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Supreme Court Hearing Update; Sabarimala Women Entry

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नई दिल्ली2 घंटे पहले

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धार्मिक स्थलों में महिलाओं के साथ भेदभाद मामले में सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की बेंच आज लगातार दूसरे दिन सुनवाई करेगी। मंगलवार को पहले दिन 5 घंटे की सुनवाई में केंद्र ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगाने का समर्थन किया।

सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा- मंदिर में महिलाओं को न जाने देना उनका अपमान करना नहीं है। भारत में उन्हें पूजा जाता है। हमें इस बात पर ऐतराज है कि मंदिर की परंपरा को ‘अस्पृश्यता’ (छुआछूत या अनुच्छेद 17) कहा गया। छुआछूत जाति के आधार पर होती थी, यह मामला उससे अलग है।

उन्होंने आगे कहा- जैसे हम मस्जिद, मजार या गुरुद्वारे में जाते समय सिर ढंकते हैं, वैसे ही सबरीमाला की भी एक अलग परंपरा है और इसका सम्मान होना चाहिए। ये धार्मिक आस्था और संप्रदाय की स्वायत्तता का मुद्दा है, जो कोर्ट के दायरे से बाहर है।

इस पर बेंच की एकमात्र महिला जज जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अगर किसी महिला को उसके मासिक धर्म की वजह से मंदिर में घुसने से रोका जाता है, तो क्या वह ‘छुआछूत’ नहीं है? संविधान में छुआछूत को पूरी तरह खत्म किया गया है।

SC बोला- भेदभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता

  • सरकार: महिलाओं की मंदिर में एंट्री पर 2018 का फैसला गलत तरीके से लिया गया। सभी धर्मों की परंपराओं का सम्मान जरूरी है। सिर ढकने जैसे नियम अधिकारों का हनन नहीं हैं।
  • जस्टिस नागरत्ना: सामाजिक बुराई और धार्मिक प्रथा में फर्क हो सकता है। संविधान का नियम हर दिन के लिए एक समान होना चाहिए।
  • सरकार: सबरीमाला की परंपरा को ‘अस्पृश्यता’ (अनुच्छेद 17) कहना गलत है। छुआछूत जाति आधारित थी, यह मामला उससे अलग है।
  • जस्टिस नागरत्ना: क्या मासिक धर्म के आधार पर प्रवेश रोकना क्या ‘छुआछूत’ नहीं है? संविधान ने छुआछूत को पूरी तरह समाप्त किया है।
  • सरकार: कोर्ट को धार्मिक प्रथाओं की आधुनिकता या वैज्ञानिकता तय नहीं करनी चाहिए। केवल वही प्रथाएं रद्द हों जो सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य के खिलाफ हों।
  • जस्टिस नागरत्ना: सामाजिक बुराई और धार्मिक प्रथा में फर्क हो सकता है, लेकिन भेदभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट में 50 से ज्यादा रिव्यू पिटीशन

धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव का मामला बीते 26 सालों से देश की अदालतों में हैं। 2018 में, 5 जजों की बेंच ने 4:1 के बहुमत से मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक हटा दी थी। इसके बाद कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं।

सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की संविधान बेंच 7 अप्रैल से 22 अप्रैल तक 50 से ज्यादा याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। कोर्ट में रिव्यू पिटीशनरों और उन्हें सपोर्ट करने वाले 7 अप्रैल से 9 अप्रैल तक, जबकि विरोध करने वाले 14 अप्रैल से 16 अप्रैल तक दलीलें दे सकेंगे।

सबरीमाला सहित 5 मामले, जिनपर SC फैसला करेगा

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश: सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में जाने का अधिकार दिया था। अब बड़ी पीठ तय करेगी कि यह फैसला सही था या नहीं।

दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं का खतना: एडवोकेट सुनीता तिवारी ने 2017 में इसके खिलाफ याचिका दायर की और कहा कि यह प्रथा महिलाओं के साथ भेदभाव करती है और यह नाबालिग बच्चियों के अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है। कोर्ट यह तय करेगा कि क्या यह प्रथा मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है?

मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश: यास्मीन जुबैर अहमद पीरजादा नाम की महिला ने 2016 में मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। कोर्ट तय करेगा कि क्या मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में नमाज पढ़ने से रोका जा सकता है।

पारसी महिलाओं का अग्निमंदिर में प्रवेश: 2012 में पारसी महिला गुलरुख एम गुप्ता ने हिंदू व्यक्ति से शादी के बाद अग्नि मंदिर में प्रवेश से रोके जाने के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की। सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि क्या गैर-पारसी से शादी करने पर पारसी महिला को मंदिर में प्रवेश से रोका जा सकता है।

मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े लैंगिक भेदभाव के प्रश्न: सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि क्या धार्मिक गतिविधियों में जेंडर के आधार पर भेदभाव को क्या मौलिक अधिकार का हनन माना जा सकता है?

सुप्रीम कोर्ट ने 7 संवैधानिक सवाल तय किए, जिन पर बहस होगी-

  1. अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा और दायरा क्या है?
  2. अनुच्छेद 25 (व्यक्तिगत धार्मिक अधिकार) और अनुच्छेद 26 (धार्मिक संप्रदाय के अधिकार) के बीच संतुलन कैसे तय होगा?
  3. क्या अनुच्छेद 26 के तहत मिलने वाले अधिकार अन्य मौलिक अधिकारों से ऊपर हैं या उनके अधीन आते हैं?
  4. ‘नैतिकता’ और ‘संवैधानिक नैतिकता’ की परिभाषा क्या है और इनमें क्या अंतर है?
  5. धार्मिक प्रथाओं में कोर्ट के हस्तक्षेप या न्यायिक समीक्षा की सीमा कहां तक होनी चाहिए?
  6. अनुच्छेद 25(2)(b) में ‘हिंदुओं के वर्ग’ (class of Hindus) का अर्थ किस रूप में समझा जाए?
  7. क्या कोई व्यक्ति, जो उस धर्म का अनुयायी नहीं है, जनहित याचिका (PIL) के जरिए किसी धार्मिक परंपरा को चुनौती दे सकता है?

सबरीमाला में 10 से 50 साल की महिलाओं को एंट्री नहीं, पूरा मामला 5 पॉइंट्स में

  1. सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं की एंट्री पहले बैन थी। वजह पीरियड्स और भगवान अयप्पा के ब्रह्मचर्य व्रत को माना गया। इसी नियम को लेकर विवाद शुरू हुआ।
  2. 1990 में मामला उठा, बाद में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। 2006 में कोर्ट ने नोटिस जारी किया। 2008 में केस 3 जजों की बेंच को गया।
  3. 2016 में सुनवाई शुरू हुई। 2017 में मामला 5 जजों की संविधान पीठ को भेजा गया। 2018 में 4-1 बहुमत से सभी उम्र की महिलाओं को एंट्री की अनुमति मिली।
  4. कोर्ट ने प्रतिबंध को असंवैधानिक बताया। विरोध के बीच बिंदु कनकदुर्गा और बिंदु अम्मिनी ने मंदिर में प्रवेश किया।
  5. 2019 में मामला 9 जजों की बड़ी बेंच को भेज दिया गया। बाद में दूसरे धर्मों से जुड़े महिला प्रवेश मामलों को भी इसमें जोड़ा गया।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 2 जनवरी 2019 को बिंदु कनकदुर्गा (45) और बिंदु अम्मिनी (46) ने पुलिस सुरक्षा में सबरीमाला मंदिर में प्रवेश किया। वे ऐसा करने वालीं पहली महिलाएं थीं। दोनों ने मंदिर में जाने के लिए पारंपरिक काले कपड़े पहने।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 2 जनवरी 2019 को बिंदु कनकदुर्गा (45) और बिंदु अम्मिनी (46) ने पुलिस सुरक्षा में सबरीमाला मंदिर में प्रवेश किया। वे ऐसा करने वालीं पहली महिलाएं थीं। दोनों ने मंदिर में जाने के लिए पारंपरिक काले कपड़े पहने।

अदालतों में 26 साल में क्या हुआ, पूरी टाइमलाइन…

सबरीमाला में 2 महिलाओं की एंट्री पर प्रदर्शन हुए…फोटोज

बिंदु कनकदुर्गा (45) और बिंदु अम्मिनी (46) इन्होंने पहली बार सबरीमाला मंदिर में एंट्री की।

