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केसी बोकाड़िया बोले- ‘तीसरी बेगम’ में कड़वी सच्चाई दिखाई है:जय सियाराम विवाद, लव जिहाद मुद्दे और सेंसर बोर्ड पर खुलकर बोले फिल्ममेकर

केसी बोकाड़िया बोले- ‘तीसरी बेगम’ में कड़वी सच्चाई दिखाई है:जय सियाराम विवाद, लव जिहाद मुद्दे और सेंसर बोर्ड पर खुलकर बोले फिल्ममेकर

अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान, रेखा, माधुरी दीक्षित और राजकुमार जैसे बड़े सितारों के साथ काम कर चुके दिग्गज फिल्ममेकर केसी बोकड़िया इन दिनों अपनी नई फिल्म ‘तीसरी बेगम’ को लेकर चर्चा में हैं। लव जिहाद, ट्रिपल तलाक और धर्म परिवर्तन जैसे संवेदनशील मुद्दों पर बनी इस फिल्म को लेकर उन्होंने दैनिक भास्कर से खुलकर बातचीत की। बोकाड़िया ने बताया कि फिल्म एक सच्ची घटना से प्रेरित है और इसका मकसद किसी धर्म को निशाना बनाना नहीं, बल्कि समाज के सामने एक गंभीर सवाल रखना है। उन्होंने सेंसर बोर्ड से विवाद, कोर्ट तक पहुंची लड़ाई और अपनी कन्विक्शन पर भी बेबाक राय रखी।
सवाल: ‘तीसरी बेगम’ बनाने की प्रेरणा कहां से मिली? जवाब: एक असली घटना से। मैं एक परिचित के घर गया था, जहां उसने गर्व से बताया कि उसकी तीन पत्नियां हैं- मुस्लिम, राजपूत और ब्राह्मण। वहीं से मेरे मन में सवाल आया कि अलग संस्कार और खान-पान वाली लड़कियां ऐसे माहौल में कैसे एडजस्ट करती होंगी। उसी सोच से फिल्म की कहानी बनी। सवाल: फिल्म में लव जिहाद, ट्रिपल तलाक और हलाला जैसे मुद्दे दिख रहे हैं। इतने विवादित विषय पर फिल्म बनाने में डर नहीं लगा? जवाब: नहीं। मैंने जो देखा और महसूस किया, वही फिल्म में दिखाया। मेरा मकसद किसी धर्म को गलत बताना नहीं, बल्कि उन लड़कियों की मानसिक स्थिति दिखाना है जो अलग माहौल में जाकर संघर्ष करती हैं। मैंने इसे संतुलित तरीके से पेश किया है। सवाल: फिल्म में क्या दिखाया गया है? जवाब: फिल्म में एक ब्राह्मण लड़की शादी के बाद मुस्लिम परिवार में जाती है। वहां उसे नाम बदलने, तौर-तरीके अपनाने और नई जिंदगी में ढलने का दबाव झेलना पड़ता है। कहानी में उसकी परेशानी, संघर्ष और बाहर निकलने की कोशिश दिखाई गई है। सवाल: क्या फिल्म में धर्म परिवर्तन और जबरदस्ती जैसे मुद्दे भी हैं? जवाब: हमने दिखाया है कि कई बार लड़कियों को बड़े-बड़े सपने दिखाकर शादी की जाती है। बाद में उन्हें सच्चाई पता चलती है। फिल्म सिर्फ समस्या नहीं दिखाती, यह भी बताती है कि फैसले सोच-समझकर लेने चाहिए। सवाल: क्या फिल्म में यह दिखाया गया है कि ऐसे मामलों के पीछे कोई नेटवर्क या पैसों का खेल होता है? जवाब: मैंने ऐसी बातें सुनी हैं, लेकिन फिल्म में उसे नहीं दिखाया। मैंने सिर्फ वही रखा जो कहानी और भावनाओं के हिसाब से जरूरी था। सवाल: सेंसर बोर्ड के साथ आपकी लंबी लड़ाई क्यों हुई? जवाब: सेंसर बोर्ड को कुछ डायलॉग्स और खासकर ‘जय सियाराम’ वाले सीन पर आपत्ति थी। मैंने साफ कहा कि इसे हटाऊंगा नहीं। बाद में मामला कोर्ट तक गया। कोर्ट ने फिल्म देखी और सिर्फ 24 सेकंड काटने के बाद रिलीज की अनुमति मिली। सवाल: क्या यह आपकी कन्विक्शन की जीत भी