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Justice Vikram Nath on AI Uses; AI Lawyers Debate

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हैदराबाद3 घंटे पहले

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फाइल फोटो।

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस विक्रम नाथ ने शनिवार को कहा कि AI वकील के प्रशिक्षित दिमाग और जज की नैतिक जिम्मेदारी की जगह नहीं ले सकता। उन्होंने आगे कहा कि अगर समझदारी से इस्तेमाल किया जाए, तो AI समय बचा सकता है और कानूनी काम के कुछ पहलुओं को ज्यादा आसान बना सकता है।

जस्टिस विक्रम तेलंगाना में एक कॉन्फ्रेंस को संबोधित कर रहे थे। जस्टिस नाथ ने आगे कहा कि टेक्नोलॉजी किसी नोट का ड्राफ्टा बनाने में मदद कर सकती है, लेकिन इसे कानून बनाने की इजाजत नहीं दी जा सकती।

उन्होंने कहा कि AI के गलत इस्तेमाल की वजह से न्यायिक व्यवस्था को इस हद तक नहीं जाना चाहिए कि वह इससे पूरी तरह से दूरी बना ले। उन्होंने इसके साथ ही कहा कि AI महज एक टूल है, और एक टूल को टूल ही रहना चाहिए। इस कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के जज, सतीश चंद्र शर्मा और तेलंगाना हाई कोर्ट के मुख्य जज, जस्टिस अपारेष कुमार सिंह ने भी बात रखी।

जस्टिस विक्रम नाथ ने ये भी कहा…

  • सुप्रीम कोर्ट में भी AI से बनी गलत सामग्री और नकली साइटेशन के इस्तेमाल को लेकर चिंता जताई गई है। गलत कानूनी संदर्भ (साइटेशन) सिर्फ तकनीकी गलती नहीं है, इससे न्याय प्रक्रिया की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
  • AI के गलत इस्तेमाल के कारण इसे पूरी तरह से छोड़ देना भी सही नहीं है। इसका समाधान है जानकारी के साथ इस्तेमाल, नैतिक अनुशासन और पेशेवर मानकों का पालन। लोगों को AI का उपयोग सावधानी और इसकी सीमाओं को समझकर करना चाहिए।
  • नई टेक्नोलॉजी कानूनी काम को आसान बना सकती है, लेकिन लापरवाही के नए रूप भी पैदा कर सकती है। यह अपराध से निपटने में मदद कर सकती है, लेकिन नए तरह के अपराध भी पैदा कर सकती है।
  • टेक्नोलॉजी को सिर्फ इसलिए नहीं ठुकराना चाहिए क्योंकि वह नई है। और सिर्फ इसलिए स्वीकार भी नहीं करना चाहिए क्योंकि वह तेज और कुशल है। इसका उपयोग सिद्धांतों और जिम्मेदारी के साथ होना चाहिए।
  • न्याय व्यवस्था का भविष्य सिर्फ प्रक्रियाओं को डिजिटल बनाने से सुरक्षित नहीं होगा। जरूरी है कि टेक्नोलॉजी कानून के मूल सिद्धांतों से जुड़ी रहे। कानून का राज टेक्नोलॉजी पर नहीं, बल्कि मजबूत संस्थाओं और ईमानदार लोगों पर निर्भर करता है।

2 मार्च: सुप्रीम कोर्ट बोला-AI जेनरेटेड सबूतों पर फैसला लेना बिल्कुल गलत:इसका सीधा असर न्याय प्रक्रिया पर पड़ता है

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से तैयार सबूतों के आधार पर फैसला लिखना गलत है। जस्टिस पी एस नरसिम्हा और आलोक अराधे की बेंच ने कहा कि यह साधारण गलती नहीं हो सकती।

कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और बार काउंसिल ऑफ इंडिया को नोटिस जारी किया है। मामले की अगली सुनवाई 10 मार्च को होगी।

दरअसल अगस्त 2023 में आंध्र प्रदेश की एक ट्रायल कोर्ट ने विवादित प्रॉपर्टी केस में AI से बनी तस्वीर के आधार पर फैसला दिया। इसके खिलाफ आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट में याचिका दायर हुई, जिसे जनवरी 2024 में खारिज कर दिया गया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई। 17 फरवरी को भी कोर्ट ने AI टूल से तैयार पिटीशन फाइल करने के बढ़ते ट्रेंड पर चिंता जताई थी। पूरी खबर पढ़ें…