बिंदु कनकदुर्गा (45) और बिंदु अम्मिनी (46) इन्होंने पहली बार सबरीमाला मंदिर में एंट्री की।

बिंदु कनकदुर्गा और बिंदु अम्मिनी जब भगवान अयप्पा के दर्शन करके वापस लौटी थीं, उनके जाते ही मंदिर में शुद्धी की गई थी। मंदिर में 1 घंटे तक दर्शन बंद किए गए थे।

बिंदु कनकदुर्गा और बिंदु अम्मिनी जब भगवान अयप्पा के दर्शन करके वापस लौटी थीं, उनके जाते ही मंदिर में शुद्धी की गई थी। मंदिर में 1 घंटे तक दर्शन बंद किए गए थे।

महिलाओं के मंदिर में प्रवेश करने का जमकर विरोध हुआ था। 2 जनवरी को कोच्चि में लोगों ने प्रदर्शन किया था।

महिलाओं के मंदिर में प्रवेश करने का जमकर विरोध हुआ था। 2 जनवरी को कोच्चि में लोगों ने प्रदर्शन किया था।

3 जनवरी को भी केरल के जगह-जगह विरोध प्रदर्शन हुआ था। पुलिस ने भीड़ को खदेड़ा था।

3 जनवरी को भी केरल के जगह-जगह विरोध प्रदर्शन हुआ था। पुलिस ने भीड़ को खदेड़ा था।

विरोध प्रदर्शन के दौरान केरल के सीएम पिनाराई विजयन के पोस्टर को चप्पल मारती महिला।

विरोध प्रदर्शन के दौरान केरल के सीएम पिनाराई विजयन के पोस्टर को चप्पल मारती महिला।

जानिए सबरीमाला मंदिर के बारे में…

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धार्मिक स्थलों में महिलाओं के साथ भेदभाद मामले में सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की बेंच आज लगातार दूसरे दिन सुनवाई करेगी। मंगलवार को पहले दिन 5 घंटे की सुनवाई में केंद्र ने सबरीमाला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर रोक लगाने का समर्थन किया।

सरकार की तरफ से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा- मंदिर में महिलाओं को न जाने देना उनका अपमान करना नहीं है। भारत में उन्हें पूजा जाता है। हमें इस बात पर ऐतराज है कि मंदिर की परंपरा को ‘अस्पृश्यता’ (छुआछूत या अनुच्छेद 17) कहा गया। छुआछूत जाति के आधार पर होती थी, यह मामला उससे अलग है।

उन्होंने आगे कहा- जैसे हम मस्जिद, मजार या गुरुद्वारे में जाते समय सिर ढंकते हैं, वैसे ही सबरीमाला की भी एक अलग परंपरा है और इसका सम्मान होना चाहिए। ये धार्मिक आस्था और संप्रदाय की स्वायत्तता का मुद्दा है, जो कोर्ट के दायरे से बाहर है।

इस पर बेंच की एकमात्र महिला जज जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि अगर किसी महिला को उसके मासिक धर्म की वजह से मंदिर में घुसने से रोका जाता है, तो क्या वह ‘छुआछूत’ नहीं है? संविधान में छुआछूत को पूरी तरह खत्म किया गया है।

SC बोला- भेदभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता

  • सरकार: महिलाओं की मंदिर में एंट्री पर 2018 का फैसला गलत तरीके से लिया गया। सभी धर्मों की परंपराओं का सम्मान जरूरी है। सिर ढकने जैसे नियम अधिकारों का हनन नहीं हैं।
  • जस्टिस नागरत्ना: सामाजिक बुराई और धार्मिक प्रथा में फर्क हो सकता है। संविधान का नियम हर दिन के लिए एक समान होना चाहिए।
  • सरकार: सबरीमाला की परंपरा को ‘अस्पृश्यता’ (अनुच्छेद 17) कहना गलत है। छुआछूत जाति आधारित थी, यह मामला उससे अलग है।
  • जस्टिस नागरत्ना: क्या मासिक धर्म के आधार पर प्रवेश रोकना क्या ‘छुआछूत’ नहीं है? संविधान ने छुआछूत को पूरी तरह समाप्त किया है।
  • सरकार: कोर्ट को धार्मिक प्रथाओं की आधुनिकता या वैज्ञानिकता तय नहीं करनी चाहिए। केवल वही प्रथाएं रद्द हों जो सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता या स्वास्थ्य के खिलाफ हों।
  • जस्टिस नागरत्ना: सामाजिक बुराई और धार्मिक प्रथा में फर्क हो सकता है, लेकिन भेदभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट में 50 से ज्यादा रिव्यू पिटीशन

