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Opinion: ब्रिटेन में 2008 के बाद जन्मे लोगों पर लाइफटाइम टोबैको बैन, पर क्या भारत दिखा पाएगा हिम्मत

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Smoke-Free Generation: ब्रिटेन की संसद ने ऐतिहासिक बिल पास करते हुए 2008 के बाद पैदा लिए लोगों पर लाइफटाइम स्मोकिंग बैन कर दिया है. यानी वर्तमान में जो लोग 18 साल के हो चुके हैं और इस उम्र से कम के हैं वे अब कभी भी ब्रिटेन में तंबाकू या तंबाकू जनित चीजों का सेवन नहीं कर सकते हैं. एक तरह से ब्रिटेन स्मोक फ्री जेनरेशन बनना चाहता है. भारत की स्थिति इस मामले में बेहद खराब है. यहां हर साल 13.5 लाख मौतें तंबाकू के कारण हो जाती है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत में इतनी हिम्मत है.

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ब्रिटेन में 2008 के बाद पैदा लेने वाले लोगों के लिए लाइफटाइम तंबाकू बैन हो गया है.

कैसी अजीब बिडंबना है पहले हम जहर बेचकर सौ रुपये कमाते हैं और फिर इसके इलाज पर 816 रुपये खर्च कर देते हैं. तंबाकू की जानलेवा आदत पर हमारे देश की यही स्थिति है. हम तंबाकू पर सिर्फ चेतावनी डाल देते हैं कि इससे कैंसर होता है. दूसरी तरफ इससे पैसा कमाने के लिए हम इस जहर को बेचना बदस्तूर जारी रखते हैं. लाखों जिंदगियां इस धुएं की राख में तबाह हो जाती है. पर इसका हमें कोई गम नहीं. दुनिया भर में यह खेल चल रहा है. युवा वर्ग सिगरेट के छल्ले को निकालने में अपनी शानो-शौकत समझते हैं. और इसमें उनकी जिंदगी तबाह हो रही है. इन सुलगते सवालों के बीच ब्रिटेन ने ऐसा फैसला लिया है जो इतिहास के स्वर्णाक्षरों में अंकित हो जाएगा. ब्रिटेन में 2008 के बाद पैदा लेने वाले सभी लोगों को पूरी जिंदगी तंबाकू या तंबाकू जनित प्रोडक्ट को हाथ भी नहीं लगाने दिया जाएगा. यह पूरी तरह से बैन होगा. यानी ब्रिटेन अगली पीढ़ी को स्मोक जेनरेशन की ओर ले जाने का पुख्ता बंदोवस्त कर लिया है. इससे पहले न्यूजीलैंड मालद्वीव जैसे देशों ने अपने यहां आने वाली पीढ़ियों के लिए स्मोकिंग बैन कर दिया है. पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि तंबाकू से सबसे ज्यादा चोट खाने वाले भारत में क्या ऐसा हो सकता है. क्या भारत में इतना दम है.

हर साल 13 लाख लोगों की मौत

डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट को मानें तो भारत में हर साल 13.5 लाख लोगों की मौत तंबाकू के कारण होती है. तंबाकू से भारत में कई प्रोडक्ट बनते हैं. सिगरेट, वेपिंग तो स्मोकिंग प्रोडक्ट है लेकिन भारत के कोने-कोने में गुटखा पाया जाता है. गुटखा में तंबाकू डालने पर बैन है लेकिन तंबाकू को बेचने पर कोई बैन नहीं है. इसलिए कंपनियां बिना तंबाकू वाले गुटखा को अलग बेचते हैं और तंबाकू को अलग से बेचते हैं. लोग दोनों पाउच एक साथ खरीदते हैं और दोनों को मिलाकर चबाने लगते हैं. यह किलर कॉम्बिनेशन है. इतना ही भारत में कॉरपोरेट कल्चर में सिगरेट पीने की लत सी लग गई है. लड़कियां भी इसमें बहुत आगे रहती हैं. सबको पता है कि सिगरेट कैंसर, सीओपीडी, अस्थमा, लिवर डिजीज, किडनी डिजीज का कारण है, इसके बावजूद तंबाकू जनित प्रोडक्ट की बाढ़ गई है. अब इसे कई रूपों में बेचा जाता है. चिंता की बात यह है कि भारत में तंबाकू सेवन करने वाले लोगों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है. भारत में 15 साल से उपर 26.7 करोड़ लोगों को तंबाकू के सेवन की आदत है. इसका मतलब यह हुआ कि 30 फीसदी वयस्क जनसंख्या तंबाकू की चपेट में है.

