलिसकर्मियों की तत्परता रविवार को काम आई। इसकी वजह से एक बड़ा हादसा टल गया। पलासिया चौराहे पर एक...

MI Vs SRH Live Score, IPL 2026

April 29, 2026/
8:54 pm

आखरी अपडेट:29 अप्रैल, 2026, 20:54 IST हालाँकि, अधिकांश सर्वेक्षणकर्ताओं ने राज्य में दूसरे चरण के लिए मतदान समाप्त होने के...

रामपाल के जेल से बाहर आने में हो रही देरी:जेल सुपरिटेंडेंट बोले- कोर्ट से नहीं पहुंचे रिहाई डॉक्यूमेंट; काली स्कॉर्पियो में आया परिवार

April 10, 2026/
9:09 am

हरियाणा के हिसार के सतलोक आश्रम प्रकरण में उम्रकैद की सजा काट रहा रामपाल 11 साल 4 माह बाद आज...

Shiney Ahuja Rape Case Controversial Story; Maid

February 24, 2026/
4:30 am

36 मिनट पहलेलेखक: ईफत कुरैशी और वर्षा राय कॉपी लिंक बॉलीवुड क्राइम फाइल्स के केस-6 में जानिए शाइनी आहूजा रेप...

जॉब - शिक्षा

राजनीति

Asha Bhosle Passes Away at 92

Asha Bhosle Passes Away at 92

16 मिनट पहले

  • कॉपी लिंक

भारतीय संगीत जगत की सबसे वर्सेटाइल सिंगर आशा भोसले का 92 साल की उम्र में निधन हो गया है। उन्होंने अपनी आवाज से सात दशकों तक फिल्म इंडस्ट्री पर राज किया।

10 साल की उम्र से करियर शुरू करने वाली आशा ताई को शुरुआती दौर में ‘खराब आवाज’ कहकर स्टूडियो से रिजेक्ट कर दिया गया था, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी।

अपनी बड़ी बहन लता मंगेशकर के साये से बाहर निकलकर उन्होंने संगीत की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई और 12,000 से ज्यादा गानों के साथ अपना नाम ‘गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स’ में दर्ज कराया।

आशा भोसले ने शास्त्रीय संगीत से लेकर कैबरे, पॉप और गजल तक हर शैली में अपनी महारत साबित की।

दिवंगत गायिका आशा भोसले।

दिवंगत गायिका आशा भोसले।

महाराष्ट्र के सांगली में जन्म, पिता शास्त्रीय गायक रहे

आशा भोसले का जन्म 8 सितंबर 1933 को महाराष्ट्र के सांगली में हुआ था। वह प्रसिद्ध शास्त्रीय गायक और थिएटर कलाकार पंडित दीनानाथ मंगेशकर की बेटी थीं। घर में संगीत का माहौल शुरू से ही था। उनके भाई-बहन लता मंगेशकर, मीना खडीकर, उषा मंगेशकर और हृदयनाथ मंगेशकर भी संगीत की दुनिया से ही जुड़े रहे।

जब आशा सिर्फ 9 साल की थीं, तब 1942 में उनके पिता दीनानाथ मंगेशकर का निधन हो गया। पिता के जाने के बाद परिवार पर आर्थिक संकट आ गया। परिवार को सहारा देने के लिए लता और आशा ने बहुत कम उम्र में गाना और फिल्मों में छोटी भूमिकाएं निभाना शुरू कर दिया था।

मराठी फिल्म से बॉलीवुड तक का सफर

आशा भोसले ने अपने सिंगिंग करियर की शुरुआत 1943 में एक मराठी फिल्म ‘माझा बाळ’ के गाने ‘चला चला नव बाड़ा’ से की थी। हिंदी सिनेमा में उन्हें पहला मौका 1948 में फिल्म ‘चुनरिया’ के गाने ‘सावन आया’ से मिला।

शुरुआती दौर में आशा को वे गाने मिलते थे जिन्हें प्रमुख गायिकाएं जैसे लता मंगेशकर, शमशाद बेगम या गीता दत्त छोड़ देती थीं। उस समय उन्हें अक्सर फिल्मों में विलेन, डांसर या साइड किरदारों के लिए गाने के लिए बुलाया जाता था।

आवाज को खराब बताया, स्टूडियो से रिजेक्शन मिला

आज जो आवाज दुनिया भर में पहचानी जाती है, एक समय उसे भी नकारा गया था। 1947 में, जब आशा अपने करियर के शुरुआती दौर में थीं, तब फिल्म ‘जान पहचान’ (संगीतकार: खेमचंद प्रकाश) के एक गाने की रिकॉर्डिंग के लिए वे किशोर कुमार के साथ फेमस स्टूडियो गई थीं। वहां के रिकॉर्डिस्ट रॉबिन चटर्जी ने उनकी आवाज सुनने के बाद कहा था, “यह आवाज नहीं चलेगी, इनका गला खराब है, किसी और को बुलाओ।”

