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नई दिल्ली8 मिनट पहले
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सुप्रीम कोर्ट में सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री और धार्मिक भेदभाव से जुड़े मामले में बुधवार की सुनवाई शुरू हो चुकी है। इससे पहले छठे दिन की सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा था कि अगर राज्य सामाजिक सुधार या जनहित के नाम पर किसी धार्मिक प्रथा या रिवाज पर रोक लगाता है, तो उसकी जांच कोर्ट कर सकता है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि भले ही ज्यूडिशियल रिव्यू को लेकर उसकी कुछ सीमाएं हैं, लेकिन कोई यह नहीं कह सकता कि कोर्ट के पास कोई अधिकार ही नहीं है।
आज फैसला आने की संभावना
सुप्रीम कोर्ट में 9 जजों की संवैधानिक बेंच सबरीमाला मंदिर में महिलाओं की एंट्री से जुड़े मामले पर सुनवाई कर रही है। इसके साथ धार्मिक आस्था के 66 मामले और जुड़े हैं। फैसला आने की संभावना है, या फिर कोर्ट इसे रिजर्व भी रख सकता है।
केरल हाईकोर्ट ने 1991 में सबरीमाला में मासिक धर्म वाली महिलाओं (10-50 साल) की एंट्री पर रोक लगाई थी। सुप्रीम कोर्ट ने 2018 में बैन हटा दिया। फैसले के खिलाफ कई पुनर्विचार याचिकाएं लगाई गईं, जिसपर अब सुनवाई हो रही है। मंदिर प्रशासन महिलाओं की एंट्री का विरोध कर रहा है।
7 सवाल, जिनपर सुप्रीम कोर्ट में बहस हो रही

सबरीमाला मामले पर 7 अप्रैल से शुरू हुई सुनवाई
सबरीमाला मंदिर मामले पर 7 अप्रैल से सुनवाई शुरू हुई है। पहले 3 दिन, 9 अप्रैल तक सुनवाई हुई। इस दौरान केंद्र सरकार ने महिलाओं की एंट्री के विरोध में दलीलें रखीं। सरकार ने कहा था कि देश के कई देवी मंदिरों में पुरुषों की एंट्री भी बैन है, इसलिए धार्मिक परंपराओं का सम्मान किया जाना चाहिए।
पिछले 5 दिन की सुनवाई में क्या हुआ, पढ़िए…
7 अप्रैल : केंद्र की दलील- मंदिर में महिलाओं की एंट्री का फैसला गलत
8 अप्रैल- जो भक्त नहीं, वो धार्मिक परंपरा को चुनौती कैसे दे रहा
9 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट बोला- मंदिरों में एंट्री रोकने से समाज बंटेगा
15 अप्रैल- सबरीमाला मैनेजमेंट बोला- अयप्पा मंदिर रेस्टोरेंट नहीं, यहां ब्रह्मचारी देवता
17 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट बोला- संविधान सबसे ऊपर, निजी धार्मिक मान्यताओं से उठकर फैसला जरूरी
21 अप्रैल- सुप्रीम कोर्ट ने पूछा-छूने से देवता अपवित्र कैसे होते हैं
सबरीमाला केस से जुड़ी सुप्रीम कोर्ट में पल-पल की अपडेट्स के लिए नीचे के ब्लॉग से गुजर जाएं…
लाइव अपडेट्स
8 मिनट पहले
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एडवोकेट सुब्रमण्यम ने कहा- दो लोग एक ही धर्म को बिल्कुल एक ही तरीके से नहीं मान सकते
एडवोकेट सुब्रमण्यम ने कहा- आर्टिकल 25(1) में इस्तेमाल किए गए शब्दों को व्यापक अर्थ दिया जाना चाहिए, क्योंकि इनमें व्यक्ति की अपनी मर्जी शामिल है। यहां तक कि धर्म चुनने और उसके आचरण की सीमा तय करने के मामलों में भी। कोई भी दो लोग एक ही धर्म को बिल्कुल एक ही तरीके से नहीं मान सकते, भले ही वे एक ही धर्म के हों; फिर भी, उन दोनों को अपनी मर्जी के मुताबिक धर्म का आचरण करने की पूरी आजादी है। यह आजादी आर्टिकल 25 के तहत सुरक्षित है।
