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दिब्येंदु बोले- रेस्पेक्ट मांगी नहीं जाती, काम से मिलती है:कई बार रिजेक्शन झेले, स्ट्रगल में दोस्तों के घरों में गुजरे कठिन दिन

दिब्येंदु बोले- रेस्पेक्ट मांगी नहीं जाती, काम से मिलती है:कई बार रिजेक्शन झेले, स्ट्रगल में दोस्तों के घरों में गुजरे कठिन दिन

‘मामला लीगल है’ के दूसरे सीजन के साथ दिब्येंदु भट्टाचार्य फिर चर्चा में आए। दैनिक भास्कर से बातचीत के दौरान उन्होंने करियर, स्ट्रगल और नए प्रोजेक्ट्स पर बातचीत की। उन्होंने बताया कि इस सीजन में कहानी पहले से ज्यादा गहरी हो जाती है। इसमें इंटरनेशनल रिलेशन, फिलॉसफी और कैपिटल पनिशमेंट जैसे गंभीर मुद्दे शामिल हैं। शो सिर्फ एंटरटेनमेंट नहीं, सोचने पर मजबूर करने वाला अनुभव बनता है। उन्होंने ‘अनदेखी 4’, ‘अल्फा’ और ‘गुलाबी’ पर अपडेट दिए। अमिताभ बच्चन, आमिर खान और हुमा कुरैशी के साथ काम के अनुभव साझा किए। मुंबई के शुरुआती संघर्ष और घर बनाने की जद्दोजहद भी याद की। सवाल: ‘मामला लीगल है’ के दूसरे सीजन में क्या खास है, और दर्शकों को क्या नया देखने को मिलेगा? जवाब: ज्यादा बताऊंगा तो स्पॉइलर हो जाएगा, लेकिन पहले सीजन में एक मजबूत दुनिया बनाई गई थी। दूसरे सीजन में वही दुनिया और गहरी हो जाती है। इस बार इंटरनेशनल रिलेशनशिप, फिलॉसफी और मेरे किरदार के जरिए अहम मैसेज देने की कोशिश की गई है। कैपिटल पनिशमेंट जैसे मुद्दों पर भी बात होती है। कॉमिक एलिमेंट के साथ यह सीजन डीप है और दर्शकों को एंटरटेनमेंट के साथ बहुत कुछ सिखाता है। सवाल: फिल्म ‘अल्फा’ और आलिया भट्ट के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा? जवाब: फिल्म के बारे में अभी ज्यादा नहीं कह सकता, क्योंकि एनडीए में है। यह एक बड़ी फिल्म है। आलिया भट्ट बहुत अच्छी एक्ट्रेस और शानदार इंसान हैं। उनसे मुलाकात वेब सीरीज ‘पोचर’ के दौरान हुई थी, जहां वो एग्जीक्यूटिव प्रोड्यूसर थीं। सवाल: वेब सीरीज ‘अनदेखी 4’ में क्या नया देखने को मिलेगा? जवाब: ‘अनदेखी’ की दुनिया वही है, लेकिन कहानी में नए ट्विस्ट आते हैं। यह बिंज-वॉच शो है। एक बार देखना शुरू करेंगे तो खत्म करके ही उठेंगे। जैसे जिंदगी बदलती है, वैसे ही ‘अनदेखी’ की दुनिया भी बदलती रहती है। सवाल: फिल्म ‘गुलाबी’ में हुमा कुरैशी के साथ आपकी केमिस्ट्री कैसी रही? जवाब: हुमा कुरैशी शानदार एक्ट्रेस और बहुत अच्छी इंसान हैं। उनके साथ काम करना आसान और मजेदार होता है। हम सेट पर खूब एंजॉय करते हैं। साथ में खाना-पीना चलता रहता है। सवाल: आप खाने-पीने के कितने शौकीन हैं? जवाब: मैं खाने का बहुत शौकीन हूं। जहां जाता