धार्मिक स्थलों पर महिलाओं के साथ भेदभाव का मामला बीते 26 सालों से देश की अदालतों में हैं। 2018 में, 5 जजों की बेंच ने 4:1 के बहुमत से मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक हटा दी थी। इसके बाद कई पुनर्विचार याचिकाएं दायर की गईं।

सुप्रीम कोर्ट के 9 जजों की संविधान बेंच 7 अप्रैल से 22 अप्रैल तक 50 से ज्यादा याचिकाओं पर सुनवाई करेगी। कोर्ट में रिव्यू पिटीशनरों और उन्हें सपोर्ट करने वाले 7 अप्रैल से 9 अप्रैल तक, जबकि विरोध करने वाले 14 अप्रैल से 16 अप्रैल तक दलीलें दे सकेंगे।

सबरीमाला सहित 5 मामले, जिनपर SC फैसला करेगा

सबरीमाला मंदिर में महिलाओं का प्रवेश: सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में सभी उम्र की महिलाओं को मंदिर में जाने का अधिकार दिया था। अब बड़ी पीठ तय करेगी कि यह फैसला सही था या नहीं।

दाऊदी बोहरा समुदाय में महिलाओं का खतना: एडवोकेट सुनीता तिवारी ने 2017 में इसके खिलाफ याचिका दायर की और कहा कि यह प्रथा महिलाओं के साथ भेदभाव करती है और यह नाबालिग बच्चियों के अधिकारों का गंभीर उल्लंघन है। कोर्ट यह तय करेगा कि क्या यह प्रथा मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है?

मस्जिदों में महिलाओं का प्रवेश: यास्मीन जुबैर अहमद पीरजादा नाम की महिला ने 2016 में मुस्लिम महिलाओं के मस्जिद में प्रवेश के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की। कोर्ट तय करेगा कि क्या मुस्लिम महिलाओं को मस्जिद में नमाज पढ़ने से रोका जा सकता है।

पारसी महिलाओं का अग्निमंदिर में प्रवेश: 2012 में पारसी महिला गुलरुख एम गुप्ता ने हिंदू व्यक्ति से शादी के बाद अग्नि मंदिर में प्रवेश से रोके जाने के खिलाफ बॉम्बे हाईकोर्ट में याचिका दायर की। सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि क्या गैर-पारसी से शादी करने पर पारसी महिला को मंदिर में प्रवेश से रोका जा सकता है।

मुस्लिम पर्सनल लॉ से जुड़े लैंगिक भेदभाव के प्रश्न: सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि क्या धार्मिक गतिविधियों में जेंडर के आधार पर भेदभाव को क्या मौलिक अधिकार का हनन माना जा सकता है?

सुप्रीम कोर्ट ने 7 संवैधानिक सवाल तय किए, जिन पर बहस होगी-

  1. अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता की सीमा और दायरा क्या है?
  2. अनुच्छेद 25 (व्यक्तिगत धार्मिक अधिकार) और अनुच्छेद 26 (धार्मिक संप्रदाय के अधिकार) के बीच संतुलन कैसे तय होगा?
  3. क्या अनुच्छेद 26 के तहत मिलने वाले अधिकार अन्य मौलिक अधिकारों से ऊपर हैं या उनके अधीन आते हैं?
  4. ‘नैतिकता’ और ‘संवैधानिक नैतिकता’ की परिभाषा क्या है और इनमें क्या अंतर है?
  5. धार्मिक प्रथाओं में कोर्ट के हस्तक्षेप या न्यायिक समीक्षा की सीमा कहां तक होनी चाहिए?
  6. अनुच्छेद 25(2)(b) में ‘हिंदुओं के वर्ग’ (class of Hindus) का अर्थ किस रूप में समझा जाए?
  7. क्या कोई व्यक्ति, जो उस धर्म का अनुयायी नहीं है, जनहित याचिका (PIL) के जरिए किसी धार्मिक परंपरा को चुनौती दे सकता है?