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फाइल फोटो।

सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस विक्रम नाथ ने शनिवार को कहा कि AI वकील के प्रशिक्षित दिमाग और जज की नैतिक जिम्मेदारी की जगह नहीं ले सकता। उन्होंने आगे कहा कि अगर समझदारी से इस्तेमाल किया जाए, तो AI समय बचा सकता है और कानूनी काम के कुछ पहलुओं को ज्यादा आसान बना सकता है।

जस्टिस विक्रम तेलंगाना में एक कॉन्फ्रेंस को संबोधित कर रहे थे। जस्टिस नाथ ने आगे कहा कि टेक्नोलॉजी किसी नोट का ड्राफ्टा बनाने में मदद कर सकती है, लेकिन इसे कानून बनाने की इजाजत नहीं दी जा सकती।

उन्होंने कहा कि AI के गलत इस्तेमाल की वजह से न्यायिक व्यवस्था को इस हद तक नहीं जाना चाहिए कि वह इससे पूरी तरह से दूरी बना ले। उन्होंने इसके साथ ही कहा कि AI महज एक टूल है, और एक टूल को टूल ही रहना चाहिए। इस कार्यक्रम में सुप्रीम कोर्ट के जज, सतीश चंद्र शर्मा और तेलंगाना हाई कोर्ट के मुख्य जज, जस्टिस अपारेष कुमार सिंह ने भी बात रखी।

जस्टिस विक्रम नाथ ने ये भी कहा…

  • सुप्रीम कोर्ट में भी AI से बनी गलत सामग्री और नकली साइटेशन के इस्तेमाल को लेकर चिंता जताई गई है। गलत कानूनी संदर्भ (साइटेशन) सिर्फ तकनीकी गलती नहीं है, इससे न्याय प्रक्रिया की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।
  • AI के गलत इस्तेमाल के कारण इसे पूरी तरह से छोड़ देना भी सही नहीं है। इसका समाधान है जानकारी के साथ इस्तेमाल, नैतिक अनुशासन और पेशेवर मानकों का पालन। लोगों को AI का उपयोग सावधानी और इसकी सीमाओं को समझकर करना चाहिए।
  • नई टेक्नोलॉजी कानूनी काम को आसान बना सकती है, लेकिन लापरवाही के नए रूप भी पैदा कर सकती है। यह अपराध से निपटने में मदद कर सकती है, लेकिन नए तरह के अपराध भी पैदा कर सकती है।
  • टेक्नोलॉजी को सिर्फ इसलिए नहीं ठुकराना चाहिए क्योंकि वह नई है। और सिर्फ इसलिए स्वीकार भी नहीं करना चाहिए क्योंकि वह तेज और कुशल है। इसका उपयोग सिद्धांतों और जिम्मेदारी के साथ होना चाहिए।
  • न्याय व्यवस्था का भविष्य सिर्फ प्रक्रियाओं को डिजिटल बनाने से सुरक्षित नहीं होगा। जरूरी है कि टेक्नोलॉजी कानून के मूल सिद्धांतों से जुड़ी रहे। कानून का राज टेक्नोलॉजी पर नहीं, बल्कि मजबूत संस्थाओं और ईमानदार लोगों पर निर्भर करता है।

2 मार्च: सुप्रीम कोर्ट बोला-AI जेनरेटेड सबूतों पर फैसला लेना बिल्कुल गलत:इसका सीधा असर न्याय प्रक्रिया पर पड़ता है

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को एक अहम टिप्पणी करते हुए कहा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) से तैयार सबूतों के आधार पर फैसला लिखना गलत है। जस्टिस पी एस नरसिम्हा और आलोक अराधे की बेंच ने कहा कि यह साधारण गलती नहीं हो सकती।

कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल आर वेंकटरमणी, सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता और बार काउंसिल ऑफ इंडिया को नोटिस जारी किया है। मामले की अगली सुनवाई 10 मार्च को होगी।

दरअसल अगस्त 2023 में आंध्र प्रदेश की एक ट्रायल कोर्ट ने विवादित प्रॉपर्टी केस में AI से बनी तस्वीर के आधार पर फैसला दिया। इसके खिलाफ आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट में याचिका दायर हुई, जिसे जनवरी 2024 में खारिज कर दिया गया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट में अपील की गई। 17 फरवरी को भी कोर्ट ने AI टूल से तैयार पिटीशन फाइल करने के बढ़ते ट्रेंड पर चिंता जताई थी। पूरी खबर पढ़ें…

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