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पहाड़ी लोगों की पसंदीदा सब्जी लिंगुड़ा, जिसके स्वाद में छुपा है नॉनवेज जैसा ट्विस्ट, जानिए इसके फायदे

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पिथौरागढ़:  पहाड़ों के जंगलों में मिलने वाला लिंगुड़ा एक जंगली फर्न है, जिससे स्वादिष्ट सब्जी बनाई जाती है. इसे उबालकर मसालों के साथ पकाया जाता है. इसका स्वाद हल्का खट्टा और कुरकुरा होता है. लोग इसे दाल-चावल या रोटी के साथ खाते हैं. यह सेहत के लिए भी फायदेमंद और पहाड़ी संस्कृति का खास हिस्सा है.

लिंगुड़ा असल में एक जंगली पौधा होता है, जिसे अंग्रेज़ी में फर्न कहा जाता है. इसका कोमल हिस्सा, जो घुमावदार होता है, वही खाने के काम आता है. यह पौधा पहाड़ों के जंगलों में खुद-ब-खुद उगता है, इसे उगाने के लिए किसी खास खेती की जरूरत नहीं होती. जब यह पौधा छोटा और नरम होता है, तब इसे तोड़ लिया जाता है. अगर यह ज्यादा बड़ा हो जाए, तो सख्त हो जाता है और खाने लायक नहीं रहता.

where it will be found

लिंगुड़ा मुख्य रूप से उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और अन्य पहाड़ी इलाकों के जंगलों में मिलता है. यह खासकर गर्मियों के मौसम में उगता है, जब बारिश शुरू होने वाली होती है. गांव के लोग सुबह-सुबह जंगल जाते हैं और ताजा लिंगुड़ा तोड़कर लाते हैं. यह काम थोड़ा मेहनत वाला जरूर है, लेकिन लोगों के लिए यह एक रोजमर्रा की आदत जैसा है.

how to make this vegetable

लिंगुड़ा को बनाने का तरीका बहुत आसान होता है, लेकिन इसमें थोड़ी सावधानी जरूरी है. सबसे पहले लिंगुड़ा को अच्छी तरह धोया जाता है, ताकि उसमें लगी मिट्टी साफ हो जाए. इसके बाद फिर कढ़ाई में तेल गर्म किया जाता है, उसमें जीरा, लहसुन और हरी मिर्च डाली जाती है. इसके बाद लिंगुड़ा डालकर हल्दी, नमक और धनिया पाउडर जैसे मसाले मिलाए जाते हैं. बस कुछ ही देर में तैयार हो जाती है ये पहाड़ी सब्जी.

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its taste

लिंगुड़ा की सब्जी का स्वाद बहुत ही अलग और खास होता है. ये खाने में थोड़ा बहुत नॉनवेज जैसा टेस्ट करता है और खाने में कुरकुरापन भी महसूस होता है. जो लोग पहली बार इसे खाते हैं, उन्हें इसका स्वाद थोड़ा नया लग सकता है. लेकिन, धीरे-धीरे यह उनकी पसंद बन जाती है. पहाड़ों में तो लोग इसे दाल-चावल या रोटी के साथ बड़े मजे से खाते हैं.

write way to linguda

लिंगुड़ा स्वादिष्ट जरूर है, लेकिन इसे सही तरीके से खाना बहुत जरूरी है. कच्चा लिंगुड़ा सीधे नहीं खाना चाहिए, क्योंकि इसमें हल्की कड़वाहट और कुछ प्राकृतिक तत्व होते हैं जो पाचन में दिक्कत दे सकते हैं. हमेशा इसे अच्छे से धोकर फिर ही इस्तेमाल करें. ज्यादा मात्रा में भी इसे एक साथ नहीं खाना चाहिए. अगर पहली बार खा रहे हैं, तो थोड़ा-थोड़ा खाकर देखें.

benefits of health

लिंगुड़ा सिर्फ स्वाद में ही नहीं, बल्कि सेहत के लिए भी काफी फायदेमंद माना जाता है. इसमें फाइबर अच्छी मात्रा में होता है, जो पाचन को बेहतर बनाता है, यह शरीर को ठंडक देने में मदद करता है, इसमें कई जरूरी विटामिन और मिनरल्स होते हैं. यह हल्का और आसानी से पचने वाला होता है . इसी वजह से पहाड़ों में इसे एक हेल्दी फूड माना जाता है.

relate with pahadi life

लिंगुड़ा की सब्जी सिर्फ खाने की चीज नहीं है, बल्कि यह पहाड़ी लोगों की यादों से भी जुड़ी होती है. बचपन में जब बच्चे अपने बुजुर्गों के साथ जंगल जाते थे, तो लिंगुड़ा तोड़ना उनके लिए एक मजेदार अनुभव होता था. घर आकर जब मां या दादी इसे बनाती थीं, तो पूरे घर में इसकी खुशबू फैल जाती थी. आज भी जब लोग इसे खाते हैं, तो उन्हें अपने गांव और बचपन की यादें ताजा हो जाती हैं.

why this is people's favorite

आज के समय में भले ही बाजार में कई तरह की सब्जियां मिल जाती हैं, लेकिन लिंगुड़ा की अपनी अलग पहचान है. लेकिन ये पूरी तरह प्राकृतिक होता है, इसमें पहाड़ी स्वाद होता है,
यह परंपरा और संस्कृति से जुड़ा हुआ है, और सबसे खास बात, यह हर जगह आसानी से नहीं मिलता. इसी वजह से पहाड़ों के लोग आज भी इसे बड़े चाव से खाते हैं और इसे अपनी पसंदीदा सब्जी मानते हैं.