हूं, वहां का लोकल खाना ट्राय करता हूं। आउटडोर शूट में समय मिले तो खुद भी कुछ बना लेता हूं। सवाल: आपने कई दिग्गजों के साथ काम किया है। कुछ अनुभव बताइए? जवाब: मेरी पहली फिल्म ‘मॉनसून वेडिंग’ थी, जिसमें नसीरुद्दीन शाह थे। उन्होंने मुझे नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा में पढ़ाया भी था। फिल्म में हमारे साथ कोई सीन नहीं था, जो मेरे लिए अफसोस की बात रही। करियर के शुरुआती दिनों में अमिताभ बच्चन और आमिर खान जैसे बड़े स्टार्स के साथ काम करने का मौका मिला। सवाल: अमिताभ बच्चन के साथ आपका अनुभव कैसा रहा? जवाब: मेरी पहली कमर्शियल फिल्म ‘ऐतबार’ थी, जिसमें मुझे अमिताभ बच्चन के साथ काम करने का मौका मिला। जब मैं नया-नया मुंबई आया था, तब उन्हें सेट पर देखना ही बड़ी बात थी। वो तीन-चार कुर्सियां लगाकर बैठते थे और किताब पढ़ते रहते थे। उनका डिसिप्लिन और ऑरा कमाल का है। एक एक्शन सीन में मैंने ज्यादा एग्रेसिव होकर परफॉर्म किया, तो उन्होंने हंसते हुए कहा- “आराम से, आराम से… मैं एक बूढ़ा आदमी हूं।.” यह उनका ह्यूमर और सादगी दिखाता है। उनकी फिटनेस देखकर मैं हैरान रह गया। एक किक सीन में उनका पैर मेरे कंधे से ऊपर पहुंच गया था। उनसे मैंने सीखा कि रेस्पेक्ट मांगी नहीं जाती, अपने काम से कमाई जाती है। सवाल: आमिर खान के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा? जवाब: आमिर खान के साथ फिल्म ‘मंगल पांडे’ में काम किया। वह बेहद डेडिकेटेड एक्टर हैं और स्क्रिप्ट पर गहराई से काम करते हैं। उनका सोचने का तरीका इंटरनेशनल है। वह को-एक्टर्स की मदद करते हैं। खुद क्यू देते हैं ताकि सीन बेहतर बन सके। उनका मानना है कि एक्टिंग पूरी तरह टीमवर्क है। सवाल: आपके करियर की शुरुआत और स्ट्रगल कैसा रहा? जवाब: मैं 1994–97 तक NSD में था और 2000 तक रेपर्टरी में काम किया। वहां की पॉलिटिक्स से परेशान होकर छोड़ दिया। पहले कोलकाता गया, लेकिन वहां काम नहीं मिला। फिर दिल्ली में ‘मॉनसून वेडिंग’ की कास्टिंग के दौरान मौका मिला। पहले किसी और को कास्ट किया गया था, लेकिन बाद में ऑडिशन के जरिए मुझे रोल मिला, यहीं से सफर शुरू हुआ। सवाल: आप ‘मॉनसून वेडिंग’ के बाद मुंबई आए। यहां आने पर पुराने दोस्तों का कितना सहारा मिला? जवाब: मुझे दोस्तों का बहुत सपोर्ट मिला। मेरा एक बैचमेट राजीव कुमार है, जो टीवी इंडस्ट्री में बड़ा नाम है। वह हमारे बैच का पहला इंसान था जिसने लोखंडवाला की कृष्णा कावेरी सोसाइटी में घर खरीदा था। मैंने उससे कहा था कि मैं तीन साल बाद आऊंगा और उसी के पास रहूंगा। लेकिन जब मैं मुंबई पहुंचा, उसे पता नहीं था कि मैं आ रहा हूं, क्योंकि