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Supreme Court Hearing Update; Sabarimala Women Entry

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नई दिल्ली7 मिनट पहले

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धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव का मामला बीते 26 सालों से देश की अदालतों में हैं। सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ आज से 22 अप्रैल तक 50 से ज्यादा पेंडिंग याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई करेगी।

जिन मुद्दों पर सुनवाई होगी उनमें केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक अहम है। इसके अलावा मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश पर रोक, दाऊदी बोहरा मुस्लिम समुदाय में महिला खतना और गैर-पारसी पुरुषों से शादी करने पर पारसी महिलाओं को धार्मिक स्थल पर प्रवेश से रोकने के मामले भी सुने जाएंगे।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश में कहा गया है कि 7 अप्रैल की सुबह 10.30 बजे सबरीमाला रिव्यू केस की सुनवाई शुरू होगी। रिव्यू पिटीशनरों और उन्हें सपोर्ट करने वालों की सुनवाई 7 अप्रैल से 9 अप्रैल तक होगी। रिव्यू का विरोध करने वालों को 14 अप्रैल से 16 अप्रैल तक सुना जाएगा।

सबरीमाला में 10 से 50 साल की फीमेल को एंट्री नहीं, पूरा मामला 5 पॉइंट्स में

  • सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की फीमेल की एंट्री बैन है। इसकी वजह मासिक धर्म है, क्योंकि पीरियड के दौरान महिलाओं को अशुद्ध माना जाता है। उन्हें धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने से रोका जाता है।सबरीमाला मंदिर की पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान अयप्पा एक ब्रह्मचारी हैं, जिन्होंने ब्रह्मचर्य का व्रत लिया है, और इसी कारण एक निश्चित आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं दी जाती थी। इसी पर विवाद है।
  • 1990 में मंदिर में महिला की एंट्री को लेकर विवाद उठा। समय के साथ स्थानीय कोर्ट में मामला चला बाद में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किए थे। केस 2008 में 3 जजों की बेंच को सौंपा गया।
  • 7 साल बाद 2016 में सुनवाई हुई। इसके बाद 2017 में तत्कालीन सीजेआई की 3 जजों की बेंच ने केस 5 जजों की संविधान पीठ को सौंपा। 2018 में संविधान पीठ ने 4-1 के बहुमत से फैसला सुनाया कि सबरीमाला में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश दिया जाए। प्रतिबंध असंवैधानिक है। इसके बाद बड़े विरोध के बीच 2 महिला बिंदु कनकदुर्गा और बिंदु अम्मिनी ने मंदिर में प्रवेश किया।
  • इसके बाद 2019 में 7 जजों की बेंच ने यह मुद्दा 9 जजों की बड़ी बेंच को भेजा दिया था। तब अन्य धर्मों की महिलाओं से जुड़े मामले में भी इसमें जोड़ दिए गए।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 2 जनवरी 2019 को बिंदु कनकदुर्गा (45) और बिंदु अम्मिनी (46) ने पुलिस सुरक्षा में सबरीमाला मंदिर में प्रवेश किया। वे ऐसा करने वालीं पहली महिलाएं थीं। दोनों ने मंदिर में जाने के लिए पारंपरिक काले कपड़े पहने।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 2 जनवरी 2019 को बिंदु कनकदुर्गा (45) और बिंदु अम्मिनी (46) ने पुलिस सुरक्षा में सबरीमाला मंदिर में प्रवेश किया। वे ऐसा करने वालीं पहली महिलाएं थीं। दोनों ने मंदिर में जाने के लिए पारंपरिक काले कपड़े पहने।

9 जजों की बेंच 5 मुद्दों पर सुनवाई करेगी

1. सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश: क्या सभी आयु की महिलाओं को प्रवेश का अधिकार है? बेंच यह तय करेगी कि साल 2018 में इंडियन यंग लायर एसोसिएशन Vs स्टेट ऑफ केरल मामले में हाईकोर्ट का फैसला सही था या नहीं।

2. मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश: क्या मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में नमाज पढ़ने से रोका जा सकता है। 2016 में यास्मीन जुबैर अहमद पीरजादा नाम की महिला ने मुस्लिम महिलाओं का मस्जिद में प्रवेश का मुद्दा उठाया और सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।

3. दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं का खतना: क्या यह प्रथा मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है? 2012 में पारसी महिला गूलरुख एम गुप्ता ने हिंदु व्यक्ति से शादी की। उन्हें पारसी धर्मस्थलों में प्रवेश से रोका जाने लगा। उन्होंने इसके खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में पारसी महिलाओं के धार्मिक अधिकार को लेकर याचिका लगाई। बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

4. पारसी महिलाओं का अग्निमंदिर में प्रवेश: क्या गैर-पारसी से शादी करने वाली पारसी महिला को अग्नि मंदिर में प्रवेश से रोका जा सकता है? 2017 में एड. सुनीता तिवारी ने दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला खतना का मुद्दा उठाया और सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।

5. मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े लैंगिक भेदभाव के प्रश्न: क्या व्यक्तिगत कानून मौलिक अधिकारों की कसौटी पर परखे जा सकते हैं?

सुप्रीम कोर्ट ने 7 सवाल तय किए

13 जनवरी 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि वह सीधे पुनर्विचार याचिकाओं पर नहीं, बल्कि आर्टिकल 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) और आर्टिकल 14 (समानता) के बीच संतुलन तथा आवश्यक धार्मिक प्रथाएं जैसे सिद्धांतों पर विचार करेगा। 14 से 23 जनवरी के बीच चली सुनवाई में याचिकाकर्ताओं ने महिलाओं के बहिष्कार को असंवैधानिक बताया, जबकि धार्मिक पक्ष ने आस्था और आर्टिकल 26 के तहत स्वतंत्रता का हवाला देते हुए न्यायिक हस्तक्षेप सीमित रखने की मांग की। इसी दौरान कोर्ट ने आवश्यक धार्मिक प्रथाएं और ज्यूडिशिअल रिव्यू की सीमाओं पर सवाल उठाए।

3 से 7 फरवरी के दौरान भी बहस जारी रही, जहां समानता बनाम धार्मिक स्वतंत्रता और न्यायिक सीमा के मुद्दों पर चर्चा हुई। लेकिन कोविड-19 के कारण सुनवाई रोक दी गई।

सुप्रीम कोर्ट अपने ही फैसले को बरकरार रखती तो क्या बदलेगा

अगर सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच केरल हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की संविधान पीठ के फैसले को बरकरार रखती है तो भविष्य में धार्मिक मामलों में कोर्ट के दखल की सीमा तय हो सकती है।

केंद्र सरकार का स्टैंड, सबरीमाला मामले पर किसने क्या कहा

केंद्र ने रूख बदला: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के 2018-2019 के फैसले का समर्थन किया था। कहा था कि मंदिर में महिलाओं के प्रवेश होना चाहिए, लैंगिक समानता के खिलाफ कोई भी प्रथा नहीं होनी चाहिए। हालांकि बाद में रिव्यू स्टेज 2019–2020 के दौरान में केंद्र ने थोड़ा संतुलित रुख अपनाते हुए कहा कि मामला व्यापक संवैधानिक प्रश्नों (धर्म बनाम समानता) से जुड़ा है और इसे संविधान पीठ तय करे।

अखिल भारतीय संत समिति: 2019 की याचिका में समिति ने कहा है कि अदालतें धार्मिक मामलों में तभी हस्तक्षेप करें जब वे सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य के खिलाफ हों। अनुच्छेद 14 का उपयोग अनुच्छेद 25 के अधिकार को खत्म करने के लिए न हो।

केरल सरकार: पुरानी धार्मिक परंपराओं में बदलाव से पहले धर्म के विद्वानों और समाज सुधारकों से सलाह जरूरी है। अदालत प्रथाओं की तर्कसंगतता नहीं, बल्कि यह देखे कि लोग उसे ईमानदारी से धर्म का हिस्सा मानते हैं।

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड: अदालतें ‘जरूरी धार्मिक प्रथा’ तय करने से बचें, क्योंकि इससे अनुच्छेद 25-26 के तहत मिली धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप हो सकता है। किसी धर्म के ‘मूल’ की पहचान करना व्यक्तिगत विश्वास पर निर्भर है।

जैन समुदाय: किसी भी धर्म की प्रथाओं को तय करने का अधिकार उसी धर्म के लोगों का है। सरकार या कोर्ट को यह तय नहीं करना चाहिए कि क्या धार्मिक है और क्या नहीं।