ऐसा खेल क्यों खेला जा रहा

यह तंबाकू भारत की सेहत में घुन की तरह खा रहा है. जो लोग भी तंबाकू का सेवन करते हैं, 35 साल के बाद इनमें से अधिकांश को कुछ न कुछ बीमारी हो ही जाती है. तंबाकू के कारण होने वाली बीमारियों और इससे होने वाली मौतों के कारण हर साल भारत की अर्थव्यवस्था 2000 करोड़ से ज्यादा का नुकसान उठाना पड़ता है. अनुमान के मुताबिक अगर सरकार को तंबाकू पर टैक्स से 100 रुपये की आमदनी होती है तो इससे अर्थव्यवस्था को 816 रुपये का नुकसान उठाना पड़ता है. हर चीज की तरह इसमें भी गरीब आदमी को ज्यादा नुकसान उठाना पड़ता है. इन लोगों को जब तंबाकू के कारण बीमारी होती है तो ये समझ नहीं पाते हैं कि इसकी वजह तंबाकू है. नतीजतन इन्हें सबसे ज्यादा मार झेलने होती है. ऐसे में सवाल उठता है कि ये कौन सी समझदारी है. सरकार को इस तंबाकू पर टैक्स से जितनी आमदनी होती है उससे कहीं ज्यादा वह इसके खिलाफ जागरुकता फैलाने के लिए प्रचार-प्रसार पर खर्च कर देती है. फिर ऐसा खेल क्यों खेला जाता है. यह एक तरह का कुचक्र है जिसमें सरकार रत्ती भर पैसे के लिए फंसती जा रही है. क्या सिगरेट से मिलने वाला टैक्स उन लाखों करोड़ों रुपयों की भरपाई कर सकता है जो भारत सरकार कैंसर के इलाज और मैनपावर लॉस पर खर्च करती है?

हमें तत्काल कानून की जरूरत

ब्रिटेन में पास हुआ कानून हमारे लिए सबसे बड़ी सबक है. हमारे देश में युवाओं की बहुत बड़ी आबादी ऐसी है जो सिर्फ स्टेट्स सिंबल के लिए सिगरेट की कश में अपनी जिंदगी को बर्बाद कर लेते हैं. टीनएज लड़कियां जिस तरह से स्मोकिंग की ओर आक्रामकता से बढ़ रही है वह और भी चिंताजनक है. कोई देश तभी आगे बढ़ सकता है जब उसके नागरिकों की सेहत दुरुस्त हो. लेकिन हमारे देश में 30 के बाद से ही लोगों को हार्ट डिजीज, मोटापा, डायबिटीज और लिवर की गंभीर बीमारी होने लगी है. ये सारे संकेत इस चिंता को और बढ़ा देती है कि हमें तत्काल ऐसी नीति की जरूरत है जिसमें तंबाकू पूरी तरह से प्रतिबंधित हो. दुनिया के विकसित देश अब स्मोक-फ्री जेनरेशन के मॉडल पर काम कर रहे हैं.भारत जैसे घनी आबादी वाले देश के लिए यह एक उदाहरण है. जिस तरह की मुसीबतें हम झेल रहे हैं, उसमें हमें ऐसे कानून की सख्त आवश्यकता है.