14 मिनट पहले
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एडवोकेट सुब्रमण्यम ने कहा- हर धर्म का अपना एक दर्शन और सिद्धांत होता है
एडवोकेट सुब्रमण्यम ने कहा- इस लिहाज से, आर्टिकल 25(1) एक बुनियादी अधिकार है जिसका दायरा काफी बड़ा है। अंतरात्मा को धर्म के अधिकार से अलग करके देखना भी जरूरी है। अंतरात्मा को अलग और स्वतंत्र शक्ति के तौर पर देखा जा सकता है, जिसके जरिए कोई व्यक्ति धार्मिक दर्शन और सच्चाइयों को अपने अंदर उतारता है।
हर धर्म का अपना एक दर्शन, सिद्धांत, और तौर-तरीके होते हैं जिनके जरिए उन सिद्धांतों को अमल में लाया जाता है। विश्वास और आचरण की सीमा भी व्यक्ति पर ही छोड़ दी जाती है, जो उस धर्म के सिद्धांतों पर निर्भर करती है।
16 मिनट पहले
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एडवोकेट सुब्रमण्यम ने कहा- आर्टिकल 25 के तहत व्यक्तियों को आजादी मिली
एडवोकेट सुब्रमण्यम: आर्टिकल 25 के तहत व्यक्तियों को आज़ादी मिली हुई है। अब, जब हम “प्रोफ़ेस” (मानने) शब्द पर आते हैं, तो इसका मतलब निजी तौर पर मानना और सार्वजनिक तौर पर मानना भी हो सकता है। यह धार्मिक आजादी का ही एक हिस्सा है। अगला शब्द है “प्रैक्टिस” (पालन करना)। प्रैक्टिस निजी तौर पर भी की जा सकती है, और इसे दूसरी जगहों पर भी किया जा सकता है। और फिर धर्म का “प्रचार” करने का अधिकार भी है। अगर किसी व्यक्ति के पास काफी ज्ञान और विद्वत्ता है और वह अपने विश्वास या धर्म के बारे में अपनी समझ दूसरों के साथ बांटना चाहता है, तो वह निश्चित रूप से उसका प्रचार कर सकता है। वह लेक्चर दे सकता है, वह बोल सकता है; आर्टिकल 25(1) के तहत उसे यह आजादी मिली हुई है। यह सब सार्वजनिक व्यवस्था और नैतिकता में आता है; क्योंकि जब आप इन अधिकारों का इस्तेमाल करते हैं, तो आपको बाकी लोगों के अधिकारों का भी ध्यान रखना चाहिए, उनके पास भी इसी तरह की अधिकारों के इस्तेमाल की आजादी है।
32 मिनट पहले
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7वें दिन की सुनवाई शुरू, गोपाल सुब्रण्यम ने दलीलें रखीं
एडवोकेट सुब्रमण्यम: आर्टिकल 25 धार्मिक स्वतंत्रता का विस्तार है, क्योंकि यह धार्मिक स्वतंत्रता के कई पहलुओं से संबंधित है। इसकी अवधारणा क्या है?
यह किसी व्यक्ति की वह निजी यात्रा है, जिसके तहत वह किसी दर्शन को धार्मिक दर्शन के रूप में स्वीकार करता है। इसमें किसी फैसले में दिखाई देने वाले पहलुओं से कहीं अधिक घटक शामिल हैं। इसके चार पहलू हैं, जो सभी अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता में शामिल हैं-
1. धर्म की दार्शनिक सामग्री 2. उस दर्शन की सहायता से जुड़ी प्रथाएं 3. पूजा का अधिकार 4. आस्था का विस्तार
ये सभी आर्टिकल 25 के तहत ‘धर्म’ शब्द के तहत संरक्षित हैं। ऐसा इसलिए है, क्योंकि हो सकता है कि आप उस सिद्धांत की प्रथाओं को न अपनाएं, या हो सकता है कि आप वास्तव में बाहरी पूजा-पाठ में भी शामिल न हों। लेकिन यह एक व्यक्तिगत स्वतंत्रता है।
















