उस समय फोन-पेजर का दौर था। कॉल करना भी सोच-समझकर होता था। वह शूटिंग के लिए 10 दिन बाहर था, तो मैं अपने दोस्त राजपाल यादव के घर चला गया। उस समय हम सब स्ट्रगल कर रहे थे और एक-दूसरे के साथ रहकर काम चलता था। सवाल: मुंबई में शुरुआती रहने का सफर कैसा रहा? जवाब: शुरुआत में कहीं टिककर रहना मुश्किल था। दोस्त ही सहारा थे। जब थोड़ा काम मिलने लगा, तब लगा कि अपना घर होना चाहिए। सबसे बड़ी दिक्कत लोन को लेकर आई। उस समय इनकम स्टेबल नहीं थी, इसलिए बैंक लोन देने को तैयार नहीं थे। बार-बार रिजेक्शन मिलता था। फिर जुगाड़ करके, थोड़ा सेविंग, थोड़ा उधार और भरोसे के दम पर आखिरकार मुंबई में अपना घर लिया। यह बड़ा मोमेंट था, क्योंकि स्ट्रगल के बाद घर लेना सेटल होने जैसा था। सवाल: इतने सालों बाद भी क्या शूटिंग के पहले दिन नर्वसनेस होती है? जवाब: आज भी लगता है कि यह मेरा पहला दिन है, पहला कैरेक्टर है। सोचता हूं इसे कैसे डेवलप करूंगा। सेट पर इतने लोग देखते हैं। कैमरामैन, साउंड वाले, तो अलग दबाव होता है। कॉन्फिडेंस होता है, लेकिन ओवरकॉन्फिडेंस नहीं लेता। मैं हमेशा संतुलित रहने की कोशिश करता हूं, क्योंकि वही सही स्थिति है। सवाल: कब लगा कि अब लोग आपको पहचानने लगे हैं? जवाब: थोड़ी पहचान ‘ब्लैक फ्राइडे’ और ‘देव डी’ के बाद मिलनी शुरू हुई। उस समय लोग चेहरे से पहचानते थे, नाम से नहीं। आज भी कई लोग कहते हैं, “आपको कहीं देखा है,” लेकिन सही जगह याद नहीं आती। कभी-कभी लोग गलत फिल्म या सीरीज का नाम भी बोल देते हैं। फिर मुझे कहना पड़ता है कि “भाई, गूगल कर लो।” असल में सही पहचान OTT के आने के बाद मिली। जब काम ज्यादा लोगों तक पहुंचता है और उन्हें पसंद आता है, तभी लोग दिल में जगह देते हैं। सवाल: शुरुआत में जब काम कम मिलता था, तब क्या करते थे? जवाब: कुछ खास नहीं करता था। घर पर समय बिताता था। बच्चों के साथ खेलना, उन्हें स्कूल छोड़ना, पियानो और डांस क्लास ले जाना, खाना बनाना, किताबें पढ़ना, फिल्में देखना। मैं फैमिली वाला इंसान हूं। काम नहीं होता था तो कोलकाता चला जाता था और वहां समय बिताकर वापस आता था। सवाल: क्या आपने एक्टिंग की ट्रेनिंग भी दी है? जवाब: मैंने कभी इंस्टिट्यूट खोलकर ट्रेनिंग नहीं दी, लेकिन जरूरत पड़ने पर वर्कशॉप और वन-ऑन-वन कोचिंग की। मैंने अर्जुन कपूर, परिणीति चोपड़ा, वाणी कपूर जैसे कलाकारों एक्टिंग की ट्रेनिंग दी है। कई फिल्मों और प्रोजेक्ट्स में भी कोचिंग दी। वर्कशॉप आमतौर पर 7 से 15 दिन, और कभी-कभी एक महीने तक की होती थी। सवाल: आप एक्टिंग सिखाते समय किन बातों पर जोर देते हैं? जवाब: मैं सिर्फ डायलॉग या सीन नहीं सिखाता, बल्कि