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बच्चा रो रहा है बार-बार? हो सकता है वजह डकार न आना, ये टिप्स फॉलो करते ही तुरंत लेगा डकार, नहीं दिखाएगा नखरे

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नवजात शिशु की देखभाल में डकार दिलाना एक बेहद अहम हिस्सा है. सही तरीके से डकार दिलाने से बच्चे के पेट में फंसी हवा बाहर निकलती है, जिससे वह ज्यादा आरामदायक महसूस करता है और उसकी सेहत बेहतर रहती है. आइए जानते है कुछ जरूरी टिप्स…

अक्सर नई मांओं के लिए यह समझना थोड़ा मुश्किल होता है कि बच्चे को सही तरीके से डकार कैसे दिलाई जाए. इसी वजह से कई बार वे बच्चे के व्यवहार और सेहत में होने वाले बदलावों को ठीक से समझ नहीं पातीं. दरअसल, बच्चे को डकार दिलाना उसकी देखभाल का एक जरूरी हिस्सा है. जब मां को बच्चे की डकार सुनाई देती है, तो उसे एक तरह की तसल्ली मिलती है कि बच्चे ने दूध अच्छे से पिया है और वह आराम में है.

लोकल18 से बातचीत में सर्वोदय हॉस्पिटल, सेक्टर-8 के डायरेक्टर और बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. सुशील सिंगला बताते हैं कि डकार दिलाना क्यों जरूरी है, यह समझना बेहद अहम है. जब बच्चा दूध पीता है, खासकर बोतल से, तो उसके साथ कुछ मात्रा में हवा भी उसके पेट में चली जाती है. यही हवा बाद में परेशानी की वजह बनती है. जब इस हवा को बाहर निकाला जाता है, तो उसे ही डकार कहा जाता है.

अगर बच्चे के पेट में यह हवा फंसी रह जाए, तो उसका पेट फूला-फूला लगने लगता है. इससे बच्चे को पेट दर्द हो सकता है, वह बार-बार रोता है, चिड़चिड़ा हो जाता है और कई बार दूध पीने से भी कतराने लगता है. लेकिन यदि समय पर बच्चे को डकार दिला दी जाए, तो वह न सिर्फ आराम महसूस करता है, बल्कि अच्छे से दूध भी पीता है और उसे नींद भी बेहतर आती है. 

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डॉ. सिंगला के अनुसार, कई बार आपने देखा होगा कि बच्चे को दूध पीने के बाद उल्टी हो जाती है. यह भी उसी हवा के बाहर निकलने का एक तरीका होता है, जिसमें दूध के साथ हवा भी बाहर आ जाती है. खासकर बोतल से दूध पीने वाले बच्चों में यह समस्या ज्यादा देखने को मिलती है, जबकि मां का दूध पीने वाले बच्चों में यह अपेक्षाकृत कम होती है. 

बच्चे को डकार दिलाने के कुछ आसान और प्रभावी तरीके भी हैं. आप बच्चे को अपने कंधे से सटा कर उसकी पीठ को हल्के-हल्के थपथपा सकते हैं. इसके अलावा, बच्चे को गोद में सीधा बैठाकर उसकी पीठ पर हल्का दबाव देना भी मददगार होता है. एक और तरीका यह है कि बच्चे को अपनी गोद में पेट के बल लिटाकर उसकी पीठ को धीरे-धीरे सहलाया जाए. इन तरीकों से बच्चे के पेट में फंसी हवा आसानी से बाहर निकल जाती है. 

डकार का मतलब यही है कि बच्चे के पेट की हवा सहजता से बाहर निकल गई. यह समस्या आमतौर पर 4 से 6 महीने तक के बच्चों में ज्यादा देखने को मिलती है. जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, यह समस्या अपने आप कम हो जाती है और 6 महीने के बाद अक्सर खत्म भी हो जाती है. ऐसे में घबराने की जरूरत नहीं होती और सामान्य देखभाल से ही यह समस्या संभाली जा सकती है. 

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अक्सर नई मांओं के लिए यह समझना थोड़ा मुश्किल होता है कि बच्चे को सही तरीके से डकार कैसे दिलाई जाए. इसी वजह से कई बार वे बच्चे के व्यवहार और सेहत में होने वाले बदलावों को ठीक से समझ नहीं पातीं. दरअसल, बच्चे को डकार दिलाना उसकी देखभाल का एक जरूरी हिस्सा है. जब मां को बच्चे की डकार सुनाई देती है, तो उसे एक तरह की तसल्ली मिलती है कि बच्चे ने दूध अच्छे से पिया है और वह आराम में है.

लोकल18 से बातचीत में सर्वोदय हॉस्पिटल, सेक्टर-8 के डायरेक्टर और बाल रोग विशेषज्ञ डॉ. सुशील सिंगला बताते हैं कि डकार दिलाना क्यों जरूरी है, यह समझना बेहद अहम है. जब बच्चा दूध पीता है, खासकर बोतल से, तो उसके साथ कुछ मात्रा में हवा भी उसके पेट में चली जाती है. यही हवा बाद में परेशानी की वजह बनती है. जब इस हवा को बाहर निकाला जाता है, तो उसे ही डकार कहा जाता है.

अगर बच्चे के पेट में यह हवा फंसी रह जाए, तो उसका पेट फूला-फूला लगने लगता है. इससे बच्चे को पेट दर्द हो सकता है, वह बार-बार रोता है, चिड़चिड़ा हो जाता है और कई बार दूध पीने से भी कतराने लगता है. लेकिन यदि समय पर बच्चे को डकार दिला दी जाए, तो वह न सिर्फ आराम महसूस करता है, बल्कि अच्छे से दूध भी पीता है और उसे नींद भी बेहतर आती है. 

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बच्चे को डकार दिलाने के कुछ आसान और प्रभावी तरीके भी हैं. आप बच्चे को अपने कंधे से सटा कर उसकी पीठ को हल्के-हल्के थपथपा सकते हैं. इसके अलावा, बच्चे को गोद में सीधा बैठाकर उसकी पीठ पर हल्का दबाव देना भी मददगार होता है. एक और तरीका यह है कि बच्चे को अपनी गोद में पेट के बल लिटाकर उसकी पीठ को धीरे-धीरे सहलाया जाए. इन तरीकों से बच्चे के पेट में फंसी हवा आसानी से बाहर निकल जाती है. 

डकार का मतलब यही है कि बच्चे के पेट की हवा सहजता से बाहर निकल गई. यह समस्या आमतौर पर 4 से 6 महीने तक के बच्चों में ज्यादा देखने को मिलती है. जैसे-जैसे बच्चा बड़ा होता है, यह समस्या अपने आप कम हो जाती है और 6 महीने के बाद अक्सर खत्म भी हो जाती है. ऐसे में घबराने की जरूरत नहीं होती और सामान्य देखभाल से ही यह समस्या संभाली जा सकती है. 

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