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साई से लौटकर गांव में सीख रही कुश्ती:12 राष्ट्रीय पदक जीती माधुरी; ओलंपिक में भारत के लिए लाना चाहती हैं मेडल

साई से लौटकर गांव में सीख रही कुश्ती:12 राष्ट्रीय पदक जीती माधुरी; ओलंपिक में भारत के लिए लाना चाहती हैं मेडल

खंडवा जिले के बोरगांवखुर्द की युवा पहलवान माधुरी पटेल देवास में आयोजित कुश्ती महोत्सव में हिस्सा लेने आई हैं। 21 वर्षीय माधुरी का सपना ओलंपिक में देश के लिए पदक जीतना है। वह अपने पिता से कुश्ती के गुर सीख रही हैं। माधुरी अब तक 12 राष्ट्रीय पदक जीत चुकी हैं। उनकी कहानी फिल्म ‘दंगल’ से मिलती-जुलती है, जहां उनके पिता जगदीश पटेल, जो खुद राज्य स्तर के पहलवान रह चुके हैं, पिछले 11 सालों से उन्हें प्रशिक्षण दे रहे हैं। पिता जगदीश पटेल का एकमात्र सपना है कि उनकी बेटी देश के लिए ओलंपिक में पदक जीते। उन्होंने माधुरी के सपनों को साकार करने के लिए अथक प्रयास किए हैं और उनका अटूट विश्वास ही माधुरी की सबसे बड़ी ताकत है। शुरुआत में माधुरी अपने गांव की अकेली लड़की थीं जो अखाड़े में उतरती थीं। उन्हें और उनके पिता को समाज के सवालों का सामना करना पड़ा। माधुरी को भी शुरू में इस संघर्ष और कड़ी मेहनत का अर्थ समझ नहीं आता था, लेकिन जैसे-जैसे उन्होंने दंगल जीते और पदक प्राप्त किए, उन्हें अपनी मेहनत का महत्व समझ आने लगा। आज माधुरी न केवल खुद कुश्ती लड़ रही हैं, बल्कि अपने गांव की 15-20 अन्य बेटियों को भी कुश्ती के लिए प्रेरित कर रही हैं। जो लड़कियां पहले अखाड़े के बाहर खड़ी होकर देखती थीं, वे अब उनके साथ मिट्टी में पसीना बहा रही हैं। सुबह शाम तीन-तीन घंटे करती हैं अभ्यास
माधुरी ने बताया कि उनकी दिनचर्या में हर सुबह और शाम तीन-तीन घंटे का अभ्यास, सख्त आहार और पिता की डांट में छिपा प्यार शामिल है। मुंबई के साई सेंटर तक पहुंचने के बाद भी उन्होंने गांव लौटना चुना, क्योंकि उनका मानना है कि उनका असली संघर्ष और पहचान इसी मिट्टी से जुड़ी है। साम्या के पिता ट्रेन में चने बेचते है
इसी अखाड़े में खंडवा की एक और बेटी, समय साम्या बानो भी अपने सपनों की लड़ाई लड़ रही हैं। 8 साल से कुश्ती कर रही साम्या के पिता ट्रेन में चने बेचते हैं, लेकिन उनकी हिम्मत कभी नहीं टूटी। पांच बार नेशनल में उतर चुकीं साम्या ने एक मेडल जरूर जीता है, पर उनका हौसला उससे कहीं बड़ा है। माधुरी और साम्या की कहानी सिर्फ कुश्ती की नहीं, बल्कि उस जिद की है जो हालातों से लड़ना सिखाती है… उस भरोसे की है जो एक पिता अपनी बेटी पर करता है… और उस सपने की है, जो छोटे गांवों की मिट्टी से निकलकर देश का नाम रोशन करने का हौसला रखता है। आयोजन से जुड़े आकाश संगते ने बताया कि इस कुश्ती महोत्सव में राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय महिला पहलवान अपनी प्रतिभा दिखा रहे हैं। खंडवा से भी कई प्रतिभाशाली महिला पहलवान शामिल हुई है

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साई से लौटकर गांव में सीख रही कुश्ती:12 राष्ट्रीय पदक जीती माधुरी; ओलंपिक में भारत के लिए लाना चाहती हैं मेडल

खंडवा जिले के बोरगांवखुर्द की युवा पहलवान माधुरी पटेल देवास में आयोजित कुश्ती महोत्सव में हिस्सा लेने आई हैं। 21 वर्षीय माधुरी का सपना ओलंपिक में देश के लिए पदक जीतना है। वह अपने पिता से कुश्ती के गुर सीख रही हैं। माधुरी अब तक 12 राष्ट्रीय पदक जीत चुकी हैं। उनकी कहानी फिल्म ‘दंगल’ से मिलती-जुलती है, जहां उनके पिता जगदीश पटेल, जो खुद राज्य स्तर के पहलवान रह चुके हैं, पिछले 11 सालों से उन्हें प्रशिक्षण दे रहे हैं। पिता जगदीश पटेल का एकमात्र सपना है कि उनकी बेटी देश के लिए ओलंपिक में पदक जीते। उन्होंने माधुरी के सपनों को साकार करने के लिए अथक प्रयास किए हैं और उनका अटूट विश्वास ही माधुरी की सबसे बड़ी ताकत है। शुरुआत में माधुरी अपने गांव की अकेली लड़की थीं जो अखाड़े में उतरती थीं। उन्हें और उनके पिता को समाज के सवालों का सामना करना पड़ा। माधुरी को भी शुरू में इस संघर्ष और कड़ी मेहनत का अर्थ समझ नहीं आता था, लेकिन जैसे-जैसे उन्होंने दंगल जीते और पदक प्राप्त किए, उन्हें अपनी मेहनत का महत्व समझ आने लगा। आज माधुरी न केवल खुद कुश्ती लड़ रही हैं, बल्कि अपने गांव की 15-20 अन्य बेटियों को भी कुश्ती के लिए प्रेरित कर रही हैं। जो लड़कियां पहले अखाड़े के बाहर खड़ी होकर देखती थीं, वे अब उनके साथ मिट्टी में पसीना बहा रही हैं। सुबह शाम तीन-तीन घंटे करती हैं अभ्यास
माधुरी ने बताया कि उनकी दिनचर्या में हर सुबह और शाम तीन-तीन घंटे का अभ्यास, सख्त आहार और पिता की डांट में छिपा प्यार शामिल है। मुंबई के साई सेंटर तक पहुंचने के बाद भी उन्होंने गांव लौटना चुना, क्योंकि उनका मानना है कि उनका असली संघर्ष और पहचान इसी मिट्टी से जुड़ी है। साम्या के पिता ट्रेन में चने बेचते है
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