है? जवाब: बिल्कुल। अगर फिल्ममेकर को अपने विषय और कहानी पर भरोसा नहीं होगा तो वह फिल्म कैसे बनाएगा? मैंने वही दिखाया जो मुझे सही लगा। ‘जय सियाराम’ वाला सीन हटाने के लिए कहा गया, लेकिन मैं अपने स्टैंड पर कायम रहा। आखिरकार कोर्ट ने भी हमारी बात समझी। सवाल: ‘जय सियाराम’ वाले सीन पर इतनी बहस क्यों हुई? जवाब: फिल्म में एक लड़की से पूछा जाता है कि उसका भगवान कौन है, तो वह ‘जय सियाराम’ बोलती है। सेंसर को इस पर आपत्ति थी, लेकिन मैंने कहा कि यह किरदार की सच्चाई है। बाद में कोर्ट ने ज्यादातर सीन रहने दिए। सवाल: आपने फिल्म को खुद रिलीज करने का फैसला क्यों लिया? जवाब: आज सिस्टम काफी बदल गया है। कई लोग पहले ओटीटी के बारे में सोचते हैं, लेकिन मेरा मानना है कि अगर कंटेंट अच्छा हो तो फिल्म थिएटर में जरूर चलती है। इसलिए मैंने खुद थिएटर मालिकों से बात की और अपनी तरह से फिल्म रिलीज करने का फैसला लिया। सवाल: क्या आज फिल्म रिलीज करना मुश्किल हो गया है? जवाब: बहुत मुश्किल है। टिकट, थिएटर और पूरा सिस्टम बदल गया है। अच्छे कंटेंट वाली फिल्मों को भी मौका कम मिलता है। लेकिन मुझे आज भी विश्वास है कि अच्छी फिल्म चलेगी। सवाल: इतने लंबे करियर और अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान जैसे बड़े स्टार्स के साथ काम करने के बाद भी आपको आज संघर्ष करना पड़ रहा है? जवाब: संघर्ष हर दौर में होता है। मैंने अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान, रेखा, माधुरी दीक्षित जैसे बड़े सितारों के साथ काम किया है। उस दौर में रिश्तों और भरोसे पर काम होता था। आज सिस्टम बदल गया है, लेकिन मेरा काम करने का तरीका नहीं बदला। सवाल: क्या आज के स्टार्स और पुराने दौर के स्टार्स में फर्क महसूस होता है? जवाब: पहले कलाकारों में बहुत भरोसा था। अमिताभ बच्चन ने ‘आज का अर्जुन’ की कहानी तक नहीं सुनी थी। राजकुमार जैसे कलाकार फोन पर हां कह देते थे। आज चीजें ज्यादा कॉरपोरेट और सिस्टम बेस्ड हो गई हैं। सवाल: इतने बड़े स्टार्स के साथ काम करने के बाद भी आपने ‘तीसरी बेगम’ में नए चेहरों को क्यों चुना? जवाब: इस कहानी में मासूमियत और वास्तविकता जरूरी थी। अगर बड़े स्टार्स होते तो दर्शकों का ध्यान किरदार से ज्यादा स्टार इमेज पर जाता। मुझे कहानी का असर ज्यादा जरूरी लगा। सवाल: क्या आपको लगता है कि फिल्म पर प्रोपेगेंडा फैलाने के आरोप लगेंगे? जवाब: हो सकता है, लेकिन मैं तैयार हूं। मेरा मकसद किसी समुदाय के खिलाफ बोलना नहीं है। मैंने हमेशा सामाजिक और पारिवारिक फिल्में बनाई हैं। यह भी उसी तरह की फिल्म है। सवाल: मुस्लिम समुदाय के लिए आपका क्या संदेश है? जवाब: हम सब एक हैं। अगर किसी समुदाय में गलत चीजें हो रही हैं, तो उन्हें रोकना चाहिए। किसी भी चीज को प्रतिष्ठा का मुद्दा नहीं बनाना चाहिए। इंसानियत सबसे ऊपर है। सवाल: 78 साल की उम्र में भी इतनी ऊर्जा कहां से आती है? जवाब: भगवान की कृपा और लोगों का प्यार। मैंने हमेशा फिल्म इंडस्ट्री को पूजा की तरह माना है। अनुशासन में रहता हूं और काम को ईमानदारी से करता हूं। सवाल: फिल्म इंडस्ट्री जैसी