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गीतकार हसरत जयपुरी की 104वीं बर्थ एनिवर्सरी:भांजे डब्बू मलिक बोले- आखिरी सांस तक मामा के हाथ में कलम और किताब थी

गीतकार हसरत जयपुरी की 104वीं बर्थ एनिवर्सरी:भांजे डब्बू मलिक बोले- आखिरी सांस तक मामा के हाथ में कलम और किताब थी

हिंदी सिनेमा के दिग्गज गीतकार हसरत जयपुरी की 104वीं बर्थ एनिवर्सरी पर उनके भांजे डब्बू मलिक ने उनसे जुड़ी कई खास यादें साझा कीं। उन्होंने बताया कि हसरत जयपुरी न सिर्फ बेहतरीन शायर थे, बल्कि अपनी निजी जिंदगी में बेहद सादगी और अपनापन रखने वाले इंसान भी थे। चौपाटी पर खिलौने बेचने और बस कंडक्टर की नौकरी से शुरू हुआ उनका सफर उन्हें फिल्म इंडस्ट्री के शीर्ष गीतकारों में ले आया। शंकर-जयकिशन और राज कपूर के साथ उनकी जोड़ी ने कई यादगार गाने दिए। आखिरी सांस तक उनके हाथ में कलम और किताब रही, जो उनके काम के प्रति जुनून को दिखाती है। लोग इतना इंपोर्टेंस उन्हें क्यों दे रहे हैं, यह जानने के लिए वर्षों लगे डब्बू मलिक बताते हैं- हम बहुत छोटे थे, तब खार स्थिति मामा हसरत जयपुरी के घर पर जाते थे। घर से बालकनी से सटा उनका बेड होता था, जहां बैठकर वे पोयट्री लिखते थे। हमारी बचपन की यादें यह है कि बड़े-बड़े डायरेक्टर, प्रोडूसर, एक्टर का हुजूम उनसे मिलने के लिए घर आते थे। हम छोटे थे, तब इतना क्लीयर नहीं होता था कि लोग उन्हें इतना रिस्पेक्ट या इतना इंपोर्टेंस क्यों दे रहे हैं। यह जानने के लिए हमें वर्षों लगे। फिर धीरे-धीरे पता चला कि मामाजी बहुत बड़े गीतकार हैं। अब पीछे मुड़कर देखता हूं, तब पाता हूं कि बाप रे! इस इंसान ने इतना बेहतरीन काम किया। उनकी सबसे खूबसूरत चीज यह होती थी कि उनको किमाम पान और परफ्यूम का बड़ा शौक था। उसी तरह उनकी खुशबूदार पर्सनालिटी भी थी। उनका बहन-बहनोई आदि का काफी बड़ा कुनबा था और वे सबको बड़ा प्यार देते थे। सबका खयाल रखते थे, उनकी यह सबसे बड़ी विशेषता थी। लोगों की जिंदगी के बारे में सोचते थे और उसमें मग्न रहते थे। हम लोग सोचते थे कि उनका अटेंशन लेना भी बहुत मुश्किल था। बिकॉज, वे दिन भर गीत लिखने में लगे रहते थे। जयकिशन की डेथ पर दिन भर रोते रहे मुझे उनकी एक शाम की बात याद है, जो कभी भूलता नहीं हूं। वह यह है कि जय किशन की डेथ हुई थी। उस दिन नेशनल रेडियो पर उनका लिखा गीत पूरे हिंदुस्तान में बज रहा था। वह गीत था- ‘गीतों का कन्हैया चला गया, अब गीत मेरे विरान हुए…’, इसे सुनकर उनके आंसू रुक नहीं रहे थे। मुझे पता नहीं, शायद इसकी कम्पोजिशन शंकर-जयकिशन जी ने की होगी। लेकिन वह लम्हा कभी भुलाए भुला नहीं जाता। उनके गीतों पर शंकर-जयकिशन की जोड़ी ने बड़ा दिलकश काम किया है। आखिरी सांस तक उनके हाथ में कलम और किताब थी मामा हसरत जयपुरी, मुझसे बेहद प्यार करते थे। मैं उनका लाडला था, क्योंकि घर में सबसे छोटा मैं ही था। मुझे उनसे बहुत प्यार मिला। हालांकि उस समय वे काफी ओल्ड हो चुके थे, लेकिन उन्होंने मुझे प्रेडिक्ट किया था कि तुम्हारे अंदर भी एक संगीतकार छुपा है, तुम गाने