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Supreme Court Live-in Relation Risk

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नई दिल्ली6 मिनट पहले

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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को महिला की याचिका पर सुनवाई करते हुए पूछा कि जब रिश्ता सहमति से था तो अपराध का सवाल कहां उठता है। महिला आरोपी के साथ 15 साल लिव इन रिलेशन में रही उससे उसे एक बच्चा भी है।

यह मामला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने से जुड़ा है, जिसमें महिला के पूर्व लिव-इन पार्टनर के खिलाफ दर्ज FIR रद्द कर दी गई थी।

जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने सुनवाई की। कोर्ट ने कहा कि चूंकि कोई कानूनी विवाह नहीं था, इसलिए यह लिव-इन रिश्ता था और इसमें अलग होना अपराध नहीं माना जा सकता। जस्टिस नागरत्ना ने कहा, “यह इस तरह के रिश्तों का जोखिम है कि कोई भी कभी भी अलग हो सकता है।”

शादी से पहले साथ रहने का फैसला क्यों लिया ?

महिला के वकील ने दलील दी कि आरोपी ने शादी का वादा कर उसके साथ संबंध बनाए और बाद में मुकर गया। इस पर कोर्ट ने सवाल किया कि शादी से पहले साथ रहने का फैसला क्यों लिया गया।

सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि महिला और आरोपी लंबे समय तक साथ रहे और उनके बीच एक बच्चा भी हुआ। उन्होंने कहा, “जब कोई शादी नहीं होती और लिव-इन रिश्ता होता है, तो इसमें जोखिम रहता है कि कोई भी पक्ष कभी भी अलग हो सकता है। ऐसे में अलग होना आपराधिक मामला नहीं बनता।”

महिला के वकील ने बताया कि आरोपी पहले से शादीशुदा था और उसने यह बात छिपाई थी। इस पर कोर्ट ने कहा कि अगर शादी होती तो महिला के अधिकार मजबूत होते और वह बिगैमी या मेंटेनेंस जैसे मामलों में राहत मांग सकती थी।

महिला मेंटेनेंस या मुआवजे की मांग कर सकती है

इसी बीच कोर्ट ने सुझाव दिया कि महिला बच्चे के लिए मेंटेनेंस या मुआवजे की मांग कर सकती है। कोर्ट ने कहा कि आरोपी के जेल जाने से महिला को क्या फायदा होगा, लेकिन बच्चे के लिए आर्थिक मदद पर विचार किया जा सकता है।

बेंच ने मामले में नोटिस जारी करते हुए दोनों पक्षों को आपसी समझौते की संभावना तलाशने को कहा। साथ ही मामले को मध्यस्थता के लिए भी भेजने का सुझाव दिया।

लिव-इन रिलेशन में महिलाओं के अधिकार क्या हैं?

लिव-इन रिलेशन को अपराध की बजाय “सहमति वाला निजी रिश्ता” माना जाता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि महिला के पास कोई कानूनी अधिकार नहीं होते। भारतीय कानून में ऐसे मामलों के लिए कई रास्ते मौजूद हैं:

1. मेंटेनेंस (भरण-पोषण) का अधिकार

  • अगर महिला लंबे समय तक लिव-इन में रही है और आर्थिक रूप से निर्भर थी, तो वह मेंटेनेंस मांग सकती है।
  • प्रोटेक्शन ऑफ वुमेन फ्रॉम डोमेस्टिक वायोलेंस एक्ट, 2005 के तहत लिव-इन रिलेशन को “रिलेशनशिप इन द नेचर ऑफ मैरिज” माना गया है।
  • इस कानून के तहत महिला को रहने का अधिकार और खर्च के लिए सहायता मिल सकती है।

2. बच्चे के अधिकार सबसे मजबूत

  • लिव-इन से जन्मे बच्चे को पूरी तरह वैध माना जाता है।
  • बच्चे को पिता की संपत्ति में अधिकार और मेंटेनेंस मिल सकता है।
  • सुप्रीम कोर्ट कई फैसलों में साफ कर चुका है कि बच्चे के अधिकार शादी पर निर्भर नहीं होते।

3. घरेलू हिंसा में कानूनी सुरक्षा

  • अगर रिश्ते के दौरान महिला के साथ हिंसा या शोषण हुआ है, तो वह घरेलू हिंसा कानून के तहत केस कर सकती है।
  • इसमें शारीरिक, मानसिक, आर्थिक—तीनों तरह की हिंसा शामिल होती है।

4. शादी का झांसा और धोखाधड़ी का मामला कब बनता है

  • अगर शुरू से ही पुरुष का इरादा शादी करने का नहीं था और उसने झूठ बोलकर संबंध बनाए, तो मामला आपराधिक हो सकता है।
  • लेकिन अगर दोनों लंबे समय तक सहमति से साथ रहे, जैसा इस केस में 15 साल, तो कोर्ट आमतौर पर इसे “सहमति वाला रिश्ता” मानता है, अपराध नहीं।

