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संडे प्रोफाइल : विनोद खोसला:टेक में जोखिम भरे निवेश के लिए जाने जाते हैं खोसला

संडे प्रोफाइल : विनोद खोसला:टेक में जोखिम भरे निवेश के लिए जाने जाते हैं खोसला

भारतीय मूल के अमेरिकी इन्वेस्टर विनोद खोसला फोर्ब्स की 2026 अमीर इमिग्रेंट्स सूची में सबसे अमीर भारतीय आप्रवासी के रूप में नामित हुए हैं। वे जोखिम भरी टेक्नोलॉजी कंपनियों में निवेश के लिए जाने जाते हैं। विनोद खोसला मानते हैं कि हर बड़ी समस्या में एक बड़ा अवसर छिपा होता है। उनकी यह सोच निवेश के फैसलों में भी दिखती है। 2011 में स्केटिंग के दौरान घुटने में चोट लगने पर डॉक्टरों ने इलाज को लेकर अलग-अलग राय दी। हेल्थ केयर सिस्टम से निराश खोसला ने एक लेख में लिखा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के अल्गोरिदम डॉक्टरों से बेहतर काम कर सकते हैं। इस पर लंबे समय तक बहस हुई। इसके बाद उनकी फर्म ने रोबोटिक्स और मेडिकल टेक्नोलॉजी कंपनियों में कई निवेश किए। खोसला आज भी अपनी बात पर कायम हैं। सिलिकॉन वैली की प्रमुख हस्तियों में शामिल 71 वर्षीय खोसला ने तीन अन्य लोगों के साथ 1982 में कंप्यूटिंग कंपनी सन माइक्रोसिस्टम्स की स्थापना की थी। 2010 में उन्होंने इसे ओरेकल को बेच दिया। इसके बाद उनकी वेंचर कैपिटल कंपनी खोसला वेंचर्स ने ग्रीन टेक, हेल्थ केयर और एआई स्टार्टअप्स में बड़े दांव लगाए। 2019 में खोसला वेंचर्स ने ओपनएआई में 50 मिलियन डॉलर यानी करीब 477 करोड़ रुपए का निवेश किया था। उस समय कंपनी आज जैसी बड़ी नहीं थी। खोसला ने बाद में कहा कि ओपनएआई के असफल होने की 90% संभावना भी होती तो दुनिया बदलने की 10% संभावना के लिए यह दांव लगाने लायक था। आज ओपनएआई दुनिया की सबसे मूल्यवान कंपनियों में शामिल है। 2023 में जब सीईओ सैम आल्टमैन को कंपनी से बाहर किया गया तो खोसला उनके समर्थन में खड़े हुए थे। नई दिल्ली में जन्मे खोसला के पिता सेना में थे। वे चाहते थे कि बेटा भी सेना में जाए। लेकिन विनोद की दिलचस्पी तकनीक में थी। उन्होंने आईआईटी दिल्ली से इंजीनियरिंग की और इसके बाद स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से एमबीए तथा कार्नेगी मेलोन यूनिवर्सिटी से साइंस में मास्टर्स किया। पढ़ाई पूरी करने के बाद वे अमेरिका में बस गए। खोसला का भरोसा शुरू से एआई में रहा है। वे बताते हैं कि 2014 में एआई रेडियोलॉजी से उनका पहला एआई निवेश शुरू हुआ। उनके मुताबिक ओपनएआई में निवेश बहुत बड़ा दांव था, जबकि वे आमतौर पर बड़े दांव नहीं लगाते। उनका मानना है कि ऊंचे जोखिम वाली नई टेक्नोलॉजी में निवेश जरूरी है। वे कहते हैं कि एआई से खतरे हो सकते हैं, लेकिन इसके फायदों को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। खोसला के मुताबिक अभी अमेरिकी एआई मॉडल्स का दबदबा है, लेकिन देश राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अपने मॉडल विकसित कर सकते हैं। चीन अपना मॉडल बनाएगा तो भारत भी अपना मॉडल बना सकता है। उन्हें भरोसा है कि एआई के फायदे धीरे-धीरे बढ़ेंगे। वे भारत के पेमेंट सिस्टम का उदाहरण देते हैं। उनके अनुसार तकनीक की मदद से डॉक्टर और एआई ट्यूटर जैसी सेवाएं कम लागत में अधिक लोगों तक पहुंचाई जा सकती हैं।