उस समय आशा को यह कहकर स्टूडियो से बाहर कर दिया गया था कि उनकी आवाज अच्छी नहीं है। इस घटना से किशोर कुमार काफी दुखी हुए थे। रात के 2 बज चुके थे और दोनों महालक्ष्मी रेलवे स्टेशन पर उदास बैठे थे।

तब आशा ने ही किशोर दा को ढांढस बंधाते हुए कहा था कि उनकी आवाज को कोई नहीं रोक सकता। इस रिजेक्शन ने आशा को तोड़ा नहीं, बल्कि और बेहतर बनने की प्रेरणा दी।

आरडी बर्मन रहे करियर के बड़े टर्निंग पॉइंट्स

50 और 60 के दशक में बॉलीवुड में लता मंगेशकर, शमशाद बेगम और गीता दत्त का दबदबा था। शमशाद बेगम अपनी खनकदार आवाज और गीता दत्त अपने दर्द भरे और वेस्टर्न अंदाज वाले गानों के लिए मशहूर थीं।

जब गीता दत्त अपनी निजी जिंदगी की परेशानियों के चलते रिकॉर्डिंग से दूर होने लगीं, तब ओ.पी. नैयर और एस.डी. बर्मन जैसे संगीतकारों ने आशा भोसले की तरफ रुख किया।

1950 के दशक में नैयर ने आशा की आवाज की खनक को पहचाना। 1954 में फिल्म ‘मंगू’ से शुरू हुआ उनका साथ ‘सीआईडी’ (1956) और ‘नया दौर’ (1957) तक आते-आते ब्लॉकबस्टर साबित हुआ। नया दौर का गाना ‘मांग के साथ तुम्हारा’ और ‘उड़े जब जब जुल्फें तुम्हारी’ ने उन्हें मुख्यधारा की टॉप सिंगर्स में शामिल कर दिया।

इसके बाद 1960 और 70 के दशक में संगीतकार आरडी बर्मन (पंचम दा) के साथ उनकी जोड़ी ने संगीत की परिभाषा बदल दी। पंचम दा ने आशा से ‘दम मारो दम’ (हरे रामा हरे कृष्णा) और ‘पिया तू अब तो आजा’ (कारवां) जैसे वेस्टर्न और जैज स्टाइल के गाने गवाए, जिन्होंने आशा को ‘क्वीन ऑफ इंडिपॉप’ बना दिया।

जब लता के साये से बाहर आईं आशा

आशा भोसले के लिए सबसे बड़ी चुनौती अपनी ही बहन लता मंगेशकर के साथ कॉम्पिटिशन करना था। उस दौर में लता जी की आवाज को ‘आदर्श’ माना जाता था। आशा ने चतुराई से अपनी आवाज के साथ प्रयोग किए। उन्होंने महसूस किया कि अगर वह लता जैसी ही शैली अपनाएंगी, तो वह कभी अपनी पहचान नहीं बना पाएंगी।

उन्होंने वेस्टर्न टच, मॉड्यूलेशन को अपनी आवाज में पिरोया, जो उस समय किसी अन्य सिंगर के पास नहीं था। उन्होंने गीता दत्त और शमशाद बेगम जैसे सिंगर्स को उनके ही दौर में कड़ी टक्कर दी और बाद में अलका याग्निक, कविता कृष्णमूर्ति और सुनिधि चौहान जैसी पीढ़ियों के लिए भी प्रेरणा बनीं।

जब लोगों को लगा कि वे सिर्फ कैबरे गा सकती हैं, तब 1981 में फिल्म ‘उमराव जान’ आई। संगीतकार खय्याम के निर्देशन में आशा ने ‘दिल चीज क्या है’ और ‘इन आंखों की मस्ती के’ जैसी बेहतरीन गजलें गाकर क्लासिकल गायिकी में भी लता मंगेशकर के बराबर अपनी जगह पक्की कर ली।

आशा भोसले का पहला बड़ा सम्मान और वर्ल्ड रिकॉर्ड

  • पहला फिल्मफेयर अवॉर्ड: उन्हें अपना पहला फिल्मफेयर सर्वश्रेष्ठ पार्श्व गायिका का पुरस्कार 1968 में फिल्म ‘दस लाख’ के गाने ‘गरीबों की सुनो’ के लिए मिला था।
  • कुल फिल्मफेयर अवॉर्ड: उन्होंने कुल 7 बार यह अवॉर्ड जीता। इसके बाद उन्होंने खुद को नॉमिनेशन से अलग कर लिया ताकि नई प्रतिभाओं को मौका मिल सके। 2001 में उन्हें ‘लाइफटाइम अचीवमेंट अवॉर्ड’ से नवाजा गया।
  • नेशनल अवार्ड्स: उन्हें फिल्म ‘उमराव जान’ (1981) और ‘इजाजत’ (1987) के लिए दो बार नेशनल फिल्म अवॉर्ड मिला।
  • पद्म विभूषण: साल 2000 में भारत सरकार ने उन्हें सिनेमा के सर्वोच्च सम्मान ‘दादा साहब फाल्के अवॉर्ड’ और 2008 में ‘पद्म विभूषण’ से सम्मानित किया।
  • गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड्स: साल 2011 में गिनीज बुक ने आधिकारिक तौर पर उन्हें संगीत इतिहास में सबसे अधिक स्टूडियो रिकॉर्डिंग (सर्वाधिक गाने) करने वाली कलाकार के रूप में मान्यता दी। आशा 20 भाषाओं में 12 हजार से ज्यादा गाने गा चुकीं थीं।

