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आरोप- बांग्लादेश सरकार ने डिफाल्टर को सेंट्रल बैंक गवर्नर बनाया:विपक्ष बोला- ये बर्दाश्त नहीं कर सकते, देश में भीड़तंत्र चल रहा

आरोप- बांग्लादेश सरकार ने डिफाल्टर को सेंट्रल बैंक गवर्नर बनाया:विपक्ष बोला- ये बर्दाश्त नहीं कर सकते, देश में भीड़तंत्र चल रहा

बांग्लादेश में सेंट्रल बैंक के नए गवर्नर की नियुक्ति को लेकर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। विपक्ष का आरोप है कि तारिक रहमान की सरकार ने एक डिफाल्टर को कारोबारी को सेंट्रल बैंक गवर्नर बना दिया है, जो देश में भीड़तंत्र की शुरुआत जैसा है। बांग्लादेश बैंक के नए गवर्नर के रूप में मोस्ताकुर रहमान की नियुक्ति के बाद राजनीतिक घमासान तेज हो गया। जमात ए इस्लामी के प्रमुख और विपक्ष के नेता शफीकुर रहमान ने कहा कि यह फैसला पीएम की शह पर लिया गया है और इसे बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, इससे पहले सरकार ने अहसान हबीब मंसूर का कार्यकाल अचानक खत्म कर दिया था, जिन्हें मोहम्मद यूनुस की अंतरिम सरकार ने नियुक्त किया था। मंसूर ने कहा कि उन्होंने न इस्तीफा दिया और न ही उन्हें हटाए जाने की कोई आधिकारिक सूचना मिली। उन्हें यह खबर मीडिया के जरिए पता चली। गारमेंट कारोबारी रहे हैं मोस्ताकुर रहमान मोस्ताकुर रहमान की नियुक्ति इसलिए अलग मानी जा रही है क्योंकि अब तक बांग्लादेश में केंद्रीय बैंक का गवर्नर आमतौर पर अनुभवी बैंकर, अर्थशास्त्री या वरिष्ठ सिविल सेवक होते रहे हैं। मोस्ताकुर एक कॉस्ट एंड मैनेजमेंट अकाउंटेंट और गारमेंट कारोबारी हैं। वे हेरा स्वेटर्स लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर हैं और हालिया चुनाव में तारिक रहमान की BNP पार्टी की केंद्रीय चुनाव संचालन समिति से भी जुड़े रहे थे। उनकी नियुक्ति को लेकर कर्ज चुकाने से जुड़े पुराने मामलों पर भी सवाल उठ रहे हैं। बीडी न्यूज24 की रिपोर्ट में कहा गया कि उनकी कंपनी 86 करोड़ टका का कर्ज समय पर नहीं चुका पाई थी। एक बैंक अधिकारी ने कहा कि जो इंसान अपनी ही कंपनी के लिए स्पेशल कंडीशन पर कर्ज का पुनर्गठन कराता है, वह देश के बैंकिंग सिस्टम के हितों की रक्षा कैसे करेगा। यूनिवर्सिटी ऑफ ढाका के पूर्व प्रोफेसर दीन इस्लाम ने भी कहा कि किसी एक्टिव कारोबारी को केंद्रीय बैंक का गवर्नर बनाना गलत संदेश देता है और इससे हितों के टकराव की आशंका बढ़ती है। विपक्ष ने मोस्तकुर को गवर्नर बनाने पर विरोध जताया मोस्ताकुर की नियुक्ति के बाद विपक्षी नेता शफीकुर रहमान ने फेसबुक पर लिखा कि बांग्लादेश बैंक में जो हो रहा है वह दुर्भाग्यपूर्ण और पूरी तरह अस्वीकार्य है। उन्होंने कहा कि किसी को भी गवर्नर और उनके सलाहकारों जैसे सम्मानित लोगों को इस तरह अपमानित करने का अधिकार नहीं है। उन्होंने चेतावनी दी कि जब देश की अर्थव्यवस्था पहले से कई समस्याओं से जूझ रही है, तब बांग्लादेश बैंक जैसी महत्वपूर्ण संस्था में इस तरह की कार्रवाई बची हुई अर्थव्यवस्था को भी बर्बाद कर देगी। उन्होंने सभी राजनीतिक दलों और समाज के सभी वर्गों से विरोध करने की अपील की और कहा कि अगर सरकार सच में लोकतांत्रिक और भेदभाव-रहित बांग्लादेश बनाना चाहती है तो ऐसी गतिविधियां तुरंत बंद होनी चाहिए। जरूरी पदों पर नियुक्तियां योग्यता के आधार पर होनी चाहिए, न कि राजनीतिक निष्ठा के आधार पर। अहसान हबीब को गवर्नर पद से हटाने का विरोध विवाद की दूसरी बड़ी वजह उनकी नियुक्ति की परिस्थितियां हैं। अहसान हबीब मंसूर 2024 में चार साल के लिए गवर्नर बनाया गया था और उनका कार्यकाल अगस्त 2028 तक था, लेकिन 18 महीने से भी कम समय में ही उनका कार्यकाल खत्म कर दिया गया। मंसूर को हटाए जाने से पहले कुछ अधिकारियों ने उनके खिलाफ तानाशाही का आरोप लगाते हुए विरोध प्रदर्शन किया था। हालांकि, मंसूर ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर इन आरोपों को साजिश बताया था। अहसान हबीब मंसूर की बर्खास्तगी से देश में कई लोग हैरान हैं। उन्हें 27 साल का अनुभव है। वे IMF जैसी संस्थाओं में काम कर चुके हैं। 2024 में शेख हसीना और उनकी अवामी लीग सरकार के हटने के बाद जब देश में आर्थिक अस्थिरता थी, तब उन्हें जिम्मेदारी दी गई थी। जब उन्होंने पद संभाला था तब फॉरेंन करेंसी रिजर्व 26 अरब डॉलर था। उनके पद छोड़ने तक यह बढ़कर 35 अरब डॉलर हो गया। उन्होंने टका को 122.20 प्रति डॉलर पर स्थिर किया और महंगाई दर को 2024 के 10.49% से घटाकर जनवरी 2026 में 8.58% तक लाने के लिए पॉलिसी अपनाईं। ढाका स्थित HSBC के डायरेक्टर शाहीर चौधरी ने लिखा कि मंसूर ने बहुत कठिन समय में जिम्मेदारी संभाली, जब बैंकिंग सिस्टम पर भरोसा कमजोर था और 18 महीनों में हालात में सुधार आया। उन्होंने कहा कि ऐसे अनुभव और रिकॉर्ड वाले इंसान को कार्यकाल पूरा करने का मौका न देना निराशाजनक है। वहीं NCP नेता नाहिद इस्लाम ने भी फेसबुक पर लिखा कि मंसूर को हटाकर सरकार ने फाइनेंशियल सेक्टर में लूट का रास्ता खोल दिया है। उन्होंने कहा कि मंसूर ने पद संभालने के बाद फाइनेंशियल सेक्टर में अनुशासन बहाल करने में काफी सफलता हासिल की थी और मोस्ताकुर जैसे कारोबारी के हाथों में देश की सर्वोच्च बैंकिंग संस्था सुरक्षित नहीं रह सकती।

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