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ये खबर भी पढ़ें:

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यह मामला मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस आदेश को चुनौती देने से जुड़ा है, जिसमें महिला के पूर्व लिव-इन पार्टनर के खिलाफ दर्ज FIR रद्द कर दी गई थी।

जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस उज्जल भुइयां की बेंच ने सुनवाई की। कोर्ट ने कहा कि चूंकि कोई कानूनी विवाह नहीं था, इसलिए यह लिव-इन रिश्ता था और इसमें अलग होना अपराध नहीं माना जा सकता। जस्टिस नागरत्ना ने कहा, “यह इस तरह के रिश्तों का जोखिम है कि कोई भी कभी भी अलग हो सकता है।”

शादी से पहले साथ रहने का फैसला क्यों लिया ?

महिला के वकील ने दलील दी कि आरोपी ने शादी का वादा कर उसके साथ संबंध बनाए और बाद में मुकर गया। इस पर कोर्ट ने सवाल किया कि शादी से पहले साथ रहने का फैसला क्यों लिया गया।

सुनवाई के दौरान जस्टिस नागरत्ना ने कहा कि महिला और आरोपी लंबे समय तक साथ रहे और उनके बीच एक बच्चा भी हुआ। उन्होंने कहा, “जब कोई शादी नहीं होती और लिव-इन रिश्ता होता है, तो इसमें जोखिम रहता है कि कोई भी पक्ष कभी भी अलग हो सकता है। ऐसे में अलग होना आपराधिक मामला नहीं बनता।”

महिला के वकील ने बताया कि आरोपी पहले से शादीशुदा था और उसने यह बात छिपाई थी। इस पर कोर्ट ने कहा कि अगर शादी होती तो महिला के अधिकार मजबूत होते और वह बिगैमी या मेंटेनेंस जैसे मामलों में राहत मांग सकती थी।

महिला मेंटेनेंस या मुआवजे की मांग कर सकती है

इसी बीच कोर्ट ने सुझाव दिया कि महिला बच्चे के लिए मेंटेनेंस या मुआवजे की मांग कर सकती है। कोर्ट ने कहा कि आरोपी के जेल जाने से महिला को क्या फायदा होगा, लेकिन बच्चे के लिए आर्थिक मदद पर विचार किया जा सकता है।

बेंच ने मामले में नोटिस जारी करते हुए दोनों पक्षों को आपसी समझौते की संभावना तलाशने को कहा। साथ ही मामले को मध्यस्थता के लिए भी भेजने का सुझाव दिया।

लिव-इन रिलेशन में महिलाओं के अधिकार क्या हैं?

लिव-इन रिलेशन को अपराध की बजाय “सहमति वाला निजी रिश्ता” माना जाता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि महिला के पास कोई कानूनी अधिकार नहीं होते। भारतीय कानून में ऐसे मामलों के लिए कई रास्ते मौजूद हैं:

1. मेंटेनेंस (भरण-पोषण) का अधिकार

  • अगर महिला लंबे समय तक लिव-इन में रही है और आर्थिक रूप से निर्भर थी, तो वह मेंटेनेंस मांग सकती है।
  • प्रोटेक्शन ऑफ वुमेन फ्रॉम डोमेस्टिक वायोलेंस एक्ट, 2005 के तहत लिव-इन रिलेशन को “रिलेशनशिप इन द नेचर ऑफ मैरिज” माना गया है।
  • इस कानून के तहत महिला को रहने का अधिकार और खर्च के लिए सहायता मिल सकती है।

2. बच्चे के अधिकार सबसे मजबूत

  • लिव-इन से जन्मे बच्चे को पूरी तरह वैध माना जाता है।
  • बच्चे को पिता की संपत्ति में अधिकार और मेंटेनेंस मिल सकता है।
  • सुप्रीम कोर्ट कई फैसलों में साफ कर चुका है कि बच्चे के अधिकार शादी पर निर्भर नहीं होते।

3. घरेलू हिंसा में कानूनी सुरक्षा

  • अगर रिश्ते के दौरान महिला के साथ हिंसा या शोषण हुआ है, तो वह घरेलू हिंसा कानून के तहत केस कर सकती है।
  • इसमें शारीरिक, मानसिक, आर्थिक—तीनों तरह की हिंसा शामिल होती है।

4. शादी का झांसा और धोखाधड़ी का मामला कब बनता है

  • अगर शुरू से ही पुरुष का इरादा शादी करने का नहीं था और उसने झूठ बोलकर संबंध बनाए, तो मामला आपराधिक हो सकता है।
  • लेकिन अगर दोनों लंबे समय तक सहमति से साथ रहे, जैसा इस केस में 15 साल, तो कोर्ट आमतौर पर इसे “सहमति वाला रिश्ता” मानता है, अपराध नहीं।

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