सोच सिखाता हूं। एक्टर की सोच अलग होनी चाहिए कि कैसे ऑब्जर्व करना है, चीजों को समझना है, ज्ञान इकट्ठा करना है और उसे परफॉर्मेंस में बदलना है। एक्टिंग जिम जाने जैसी चीज नहीं है। यह बड़ा और गहरा क्राफ्ट है। सवाल: जब आप इंडस्ट्री में आए, तो हीरो-विलेन को लेकर एक तय छवि होती है। क्या बचपन में आपने कभी सोचा था कि आप एक्टर बनेंगे? जवाब: नहीं, बचपन में मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं एक्टर बनूंगा। मैं पूरी तरह स्पोर्ट्स में था। फुटबॉल और क्रिकेट खेलता था। मुझे साहित्य में भी रुचि थी। मैं ‘लिटिल मैगजीन’ चलाता था, आर्टिकल लिखता था और कॉलेज मैगजीन में लिखता था। साथ ही थिएटर भी करता था। कोलकाता में मेरे दो थिएटर ग्रुप थे, एक में डायरेक्शन करता था और दूसरे में एक्टिंग। 2-3 और ग्रुप्स के साथ भी जुड़ा था। मैं स्टूडेंट यूनियन में भी एक्टिव था, इसलिए दिनभर व्यस्त रहता था। सवाल: तो एक्टिंग का ख्याल कब आया? जवाब: जब ग्रेजुएशन खत्म होने वाला था, तब लगा कि जिंदगी में कुछ खास नहीं किया। सिर्फ बीकॉम करके क्या करूंगा? उस समय उम्र 21-22 साल थी और स्पोर्ट्स में उस स्तर तक नहीं पहुंच पाया था, जहां तक पहुंचना चाहता था। तभी लगा कि एक्टिंग ऐसी चीज है, जो मैं कर सकता हूं। सवाल: इसके बाद आपका सफर कैसे आगे बढ़ा? जवाब: मैंने थिएटर को गंभीरता से लेना शुरू किया। 1993 में IPTA (वेस्ट बंगाल) की तरफ से बेस्ट एक्टर का अवॉर्ड मिला। 1994 में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) जॉइन किया। एनएसडी में आने के बाद भी कभी नहीं सोचा था कि मुंबई जाऊंगा। मैं थिएटर ही करना चाहता था, इसलिए रिपर्टरी कंपनी जॉइन की। वाल: रिपर्टरी और थिएटर का अनुभव कैसा रहा? जवाब: रिपर्टरी में थिएटर करना मेरे लिए खास अनुभव था, क्योंकि वहां इज्जत और पैसे- दोनों के साथ काम करने का मौका मिलता था। सरकारी संस्था होने के कारण बड़े बजट में अलग-अलग तरह के नाटक करने का मौका मिलता था। यहां कॉमर्शियल दबाव नहीं होता था- टिकट बिके या न बिके, फर्क नहीं पड़ता था। हम ऐसे प्रयोग करते थे, जो बाहर इंडिपेंडेंट थिएटर में करना मुश्किल होता है। सवाल: फिर थिएटर छोड़कर आगे बढ़ने का फैसला कैसे लिया? जवाब: कुछ समय बाद माहौल अलग होने लगा। मुझे लगा कि हर किसी का अपना एजेंडा है और मेरा अपना। मैं बेवजह लड़ाई-झगड़े में समय खराब नहीं करना चाहता। इसलिए अपनी राह अलग बनाना बेहतर लगा और वहां से निकल आया। सवाल: आपके आने वाले प्रोजेक्ट्स कौन-कौन से हैं? जवाब: कुछ प्रोजेक्ट्स लाइन में हैं। एक ‘राख’ है, जो अमेजन पर आएगी और उसका टीजर आ चुका है। इसके अलावा एक सीरीज साल के अंत तक आएगी। ‘गुलाबी’, ‘रुका हुआ फैसला’, ‘अल्फा’ जैसे प्रोजेक्ट्स भी हैं। साथ ही ‘चकदा एक्सप्रेस’ भी है, लेकिन उसकी रिलीज तय नहीं है। अगर सब सही से रिलीज हो जाएं, तो दर्शकों को अच्छी चीजें देखने को मिलेंगी।