प्रतिस्पर्धी जगह में इतना सरल और ईमानदार रहना कितना मुश्किल है? जवाब: अगर इंसान साफ नीयत से काम करे तो मजा आता है। मैंने हमेशा रिश्तों और सम्मान को महत्व दिया है। यही वजह है कि इतने साल बाद भी लोग प्यार देते हैं। सवाल: दर्शकों से क्या कहना चाहेंगे? जवाब: ‘तीसरी बेगम’ परिवार के साथ देखने वाली फिल्म है। इसमें सिर्फ विवाद नहीं, बल्कि समाज के लिए एक संदेश और समाधान भी है। मैं चाहता हूं कि लोग इसे खुले मन से देखें।

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सवाल: ‘तीसरी बेगम’ बनाने की प्रेरणा कहां से मिली? जवाब: एक असली घटना से। मैं एक परिचित के घर गया था, जहां उसने गर्व से बताया कि उसकी तीन पत्नियां हैं- मुस्लिम, राजपूत और ब्राह्मण। वहीं से मेरे मन में सवाल आया कि अलग संस्कार और खान-पान वाली लड़कियां ऐसे माहौल में कैसे एडजस्ट करती होंगी। उसी सोच से फिल्म की कहानी बनी। सवाल: फिल्म में लव जिहाद, ट्रिपल तलाक और हलाला जैसे मुद्दे दिख रहे हैं। इतने विवादित विषय पर फिल्म बनाने में डर नहीं लगा? जवाब: नहीं। मैंने जो देखा और महसूस किया, वही फिल्म में दिखाया। मेरा मकसद किसी धर्म को गलत बताना नहीं, बल्कि उन लड़कियों की मानसिक स्थिति दिखाना है जो अलग माहौल में जाकर संघर्ष करती हैं। मैंने इसे संतुलित तरीके से पेश किया है। सवाल: फिल्म में क्या दिखाया गया है? जवाब: फिल्म में एक ब्राह्मण लड़की शादी के बाद मुस्लिम परिवार में जाती है। वहां उसे नाम बदलने, तौर-तरीके अपनाने और नई जिंदगी में ढलने का दबाव झेलना पड़ता है। कहानी में उसकी परेशानी, संघर्ष और बाहर निकलने की कोशिश दिखाई गई है। सवाल: क्या फिल्म में धर्म परिवर्तन और जबरदस्ती जैसे मुद्दे भी हैं? जवाब: हमने दिखाया है कि कई बार लड़कियों को बड़े-बड़े सपने दिखाकर शादी की जाती है। बाद में उन्हें सच्चाई पता चलती है। फिल्म सिर्फ समस्या नहीं दिखाती, यह भी बताती है कि फैसले सोच-समझकर लेने चाहिए। सवाल: क्या फिल्म में यह दिखाया गया है कि ऐसे मामलों के पीछे कोई नेटवर्क या पैसों का खेल होता है? जवाब: मैंने ऐसी बातें सुनी हैं, लेकिन फिल्म में उसे नहीं दिखाया। मैंने सिर्फ वही रखा जो कहानी और भावनाओं के हिसाब से जरूरी था। सवाल: सेंसर बोर्ड के साथ आपकी लंबी लड़ाई क्यों हुई? जवाब: सेंसर बोर्ड को कुछ डायलॉग्स और खासकर ‘जय सियाराम’ वाले सीन पर आपत्ति थी। मैंने साफ कहा कि इसे हटाऊंगा नहीं। बाद में मामला कोर्ट तक गया। कोर्ट ने फिल्म देखी और सिर्फ 24 सेकंड काटने के बाद रिलीज की अनुमति मिली। सवाल: क्या यह आपकी कन्विक्शन की जीत भी है? जवाब: बिल्कुल। अगर फिल्ममेकर को अपने विषय और कहानी पर भरोसा नहीं होगा तो वह फिल्म कैसे बनाएगा? मैंने वही दिखाया जो मुझे सही लगा। ‘जय सियाराम’ वाला सीन हटाने के लिए कहा गया, लेकिन मैं अपने स्टैंड पर कायम रहा। आखिरकार कोर्ट ने भी हमारी बात समझी। सवाल: ‘जय सियाराम’ वाले सीन पर इतनी बहस क्यों हुई? जवाब: फिल्म में एक लड़की से पूछा जाता है कि उसका भगवान कौन है, तो वह ‘जय सियाराम’ बोलती है। सेंसर को इस पर आपत्ति थी, लेकिन मैंने कहा कि