अदालतों में 26 साल में क्या हुआ, पूरी टाइमलाइन…

सबरीमाला में 2 महिलाओं की एंट्री पर प्रदर्शन हुए…फोटोज

बिंदु कनकदुर्गा (45) और बिंदु अम्मिनी (46) इन्होंने पहली बार सबरीमाला मंदिर में एंट्री की।

बिंदु कनकदुर्गा (45) और बिंदु अम्मिनी (46) इन्होंने पहली बार सबरीमाला मंदिर में एंट्री की।

बिंदु कनकदुर्गा और बिंदु अम्मिनी जब भगवान अयप्पा के दर्शन करके वापस लौटी थीं, उनके जाते ही मंदिर में शुद्धी की गई थी। मंदिर में 1 घंटे तक दर्शन बंद किए गए थे।

बिंदु कनकदुर्गा और बिंदु अम्मिनी जब भगवान अयप्पा के दर्शन करके वापस लौटी थीं, उनके जाते ही मंदिर में शुद्धी की गई थी। मंदिर में 1 घंटे तक दर्शन बंद किए गए थे।

महिलाओं के मंदिर में प्रवेश करने का जमकर विरोध हुआ था। 2 जनवरी को कोच्चि में लोगों ने प्रदर्शन किया था।

महिलाओं के मंदिर में प्रवेश करने का जमकर विरोध हुआ था। 2 जनवरी को कोच्चि में लोगों ने प्रदर्शन किया था।

3 जनवरी को भी केरल के जगह-जगह विरोध प्रदर्शन हुआ था। पुलिस ने भीड़ को खदेड़ा था।

3 जनवरी को भी केरल के जगह-जगह विरोध प्रदर्शन हुआ था। पुलिस ने भीड़ को खदेड़ा था।

विरोध प्रदर्शन के दौरान केरल के सीएम पिनाराई विजयन के पोस्टर को चप्पल मारती महिला।

विरोध प्रदर्शन के दौरान केरल के सीएम पिनाराई विजयन के पोस्टर को चप्पल मारती महिला।

जानिए सबरीमाला मंदिर के बारे में…

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धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव का मामला बीते 26 सालों से देश की अदालतों में हैं। सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की संविधान पीठ आज से 22 अप्रैल तक 50 से ज्यादा पेंडिंग याचिकाओं पर अंतिम सुनवाई करेगी।

जिन मुद्दों पर सुनवाई होगी उनमें केरल के सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक अहम है। इसके अलावा मस्जिदों में महिलाओं के प्रवेश पर रोक, दाऊदी बोहरा मुस्लिम समुदाय में महिला खतना और गैर-पारसी पुरुषों से शादी करने पर पारसी महिलाओं को धार्मिक स्थल पर प्रवेश से रोकने के मामले भी सुने जाएंगे।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश में कहा गया है कि 7 अप्रैल की सुबह 10.30 बजे सबरीमाला रिव्यू केस की सुनवाई शुरू होगी। रिव्यू पिटीशनरों और उन्हें सपोर्ट करने वालों की सुनवाई 7 अप्रैल से 9 अप्रैल तक होगी। रिव्यू का विरोध करने वालों को 14 अप्रैल से 16 अप्रैल तक सुना जाएगा।