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जवाब: मेरी पहली कमर्शियल फिल्म ‘ऐतबार’ थी, जिसमें मुझे अमिताभ बच्चन के साथ काम करने का मौका मिला। जब मैं नया-नया मुंबई आया था, तब उन्हें सेट पर देखना ही बड़ी बात थी। वो तीन-चार कुर्सियां लगाकर बैठते थे और किताब पढ़ते रहते थे। उनका डिसिप्लिन और ऑरा कमाल का है। एक एक्शन सीन में मैंने ज्यादा एग्रेसिव होकर परफॉर्म किया, तो उन्होंने हंसते हुए कहा- “आराम से, आराम से… मैं एक बूढ़ा आदमी हूं।.” यह उनका ह्यूमर और सादगी दिखाता है। उनकी फिटनेस देखकर मैं हैरान रह गया। एक किक सीन में उनका पैर मेरे कंधे से ऊपर पहुंच गया था। उनसे मैंने सीखा कि रेस्पेक्ट मांगी नहीं जाती, अपने काम से कमाई जाती है। सवाल: आमिर खान के साथ काम करने का अनुभव कैसा रहा? जवाब: आमिर खान के साथ फिल्म ‘मंगल पांडे’ में काम किया। वह बेहद डेडिकेटेड एक्टर हैं और स्क्रिप्ट पर गहराई से काम करते हैं। उनका सोचने का तरीका इंटरनेशनल है। वह को-एक्टर्स की मदद करते हैं। खुद क्यू देते हैं ताकि सीन बेहतर बन सके। उनका मानना है कि एक्टिंग पूरी तरह टीमवर्क है। सवाल: आपके करियर की शुरुआत और स्ट्रगल कैसा रहा? जवाब: मैं 1994–97 तक NSD में था और 2000 तक रेपर्टरी में काम किया। वहां की पॉलिटिक्स से परेशान होकर छोड़ दिया। पहले कोलकाता गया, लेकिन वहां काम नहीं मिला। फिर दिल्ली में ‘मॉनसून वेडिंग’ की कास्टिंग के दौरान मौका मिला। पहले किसी और को कास्ट किया गया था, लेकिन बाद में ऑडिशन के जरिए मुझे रोल मिला, यहीं से सफर शुरू हुआ। सवाल: आप ‘मॉनसून वेडिंग’ के बाद मुंबई आए। यहां आने पर पुराने दोस्तों का कितना सहारा मिला? जवाब: मुझे दोस्तों का बहुत सपोर्ट मिला। मेरा एक बैचमेट राजीव कुमार है, जो टीवी इंडस्ट्री में बड़ा नाम है। वह हमारे बैच का पहला इंसान था जिसने लोखंडवाला की कृष्णा कावेरी सोसाइटी में घर खरीदा था। मैंने उससे कहा था कि मैं तीन साल बाद आऊंगा और उसी के पास रहूंगा। लेकिन जब मैं मुंबई पहुंचा, उसे पता नहीं था कि मैं आ रहा हूं, क्योंकि उस समय फोन-पेजर का दौर था। कॉल करना भी सोच-समझकर होता था। वह शूटिंग के लिए 10 दिन बाहर था, तो मैं अपने दोस्त राजपाल यादव के घर चला गया। उस समय हम सब स्ट्रगल कर रहे थे और एक-दूसरे के साथ रहकर काम चलता था। सवाल: मुंबई में शुरुआती रहने का सफर कैसा रहा? जवाब: शुरुआत में कहीं