सबरीमाला में 10 से 50 साल की महिलाओं को एंट्री नहीं, पूरा मामला 5 पॉइंट्स में

  1. सबरीमाला मंदिर में 10 से 50 साल की महिलाओं की एंट्री पहले बैन थी। वजह पीरियड्स और भगवान अयप्पा के ब्रह्मचर्य व्रत को माना गया। इसी नियम को लेकर विवाद शुरू हुआ।
  2. 1990 में मामला उठा, बाद में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा। 2006 में कोर्ट ने नोटिस जारी किया। 2008 में केस 3 जजों की बेंच को गया।
  3. 2016 में सुनवाई शुरू हुई। 2017 में मामला 5 जजों की संविधान पीठ को भेजा गया। 2018 में 4-1 बहुमत से सभी उम्र की महिलाओं को एंट्री की अनुमति मिली।
  4. कोर्ट ने प्रतिबंध को असंवैधानिक बताया। विरोध के बीच बिंदु कनकदुर्गा और बिंदु अम्मिनी ने मंदिर में प्रवेश किया।
  5. 2019 में मामला 9 जजों की बड़ी बेंच को भेज दिया गया। बाद में दूसरे धर्मों से जुड़े महिला प्रवेश मामलों को भी इसमें जोड़ा गया।
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 2 जनवरी 2019 को बिंदु कनकदुर्गा (45) और बिंदु अम्मिनी (46) ने पुलिस सुरक्षा में सबरीमाला मंदिर में प्रवेश किया। वे ऐसा करने वालीं पहली महिलाएं थीं। दोनों ने मंदिर में जाने के लिए पारंपरिक काले कपड़े पहने।

सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद 2 जनवरी 2019 को बिंदु कनकदुर्गा (45) और बिंदु अम्मिनी (46) ने पुलिस सुरक्षा में सबरीमाला मंदिर में प्रवेश किया। वे ऐसा करने वालीं पहली महिलाएं थीं। दोनों ने मंदिर में जाने के लिए पारंपरिक काले कपड़े पहने।

अदालतों में 26 साल में क्या हुआ, पूरी टाइमलाइन…

सबरीमाला में 2 महिलाओं की एंट्री पर प्रदर्शन हुए…फोटोज

बिंदु कनकदुर्गा (45) और बिंदु अम्मिनी (46) इन्होंने पहली बार सबरीमाला मंदिर में एंट्री की।

बिंदु कनकदुर्गा (45) और बिंदु अम्मिनी (46) इन्होंने पहली बार सबरीमाला मंदिर में एंट्री की।

बिंदु कनकदुर्गा और बिंदु अम्मिनी जब भगवान अयप्पा के दर्शन करके वापस लौटी थीं, उनके जाते ही मंदिर में शुद्धी की गई थी। मंदिर में 1 घंटे तक दर्शन बंद किए गए थे।

बिंदु कनकदुर्गा और बिंदु अम्मिनी जब भगवान अयप्पा के दर्शन करके वापस लौटी थीं, उनके जाते ही मंदिर में शुद्धी की गई थी। मंदिर में 1 घंटे तक दर्शन बंद किए गए थे।

महिलाओं के मंदिर में प्रवेश करने का जमकर विरोध हुआ था। 2 जनवरी को कोच्चि में लोगों ने प्रदर्शन किया था।

महिलाओं के मंदिर में प्रवेश करने का जमकर विरोध हुआ था। 2 जनवरी को कोच्चि में लोगों ने प्रदर्शन किया था।

3 जनवरी को भी केरल के जगह-जगह विरोध प्रदर्शन हुआ था। पुलिस ने भीड़ को खदेड़ा था।

3 जनवरी को भी केरल के जगह-जगह विरोध प्रदर्शन हुआ था। पुलिस ने भीड़ को खदेड़ा था।

विरोध प्रदर्शन के दौरान केरल के सीएम पिनाराई विजयन के पोस्टर को चप्पल मारती महिला।

विरोध प्रदर्शन के दौरान केरल के सीएम पिनाराई विजयन के पोस्टर को चप्पल मारती महिला।

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