बना सकते हो। मैंने बोला कि मैं तो कुछ सीखा ही नहीं हूं। उस समय तक वे जुहू स्थिति अपने बंगले में रहने के लिए आ गए थे। जुहू में उनका भव्य बंगला था। फाइनेंशियली बहुत ही सिक्योर इंसान थे। वे और उनकी वाइफ ने फैमिली के लिए बड़े-बड़े डिसीजन लिये। अपने जमाने में उनकी बहुत ही सक्सेसफुल फैमिली रही है। वे आने वाली 10 जेनरेशन को सिक्योर करके चले गए। इतने महान आदमी थे। लेकिन मैंने एक चीज देखी है कि आखिरी सांस तक उनके हाथ में कलम और किताब थी। अपनी बहन यानी मेरी मम्मी के लिए लिखा गीत मेरी मम्मी मिल्किस, हसरत जयपुरी की सबसे छोटी बहन थीं। वे मेरी मम्मी को बहुत प्यार करते थे। प्यार से मम्मी को नन्हूं (छोटी) बुलाते थे। उन्होंने गीत- ‘सुनो छोटी-सी गुड़िया की लंबी कहानी…’, मेरी मम्मी के लिए लिखा था। मेरी मम्मी के जीवन में जो संघर्ष था, उसे ध्यान रखते हुए लिखा था। पापा ने काफी स्ट्रगल देखा था। उनके लिए तो मम्मी 15-16 साल की बहन थी, जिनकी शादी 18 साल की उम्र में हो गई। उन्होंने बहन की सारी जिंदगी देखी। हालांकि अपने हिसाब से वे जो कुछ भी कर सकते थे, वह किया। लेकिन मम्मी को देखकर वे हमेशा कहते थे कि यह मेरी गुड़िया है। उनको इन सब चीजों की तकलीफ उठाने की जरूरत नहीं थी, तब उन्होंने यह गाना लिखा था। अपने काम के प्रति फोकस्ड थे उनकी बहुत ही क्रिएटिव और बड़े कमाल की पर्सनालिटी थी। अपने काम के प्रति इतना फोकस्ड और इतना लीन होना उनसे सीखा जा सकता है। मतलब उनके पास किसी तरह का कोई डायवर्जन ही नहीं था। दिन भर लफ्जों की कहानी में बिजी रहते थे। उन्होंने कभी नॉर्मल जिंदगी जिया ही नहीं। हर एक पल, हर एक क्षण उनको सिर्फ म्यूजिक, लिरिक्स, गीत-गाने, मुखड़े ही सुनते थे। कमाल की शख्सियत थी। डायरेक्टर वगैरह से मिलना हो, तभी वे पार्टी-फंक्शन में जाते थे। अपने जमाने में राइटिंग कि हिसाब से कमर्शियल सक्सेसफुल इंसान रहे। उन्होंने अपने दौर में जो समय देखा है, वह कोई देख ही नहीं सकता। इतना पॉवर, इतनी कमर्शियल सक्सेस, बाप रे बाप! वॉव!! आज अतीत में जाएंगे, तब पाएंगे कि क्या गाने और क्या पिक्चर, क्या काम किया है। मैंने भी सुना है कि चौपाटी पर बैठकर खिलौने बेचते थे उनके बारे जितना सुना है, वह यह है कि वे अपनी फैमिली को संभालने जयपुर से मुंबई आए थे। यहां चौपाटी पर बैठकर खिलौने बेचते थे। फिर उनको बस कंडक्टर की नौकरी मिली। फिर किसी मुशायरे में बतौर पोएट उनको पृथ्वी राज कपूर मिले। पृथ्वी राज कपूर ने उन्हें रेकमेंड किया है कि मेरे बेटे राज कपूर से मिलिए। वहां से कहानी शुरू हुई। मैंने इतना मेहनत करने वाला इंसान अपनी जिंदगी में कभी नहीं देखा। ‘बाहरों फूल बरसाओ…’, ‘लिखे जो खत तुझे…’, ‘तुम मुझे यूं न भुला पाओगे…’, ‘एहसास तेरा होगा मुझ पर…’ ‘जिंन्दगी एक सफर है सुहाना…’ आदि उनके लिखे मेरे पसंदीदा गानों की लिस्ट ही खत्म नहीं होगी। आज सोचता हूं कि इतना दिग्गज इंसान इस पृथ्वी पर आया और इतने अच्छे रोमेंटिक गाने लिखकर चला गया। खुशकिश्मत हूं कि उन्हें गले लगाने का मौका मिला हम तो सारी जिंदगी