सबरीमाला में 10 से 50 साल की फीमेल को एंट्री नहीं, पूरा मामला 5 पॉइंट्स में

  • सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की फीमेल की एंट्री बैन है। इसकी वजह मासिक धर्म है, क्योंकि पीरियड के दौरान महिलाओं को अशुद्ध माना जाता है। उन्हें धार्मिक अनुष्ठानों में भाग लेने से रोका जाता है।सबरीमाला मंदिर की पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान अयप्पा एक ब्रह्मचारी हैं, जिन्होंने ब्रह्मचर्य का व्रत लिया है, और इसी कारण एक निश्चित आयु वर्ग की महिलाओं को मंदिर में प्रवेश की अनुमति नहीं दी जाती थी। इसी पर विवाद है।
  • 1990 में मंदिर में महिला की एंट्री को लेकर विवाद उठा। समय के साथ स्थानीय कोर्ट में मामला चला बाद में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किए थे। केस 2008 में 3 जजों की बेंच को सौंपा गया।
  • 7 साल बाद 2016 में सुनवाई हुई। इसके बाद 2017 में तत्कालीन सीजेआई की 3 जजों की बेंच ने केस 5 जजों की संविधान पीठ को सौंपा। 2018 में संविधान पीठ ने 4-1 के बहुमत से फैसला सुनाया कि सबरीमाला में सभी आयु वर्ग की महिलाओं के प्रवेश दिया जाए। प्रतिबंध असंवैधानिक है। इसके बाद बड़े विरोध के बीच 2 महिला बिंदु कनकदुर्गा और बिंदु अम्मिनी ने मंदिर में प्रवेश किया।
  • इसके बाद 2019 में 7 जजों की बेंच ने यह मुद्दा 9 जजों की बड़ी बेंच को भेजा दिया था। तब अन्य धर्मों की महिलाओं से जुड़े मामले में भी इसमें जोड़ दिए गए।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 2 जनवरी 2019 को बिंदु कनकदुर्गा (45) और बिंदु अम्मिनी (46) ने पुलिस सुरक्षा में सबरीमाला मंदिर में प्रवेश किया। वे ऐसा करने वालीं पहली महिलाएं थीं। दोनों ने मंदिर में जाने के लिए पारंपरिक काले कपड़े पहने।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 2 जनवरी 2019 को बिंदु कनकदुर्गा (45) और बिंदु अम्मिनी (46) ने पुलिस सुरक्षा में सबरीमाला मंदिर में प्रवेश किया। वे ऐसा करने वालीं पहली महिलाएं थीं। दोनों ने मंदिर में जाने के लिए पारंपरिक काले कपड़े पहने।

9 जजों की बेंच 5 मुद्दों पर सुनवाई करेगी

1. सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश: क्या सभी आयु की महिलाओं को प्रवेश का अधिकार है? बेंच यह तय करेगी कि साल 2018 में इंडियन यंग लायर एसोसिएशन Vs स्टेट ऑफ केरल मामले में हाईकोर्ट का फैसला सही था या नहीं।

2. मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश: क्या मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में नमाज पढ़ने से रोका जा सकता है। 2016 में यास्मीन जुबैर अहमद पीरजादा नाम की महिला ने मुस्लिम महिलाओं का मस्जिद में प्रवेश का मुद्दा उठाया और सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।

3. दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं का खतना: क्या यह प्रथा मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है? 2012 में पारसी महिला गूलरुख एम गुप्ता ने हिंदु व्यक्ति से शादी की। उन्हें पारसी धर्मस्थलों में प्रवेश से रोका जाने लगा। उन्होंने इसके खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में पारसी महिलाओं के धार्मिक अधिकार को लेकर याचिका लगाई। बाद में मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।

4. पारसी महिलाओं का अग्निमंदिर में प्रवेश: क्या गैर-पारसी से शादी करने वाली पारसी महिला को अग्नि मंदिर में प्रवेश से रोका जा सकता है? 2017 में एड. सुनीता तिवारी ने दाऊदी बोहरा समुदाय में महिला खतना का मुद्दा उठाया और सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की।

5. मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े लैंगिक भेदभाव के प्रश्न: क्या व्यक्तिगत कानून मौलिक अधिकारों की कसौटी पर परखे जा सकते हैं?

सुप्रीम कोर्ट ने 7 सवाल तय किए

13 जनवरी 2020 को सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि वह सीधे पुनर्विचार याचिकाओं पर नहीं, बल्कि आर्टिकल 25 (धार्मिक स्वतंत्रता) और आर्टिकल 14 (समानता) के बीच संतुलन तथा आवश्यक धार्मिक प्रथाएं जैसे सिद्धांतों पर विचार करेगा। 14 से 23 जनवरी के बीच चली सुनवाई में याचिकाकर्ताओं ने महिलाओं के बहिष्कार को असंवैधानिक बताया, जबकि धार्मिक पक्ष ने आस्था और आर्टिकल 26 के तहत स्वतंत्रता का हवाला देते हुए न्यायिक हस्तक्षेप सीमित रखने की मांग की। इसी दौरान कोर्ट ने आवश्यक धार्मिक प्रथाएं और ज्यूडिशिअल रिव्यू की सीमाओं पर सवाल उठाए।

3 से 7 फरवरी के दौरान भी बहस जारी रही, जहां समानता बनाम धार्मिक स्वतंत्रता और न्यायिक सीमा के मुद्दों पर चर्चा हुई। लेकिन कोविड-19 के कारण सुनवाई रोक दी गई।