टिककर रहना मुश्किल था। दोस्त ही सहारा थे। जब थोड़ा काम मिलने लगा, तब लगा कि अपना घर होना चाहिए। सबसे बड़ी दिक्कत लोन को लेकर आई। उस समय इनकम स्टेबल नहीं थी, इसलिए बैंक लोन देने को तैयार नहीं थे। बार-बार रिजेक्शन मिलता था। फिर जुगाड़ करके, थोड़ा सेविंग, थोड़ा उधार और भरोसे के दम पर आखिरकार मुंबई में अपना घर लिया। यह बड़ा मोमेंट था, क्योंकि स्ट्रगल के बाद घर लेना सेटल होने जैसा था। सवाल: इतने सालों बाद भी क्या शूटिंग के पहले दिन नर्वसनेस होती है? जवाब: आज भी लगता है कि यह मेरा पहला दिन है, पहला कैरेक्टर है। सोचता हूं इसे कैसे डेवलप करूंगा। सेट पर इतने लोग देखते हैं। कैमरामैन, साउंड वाले, तो अलग दबाव होता है। कॉन्फिडेंस होता है, लेकिन ओवरकॉन्फिडेंस नहीं लेता। मैं हमेशा संतुलित रहने की कोशिश करता हूं, क्योंकि वही सही स्थिति है। सवाल: कब लगा कि अब लोग आपको पहचानने लगे हैं? जवाब: थोड़ी पहचान ‘ब्लैक फ्राइडे’ और ‘देव डी’ के बाद मिलनी शुरू हुई। उस समय लोग चेहरे से पहचानते थे, नाम से नहीं। आज भी कई लोग कहते हैं, “आपको कहीं देखा है,” लेकिन सही जगह याद नहीं आती। कभी-कभी लोग गलत फिल्म या सीरीज का नाम भी बोल देते हैं। फिर मुझे कहना पड़ता है कि “भाई, गूगल कर लो।” असल में सही पहचान OTT के आने के बाद मिली। जब काम ज्यादा लोगों तक पहुंचता है और उन्हें पसंद आता है, तभी लोग दिल में जगह देते हैं। सवाल: शुरुआत में जब काम कम मिलता था, तब क्या करते थे? जवाब: कुछ खास नहीं करता था। घर पर समय बिताता था। बच्चों के साथ खेलना, उन्हें स्कूल छोड़ना, पियानो और डांस क्लास ले जाना, खाना बनाना, किताबें पढ़ना, फिल्में देखना। मैं फैमिली वाला इंसान हूं। काम नहीं होता था तो कोलकाता चला जाता था और वहां समय बिताकर वापस आता था। सवाल: क्या आपने एक्टिंग की ट्रेनिंग भी दी है? जवाब: मैंने कभी इंस्टिट्यूट खोलकर ट्रेनिंग नहीं दी, लेकिन जरूरत पड़ने पर वर्कशॉप और वन-ऑन-वन कोचिंग की। मैंने अर्जुन कपूर, परिणीति चोपड़ा, वाणी कपूर जैसे कलाकारों एक्टिंग की ट्रेनिंग दी है। कई फिल्मों और प्रोजेक्ट्स में भी कोचिंग दी। वर्कशॉप आमतौर पर 7 से 15 दिन, और कभी-कभी एक महीने तक की होती थी। सवाल: आप एक्टिंग सिखाते समय किन बातों पर जोर देते हैं? जवाब: मैं सिर्फ डायलॉग या सीन नहीं सिखाता, बल्कि सोच सिखाता हूं। एक्टर की सोच अलग होनी चाहिए कि कैसे ऑब्जर्व करना है, चीजों को समझना है, ज्ञान इकट्ठा करना है और उसे परफॉर्मेंस में बदलना है। एक्टिंग जिम जाने जैसी चीज नहीं है। यह बड़ा और गहरा क्राफ्ट है। सवाल: जब आप इंडस्ट्री में आए, तो हीरो-विलेन को लेकर एक तय छवि होती