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भारतीय मूल के अमेरिकी इन्वेस्टर विनोद खोसला फोर्ब्स की 2026 अमीर इमिग्रेंट्स सूची में सबसे अमीर भारतीय आप्रवासी के रूप में नामित हुए हैं। वे जोखिम भरी टेक्नोलॉजी कंपनियों में निवेश के लिए जाने जाते हैं। विनोद खोसला मानते हैं कि हर बड़ी समस्या में एक बड़ा अवसर छिपा होता है। उनकी यह सोच निवेश के फैसलों में भी दिखती है। 2011 में स्केटिंग के दौरान घुटने में चोट लगने पर डॉक्टरों ने इलाज को लेकर अलग-अलग राय दी। हेल्थ केयर सिस्टम से निराश खोसला ने एक लेख में लिखा कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के अल्गोरिदम डॉक्टरों से बेहतर काम कर सकते हैं। इस पर लंबे समय तक बहस हुई। इसके बाद उनकी फर्म ने रोबोटिक्स और मेडिकल टेक्नोलॉजी कंपनियों में कई निवेश किए। खोसला आज भी अपनी बात पर कायम हैं। सिलिकॉन वैली की प्रमुख हस्तियों में शामिल 71 वर्षीय खोसला ने तीन अन्य लोगों के साथ 1982 में कंप्यूटिंग कंपनी सन माइक्रोसिस्टम्स की स्थापना की थी। 2010 में उन्होंने इसे ओरेकल को बेच दिया। इसके बाद उनकी वेंचर कैपिटल कंपनी खोसला वेंचर्स ने ग्रीन टेक, हेल्थ केयर और एआई स्टार्टअप्स में बड़े दांव लगाए। 2019 में खोसला वेंचर्स ने ओपनएआई में 50 मिलियन डॉलर यानी करीब 477 करोड़ रुपए का निवेश किया था। उस समय कंपनी आज जैसी बड़ी नहीं थी। खोसला ने बाद में कहा कि ओपनएआई के असफल होने की 90% संभावना भी होती तो दुनिया बदलने की 10% संभावना के लिए यह दांव लगाने लायक था। आज ओपनएआई दुनिया की सबसे मूल्यवान कंपनियों में शामिल है। 2023 में जब सीईओ सैम आल्टमैन को कंपनी से बाहर किया गया तो खोसला उनके समर्थन में खड़े हुए थे। नई दिल्ली में जन्मे खोसला के पिता सेना में थे। वे चाहते थे कि बेटा भी सेना में जाए। लेकिन विनोद की दिलचस्पी तकनीक में थी। उन्होंने आईआईटी दिल्ली से इंजीनियरिंग की और इसके बाद स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से एमबीए तथा कार्नेगी मेलोन यूनिवर्सिटी से साइंस में मास्टर्स किया। पढ़ाई पूरी करने के बाद वे अमेरिका में बस गए। खोसला का भरोसा शुरू से एआई में रहा है। वे बताते हैं कि 2014 में एआई रेडियोलॉजी से उनका पहला एआई निवेश शुरू हुआ। उनके मुताबिक ओपनएआई में निवेश बहुत बड़ा दांव था, जबकि वे आमतौर पर बड़े दांव नहीं लगाते। उनका मानना है कि ऊंचे जोखिम वाली नई टेक्नोलॉजी में निवेश जरूरी है। वे कहते हैं कि एआई से खतरे हो सकते हैं, लेकिन इसके फायदों को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। खोसला के मुताबिक अभी अमेरिकी एआई मॉडल्स का दबदबा है, लेकिन देश राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए अपने मॉडल विकसित कर सकते हैं। चीन अपना मॉडल बनाएगा तो भारत भी अपना मॉडल बना सकता है। उन्हें भरोसा है कि एआई के फायदे धीरे-धीरे बढ़ेंगे। वे भारत के पेमेंट सिस्टम का उदाहरण देते हैं। उनके अनुसार तकनीक की मदद से डॉक्टर और एआई ट्यूटर जैसी सेवाएं कम लागत में अधिक लोगों तक पहुंचाई जा सकती हैं।

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