सुप्रीम कोर्ट अपने ही फैसले को बरकरार रखती तो क्या बदलेगा

अगर सुप्रीम कोर्ट की 9 जजों की बेंच केरल हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों की संविधान पीठ के फैसले को बरकरार रखती है तो भविष्य में धार्मिक मामलों में कोर्ट के दखल की सीमा तय हो सकती है।

केंद्र सरकार का स्टैंड, सबरीमाला मामले पर किसने क्या कहा

केंद्र ने रूख बदला: केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के 2018-2019 के फैसले का समर्थन किया था। कहा था कि मंदिर में महिलाओं के प्रवेश होना चाहिए, लैंगिक समानता के खिलाफ कोई भी प्रथा नहीं होनी चाहिए। हालांकि बाद में रिव्यू स्टेज 2019–2020 के दौरान में केंद्र ने थोड़ा संतुलित रुख अपनाते हुए कहा कि मामला व्यापक संवैधानिक प्रश्नों (धर्म बनाम समानता) से जुड़ा है और इसे संविधान पीठ तय करे।

अखिल भारतीय संत समिति: 2019 की याचिका में समिति ने कहा है कि अदालतें धार्मिक मामलों में तभी हस्तक्षेप करें जब वे सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य के खिलाफ हों। अनुच्छेद 14 का उपयोग अनुच्छेद 25 के अधिकार को खत्म करने के लिए न हो।

केरल सरकार: पुरानी धार्मिक परंपराओं में बदलाव से पहले धर्म के विद्वानों और समाज सुधारकों से सलाह जरूरी है। अदालत प्रथाओं की तर्कसंगतता नहीं, बल्कि यह देखे कि लोग उसे ईमानदारी से धर्म का हिस्सा मानते हैं।

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड: अदालतें ‘जरूरी धार्मिक प्रथा’ तय करने से बचें, क्योंकि इससे अनुच्छेद 25-26 के तहत मिली धार्मिक स्वतंत्रता में हस्तक्षेप हो सकता है। किसी धर्म के ‘मूल’ की पहचान करना व्यक्तिगत विश्वास पर निर्भर है।

जैन समुदाय: किसी भी धर्म की प्रथाओं को तय करने का अधिकार उसी धर्म के लोगों का है। सरकार या कोर्ट को यह तय नहीं करना चाहिए कि क्या धार्मिक है और क्या नहीं।

अदालतों में 26 साल में क्या हुआ, पूरी टाइमलाइन…

सबरीमाला में 2 महिलाओं की एंट्री पर प्रदर्शन हुए…फोटोज

बिंदु कनकदुर्गा (45) और बिंदु अम्मिनी (46) इन्होंने पहली बार सबरीमाला मंदिर में एंट्री की।

बिंदु कनकदुर्गा (45) और बिंदु अम्मिनी (46) इन्होंने पहली बार सबरीमाला मंदिर में एंट्री की।

बिंदु कनकदुर्गा और बिंदु अम्मिनी जब भगवान अयप्पा के दर्शन करके वापस लौटी थीं, उनके जाते ही मंदिर में शुद्धी की गई थी। मंदिर में 1 घंटे तक दर्शन बंद किए गए थे।

बिंदु कनकदुर्गा और बिंदु अम्मिनी जब भगवान अयप्पा के दर्शन करके वापस लौटी थीं, उनके जाते ही मंदिर में शुद्धी की गई थी। मंदिर में 1 घंटे तक दर्शन बंद किए गए थे।

महिलाओं के मंदिर में प्रवेश करने का जमकर विरोध हुआ था। 2 जनवरी को कोच्चि में लोगों ने प्रदर्शन किया था।

महिलाओं के मंदिर में प्रवेश करने का जमकर विरोध हुआ था। 2 जनवरी को कोच्चि में लोगों ने प्रदर्शन किया था।

3 जनवरी को भी केरल के जगह-जगह विरोध प्रदर्शन हुआ था। पुलिस ने भीड़ को खदेड़ा था।

3 जनवरी को भी केरल के जगह-जगह विरोध प्रदर्शन हुआ था। पुलिस ने भीड़ को खदेड़ा था।

विरोध प्रदर्शन के दौरान केरल के सीएम पिनाराई विजयन के पोस्टर को चप्पल मारती महिला।

विरोध प्रदर्शन के दौरान केरल के सीएम पिनाराई विजयन के पोस्टर को चप्पल मारती महिला।

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