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लिंगुड़ा असल में एक जंगली पौधा होता है, जिसे अंग्रेज़ी में फर्न कहा जाता है. इसका कोमल हिस्सा, जो घुमावदार होता है, वही खाने के काम आता है. यह पौधा पहाड़ों के जंगलों में खुद-ब-खुद उगता है, इसे उगाने के लिए किसी खास खेती की जरूरत नहीं होती. जब यह पौधा छोटा और नरम होता है, तब इसे तोड़ लिया जाता है. अगर यह ज्यादा बड़ा हो जाए, तो सख्त हो जाता है और खाने लायक नहीं रहता.

where it will be found

लिंगुड़ा मुख्य रूप से उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और अन्य पहाड़ी इलाकों के जंगलों में मिलता है. यह खासकर गर्मियों के मौसम में उगता है, जब बारिश शुरू होने वाली होती है. गांव के लोग सुबह-सुबह जंगल जाते हैं और ताजा लिंगुड़ा तोड़कर लाते हैं. यह काम थोड़ा मेहनत वाला जरूर है, लेकिन लोगों के लिए यह एक रोजमर्रा की आदत जैसा है.

how to make this vegetable

लिंगुड़ा को बनाने का तरीका बहुत आसान होता है, लेकिन इसमें थोड़ी सावधानी जरूरी है. सबसे पहले लिंगुड़ा को अच्छी तरह धोया जाता है, ताकि उसमें लगी मिट्टी साफ हो जाए. इसके बाद फिर कढ़ाई में तेल गर्म किया जाता है, उसमें जीरा, लहसुन और हरी मिर्च डाली जाती है. इसके बाद लिंगुड़ा डालकर हल्दी, नमक और धनिया पाउडर जैसे मसाले मिलाए जाते हैं. बस कुछ ही देर में तैयार हो जाती है ये पहाड़ी सब्जी.

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लिंगुड़ा की सब्जी का स्वाद बहुत ही अलग और खास होता है. ये खाने में थोड़ा बहुत नॉनवेज जैसा टेस्ट करता है और खाने में कुरकुरापन भी महसूस होता है. जो लोग पहली बार इसे खाते हैं, उन्हें इसका स्वाद थोड़ा नया लग सकता है. लेकिन, धीरे-धीरे यह उनकी पसंद बन जाती है. पहाड़ों में तो लोग इसे दाल-चावल या रोटी के साथ बड़े मजे से खाते हैं.

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लिंगुड़ा स्वादिष्ट जरूर है, लेकिन इसे सही तरीके से खाना बहुत जरूरी है. कच्चा लिंगुड़ा सीधे नहीं खाना चाहिए, क्योंकि इसमें हल्की कड़वाहट और कुछ प्राकृतिक तत्व होते हैं जो पाचन में दिक्कत दे सकते हैं. हमेशा इसे अच्छे से धोकर फिर ही इस्तेमाल करें. ज्यादा मात्रा में भी इसे एक साथ नहीं खाना चाहिए. अगर पहली बार खा रहे हैं, तो थोड़ा-थोड़ा खाकर देखें.

benefits of health

लिंगुड़ा सिर्फ स्वाद में ही नहीं, बल्कि सेहत के लिए भी काफी फायदेमंद माना जाता है. इसमें फाइबर अच्छी मात्रा में होता है, जो पाचन को बेहतर बनाता है, यह शरीर को ठंडक देने में मदद करता है, इसमें कई जरूरी विटामिन और मिनरल्स होते हैं. यह हल्का और आसानी से पचने वाला होता है . इसी वजह से पहाड़ों में इसे एक हेल्दी फूड माना जाता है.

relate with pahadi life

लिंगुड़ा की सब्जी सिर्फ खाने की चीज नहीं है, बल्कि यह पहाड़ी लोगों की यादों से भी जुड़ी होती है. बचपन में जब बच्चे अपने बुजुर्गों के साथ जंगल जाते थे, तो लिंगुड़ा तोड़ना उनके लिए एक मजेदार अनुभव होता था. घर आकर जब मां या दादी इसे बनाती थीं, तो पूरे घर में इसकी खुशबू फैल जाती थी. आज भी जब लोग इसे खाते हैं, तो उन्हें अपने गांव और बचपन की यादें ताजा हो जाती हैं.

why this is people's favorite

आज के समय में भले ही बाजार में कई तरह की सब्जियां मिल जाती हैं, लेकिन लिंगुड़ा की अपनी अलग पहचान है. लेकिन ये पूरी तरह प्राकृतिक होता है, इसमें पहाड़ी स्वाद होता है,
यह परंपरा और संस्कृति से जुड़ा हुआ है, और सबसे खास बात, यह हर जगह आसानी से नहीं मिलता. इसी वजह से पहाड़ों के लोग आज भी इसे बड़े चाव से खाते हैं और इसे अपनी पसंदीदा सब्जी मानते हैं.

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