उनके मुरीद ही बने रहेंगे। कभी-कभी खुद को खुशकिस्मत समझते हैं, जो उनको दिल से दिल गले लगाने मौका मिला। हम उनको किस कर सके और वे हमारे माथे को चूम सके। यह हमारी किस्मत थी कि इतने बड़े आदमी का हमें प्यार मिला। उन्हें वेज-नॉन वेज सब पसंद था। उनके बेटे भी कहते हैं कि गाना और खाना उनका फेवरिट रहा है। वे अपनी बहन यानी मेरी मम्मी के हाथ का खाना खाने के लिए शंकर-जयकिशन, राज कपूर आदि के साथ घर आया करते थे। मेरी मम्मी बहुत अच्छा नॉन वेजिटेरियन बनाती थी। वे घर पर फोन करके बोलते थे कि नंदो से कहना कि आज शाही कबाब बना दें। मेरी मम्मी के खाने पकाने पर उनको बड़ा गर्व था। वे बड़े साधारण तरीके जन्मदिन मनाते थे। जन्मदिन पर गरीबों को खाना बांटते थे।

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इस इंसान ने इतना बेहतरीन काम किया। उनकी सबसे खूबसूरत चीज यह होती थी कि उनको किमाम पान और परफ्यूम का बड़ा शौक था। उसी तरह उनकी खुशबूदार पर्सनालिटी भी थी। उनका बहन-बहनोई आदि का काफी बड़ा कुनबा था और वे सबको बड़ा प्यार देते थे। सबका खयाल रखते थे, उनकी यह सबसे बड़ी विशेषता थी। लोगों की जिंदगी के बारे में सोचते थे और उसमें मग्न रहते थे। हम लोग सोचते थे कि उनका अटेंशन लेना भी बहुत मुश्किल था। बिकॉज, वे दिन भर गीत लिखने में लगे रहते थे। जयकिशन की डेथ पर दिन भर रोते रहे मुझे उनकी एक शाम की बात याद है, जो कभी भूलता नहीं हूं। वह यह है कि जय किशन की डेथ हुई थी। उस दिन नेशनल रेडियो पर उनका लिखा गीत पूरे हिंदुस्तान में बज रहा था। वह गीत था- ‘गीतों का कन्हैया चला गया, अब गीत मेरे विरान हुए…’, इसे सुनकर उनके आंसू रुक नहीं रहे थे। मुझे पता नहीं, शायद इसकी कम्पोजिशन शंकर-जयकिशन जी ने की होगी। लेकिन वह लम्हा कभी भुलाए भुला नहीं जाता। उनके गीतों पर शंकर-जयकिशन की जोड़ी ने बड़ा दिलकश काम किया है। आखिरी सांस तक उनके हाथ में कलम और किताब थी मामा हसरत जयपुरी, मुझसे बेहद प्यार करते थे। मैं उनका लाडला था, क्योंकि घर में सबसे छोटा मैं ही था। मुझे उनसे बहुत प्यार मिला। हालांकि उस समय वे काफी ओल्ड हो चुके थे, लेकिन उन्होंने मुझे प्रेडिक्ट किया था कि तुम्हारे अंदर भी एक संगीतकार छुपा है, तुम गाने बना सकते हो। मैंने बोला कि मैं तो कुछ सीखा ही नहीं हूं। उस समय तक वे जुहू स्थिति अपने बंगले में रहने के लिए आ गए थे। जुहू में उनका भव्य बंगला था। फाइनेंशियली बहुत ही सिक्योर इंसान थे। वे और उनकी वाइफ ने फैमिली के लिए बड़े-बड़े डिसीजन लिये। अपने जमाने में उनकी बहुत ही सक्सेसफुल फैमिली रही है। वे आने वाली 10 जेनरेशन को सिक्योर करके चले गए। इतने महान आदमी थे। लेकिन मैंने एक चीज देखी है कि आखिरी सांस तक उनके हाथ में कलम और किताब थी। अपनी बहन यानी मेरी मम्मी के लिए लिखा गीत मेरी मम्मी मिल्किस, हसरत जयपुरी की सबसे छोटी बहन थीं। वे मेरी मम्मी को बहुत प्यार करते थे। प्यार से मम्मी को नन्हूं (छोटी) बुलाते थे। उन्होंने गीत- ‘सुनो छोटी-सी गुड़िया की लंबी कहानी…’, मेरी मम्मी के लिए लिखा था। मेरी