यह किरदार की सच्चाई है। बाद में कोर्ट ने ज्यादातर सीन रहने दिए। सवाल: आपने फिल्म को खुद रिलीज करने का फैसला क्यों लिया? जवाब: आज सिस्टम काफी बदल गया है। कई लोग पहले ओटीटी के बारे में सोचते हैं, लेकिन मेरा मानना है कि अगर कंटेंट अच्छा हो तो फिल्म थिएटर में जरूर चलती है। इसलिए मैंने खुद थिएटर मालिकों से बात की और अपनी तरह से फिल्म रिलीज करने का फैसला लिया। सवाल: क्या आज फिल्म रिलीज करना मुश्किल हो गया है? जवाब: बहुत मुश्किल है। टिकट, थिएटर और पूरा सिस्टम बदल गया है। अच्छे कंटेंट वाली फिल्मों को भी मौका कम मिलता है। लेकिन मुझे आज भी विश्वास है कि अच्छी फिल्म चलेगी। सवाल: इतने लंबे करियर और अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान जैसे बड़े स्टार्स के साथ काम करने के बाद भी आपको आज संघर्ष करना पड़ रहा है? जवाब: संघर्ष हर दौर में होता है। मैंने अमिताभ बच्चन, शाहरुख खान, रेखा, माधुरी दीक्षित जैसे बड़े सितारों के साथ काम किया है। उस दौर में रिश्तों और भरोसे पर काम होता था। आज सिस्टम बदल गया है, लेकिन मेरा काम करने का तरीका नहीं बदला। सवाल: क्या आज के स्टार्स और पुराने दौर के स्टार्स में फर्क महसूस होता है? जवाब: पहले कलाकारों में बहुत भरोसा था। अमिताभ बच्चन ने ‘आज का अर्जुन’ की कहानी तक नहीं सुनी थी। राजकुमार जैसे कलाकार फोन पर हां कह देते थे। आज चीजें ज्यादा कॉरपोरेट और सिस्टम बेस्ड हो गई हैं। सवाल: इतने बड़े स्टार्स के साथ काम करने के बाद भी आपने ‘तीसरी बेगम’ में नए चेहरों को क्यों चुना? जवाब: इस कहानी में मासूमियत और वास्तविकता जरूरी थी। अगर बड़े स्टार्स होते तो दर्शकों का ध्यान किरदार से ज्यादा स्टार इमेज पर जाता। मुझे कहानी का असर ज्यादा जरूरी लगा। सवाल: क्या आपको लगता है कि फिल्म पर प्रोपेगेंडा फैलाने के आरोप लगेंगे? जवाब: हो सकता है, लेकिन मैं तैयार हूं। मेरा मकसद किसी समुदाय के खिलाफ बोलना नहीं है। मैंने हमेशा सामाजिक और पारिवारिक फिल्में बनाई हैं। यह भी उसी तरह की फिल्म है। सवाल: मुस्लिम समुदाय के लिए आपका क्या संदेश है? जवाब: हम सब एक हैं। अगर किसी समुदाय में गलत चीजें हो रही हैं, तो उन्हें रोकना चाहिए। किसी भी चीज को प्रतिष्ठा का मुद्दा नहीं बनाना चाहिए। इंसानियत सबसे ऊपर है। सवाल: 78 साल की उम्र में भी इतनी ऊर्जा कहां से आती है? जवाब: भगवान की कृपा और लोगों का प्यार। मैंने हमेशा फिल्म इंडस्ट्री को पूजा की तरह माना है। अनुशासन में रहता हूं और काम को ईमानदारी से करता हूं। सवाल: फिल्म इंडस्ट्री जैसी प्रतिस्पर्धी जगह में इतना सरल और ईमानदार रहना कितना मुश्किल है? जवाब: अगर इंसान साफ नीयत से काम करे तो मजा आता है। मैंने हमेशा रिश्तों और सम्मान को महत्व दिया है। यही वजह है कि इतने साल बाद भी लोग प्यार देते हैं। सवाल: दर्शकों से क्या कहना चाहेंगे? जवाब: ‘तीसरी बेगम’ परिवार के साथ देखने वाली फिल्म है। इसमें सिर्फ विवाद नहीं, बल्कि समाज के लिए एक संदेश और समाधान भी है। मैं चाहता हूं कि लोग इसे खुले मन से देखें।

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