है। क्या बचपन में आपने कभी सोचा था कि आप एक्टर बनेंगे? जवाब: नहीं, बचपन में मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं एक्टर बनूंगा। मैं पूरी तरह स्पोर्ट्स में था। फुटबॉल और क्रिकेट खेलता था। मुझे साहित्य में भी रुचि थी। मैं ‘लिटिल मैगजीन’ चलाता था, आर्टिकल लिखता था और कॉलेज मैगजीन में लिखता था। साथ ही थिएटर भी करता था। कोलकाता में मेरे दो थिएटर ग्रुप थे, एक में डायरेक्शन करता था और दूसरे में एक्टिंग। 2-3 और ग्रुप्स के साथ भी जुड़ा था। मैं स्टूडेंट यूनियन में भी एक्टिव था, इसलिए दिनभर व्यस्त रहता था। सवाल: तो एक्टिंग का ख्याल कब आया? जवाब: जब ग्रेजुएशन खत्म होने वाला था, तब लगा कि जिंदगी में कुछ खास नहीं किया। सिर्फ बीकॉम करके क्या करूंगा? उस समय उम्र 21-22 साल थी और स्पोर्ट्स में उस स्तर तक नहीं पहुंच पाया था, जहां तक पहुंचना चाहता था। तभी लगा कि एक्टिंग ऐसी चीज है, जो मैं कर सकता हूं। सवाल: इसके बाद आपका सफर कैसे आगे बढ़ा? जवाब: मैंने थिएटर को गंभीरता से लेना शुरू किया। 1993 में IPTA (वेस्ट बंगाल) की तरफ से बेस्ट एक्टर का अवॉर्ड मिला। 1994 में नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा (NSD) जॉइन किया। एनएसडी में आने के बाद भी कभी नहीं सोचा था कि मुंबई जाऊंगा। मैं थिएटर ही करना चाहता था, इसलिए रिपर्टरी कंपनी जॉइन की। वाल: रिपर्टरी और थिएटर का अनुभव कैसा रहा? जवाब: रिपर्टरी में थिएटर करना मेरे लिए खास अनुभव था, क्योंकि वहां इज्जत और पैसे- दोनों के साथ काम करने का मौका मिलता था। सरकारी संस्था होने के कारण बड़े बजट में अलग-अलग तरह के नाटक करने का मौका मिलता था। यहां कॉमर्शियल दबाव नहीं होता था- टिकट बिके या न बिके, फर्क नहीं पड़ता था। हम ऐसे प्रयोग करते थे, जो बाहर इंडिपेंडेंट थिएटर में करना मुश्किल होता है। सवाल: फिर थिएटर छोड़कर आगे बढ़ने का फैसला कैसे लिया? जवाब: कुछ समय बाद माहौल अलग होने लगा। मुझे लगा कि हर किसी का अपना एजेंडा है और मेरा अपना। मैं बेवजह लड़ाई-झगड़े में समय खराब नहीं करना चाहता। इसलिए अपनी राह अलग बनाना बेहतर लगा और वहां से निकल आया। सवाल: आपके आने वाले प्रोजेक्ट्स कौन-कौन से हैं? जवाब: कुछ प्रोजेक्ट्स लाइन में हैं। एक ‘राख’ है, जो अमेजन पर आएगी और उसका टीजर आ चुका है। इसके अलावा एक सीरीज साल के अंत तक आएगी। ‘गुलाबी’, ‘रुका हुआ फैसला’, ‘अल्फा’ जैसे प्रोजेक्ट्स भी हैं। साथ ही ‘चकदा एक्सप्रेस’ भी है, लेकिन उसकी रिलीज तय नहीं है। अगर सब सही से रिलीज हो जाएं, तो दर्शकों को अच्छी चीजें देखने को मिलेंगी।

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