मम्मी के जीवन में जो संघर्ष था, उसे ध्यान रखते हुए लिखा था। पापा ने काफी स्ट्रगल देखा था। उनके लिए तो मम्मी 15-16 साल की बहन थी, जिनकी शादी 18 साल की उम्र में हो गई। उन्होंने बहन की सारी जिंदगी देखी। हालांकि अपने हिसाब से वे जो कुछ भी कर सकते थे, वह किया। लेकिन मम्मी को देखकर वे हमेशा कहते थे कि यह मेरी गुड़िया है। उनको इन सब चीजों की तकलीफ उठाने की जरूरत नहीं थी, तब उन्होंने यह गाना लिखा था। अपने काम के प्रति फोकस्ड थे उनकी बहुत ही क्रिएटिव और बड़े कमाल की पर्सनालिटी थी। अपने काम के प्रति इतना फोकस्ड और इतना लीन होना उनसे सीखा जा सकता है। मतलब उनके पास किसी तरह का कोई डायवर्जन ही नहीं था। दिन भर लफ्जों की कहानी में बिजी रहते थे। उन्होंने कभी नॉर्मल जिंदगी जिया ही नहीं। हर एक पल, हर एक क्षण उनको सिर्फ म्यूजिक, लिरिक्स, गीत-गाने, मुखड़े ही सुनते थे। कमाल की शख्सियत थी। डायरेक्टर वगैरह से मिलना हो, तभी वे पार्टी-फंक्शन में जाते थे। अपने जमाने में राइटिंग कि हिसाब से कमर्शियल सक्सेसफुल इंसान रहे। उन्होंने अपने दौर में जो समय देखा है, वह कोई देख ही नहीं सकता। इतना पॉवर, इतनी कमर्शियल सक्सेस, बाप रे बाप! वॉव!! आज अतीत में जाएंगे, तब पाएंगे कि क्या गाने और क्या पिक्चर, क्या काम किया है। मैंने भी सुना है कि चौपाटी पर बैठकर खिलौने बेचते थे उनके बारे जितना सुना है, वह यह है कि वे अपनी फैमिली को संभालने जयपुर से मुंबई आए थे। यहां चौपाटी पर बैठकर खिलौने बेचते थे। फिर उनको बस कंडक्टर की नौकरी मिली। फिर किसी मुशायरे में बतौर पोएट उनको पृथ्वी राज कपूर मिले। पृथ्वी राज कपूर ने उन्हें रेकमेंड किया है कि मेरे बेटे राज कपूर से मिलिए। वहां से कहानी शुरू हुई। मैंने इतना मेहनत करने वाला इंसान अपनी जिंदगी में कभी नहीं देखा। ‘बाहरों फूल बरसाओ…’, ‘लिखे जो खत तुझे…’, ‘तुम मुझे यूं न भुला पाओगे…’, ‘एहसास तेरा होगा मुझ पर…’ ‘जिंन्दगी एक सफर है सुहाना…’ आदि उनके लिखे मेरे पसंदीदा गानों की लिस्ट ही खत्म नहीं होगी। आज सोचता हूं कि इतना दिग्गज इंसान इस पृथ्वी पर आया और इतने अच्छे रोमेंटिक गाने लिखकर चला गया। खुशकिश्मत हूं कि उन्हें गले लगाने का मौका मिला हम तो सारी जिंदगी उनके मुरीद ही बने रहेंगे। कभी-कभी खुद को खुशकिस्मत समझते हैं, जो उनको दिल से दिल गले लगाने मौका मिला। हम उनको किस कर सके और वे हमारे माथे को चूम सके। यह हमारी किस्मत थी कि इतने बड़े आदमी का हमें प्यार मिला। उन्हें वेज-नॉन वेज सब पसंद था। उनके बेटे भी कहते हैं कि गाना और खाना उनका फेवरिट रहा है। वे अपनी बहन यानी मेरी मम्मी के हाथ का खाना खाने के लिए शंकर-जयकिशन, राज कपूर आदि के साथ घर आया करते थे। मेरी मम्मी बहुत अच्छा नॉन वेजिटेरियन बनाती थी। वे घर पर फोन करके बोलते थे कि नंदो से कहना कि आज शाही कबाब बना दें। मेरी मम्मी के खाने पकाने पर उनको बड़ा गर्व था। वे बड़े साधारण तरीके जन्मदिन मनाते थे। जन्मदिन पर गरीबों को खाना बांटते थे।

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