आशा भोसले के करियर के सबसे हिट गाने

  • नया दौर (1957): उड़े जब जब जुल्फें तुम्हारी
  • हावड़ा ब्रिज (1958): आइए मेहरबान
  • वक्त (1965): आगे भी जाने न तू
  • तीसरी मंजिल (1966): ओ हसीना जुल्फों वाली, ओ मेरे सोना रे
  • ज्वेल थीफ (1967): रात अकेली है
  • कारवां (1971): पिया तू अब तो आजा
  • हरे रामा हरे कृष्णा (1971): दम मारो दम
  • यादों की बारात (1973): चुरा लिया है तुमने जो दिल को
  • उमराव जान (1981): इन आंखों की मस्ती, दिल चीज क्या है
  • रंगीला (1995): तन्हा तन्हा, रंगीला रे

सिंगिंग के अलावा कुकिंग और सफल रेस्तरां बिजनेस

आशा भोसले केवल एक महान गायिका ही नहीं, बल्कि एक शानदार कुक भी थीं। वह अक्सर कहती थीं कि अगर वह सिंगर न होतीं, तो एक रसोइया होतीं। उनके हाथ के बने ‘कढ़ाई गोश्त’ और ‘बिरयानी’ के मुरीद राज कपूर से लेकर ऋषि कपूर तक रहे।

अपने इसी शौक को उन्होंने बिजनेस में बदला। उन्होंने ‘Asha’s’ नाम से रेस्तरां की एक ग्लोबल चैन शुरू की। उनका पहला रेस्तरां दुबई में खुला, जिसके बाद कुवैत, बर्मिंघम, मैनचेस्टर और अबू धाबी जैसे शहरों में भी इसे विस्तार मिला। वह अपने रेस्तरां के शेफ्स को खुद ट्रेनिंग देती थीं।

ब्रिटिश बैंड के साथ गाया आखिरी गाना

आशा भोसले की आवाज सिर्फ बॉलीवुड तक सीमित नहीं थी, बल्कि इंटरनेशनल म्यूजिक वर्ल्ड में भी उनका उतना ही सम्मान था। मार्च 2026 में रिलीज हुई मशहूर ब्रिटिश वर्चुअल बैंड ‘गोरिल्लाज’ की नौवीं एल्बम ‘द माउंटेन’ (पर्वत) में उनका गाना शामिल है।

“द शैडोई लाइट” नाम के इस ट्रैक को अब उनके शानदार करियर के आखिरी अध्याय के रूप में देखा जा रहा है। इसमें उन्होंने ब्रिटिश आर्टिस्ट ग्रफ राइस और सरोद उस्ताद अमान-अयान अली बंगश के साथ काम किया था।

इस एल्बम के पोस्टर में आशा हरी रंग की साड़ी में खड़ी दिखाई दे रही हैं।

इस एल्बम के पोस्टर में आशा हरी रंग की साड़ी में खड़ी दिखाई दे रही हैं।

गोरिल्लाज बैंड बनाने वाले डेमन अलबर्न असल में 70 के दशक के बॉलीवुड संगीत और आरडी बर्मन के बहुत बड़े फैन हैं। उन्होंने कई इंटरव्यू में आशा भोसले की आवाज को ‘साइकडेलिक’ और ‘एक्सपेरिमेंटल’ बताया था। यही वजह थी कि उन्होंने अपनी इस नई एल्बम को भारत में रिकॉर्ड किया। इस एल्बम में आशा ताई के अलावा अनुष्का शंकर ने भी साथ काम किया है।

वहीं आशा अपने अंतिम वर्षों में म्यूजिक रियलिटी शोज में जज के रूप में और लाइव कॉन्सर्ट्स में सक्रिय रहीं। 2023 में भी उन्होंने अपने 90वें जन्मदिन पर दुबई में परफॉर्म किया था। उनकी आवाज में जो ताजगी 1950 में थी, वही 92 साल की उम्र तक बरकरार रही।

WhatsApp
Facebook
Twitter
LinkedIn

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

हेल्थ & फिटनेस

विज्ञापन

राजनीति

लेटेस्ट टॉप अपडेट

ग्लोबल करेंसी अपडेट

Provided by IFC Markets

Live Cricket

सच्चाई की दहाड़

ब्रेकिंग खबरें सीधे अपने ईमेल पर पाने के लिए रजिस्टर करें।

You have been successfully Subscribed! Ops! Something went wrong, please try again.