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Lakshmi Narayan

18 साल से ज्यादा के लंबे करियर में लक्ष्मी नारायण ने डीडी न्यूज, आउटलुक, नई दुनिया, दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। समसामयिक विषयों के विभिन्न मुद्दों, राजनीति, समाज, …और पढ़ें

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Smoke-Free Generation: ब्रिटेन की संसद ने ऐतिहासिक बिल पास करते हुए 2008 के बाद पैदा लिए लोगों पर लाइफटाइम स्मोकिंग बैन कर दिया है. यानी वर्तमान में जो लोग 18 साल के हो चुके हैं और इस उम्र से कम के हैं वे अब कभी भी ब्रिटेन में तंबाकू या तंबाकू जनित चीजों का सेवन नहीं कर सकते हैं. एक तरह से ब्रिटेन स्मोक फ्री जेनरेशन बनना चाहता है. भारत की स्थिति इस मामले में बेहद खराब है. यहां हर साल 13.5 लाख मौतें तंबाकू के कारण हो जाती है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या भारत में इतनी हिम्मत है.

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ब्रिटेन में 2008 के बाद पैदा लेने वाले लोगों के लिए लाइफटाइम तंबाकू बैन हो गया है.

कैसी अजीब बिडंबना है पहले हम जहर बेचकर सौ रुपये कमाते हैं और फिर इसके इलाज पर 816 रुपये खर्च कर देते हैं. तंबाकू की जानलेवा आदत पर हमारे देश की यही स्थिति है. हम तंबाकू पर सिर्फ चेतावनी डाल देते हैं कि इससे कैंसर होता है. दूसरी तरफ इससे पैसा कमाने के लिए हम इस जहर को बेचना बदस्तूर जारी रखते हैं. लाखों जिंदगियां इस धुएं की राख में तबाह हो जाती है. पर इसका हमें कोई गम नहीं. दुनिया भर में यह खेल चल रहा है. युवा वर्ग सिगरेट के छल्ले को निकालने में अपनी शानो-शौकत समझते हैं. और इसमें उनकी जिंदगी तबाह हो रही है. इन सुलगते सवालों के बीच ब्रिटेन ने ऐसा फैसला लिया है जो इतिहास के स्वर्णाक्षरों में अंकित हो जाएगा. ब्रिटेन में 2008 के बाद पैदा लेने वाले सभी लोगों को पूरी जिंदगी तंबाकू या तंबाकू जनित प्रोडक्ट को हाथ भी नहीं लगाने दिया जाएगा. यह पूरी तरह से बैन होगा. यानी ब्रिटेन अगली पीढ़ी को स्मोक जेनरेशन की ओर ले जाने का पुख्ता बंदोवस्त कर लिया है. इससे पहले न्यूजीलैंड मालद्वीव जैसे देशों ने अपने यहां आने वाली पीढ़ियों के लिए स्मोकिंग बैन कर दिया है. पर सबसे बड़ा सवाल यह है कि तंबाकू से सबसे ज्यादा चोट खाने वाले भारत में क्या ऐसा हो सकता है. क्या भारत में इतना दम है.

हर साल 13 लाख लोगों की मौत

डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट को मानें तो भारत में हर साल 13.5 लाख लोगों की मौत तंबाकू के कारण होती है. तंबाकू से भारत में कई प्रोडक्ट बनते हैं. सिगरेट, वेपिंग तो स्मोकिंग प्रोडक्ट है लेकिन भारत के कोने-कोने में गुटखा पाया जाता है. गुटखा में तंबाकू डालने पर बैन है लेकिन तंबाकू को बेचने पर कोई बैन नहीं है. इसलिए कंपनियां बिना तंबाकू वाले गुटखा को अलग बेचते हैं और तंबाकू को अलग से बेचते हैं. लोग दोनों पाउच एक साथ खरीदते हैं और दोनों को मिलाकर चबाने लगते हैं. यह किलर कॉम्बिनेशन है. इतना ही भारत में कॉरपोरेट कल्चर में सिगरेट पीने की लत सी लग गई है. लड़कियां भी इसमें बहुत आगे रहती हैं. सबको पता है कि सिगरेट कैंसर, सीओपीडी, अस्थमा, लिवर डिजीज, किडनी डिजीज का कारण है, इसके बावजूद तंबाकू जनित प्रोडक्ट की बाढ़ गई है. अब इसे कई रूपों में बेचा जाता है. चिंता की बात यह है कि भारत में तंबाकू सेवन करने वाले लोगों की संख्या तेजी से बढ़ती जा रही है. भारत में 15 साल से उपर 26.7 करोड़ लोगों को तंबाकू के सेवन की आदत है. इसका मतलब यह हुआ कि 30 फीसदी वयस्क जनसंख्या तंबाकू की चपेट में है.

ऐसा खेल क्यों खेला जा रहा

यह तंबाकू भारत की सेहत में घुन की तरह खा रहा है. जो लोग भी तंबाकू का सेवन करते हैं, 35 साल के बाद इनमें से अधिकांश को कुछ न कुछ बीमारी हो ही जाती है. तंबाकू के कारण होने वाली बीमारियों और इससे होने वाली मौतों के कारण हर साल भारत की अर्थव्यवस्था 2000 करोड़ से ज्यादा का नुकसान उठाना पड़ता है. अनुमान के मुताबिक अगर सरकार को तंबाकू पर टैक्स से 100 रुपये की आमदनी होती है तो इससे अर्थव्यवस्था को 816 रुपये का नुकसान उठाना पड़ता है. हर चीज की तरह इसमें भी गरीब आदमी को ज्यादा नुकसान उठाना पड़ता है. इन लोगों को जब तंबाकू के कारण बीमारी होती है तो ये समझ नहीं पाते हैं कि इसकी वजह तंबाकू है. नतीजतन इन्हें सबसे ज्यादा मार झेलने होती है. ऐसे में सवाल उठता है कि ये कौन सी समझदारी है. सरकार को इस तंबाकू पर टैक्स से जितनी आमदनी होती है उससे कहीं ज्यादा वह इसके खिलाफ जागरुकता फैलाने के लिए प्रचार-प्रसार पर खर्च कर देती है. फिर ऐसा खेल क्यों खेला जाता है. यह एक तरह का कुचक्र है जिसमें सरकार रत्ती भर पैसे के लिए फंसती जा रही है. क्या सिगरेट से मिलने वाला टैक्स उन लाखों करोड़ों रुपयों की भरपाई कर सकता है जो भारत सरकार कैंसर के इलाज और मैनपावर लॉस पर खर्च करती है?

हमें तत्काल कानून की जरूरत

ब्रिटेन में पास हुआ कानून हमारे लिए सबसे बड़ी सबक है. हमारे देश में युवाओं की बहुत बड़ी आबादी ऐसी है जो सिर्फ स्टेट्स सिंबल के लिए सिगरेट की कश में अपनी जिंदगी को बर्बाद कर लेते हैं. टीनएज लड़कियां जिस तरह से स्मोकिंग की ओर आक्रामकता से बढ़ रही है वह और भी चिंताजनक है. कोई देश तभी आगे बढ़ सकता है जब उसके नागरिकों की सेहत दुरुस्त हो. लेकिन हमारे देश में 30 के बाद से ही लोगों को हार्ट डिजीज, मोटापा, डायबिटीज और लिवर की गंभीर बीमारी होने लगी है. ये सारे संकेत इस चिंता को और बढ़ा देती है कि हमें तत्काल ऐसी नीति की जरूरत है जिसमें तंबाकू पूरी तरह से प्रतिबंधित हो. दुनिया के विकसित देश अब स्मोक-फ्री जेनरेशन के मॉडल पर काम कर रहे हैं.भारत जैसे घनी आबादी वाले देश के लिए यह एक उदाहरण है. जिस तरह की मुसीबतें हम झेल रहे हैं, उसमें हमें ऐसे कानून की सख्त आवश्यकता है.

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18 साल से ज्यादा के लंबे करियर में लक्ष्मी नारायण ने डीडी न्यूज, आउटलुक, नई दुनिया, दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों में अपनी सेवाएं दी हैं। समसामयिक विषयों के विभिन्न मुद्दों, राजनीति, समाज, …और पढ़ें

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